उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम की शुरुआत के 30 साल बाद

तीस साल पहले 24 जुलाई को तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में बनी सरकार का पहला बजट पेश किया था। वह सरकार 10वीं लोकसभा के चुनाव के बाद बनी थी, जिसके दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी।

वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने समय घोषणा की थी कि भुगतान-संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट्स) की स्थिति अनिश्चित है और हिन्दोस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार एक महीने के आयात के लिए भी भुगतान करने के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि बहुत अधिक स्तर के कर्ज़ और ब्याज भुगतान की ज़रूरत के कारण, केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति संकट में है, उन्होंने घोषणा की कि “हमने आज़ाद हिन्दोस्तान के इतिहास में ऐसी स्थिति का सामना पहले कभी नहीं किया है”। इसके बाद उन्होंने व्यापार, निवेश और सार्वजनिक क्षेत्र से संबंधित नीतियों, कानूनों और नियमों में बड़े बदलावों के एक कार्यक्रम का अनावरण किया, जो मोटे तौर पर विश्व बैंक और आई.एम.एफ. के नुस्खे के अनुरूप था।

1991 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम की 30वीं वर्षगांठ, हमारे लिए उन हालातों को पीछे मुड़कर देखने और अब तक के अनुभव का विश्लेषण करने का एक अवसर प्रदान करता है। इसकी शुरुआत क्यों की गई थी? यह किसके हित में शुरू किया गया था? पिछले तीन दशकों में उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम का फ़ायदा किसे हुआ है और किसे नुक़सान हुआ है?

क्यों और किसके हित में?

1947 में उपनिवेशवादी शासन की समाप्ति के बाद से हमारे देश के आर्थिक विकास का एजेंडा, सबसे अमीर पूंजीवादी घरानों द्वारा निर्धारित किया जाता रहा है। 1950 के दशक में अपनाया गया नीतिगत ढांचा, उस समय देश और विश्व स्तर पर मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, टाटा, बिड़ला और अन्य बड़े पूंजीवादी घरानों द्वारा तैयार किया गया था।

सत्ता के हस्तांतरण से कुछ साल पहले, टाटा, बिड़ला और अन्य बड़े औद्योगिक घरानों ने उपनिवेशवादी सत्ता के हस्तांतरण के बाद हिन्दोस्तान में पूंजीवाद के विकास के लिए उपयुक्त नीति और योजना तैयार की थी। इसे बॉम्बे प्लान का नाम दिया गया और यह योजना 1944-45 में दो खंडों में प्रकाशित की गयी थी। यह योजना, जिसको आमतौर पर, “टाटा-बिड़ला प्लान” के रूप में जाना जाता है, आज़ाद हिन्दोस्तान की पहली तीन पंचवर्षीय योजनाओं का आधार थी।

जब ब्रिटिश शासन का अंत हुआ, उस समय हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों के सबसे अमीर वर्ग के पास भी, औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक भारी उद्योग, ऊर्जा और अन्य बुनियादी ढांचे में निवेश करने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं थी। उन्होंने फ़ैसला किया कि केंद्र सरकार को ऐसे उद्योगों में निवेश के लिए टैक्स और उधार के माध्यम से वित्तीय संसाधन जुटाना चाहिए। निर्मित उपभोक्ता वस्तुओं और परिवहन वाहनों के लिए घरेलू बाज़ार पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए, उन्हें वक्त चाहिए था और इसलिए हिन्दोस्तानी बड़े पूंजीपति चाहते थे कि सरकार इन क्षेत्रों में विदेशी निवेश और इस तरह की उपभोक्ता वस्तुओं के आयात को प्रतिबंधित करने की नीति अपनाए। वे चाहते थे कि राज्य आयात और निवेश के लिए लाइसेंसों को विनियमित करे, ताकि वे अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके ऐसे लाइसेंसों पर अपना एकाधिकार जमा सकें। बॉम्बे प्लान को बड़े औद्योगिक घरानों की इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ही तैयार किया गया था।

