राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के 46 साल :
जब हिन्दोस्तानी गणराज्य का बदसूरत चेहरा सामने आया

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति ने राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की 46वीं बरसी के अवसर पर दिल्ली में एक सभा आयोजित की। पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह ने आपातकाल की अवधि और उस समय से लेकर अब तक हुयी राजनीतिक गतिविधियों से मिलने वाले सबकों पर एक जोशीली चर्चा शुरू की। उनकी प्रस्तुति का सम्पादित रूप यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है।

आज से 46 साल पहले, 25-26 जून, 1975 की आधी रात को, तत्कालीन राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद ने संविधान की धारा 352 के तहत, “राष्ट्रीय आपातकाल” के घोषणा की थी। वह फ़ैसला तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से सलाह करके लिया गया था। सरकार ने आपातकाल लागू करने का यह कारण दिया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा पहुंचाने वाली अंदरूनी गड़बड़ियाँ फैल रही थीं।

एक झटके में लोगों को उन सभी अधिकारों से वंचित कर दिया गया, जो संविधान में लिखे हुए हैं। मज़दूरों की हड़तालों पर रोक लगाई गयी। ट्रेड यूनियन नेताओं और छात्र कार्यकर्ताओं को जेल में बंद किया गया। दिल्ली, मुंबई और दूसरे शहरों में झुग्गी वासियों को बलपूर्वक अपने घरों से निकला गया और उनके घरों को जलाकर राख कर दिया गया। “जनसंख्या नियंत्रण” के नाम पर, लाखों-लाखों मज़दूरों, किसानों और नौजवानों की बलपूर्वक नसबंदी कराई गई।

लोगों को बोलने और सभा करने के अधिकार से वंचित किया गया। अख़बारों पर सेंसरशिप लागू किया गया। सरकार की हर प्रकार की आलोचना पर रोक लगा दी गयी। गुजरात और तामिलनाडु में विपक्ष की पार्टियों की राज्य सरकारों को निलंबित किया गया। संविधान में संशोधन करके, संसद के कार्यकाल को बढ़ाया गया और चुनावों को स्थगित किया गया।

आपातकाल को लागू करने का फै़सला किसने लिया था? उसका मुख्य मक़सद क्या था? इन सवालों के असली जवाबों को छिपाने के लिए बहुत सारी गलत धारणाएं फैलाई गयी हैं। आज तक पूंजीपतियों के राजनीतिक विशेषज्ञ यह प्रचार करते हैं कि इंदिरा गांधी ने यह फै़सला लिया था। वे कहते हैं कि ऐसा करने में उनका राजनीतिक मक़सद था अपनी राजनीतिक तरक्की को बनाये रखना, जो अदालतों के फ़ैसलों के कारण ख़तरे में थी।

साथियों, हम जानते हैं कि आपातकाल की घोषणा जैसा मुख्य फ़ैसला किसी एक व्यक्ति के हितों के लिए नहीं लिया जाता है। ऐसे फ़ैसले सत्ताधारी वर्ग द्वारा, अपने हितों के लिए, लिए जाते हैं।

26 जून,1975 को हिन्दोस्तान के हुक्मरानों ने आपातकाल की घोषणा करने का फ़ैसला क्यों लिया था? इसका कारण समझने के लिए हमें उस समय की हालातों पर ध्यान देना होगा।

वह ऐसा समय था जब साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़, लोक जनवाद (पीपल्स डेमोक्रेसी) और समाजवाद के लिए क्रान्तिकारी संघर्ष दुनियाभर में फैल रहे थे। अति-शक्तिमान अमरीकी सेना के ख़िलाफ़ वियतनामी लोगों के लम्बे राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष की 1975 में जीत हुयी।

हिन्दोस्तान के अन्दर हालतें क्रांति के लिए परिपक्व थीं। लोग भारी संख्या में सड़कों पर उतर रहे थे। पूंजीवाद के विकास के साथ-साथ, पिछड़े सामंती और जातिवादी संबंधों के बरकरार रखे जाने की वजह से मज़दूरों और किसानों का शोषण-दमन बहुत तीव्र हो गया था।

मार्च 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग जिले के एक गांव, नक्सलबाड़ी में कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों ने बड़े ज़मींदारों के ख़िलाफ़, लगभग 50,000 ग़रीब और भूमिहीन किसानों के जन-विद्रोह को अगुवाई दी। चारू मजूमदार और उनके कामरेडों की अगुवाई में उस कम्युनिस्ट दल ने सभी कम्युनिस्टों से आह्वान किया कि समाजवाद के लिए संसदीय लोकतंत्र पर भरोसा करने की लाइन से पूरी तरह नाता तोड़ दें। इसके साथ, कम्युनिस्ट आन्दोलन में एक नयी धारा, जागृति की एक नयी लहर शुरू हुयी। इसी लहर में आगे चलकर, 1969 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की स्थापना हुयी।

