विदेश मंत्री जयशंकर की अमरीका यात्राः

अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ सहयोग, हिन्दोस्तानी लोगों और इस क्षेत्र में शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं

विदेश मंत्री जयशंकर ने 24-28 मई के बीच, न्यूयॉर्क और वाशिंगटन डीसी का दौरा किया। जनवरी में, राष्ट्रपति जो-बाइडेन की सरकार के सत्ता में आने के बाद, हिन्दोस्तानी सरकार की ओर से, अमरीका में यह पहली उच्च स्तरीय वार्ता और यात्रा थी।

अपनी यात्रा के दौरान, जयशंकर ने अपने समकक्ष, अमरीका के विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकन से मुलाकात की। उन्होंने रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन और राष्ट्रीय खुफिया-निदेशक (नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजर) एवरिल हैन्स से भी मुलाकात की। उन्होंने पूंजीपतियों के कुछ समूहों के साथ भी बैठकें कीं और एक प्रमुख थिंक टैंक, हूवर इंस्टीट्यूट के सदस्यों के साथ भी चर्चा की।

हिन्दोस्तानी राज्य और अमरीकी साम्राज्यवाद के बीच बढ़ता सहयोग

इस यात्रा को, पिछले कुछ दशकों में, हिन्दोस्तानी राज्य और अमरीकी साम्राज्यवाद के बीच बढ़ते सहयोग की पृष्ठभूमि में, देखा जाना चाहिए। इस सहयोग में, 2005 में, मनमोहन सिंह सरकार और जॉर्ज बुश सरकार के बीच हुआ हिन्दोस्तानी-अमरीका परमाणु समझौता एक मील का पत्थर था। 2016 के बाद यह रिश्ता और भी घनिष्ठ हो गया और इस दौरान, सैन्य सहयोग को मजबूत करने के लिए कई बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। हिन्दोस्तानी राज्य और अमरीकी साम्राज्यवाद के बीच बढ़ती घनिष्ठता, हिन्दोस्तान में यू.पी.ए. और एन.डी.ए.-दोनों सरकारों और अमरीका में दोनों, रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के प्रशासनों के दौरान हुई है। यह गठबंधन, सत्तारूढ़ हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग और अमरीकी साम्राज्यवाद के हितों के बीच, एक मूलभूत सामंजस्य को दर्शाता है।

हिन्दोस्तानी राज्य और अमेरीका के बीच बढ़ते सहयोग का क्या कारण है?

1990 के दशक की शुरुआत में, निजीकरण और उदारीकरण के जरिए भूमंडलीकरण की नीति की शुरुआत के साथ, हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपति, एक बड़ी वैश्विक शक्ति बनने की महत्वाकांक्षाओं को हासिल करने की कोशिश में लग गए। शीत युद्ध के बाद की दुनिया में, हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपतियों ने, अमरीका के साथ बढ़ती घनिष्ठता की नीति के माध्यम से इसे हासिल करने का सबसे अच्छा मौका देखा। हिन्दोस्तानी लोगों के बीच, अमरीकी साम्राज्यवाद के विरोध की मजबूत परंपरा के ख़िलाफ़ जाकर, इस दिशा में, हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग ने, अपनी विदेश नीति को सुनियोजित तरीके से, पुनः व्यवस्थित करना शुरू कर दिया।
अमरीकी साम्राज्यवाद, दुनिया पर अपना दबदबा कायम रखने में, आज तेजी से बढ़ते, शक्तिशाली चीन को एक मुख्य रूकावट के रूप में देखता है। उसने उन देशों के एक गुट की संरचना की योजना बनाई है जो चीन के ख़िलाफ़ एक मोर्चे के रूप में आगे आने के लिए तैयार हैं। अमरीका, हिन्दोस्तान को, एशिया में अपने आकार और राजनीतिक-आर्थिक क्षमता के साथ, चीन के बाद दूसरे नंबर के खिलाड़ी होने के नाते, चीन के ख़िलाफ़, एक काउंटरवेट के रूप में देखता है। वह हिन्दोस्तान पर इस तरह के एक गुट का हिस्सा बनने के लिए दबाव डाल रहा है, और बदले में, हिन्दोस्तान को, एक परमाणु शक्ति के रूप में ‘‘मान्यता’’ अमरीका की कंपनियों द्वारा, कुछ सैन्य हार्डवेयर बेचने के लिए मंजूरी और कुछ खुफिया जानकारी जैसी कुछ रियायतें देने की, मंशा जाहिर करता आया है। हिन्दोस्तानी राज्य को स्वेच्छा से अमरीका के नेतृत्व वाले इस चीन विरोधी मोर्चे में शामिल किया जा रहा है।

हाल के वर्षों में, अमरीका इस गुट को क्वाड (चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता) के रूप में जाने जाने वाले एक गठबंधन के माध्यम से, औपचारिक रूप देने के लिए, कड़ी मेहनत करता आया है। इसमें हिन्दोस्तान के अलावा, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं – जो पहले से ही, एक लंबे समय से, सैन्य-सहयोगी हैं। हालांकि यह दावा किया जाता है कि यह क्वाड, एक सैन्य गठबंधन नहीं है, फिर भी, ये चार देश, अन्य सहयोग-क्षेत्रों के अलावा, दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में, चीन की उपस्थिति को रोकने के उद्देश्य से, सैन्य अभ्यास भी करते आयें हैं। क्वाड का गठन 2007 में हुआ था, ऐसे समय में, जब हिन्दोस्तान और चीन के बीच सीमा पर, लंबे समय से, शांति का दौर चल रहा था और जब उनके बीच आर्थिक संबंध आगे बढ़ रहे थे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन के ख़िलाफ़ एक लड़ाकू रुख अपनाने वाले अमरीका के नेतृत्व में क्वाड समूह में शामिल होने से, पिछले कुछ वर्षों में, हिन्दोस्तान और चीन के बीच बहुत ही तनावपूर्ण हालातें पैदा हो गयी हैं।