1950 के दशक में विश्व स्तर पर वक्त की मांग थी – क्रांति। हिन्दोस्तान सहित सभी नए आज़ाद देशों में, अधिकांश लोगों के दिल में समाजवादी व्यवस्था हासिल करने की तमन्ना थी। ऐसी परिस्थितियों में नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने, टाटा-बिड़ला योजना को हिन्दोतान में “समाज के समाजवादी नमूने” के निर्माण के लिए एक परियोजना के रूप में पेश किया।

राज्य द्वारा संचालित भारी उद्योगों के एक सार्वजनिक क्षेत्र के निर्माण के साथ-साथ, कृषि क्षेत्र में सीमित भूमि सुधार भी किए गए। 1960 के दशक में शासक वर्ग ने विश्व बैंक की तकनीकी सहायता के साथ पूंजीवादी और व्यवसायिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए, “हरित क्रांति” की शुरुआत की।

आज़ादी के बाद के प्रारंभिक दशकों के दौरान, पूंजीवादी इजारेदार घरानों द्वारा निर्धारित एजेंडे के लागू किये जाने के परिणामस्वरूप, मज़दूरों और किसानों में भारी असंतोष फैला। एक तरफ सम्पति कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों के हाथ में ही जमा हो रही थी, दूसरी तरफ देश के मेहनतकश बहुसंख्यक लोग बेहद ग़रीब और उत्पीड़ित ही बने रहे।

1980 के दशक तक पहुंचते-पहंुचते देश और विश्व स्तर पर परिस्थितियां कई मायनों में बहुत ही बदल चुकी थीं। 1950 के दशक में अपनाया गया नीतिगत ढांचा, अब पूंजीवादी इजारेदार घरानों की ज़रूरतों के लिए उपयुक्त नहीं था। उद्योग के सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार के साथ-साथ वाणिज्यिक कृषि के प्रसार के द्वारा पूंजीपतियों की आंकाक्षाओं को पूरा करने की क्षमता ख़त्म हो चुकी थी। सुरक्षात्मक आयात और निवेश नीतियों ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी जिसमें हिन्दोस्तान में निर्मित वस्तुएं विश्व बाज़ार में विदेशी वस्तुओं के साथ प्रभावी रूप से प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ थीं। हरित क्रांति को बढ़ावा देने वाले रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से और एक ही फ़सल पैदा करने की पद्धति से मिट्टी की उर्वरता में भी कमी हो गयी थी। उद्योग और कृषि दोनों ही ठहराव का सामना कर रहे थे, जबकि सरकार का घाटा और उधार, नियंत्रण से बाहर हो रहा था।

1980 के दशक के दौरान बढ़ते साम्राज्यवादी दबाव में, जिसे विश्व बैंक के माध्यम से लागू किया गया था, घरेलू बाज़ार को खोलने और आयात और विदेशी पूंजी निवेश के लिए देश की आर्थिक व्यवस्था में उपयुक्त सुधार लाने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य पर बहुत दबाव था। इन परिस्थितियों में, हिन्दोस्तानी सरकार ने धीरे-धीरे लाइसेंस की आवश्यकता के बिना अधिक से अधिक वस्तुओं को आयात करने की छूट दी और आयात शुल्क को धीरे-धीरे कम किया। थोड़ा-थोड़ा करके, रुपये को डॉलर के मुक़ाबले विनिमय मूल्य में कमज़ोर किया गया, जिससे हिन्दोस्तान से निर्यात अधिक प्रतिस्पर्धी हो गया।

टाटा, बिड़ला और अन्य पूंजीवादी घरानों ने विदेशी प्रतिस्पर्धा को प्रतिबंधित करके, घरेलू बाज़ार पर अपना नियंत्रण क़ायम किया था। 1980 के दशक के मध्य तक उन्होंने उन प्रतिबंधों को हटाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया ताकि वे विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकें। हालांकि, वे हिन्दोस्तानी बाज़ार को बहुत तेज़ी से नहीं खोलना चाहते थे। वे विदेशी कंपनियों के हाथों, हिन्दोस्तानी बाज़ार में अपना दबदबा खोने के जोखिम से बचना चाहते थे। इसलिए हिन्दोस्तानी सरकार के प्रतिनिधियों ने, इस बदलाव के लिए पर्याप्त समय की मांग लेकर, विश्व बैंक के साथ बातचीत की। इस बदलाव की मौजूदा प्रक्रिया ने 1991 में विश्व स्तर पर अचानक हुए परिवर्तनों के अनुरूप अचानक बड़े परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।

