दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों के निलंबन के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन

दिल्ली विश्वविद्यालय (डी.यू.) के एक कॉलेज से 12 कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों के निलंबन के विरोध में, विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने, इतनी भयानक महामारी के बीच, 27 मई को एक दिवसीय हड़ताल की। प्रदर्शनकारी शिक्षकों के हाथों में तख्तियां थीं, जिनमें उन्होंने अपने साथियों के निलंबन के विरोध और निलंबन आदेश को रद्द करने की मांग के नारे लिखे हुए थे।

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दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) द्वारा जारी किया हड़ताल का बुलावा

विरोध में भाग लेने वाले शिक्षकों के अनुसार, इन कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों को 30 अप्रैल को निलंबन आदेश जारी किए गए थे, ऐसे समय में, जब 12 में से 5 शिक्षक कोविड-19 की भयानक महामारी, से स्वयं जूझ रहे थे। इस क्रूर आदेश के लिए विश्वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा दिया गया औचित्य यह है कि ऐसे समय में, जब कक्षाएं ऑनलाइन आयोजित की जा रही हैं और छात्र परिसर में मौजूद नहीं हैं, महामारी के कारण “काम के बोझ में कमी” हुई है। निलंबित शिक्षक, अर्थशास्त्र, वाणिज्य, कंप्यूटर विज्ञान, अंग्रेजी, खाद्य प्रौद्योगिकी, गणित और पर्यावरण विज्ञान जैसे विभिन्न विभागों में कार्यरत हैं। निलंबित किए गए लोगों में एक आठ महीने की गर्भवती शिक्षिका भी है जो निलंबन के समय कोरोना वायरस से जूझ रही थी!

दिल्ली विश्वविद्यालय (डी.यू.) में इस समय 4,500 कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक काम कर रहे हंै जिन्हें हर चार महीने के नियमित अंतराल पर, फिर नियुक्त किया जाता है। ये सभी शिक्षक, अत्यधिक शोषणकारी परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर है। इन सभी शिक्षकों को एक बेहद अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ रहा है। यहां तक कि जो शिक्षिका गर्भवती थी, उन्हें तक छुट्टी नसीब नहीं हुई और बिना किसी मैटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) के उन्हें काम करना जारी रखने के लिए मजबूर किया गया था। ये कॉन्ट्रैक्ट (एड-हाॅक) शिक्षक न केवल अपने शिक्षण से जुड़े कर्तव्यों का पालन करते आयें हैं, बल्कि उन्होंने, कॉलेज के अधिकारियों द्वारा उन्हें सौंपी गयी सभी प्रकार की अन्य ज़िम्मेदारियों को भी पूरी तरह से निभाया है। हक़ीक़त तो यह है कि इन सभी शिक्षकों को, उनके मूलभूत अधिकार जैसे कि, पेड मैटरनिटी लीव (वेतन के साथ मातृत्व अवकाश), सिक लीव (बीमारी के लिए छुट्टी) या स्टडी लीव (अध्ययन अवकाश) आदि से भी वंचित किया गया है।

प्रभावित शिक्षकों में से एक ने बताया कि उनमें से कुछ शिक्षकों को इस तरह कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हुए, लगभग 7 वर्ष हो गये हैं और वे अपने विवाह की योजनाएं और अपने स्वयं के बच्चे होने की योजनाएं टालते आयें हैं इस आशा के साथ के वे जल्दी ही एक स्थायी नियुक्ति के हक़दार होंगें। निलंबन आदेश ने उन्हें झकझोर कर रख दिया है और इस आदेश से, उन्हें गहरा मानसिक आघात पहुंचा है। उन्हें इस बात की भी आशंका है कि महामारी के बीच उन्हें कोई और रोजगार भी नहीं मिलेगा।

ऐसे समय में जब “देश दर्द और पीड़ा की दर्दनाक परिस्तिथियों से गुजर रहा है” और जब “लोगों को जिन्दा रहने के लिए, अपनी नौकरी की सबसे अधिक आवश्यकता है!”, ऐसे समय में, इन शिक्षकों के निलंबन को “अमानवीय” बताते हुए, दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) ने कहा कि यह मानव संसाधन और विकास मंत्रालय द्वारा 5 दिसंबर 2020 को जारी किये गए आदेश पत्र का भी घोर उल्लंघन है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि महामारी के दौरान किसी भी कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक को उनके पद से नहीं हटाया जाएगा।

एक प्रेस बयान में, दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) ने इस हक़ीक़त की ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि ये 12 शिक्षक पिछले कई वर्षों से कॉन्ट्रैक्ट (एड-हाॅक) आधार पर, पढ़ा रहे हैं। यह भी बताया गया कि ये शिक्षण पद, पिछले इतने वर्षों से ख़ाली पड़े हैं और अधिकारियों द्वारा इन पदों पर, स्थायी शिक्षकों को नियुक्त करने के लिए कोई भी क़दम नहीं उठाया गया है। विश्वविद्यालय के नियम, एक कॉन्ट्रैक्ट (एड-हाॅक) शिक्षक को 4 महीने से अधिक की सेवा के विस्तार की अनुमति तभी देते हैं, जब उस पद पर किसी शिक्षक की स्थाई नियुक्ति नहीं की गयी है। इन सभी शिक्षकों को, पहले भी सेवा विस्तार की अनुमति दी जा चुकी है। अब उन्हें, इतने कठिन समय में, बिना उनकी कोई ग़लती के, नौकरियों से निकाला जा रहा है, और इतनी गंभीर अनिश्चितता का सामना करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) ने इतने गहरे स्वास्थ्य संकट और वित्तीय कठिनाइयों के बीच, इन शिक्षकों को, विशेष रूप से इस समय, निलंबित करने के, दिल्ली विश्वविद्यालय के अधिकारियों के फैसले की कड़ी निंदा की है। दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) ने मांग की है कि इन कॉन्ट्रैक्ट (एड-हाॅक) शिक्षकों के निलंबन के आदेशों को तुरंत रद्द किया जाए।

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