क्वाड, जिसको बाइडन सरकार के तहत, एक शिखर-स्तरीय संवाद के ऊंचे दर्जे के गठबंधन की तरह पेश किया गया है, इसमें शामिल रहते – हिन्दोस्तानी राज्य ने, अभी भी, कुछ अन्य समूहों में भी अपना पैर जमाये रखे हैं जिनमें चीन और रूस शामिल हैं, जैसे कि ब्रिक्स गठबंधन (ब्राजील, रूस, हिन्दोस्तान, चीन और दक्षिणी अफ्रीका) और एस.सी.ओ. (शंघाई सहयोग संगठन)। दरअसल, अमरीका से लौटने के तुरंत बाद, जयशंकर ने ब्रिक्स मंत्री स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की और वे, आने वाली एस.सी.ओ. की बैठक में भी भाग लेंगे।

यात्रा का परिणाम

विभिन्न विश्लेषकों ने बताया है कि, अमरीका और हिन्दोस्तानी सरकारें अपनी साझेदारी को कितना महत्व देती हैं, इस बारे में अपने वक्तव्यों को फिर एक बार दोहराने के अलावा, जयशंकर अमरीका से कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि लेकर वापस नहीं आए।

नए अमरीकी प्रशासन से मिलने के लिए किसी हिन्दोस्तानी प्रतिनिधि की यह पहली उच्च स्तरीय यात्रा होने के बावजूद, न तो राष्ट्रपति बिडेन और न ही उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने, विदेश मंत्री जयशंकर से कोई भी मुलाकात की। यहां तक कि उनके समकक्ष, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ब्लिंकेन, जयशंकर के अमरीका पहुचने पर उपस्थित तक नहीं थे और विदेश मंत्री को, अपनी यात्रा के पहले भाग के लिए, राजधानी वाशिंगटन के बजाय, न्यूयॉर्क में रुकना पड़ा।

इस यात्रा के दौरान, किसी भी सौदे या सहायता के ठोस प्रस्तावों की घोषणा नहीं की गई यहां तक कि मोदी सरकार को हिन्दोस्तान में बिगड़ते कोविड संकट से निपटने में मदद करने के लिए भी कोई ठोस कदम उठाने की बात तक नहीं हुई। यात्रा के बाद, कोई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस, यहां तक कि कोई संयुक्त प्रेस वक्तव्य भी नहीं जारी किया गया। इसके बजाय अमरीकी विदेश मंत्री और रक्षा सचिव के कार्यालयों ने अलग-अलग दो बहुत ही संक्षिप्त बयान पढ़े। हिन्दोस्तानी विदेश मंत्रालय ने, यात्रा के बाद कोई बयान जारी नहीं किया। मोदी सरकार के लिए चिंता के दो प्रमुख मुद्दों पर – गलवान में पिछले साल की झड़प के बाद सीमा पर चीन के साथ विवाद, और अमरीका द्वारा अपने सैन्य बलों की वापसी को पूरा करने के बाद अफगानिस्तान में, हिन्दोस्तान की भूमिका – इन विषयों पर अमरीका ने कोई भी सार्वजनिक आश्वासन देने से इनकार किया। इसके बजाय, ब्लिंकन ने ‘‘एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक’’ को बनाए रखने में केवल क्वाड की भूमिका का उल्लेख किया। जयशंकर ने, अपने आधिकारिक बयानों में सार्वजनिक रूप से क्वाड का उल्लेख नहीं किया, लेकिन हूवर इंस्टीट्यूट के साथ अपनी बातचीत में, उन्होंने दुनिया में ‘‘बहुधु्रवीयता’’ (कई शक्ति केंद्र, सिर्फ एक नहीं) के महत्व पर जोर दिया – एक अवधारणा जो अमरीका को पसंद नहीं है।

निष्कर्ष

अमरीका में जयशंकर की मुख्य बैठकें विदेश नीति, सैन्य और ख़ुफिया विभागों के प्रमुखों के साथ थीं, जो यह दर्शाता है कि इन क्षेत्रों में हिन्दोस्तान-अमरीका के बीच संबंध विकसित हो रहे हैं। हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच बढ़ता सैन्य-गठबंधन, हिन्दोतानी लोगों के लिए बहुत ख़तरनाक है, और विशेष रूप से इस क्षेत्र के अन्य देशों के साथ, हिन्दोस्तान के संबंधों को कायम रखने में यह और भी जटिल मुश्किलें पैदा करेगा। अमरीका स्पष्ट रूप से चाहेगा कि चीन विरोधी मोर्चे पर, हिन्दोस्तान और अधिक खुलकर आए, चाहे वह क्वाड के रूप में हो या कुछ और, और उस दिशा में अमरीका, हिन्दोस्तान पर लगातार दबाव बना रहा है। हिन्दोस्तान, चीन और रूस के बीच किसी भी तरह के सहयोग को वह कमज़ोर ही होते देखना चाहेगा। चूंकि अमरीका पहले से ही हिन्दोस्तान को अपने सैन्य और खुफिया नेटवर्क में उलझा चुका है, इसलिए वह इस लाभ का उपयोग, दुनिया पर अपनी दादागिरी बढ़ाने के अपने हितों की हिफाजत में करेगा। हिन्दोस्तानी जनता को बहुत सतर्क रहना चाहिए और हिन्दोस्तानी राज्य और अमरीकी साम्राज्यवाद के बीच इस बढ़ते सहयोग का सक्रिय रूप से विरोध करना चाहिए।

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