1991 में सोवियत संघ विघटन की ओर बढ़ रहा था। समाजवादी अल्बानिया सहित पूर्वी यूरोप के देश प्रतिक्रान्ति की लहरों का सामना कर रहे थे। अमरीका अपने साम्राज्यवादी सहयोगियों को एक अभूतपूर्व आक्रमण शुरू करने के लिए एकजुट कर रहा था, एक ऐसा आक्रमण जो न कि केवल समाजवाद के आदर्श के ख़िलाफ़ था, बल्कि उन सभी अधिकारों के ख़िलाफ़ था, जो मज़दूर वर्ग और आम लोगों ने लंबे संघर्षों और कुर्बानियों के बाद जीते थे। विश्व स्तर पर क्रांति का ज्वार, प्रवाह से उतार की ओर मुड़ चला था।

दुनिया के दो-ध्रुवीय विभाजन की पूरी अवधि के दौरान, हिन्दोस्तानी शासकों ने सोवियत संघ के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों का इस्तेमाल, संयुक्त राज्य अमरीका और वैश्विक एजेंसियों के दबाव का विरोध करने के लिए एक प्रतित्तोलक भार के रूप में किया था। सोवियत संघ के पतन की ओर बढ़ने के साथ, हिन्दोस्तानी शासक वर्ग अब पहले की तरह चालाकी नहीं कर सकता था।

1980 के दशक के अंत तक, हिन्दोस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का स्तर एक ख़तरनाक स्तर पर पहुंच चुका था। इन परिस्थितियों में, हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपतियों ने 1991 में अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी दबाव के आगे घुटने टेक दिए। उन्होंने अपना रास्ता बदला और खुले तौर पर यह घोषणा करने के लिए सहमत हुए कि हिन्दोस्तान “समाज के समाजवादी नमूने” के पहले के दृष्टिकोण से अपना नाता तोड़ रहा है। टेक्नोक्रैट मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया गया। उन्हें, भुगतान संतुलन के संकट का इस्तेमाल करके, विश्व बैंक और आई.एम.एफ. द्वारा निर्धारित व्यापार और निवेश नीतियों में उपयुक्त सुधार शुरू करने की योजना की घोषणा करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी।

हमारे देश में पूंजीवाद का विकास उस चरण में पहुंच चुका था जब हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीवादी घरानों ने हमारे देश में विदेशी पूंजी निवेश को उनके अपने वैश्विक विस्तारवादी मंसूबों को हासिल करने में एक आवश्यक क़दम के रूप में देखना शुरू कर दिया था। विदेशी पूंजी के प्रति हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपतियों के दृष्टिकोण में इस बदलाव को दर्शाते हुए, मनमोहन सिंह ने अपने भाषण में कहा, “औद्योगीकरण के लिए चार दशकों की योजना लागू करने के बाद, हम अब विकास के उस चरण में पहुंच गए हैं जहां हमें डर की बजाय विदेशी निवेश का स्वागत करना चाहिए।” उन्होंने घोषणा की कि अधिकांश क्षेत्रों में विदेशी निवेश के साथ-साथ बड़े पैमाने पर घरेलू निवेश के लिए अब लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होगी।

मनमोहन सिंह ने अपने भाषण में निजीकरण शब्द का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के पुनर्गठन की आवश्यकता के बारे में बात की ताकि उसके द्वारा और भी मुनाफ़ा बनाया जा सके। यह दिखाता है कि इजारेदार पूंजीवादी घराने, व्यापार और निवेश नीतियों को उदार बनाने के उपायों को लागू करने का फ़ैसला पहले ही कर चुके थे। उदारीकरण का मतलब था कि अब व्यवसाय शुरू करने के लिए लाइसेंस और परमिट की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने निजीकरण कार्यक्रम को धीरे-धीरे और चुपके से आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया।

