हमारे पाठकों से : पूंजीपति वर्ग श्रमिक वर्ग के राजनीतिक अधिकारों का हनन कर रहा है

संपादक महोदय,

‘उदारीकरण और निजीकरण के तीस साल बाद’ तथा ‘सर्व हिन्द निजीकरण विरोधी मंच’ (ए.आई.एफ.ए.पी.) की स्थापना की रिपोर्ट, ये दोनों ही लेख मौजूदा हालात को देखते हुए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विगत तीस सालों का अध्ययन करने पर हम यह पाते हैं कि सोवियत संघ के विघटन के साथ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) तथा विश्व बैंक के प्रभाव तले, नीतियों को किस कदर पूंजीपतियों को विकसित करने के लिए, उनके अनुरूप बनाया गया। बॉम्बे प्लान के तहत आज़ादी के तीन दशकों तक हिन्दोस्तानी सरमायदारों ने अपने आपको बाज़ार में और सशक्त बनाया। 90 के दशक के पश्चात बाज़ारों को पूरी तरह खोला गया ताकि देशी और विदेशी पूंजी पूरी तरह से बाज़ारों पर हावी हो सके।

पिछले तीन दशकों का विश्लेषण साफ बताता है कि श्रमिक वर्ग और मालिक वर्ग के बीच अंतर बहुत-बहुत बढ़ चुके हैं। एक तरफ मज़दूर किसान गहरी आर्थिक विषमताओं की दलदल में धँस चुके हैं, उन्हें राजनीतिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया है, जबकि दूसरी और हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग श्रमिक वर्ग के राजनीतिक अधिकारों का हनन कर रहा है और विश्व स्तर पर बेशुमार संपत्तिवानों की संख्या में अपने आपको शामिल करवा रहा है।

1990 में हिन्दोस्तानी डॉलर अरबपतियों की संख्या शून्य थी जो 2020 में बढ़कर 140 हो गयी। यह घिनौना इतिहास है कि ज़रूरत पड़ने पर सार्वजनिक पैसों का इस्तेमाल किया गया और आज मालामाल होने के बाद उसी सार्वजनिक संपत्ति को कौड़ियों के मोल खरीद कर हिन्दोस्तनी सरमायदार अपने साम्राज्य को और बढ़ा रहा है। देश की सम्पदा के वास्तविक मालिक मज़दूर और किसान हैं जो अपनी श्रमशक्ति के द्वारा दौलत पैदा करते हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य और सरमायदारों को कोई हक़ नहीं है कि देश की सम्पदा की खरीद फरोख़्त की जाये और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाये। यह आवश्यक है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां जिनका मक़सद मुनाफ़ा कमाना नहीं है बल्कि एकमात्र काम है सेवा करना, इनके निजीकरण पर फ़ौरन प्रतिबन्ध लगाया जाये।

सर्व हिन्द निजीकरण विरोधी मंच; (ए.आई.एफ.ए.पी.) की स्थापना आज वक्त की ज़रूरत है। यह मज़दूर संगठनों की एक ताकत है; यह अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूरों को एक दूसरे के संघर्षों से जोड़ता है और निजीकरण जैसे देश-विरोधी समाज-विरोधी कार्यक्रमों से लड़ने की हिम्मत पैदा करता है।

मैं ए.आई.एफ.ए.पी. में कार्यरत तमाम यूनियनों का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है कि देश में चल रहे संघर्षों के प्रवाह को और तेज़ करेगा। ए.आई.एफ.ए.पी. एक ऐसा मंच साबित होगा जो सरमायदारी व्यवस्था को घुटने पर लाकर खड़ा कर देगा। मैं ए.आई.एफ.ए.पी. की लंबे; संघर्षमयी और सफल जीवन की शुभकामना देता हूँ।

विवेचन, मुंबई

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