कामरेड चारू मजूमदार की अगुवाई में भाकपा (माले) ने बड़ी बहादुरी के साथ इस सच्चाई को स्पष्ट किया कि 1947 में उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के साथ विश्वासघात किया गया था। राजनीतिक सत्ता को अंग्रेज साम्राज्यवादियों के हाथों से, हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों और बड़े ज़मींदारों के हाथों में हस्तांतरित किया गया। उपनिवेशवाद के पश्चात, हिन्दोस्तान में अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गयी, शोषण की घिनावनी व्यवस्था बरकरार रखी गयी। इस विश्लेषण और निष्कर्ष के आधार पर पार्टी ने साम्राज्यवाद-विरोधी और सामंतवाद-विरोधी संघर्ष को पूरा करने के लिए, लोक जनवादी क्रांति का आह्वान किया। “1947 की जंजीरों को चकनाचूर करना होगा!”, यह नारा दबे-कुचले जनसमुदाय और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के दिलों और दिमागों में बस गया।

देश के अनेक इलाकों में और विदेशों में निवासी हिन्दोस्तानियों में, हजारों-हजारों कम्युनिस्ट भाकपा (माले) के इस आह्वान के इर्द-गिर्द लामबंध हुए। कनाडा, अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में कम्युनिस्टों ने भाकपा (माले) की अगुवाई में चल रहे क्रान्तिकारी आन्दोलन के समर्थन में हिन्दोस्तानी मज़दूरों और छात्रों को संगठित करना शुरू कर दिया। हर विश्वविद्यालय और कालेज परिसर में नौजवान छात्र हिन्दोस्तानी राज्य के चरित्र में आमूल परिवर्तन लाने के इस आह्वान से प्रेरित होकर आगे आये।

जैसे-जैसे इस क्रान्तिकारी जागरुकता का विस्तार होता गया, वैसे-वैसे 1970 के शुरुआती वर्षों में मज़दूरों और किसानों के संघर्ष और तेज़ होने लगे। इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों ने वहशी राजकीय दमन के साथ इसका जवाब दिया। 1968 के आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम (एस्मा) को लागू करके अनेक क्षेत्रों में मज़दूरों की हड़तालों को अवैध करार किया गया। 1971 में लागू किये गए अंदरूनी सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मीसा) के तहत हजारों-हजारों कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को सिर्फ शक के आधार पर गिरफ़्तार किया गया और बेरहमी से प्रताड़ित किया गया।

कामरेड चारू मजूमदार और भाकपा (माले) के दूसरे नेताओं को गिरफ़्तार करके, हिरासत में ही मार दिया गया। लेकिन पार्टी की क्रान्तिकारी लाइन का असर देश-विदेश में फैलता रहा। बार-बार मज़दूरों और किसानों के बड़े-बड़े जुझारू प्रदर्शन होने लगे। 1974 में भारतीय रेल की सबसे बड़ी सर्व-हिन्द हड़ताल हुयी, जिसकी वजह से पूरी अर्थव्यवस्था ठप्प हो गयी।

हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग के सामने क्रांति का ख़तरा था। इस ख़तरे का मुक़ाबला करने के लिए, इजारेदार पूंजीवादी घरानों ने प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति से आपातकाल लागू करवाने की सलाह दी। इस फ़ैसले का मुख्य मक़सद था क्रांति के ख़तरे को ख़त्म करना और राज्य सत्ता पर इजारेदार पूंजीवादी घरानों के नियंत्रण को मजबूत करना।

इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने आपातकाल को दांय-पंथी प्रतिक्रिया के ख़िलाफ़ लड़ाई के रूप में पेश किया। सरकार ने दावा किया कि वह देश को अस्थायी बनाने की कोशिश करने वाली विदेशी ताक़तों के ख़िलाफ़ और जन संघ जैसी सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ रही थी। इसी प्रचार को दुनियाभर में सोवियत संघ ने बार-बार दोहराया और फैलाया, जिसके साथ हिन्दोस्तान ने 1971 में एक सैनिक संधि की थी।

पूंजीवादी संसदीय विपक्ष ने दावा किया कि वह इंदिरा गांधी की निरंकुशता व भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ और लोकतंत्र की पुनः स्थापना के लिए लड़ रहा था। लोकतंत्र की पुनः स्थापना के इस नारे का बर्तानवी-अमरीकी संस्थानों ने विदेश में खूब प्रचार किया।