30 साल के बाद नतीजे

मनमोहन सिंह द्वारा अनावरण किए गए कार्यक्रम को पिछले तीन दशकों में केंद्र और राज्यों में सत्ता में आयी सभी सरकारों द्वारा लगातार विकसित और कार्यान्वित किया गया है। नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार के बाद देवेगौड़ा और इंदर कुमार गुजराल के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनी। फिर वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा की गठबंधन सरकार आई, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस गठबंधन की दो बार और अब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार आई। उदारीकरण और निजीकरण के माध्यम से वैश्वीकरण के कार्यक्रम को प्रत्येक सरकार ने न केवल विरासत में प्राप्त किया है बल्कि हर सरकार ने इस एजेंडा को और भी आगे बढ़ाया है।

रेलवे, बैंकिंग, कोयला, पेट्रोलियम, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं के निजीकरण से बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरियों का नुकसान हुआ है, काम करने की हालातों में गिरावट आई है, कई सेवाओं की गुणवत्ता ख़राब हुई है और इन सभी सेवाओं की क़ीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। हिन्दोस्तानी और अंतर्राष्ट्रीय इजारेदार कंपनियों के बढ़ते प्रभुत्व ने बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम स्तर के उत्पादकों और व्यापारियों को नष्ट कर दिया है। हर साल, नए निवेश द्वारा सृजित नई नौकरियों की संख्या की तुलना में कहीं अधिक पुरानी नौकरियां ख़त्म हो जाती हैं। नतीजतन, कोरोना वायरस महामारी शुरू होने से पहले ही, बेरोज़गारी 45 वर्षों में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। अस्थायी अनुबंधों पर श्रमिकों को काम पर रखना और उन्हें नौकरी की सुरक्षा और सेवानिवृत्ति के लाभों से वंचित करना, अब एक नियम बन गया है।

कृषि क्षेत्र में लगने वाली सभी वस्तुओं और इस क्षेत्र के उत्पादों के बाज़ारों को, वैश्विक और हिन्दोस्तानी पूंजीवादी निगमों के प्रभुत्व और लूट के लिए और अधिक खोल दिया गया है। इन क़दमों ने, कृषि आय की असुरक्षा को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा दिया है, जिससे किसान गहरे कर्ज़ में डूब गए हैं। इन तीन दशकों में लाखों किसानों को आत्महत्या करने तक के लिए मजबूर किया गया है।

हिन्दोस्तान के अमीर पूंजीपति पहले से कहीं ज्यादा तेज़ी से अमीर हो रहे हैं। डॉलर अरबपतियों की संख्या 1990 में शून्य से बढ़कर वर्ष 2020 में 140 हो गई है। एक डॉलर अरबपति वह है जिसके पास आज की विनिमय दर पर, 7500 करोड़ रुपये या उससे अधिक की निजी संपत्ति है।

टाटा, अंबानी, बिरला, अदानी और अन्य इजारेदार पूंजीवादी घरानों ने वैश्विक बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी का विस्तार किया है और विदेशों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। उनमें से कुछ, हमारे अपने देश की तुलना में विदेशों से अधिक मुनाफ़ा कमाते हैं। वैश्वीकरण का वास्तविक अर्थ और उद्देश्य अब सबको प्रत्यक्ष रूप से सामने दिख रहा है। यह एक तरफ, हिन्दोस्तानी इजारेदार घरानों की दुनिया के सबसे अमीर पूंजीपतियों की कतार में शामिल होने की मुहिम है, जबकि दूसरी तरफ हमारे देश के मज़दूर और किसान दुनिया के सबसे ग़रीब लोगों में गिने जाते हैं। यह इजारेदार पूंजीपतियों के लालच और उनके साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए देश और उसकी अर्थव्यवस्था को संकटग्रस्त विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था से और अधिक उलझाने का कार्यक्रम है। इस सच्चाई को छिपाने के लिए कि 30 साल पहले शुरू किए गए कार्यक्रम का उद्देश्य, इजारेदार पूंजीवादी लालच को पूरा करना था, मनमोहन सिंह के बजट भाषण में ट्रस्टीशिप के गांधीवादी सिद्धांत का उल्लेख किया गया था। उन्होंने कहा (मनमोहन सिंह के शब्दों में), – “धन-सम्पति के निर्माण के लिए, हमें पूंजी के संचय को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसका मतलब अनिवार्य रूप से होगा – आत्मसंयम का शासन। हमें धन पैदा करने वालों (अर्थात पूंजीपतियों) के रास्ते की रुकावटों को भी दूर करना है। … जो लोग इसे (पूंजी) बनाते हैं और उसके मालिक हैं, उन्हें (इस पूंजी को) एक ट्रस्ट के रूप में रखना होगा और इसका उपयोग समाज के हित में करना होगा, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें कम-विशेषाधिकार प्राप्त हैं और जिनके पास (जीने के) पर्याप्त साधन नहीं हैं। वर्षों पहले, गांधी जी ने ट्रस्टीशिप के दर्शन की व्याख्या की थी। यह दर्शन हमारा मार्गदर्शक सितारा होना चाहिए।”

जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है, इजारेदार पूंजीपतियों ने इन तीन दशकों में भारी मात्रा में बेशुमार धन-संपत्ति जमा की है। उन्होंने अपने धन को समाज के हित में लगाने की बात तो दूर, अपनी संपत्ति को केवल अपने लिए, और अधिक धन संचय करने के हित में ही लगाया है।

मनमोहन सिंह पूंजीपतियों को दौलत पैदा करने वाले बताकर, एक सफेद झूठ को सच करने की कोशिश कर रहे थे। यह मानव श्रम ही है जो धन- संपत्ति बनाता है। मज़दूर, किसान और अन्य मेहनतकश लोग ही धन-सम्पति के असली निर्माता हैं। पूंजीपति बड़े पैमाने के उत्पादन के साधनों के मालिक हैं। वे मज़दूरों और किसानों का शोषण और लूट करके ही अपनी संपत्ति का विस्तार करते हैं।

आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों में कई आवश्यक वस्तुओं में भारी कमी देखी गयी,  आम लोगों को कई अकालों और खाद्य-पदार्थों के लिए दंगों का सामना करना पड़ा। आज बाज़ार में बहुत सारी वस्तुएं उपलब्ध हैं। हालांकि, अधिकांश लोगों के पास उन्हें खरीदने के लिए पर्याप्त क्रय-शक्ति नहीं है। नतीजतन, अर्थव्यवस्था संकट में है। पूरे देश में, मज़दूरों और किसानों के विरोध प्रदर्शन बड़े पैमाने पर हो रहे हैं।

निष्कर्ष

सोवियत संघ के पतन बाद की अवधि की परिस्थितियों में अपने खुदगर्ज मंसूबों को हासिल करने के लिए इजारेदार पूंजीपतियों के अपने पुराने नीतिगत ढांचे को तोड़ने का फ़ैसला, 1991 में प्रमुख सुधारों की शुरूआत का आधार है। विश्व बैंक और आई.एम.एफ. द्वारा निर्धारित वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के नुस्खे को अपनाने के लिए टाटा, अंबानी, बिरला और अन्य लोगों के फ़ैसले में निहित है। मनमोहन सिंह को 30 साल पहले अपने बजट भाषण में इस कार्यक्रम के अनावरण का ज़िम्मा सौंपा गया था।

नतीजे इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह पूंजीवादी शोषण और साम्राज्यवादी लूट की गति को और भी तीव्र करके, हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के लालच को पूरा करने का कार्यक्रम है।

इजारेदार पूंजीपतियों के प्रवक्ता, मनमोहन सिंह के 1991 के बजट भाषण की स्वाभाविक रूप से प्रशंसा करते हैं। मज़दूरों, किसानों और मेहनतकश बहुसंख्यक लोगों के लिए यह इजारेदार पूंजीवादी विकास के सबसे विनाशकारी चरण की शुरुआत का प्रतीक है। आम मेहनतकश लोगों की आजीविका और ज़िंदगी एवं प्राकृतिक पर्यावरण के लिए इसके विनाशकारी परिणाम हमारे सामने हैं।

आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता, इस समाज-विरोधी कार्यक्रम को तत्काल समाप्त करने के लिए एकजुट होकर लड़ना है, जिससे लोगो को अर्थव्यवस्था की दिशा को बदलने का हक़ हासिल हो सके। नयी आर्थिक व्यवस्था में इजारेदार पूंजीवादी लालच को पूरा करने की बजाय, वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन को लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किया जाएगा।

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