भाकपा (माले) की शाखाओं ने मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को दमनकारी आपातकालीन सरकार के ख़िलाफ़, लोक जनवादी (पीपल्स डेमोक्रेटिक) क्रांति को क़ामयाब करने के मक़सद के साथ संघर्ष करने के लिए लामबंध किया। भाकपा (माले) की विदेशी शाखा की भूमिका को निभाते हुए, कामरेड हरदयाल बैंस की अगुवाई में हिन्दुस्तानी ग़दर पार्टी (विदेश निवासी हिन्दोस्तानी मार्क्सवादी-लेनिनवादियों का संगठन) ने हिन्दोस्तानी आप्रवासी मज़दूरों और विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दोस्तानी छात्रों के बीच में कम्युनिस्ट बुनियादी संगठन स्थापित किये।

हुक्मरान वर्ग ने आपातकाल की अवधि का इस्तेमाल करके, क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों को कुचल डाला, जन संघर्षों को दबा दिया और इसके साथ-साथ, कांग्रेस पार्टी की जगह लेने के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारी की।

संसदीय विपक्ष के नेताओं को गिरफ़्तार करके, उन्हें लोगों के सामने हीरो की तरह पेश किया गया। यही हुक्मरान वर्ग की योजना थी। अपने भरोसेमंद राजनेताओं को लोकतंत्र के बड़े योद्धाओं के रूप में पेश करके हुक्मरान वर्ग लोगों को क्रांति के रास्ते से हटाने में क़ामयाब रहा।

21 मार्च, 1977 को आपातकाल को औपचारिक तौर पर ख़त्म किया गया। कुछ ही दिनों में छठी लोक सभा के चुनाव कराये गए। कांग्रेस पार्टी की जगह पर जनता पार्टी की सरकार बनी। जनता पार्टी संसदीय विपक्ष की तमाम पार्टियों के विलयन के साथ बनी थी। बहुत बड़ा भ्रम फैलाया गया कि जनता पार्टी की सरकार के बनने से लोगों और उनके अधिकारों के पक्ष में बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है।

परन्तु तथाकथित “लोकतंत्र की पुनः स्थापना” से मेहनतकश जनसमुदाय की कोई भी समस्या हल नहीं हुयी। 1980 में इजारेदार पूंजीपति “स्थाई सरकार” और “काम करने वाली सरकार” के नाम से कांग्रेस पार्टी को केंद्र सरकार में फिर से वापस ले आये। हुक्मरानों ने सिख आतंकवाद और खालिस्तानी अलगाववाद का हव्वा खड़ा करके, पंजाब के लोगों के संघर्षों को बदनाम किया और फर्जी मुठभेड़ों में नौजवानों के क़त्लेआम को जायज़ ठहराया। तथाकथित धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक हिन्दोस्तानी राज्य ने स्वर्ण मंदिर पर सेना द्वारा हमले को और नवम्बर 1984 के सांप्रदायिक जनसंहार को अगुवाई दी।

1990 के दशक से हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग ने इस्लामी आतंकवाद का हव्वा खड़ा करके, राजकीय आतंकवाद को जायज़ ठहराने की अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी लाइन का पालन किया है। हुक्मरान वर्ग की दोनों प्रमुख पार्टियों, कांग्रेस पार्टी और भाजपा ने राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक क़त्लेआम को अगुवाई दी है, जैसे कि 1992-93 और 2002 में। मुसलमान लोगों को मनमानी से गिरफ़्तार करना और उन पर हिंसक हमले करना – यह आम बात हो गयी है।

मार्च 1977 में तथाकथित लोकतंत्र की पुनः स्थापना से लेकर आज तक, हुक्मरान वर्ग केन्द्रीय राज्य की दमनकारी ताक़तों को लगातार बढ़ाता रहा है। जनता पार्टी की सरकार ने मीसा कानून को रद्द कर दिया था, परन्तु उसके बाद लोगों के अधिकारों के हनन को वैधता देने के लिए कई कठोर से कठोर काले कानून लागू किये गए हैं। इनमें शामिल हैं राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम (टाडा), आतंकवाद रोकथाम अधिनियम (पोटा) और संशोधित गैरकानूनी गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम (यू.ए.पी.ए.)। इस पूंजीवादी लोकतंत्र की जेलों में हजारों-हजारों मज़दूर, किसान, महिलाएं, नौजवान और अन्य राजनीतिक कार्यकर्ता सालों-सालों तक बिना सुनवाई के तड़पने को मजबूर हैं।

राजकीय आतंकवाद और राज्य द्वारा आयोजित साप्रदायिक हिंसा शासनतंत्र का पसंदीदा तरीक़ा बन गया है। किसी ख़ास धार्मिक समुदाय का हव्वा खड़ा करके लोगों को आपस में बांटना और गुमराह करना – यह देशी-विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के हित में है। ऐसा करके ही उन्होंने निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण के अपने समाज-विरोधी एजेंडा को बढ़ावा दिया है। लोगों के जायज़ संघर्षों को “कानून-व्यवस्था” की समस्या के रूप में पेश किया जाता है।

इन सारी गतिविधियों से क्या दिखता है? यही, कि आपातकाल को लागू करने और लोकतंत्र की पुनः स्थापना के आन्दोलन को चलाने, दोनों के पीछे इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में हुक्मरान वर्ग का हाथ था। बुलेट और बैलट के ज़रिये हुक्मरान वर्ग ने क्रांति के ख़तरे को दूर कर दिया। जब कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक धड़े ने आपातकाल का समर्थन किया और दूसरे धड़े ने जनता पार्टी और लोकतंत्र की पुनः स्थापना के नारे का समर्थन किया, तो इनसे पूंजीपतियों को मदद मिली, जिससे वे लोगों के संघर्ष के साथ दांवपेच करके क्रांति के ख़तरे को दूर कर सके।

इस समय कई पार्टियां कह रही हैं कि प्रधानमंत्री मोदी मज़दूर वर्ग और किसान आन्दोलन को दबाने के लिए, इस साल आपातकाल लागू कर सकते हैं। उनकी यह सोच बिलकुल ग़लत है।

हमें फिर से समझना होगा कि इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल की घोषणा करने का फ़ैसला निजी तौर पर नहीं लिया था। आज नरेन्द्र मोदी खुद, निजी तौर पर ऐसा फै़सला नहीं ले सकते हैं। आपातकाल की घोषणा करने का फ़ैसला हुक्मरान वर्ग लेता है। इजारेदार पूंजीपति ऐसा फै़सला तभी लेंगे जब उनकी हुकूमत को और शोषण की व्यवस्था को ख़तरा होगा।

आज बहुत सी घटनाएं हो रही हैं जो आपातकाल के समय की जैसी लगती हैं। परन्तु उस समय और आज के समय में एक बहुत बड़ा अंतर है। उस समय अपने देश में और सारी दुनिया में क्रांति की लहर तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। लाखों-लाखों मज़दूर, किसान, महिलाएं और नौजवान वर्तमान राज्य की जगह पर लोक जनवाद (पीपल्स डेमोक्रेसी) के एक नए राज्य की स्थापना करने के आन्दोलन में जुड़ रहे थे। यही मुख्य कारण था कि हुक्मरान वर्ग को आपातकाल की घोषणा करने का फ़ैसला लेना पड़ा था।

1990 के दशक के आरम्भ में, वह हालत बदल गयी। दुनियाभर में क्रांति की लहर ज्वार से भाटे में बदल गयी। सभी पूंजीवादी देशों में और अपने देश में भी प्रतिक्रियावादी पूंजीपति मज़दूर वर्ग और लोगों की रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर अप्रत्याशित हमले करते आ रहे हैं।

आज देश में करोड़ों-करोड़ों मज़दूर और किसान उदारीकरण और निजीकरण के ख़िलाफ़ एकजुट होकर संघर्ष कर रहे हैं। तीनों किसान-विरोधी कानूनों को रद्द करने और सभी कृषि उत्पादों के लिए लाभकारी दाम की गारंटी की किसान आन्दोलन की फौरी मांगों का मज़दूर वर्ग समर्थन करता है। मज़दूरों और किसानों के संघर्ष में यह क्षमता है कि वह वर्तमान राज्य के चरित्र में आमूल परिवर्तन लाने के आन्दोलन में विकसित हो। परन्तु इस समय संघर्ष में यह जागरुकता विकसित नहीं हुयी है।

जब तक मज़दूरों और किसानों का संघर्ष पूंजीपतियों की राजनीति के चंगुल में फंसा रहेगा, तब तक हुक्मरान वर्ग को आपातकाल की घोषणा करने की कोई ज़रूरत नहीं होगी। लेकिन यदि हम कम्युनिस्ट उदारीकरण और निजीकरण के ख़िलाफ़ संघर्षों को वर्तमान राज्य की जगह पर एक नया राज्य – मज़दूरों और किसानों का राज्य – स्थापित करने की दिशा में ले जाने में क़ामयाब होते हैं, तो तब क्रान्तिकारी हालत पैदा होगी। तब हुक्मरान वर्ग को आपातकाल लागू करने की ज़रूरत हो सकती है।

आज क्रान्तिकारी जागरुकता के विकास के रास्ते में मुख्य रुकावट यह सोच है कि मज़दूरों और किसानों को संसदीय लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था और उसके संविधान को भाजपा जैसी सांप्रदायिक और फासीवादी ताक़तों के ख़तरे से बचाना है।

वर्तमान लोकतंत्र की व्यवस्था की हिफ़ाज़त करके मज़दूरों और किसानों को कुछ नहीं मिलने वाला है। जो संविधान हमारे अधिकारों को सुनिश्चित नहीं कर सकता, उसकी हिफ़ाज़त करके हमें कुछ नहीं मिलने वाला है।

1975 में आपातकाल की घोषणा संविधान का कोई उल्लंधन नहीं था। धारा 352 का यही मक़सद है कि जब-जब इजारेदार पूंजीवादी घरानों को अपनी हुकूमत के लिए कोई ख़तरा महसूस होता है, तब-तब वे आपातकाल लागू कर सकते हैं और लोगों के सारे अधिकारों को छीन सकते हैं।

हाल के दिनों में यू.ए.पी.ए. के तहत लोगों का मनमाने तरीके से गिरफ़्तार किया जाना संविधान का कोई उल्लंघन नहीं है, और न ही 2020 में लागू किये गए किसान-विरोधी और मज़दूर-विरोधी कानून।

संविधान मज़दूरों और किसानों के अधिकारों की हिफ़ाज़त नहीं करता है। संविधान मानव अधिकारों, जनवादी अधिकारों, राष्ट्रीय अधिकारों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को अलंघनीय नहीं मानता है। ऐतिहासिक अनुभव यही दिखता है कि यह संविधान टाटा, अम्बानी, बिरला, अदानी और अन्य इजारेदार पूंजीवादी घरानों के अधिकतम निजी मुनाफ़ों को बनाये रखने के लिए, मज़दूरों का शोषण करने, किसानों व जनजातियों को लूटने तथा हमारी भूमि व प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने के उनके निरंकुश “अधिकार” की ही हिफ़ाज़त करता है।

संविधान के पूर्वकथन में सुन्दर-सुन्दर शब्द लिखे गए हैं जिनका हक़ीक़त से कोई संबंध नहीं है। हिन्दोस्तानी गणराज्य जो भी होने का दावा करता है, वास्तव में ठीक उसका उल्टा है। इसे समाजवादी गणराज्य कहा जाता है जबकि वास्तव में यह पूंजीवाद को विकसित करने और हिन्दोस्तान को एक साम्राज्यवादी ताक़त में तब्दील करने का साधन है। इसे जनवादी गणराज्य कहा जाता है जबकि यह वास्तव में इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में मुट्ठीभर शोषकों का क्रूर अधिनायकत्व है। इसे धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कहा जाता है जबकि वास्तव में यह उपनिवेशवाद की विरासत और ‘बांटो व राज करो’ के असूल को बरकरार रखने का साधन है।

संक्षेप में, आपातकाल और उसके बाद की सभी राजनीतिक गतिविधियों से सबसे अहम सबक यह है कि वर्तमान राज्य, उसके संविधान और संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था की हिफ़ाज़त करके मज़दूरों और किसानों का कोई भला नहीं हो सकता है। हमारे हित में यह है कि वर्तमान पूंजीवादी हुक्मशाही की जगह पर मज़दूरों और किसानों की हुकूमत के नए राज्य की स्थापना की जाये। ऐसा करके ही अर्थव्यवस्था को लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलाया जा सकता है। ऐसा करके ही सबके लिए सुख-सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

हमें हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी को मुख्य आत्मगत ताक़त, श्रमजीवी वर्ग के हिरावल दस्ते के रूप में मजबूत करना होगा। माक्र्सवाद-लेनिनवाद के मौलिक सिद्धांतों पर अडिग रहकर, कम्युनिस्ट आन्दोलन इस समय के ठोस कार्यों के इर्द-गिर्द मज़दूरों, किसानों और व्यापक जनसमुदाय को एकजुट करने में सक्षम होगा। ये ठोस कार्य हैं – उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम को फ़ौरन ख़त्म करना; मज़दूरों और किसानों की हुकूमत स्थापित करना; जनवादी, उपनिवेशवाद-विरोधी, सामंतवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष की सम्पूर्ण जीत की शर्त बतौर पूंजीवाद का तख्तापलट करना; और, क्रांति के ज़रिये समाजवाद की स्थापना करना।

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