मजदूरों के काम करने की हालातों पर कोविड-19 लॉकडाउन का असर

देश के विभिन्न हिस्सों में कोविड-19 लॉकडाउन के कारण, मज़दूर वर्ग के कई तबकों के लिए, कुछ नई और गंभीर समस्याएं पैदा हो गयी हैं।

कई क्षेत्रों में, कंपनियों ने, अपने कर्मचारियों को घर से काम करने को कहा है। “वर्क फ्रॉम होम” (डब्ल्यू.एफ.एच.) वास्तव में एक नया मानदंड बन गया है, ऐसी स्थिति में, जहां, महामारी और लॉकडाउन के कारण, मज़दूरों के लिए शारीरिक रूप से यात्रा करना और निर्धारित घंटों के दौरान, कार्यस्थल पर मौजूद रहना, संभव नहीं है।

25 मार्च, 2020 को देशव्यापी लॉकडाउन लागू होने के बाद से, सभी बड़ी और मध्यम, आई.टी. और आई.टी.-आधारित सेवाओं वाली कंपनियों ने 90-95 प्रतिशत मज़दूरों को अपने घरों से काम करने के लिए कहा गया है। तब से देश के विभिन्न हिस्सों में लॉकडाउन में ढील देने के दौरान, कुछ कंपनियों ने आंशिक रूप से अपने आॅफिस खोलने का फ़ैसला लिया था। लेकिन, अप्रैल 2021 से महामारी की वर्तमान विनाशकारी लहर ने एक बार फिर, इन सभी कंपनियों के अधिकांश मज़दूरों को, घर से काम करने के लिए मजबूर कर दिया है।

विभिन्न क्षेत्रों के अन्य सेवा क्षेत्रों में, जैसे कि उदाहरण के लिये, मीडिया और पत्रकारिता, स्कूली और उच्च शिक्षा, बैंकिंग और वित्त, आदि में लॉकडाउन के दौरान, मज़दूरों को घर से काम करने के निर्देश दिए गए हैं।

दुनिया भर में और साथ ही हिन्दोस्तान में किए गए कई अध्ययनों ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला है कि डब्ल्यू.एफ.एच. ने मज़दूरों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। कई क्षेत्रों में, मज़दूरों और उनके संगठनों ने भी, मज़दूरों के बढ़ते शोषण के बारे में, चिंता व्यक्त की है – काम के घंटों को, जो कानूनन केवल 8-12 घंटे हुआ करते थे, अब उनको बढ़ाकर और मज़दूरों को, अक्सर दिन में 20 घंटे तक काम करने के लिए मजबूर कर दिया गया है! उन्होंने, काम के बढ़े हुए घंटों के लिए कोई ओवरटाइम मज़दूरी न मिलने, मजदूरों के बच्चों के लिए क्रेश सुविधाओं की कमी, पारस्परिक मिलने जुलने में कमी, नौकरी की असुरक्षा और मज़दूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष आयोजित करने में कठिनाइयों, पर भी चिंता जताई है।

इनमें से कुछ गंभीर चिंताओं को यहां प्रस्तुत किया गया है।

मज़दूरों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

मज़दूरों को, अक्सर लैपटॉप या मोबाइल फोन के सामने, एक निश्चित मुद्रा में बैठकर, लगातार 8-10 घंटे बिताने पड़ते हैं और इस लम्बे समय के दौरान, अन्य लोगों के साथ न मुलाकात होती है और न ही कोई बातचीत।

अधिकतर मामलों में, काम का बोझ काफी बढ़ गया है, क्योंकि काम के घंटे अब तय नहीं हैं बल्कि लचीले (फ्लेक्सिबल) हैं। कई कामकाजी महिलाओं और पुरुषों ने शिकायत की है कि इसने, उनके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के बीच के अंतर को पूरी तरह से मिटा दिया है। उनके पास खाने, सोने या शारीरिक व्यायाम, टहलने, आदि के लिए, कोई निश्चित समय नहीं रह गया है।

घर और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के साथ “कार्य समय” को लगातार “समायोजित” करना पड़ता है। लॉकडाउन में, घर में बंद परिवार के अधिकांश सदस्यों के बीच, अपने कार्यक्षेत्र की ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे के निर्माण का भार भी, पूरी तरह से अब स्वयं मज़दूरों पर आ गया है।

अनिद्रा, सिरदर्द, पीठ दर्द, बेचैनी, तनाव और चिंता उन सामान्य शारीरिक बीमारियों में शामिल हैं, जिनका, मज़दूरों को, घर में, लंबे समय तक काम करने के परिणामस्वरूप, सामना करना पड़ता है। नौकरियों की असुरक्षा, जैसा कि कई क्षेत्रों में काम ठप्प होने के कारण मज़दूरों की बड़े पैमाने पर छंटनी होने में दिखाई दे रही है, एक अन्य कारण है जो मज़दूरों के बीच बहुत अधिक चिंता और मानसिक तनाव पैदा करता है। मानसिक स्वास्थ्य डॉक्टरों ने बताया है कि कोरोना वायरस से संबंधित परेशान करने वाली जानकारी, लोगों को अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य के बारे में, डर और चिंता पैदा कर रही है, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा रही है।

मज़दूरों का बढ़ता शोषण

डब्ल्य.ूएफ.एच. तरीके को, अपनाने वाले लगभग सभी क्षेत्रों के मज़दूरों ने, बढ़े हुए काम के बोझ और लंबे समय तक काम करने के साथ शोषण में वृद्धि की जानकारी दी है। अधिकांश कंपनियों ने, मज़दूरों को काम के समय को “पुनः समायोजित” करने के लिए मजबूर किया है और उत्पादकता के लिए नए उपाय के रूप में “सभी समय काम करो, जब तुम जाग रहे हो” को अपनाया है, और इस तरह से, अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए समय सीमा निर्धारित करने और यहां तक कि नए प्रोजेक्ट्स को लेने के लिए भी, अधिक समय काम करवाने की प्रथा चालू की है। कई आई.टी. और अन्य कंपनियों के मज़दूरों के अनुसार, जो परियोजनाएं मूल रूप से तीन महीने बाद शुरू होने वाली थीं, उन्हें पहले ही “कंपनियों के व्यवसाय को चालू रखने” के लिए शुरू किया गया है, जिससे मज़दूरों पर काम का बोझ और भी बढ़ गया है। मज़दूरों को अक्सर दिन में 16-18 घंटे से अधिक काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसमें बीच में बहुत कम या कोई भी अवकाश का समय नहीं होता है, और शनिवार और रविवार को भी काम करना पड़ता है, जो सामान्यतः छुट्टी के दिन होते हैं। निर्धारित घंटों से अधिक काम करने के लिए ‘ओवरटाइम’ के भुगतान की जरूरत और उसके लिए बनाये गए प्रावधान को पूरी तरह से त्याग दिया गया है। कंपनियों के मालिक, इन नाजायज शर्तों को मानने के लिए, मज़दूरों को मजबूर करने के लिए, कंपनियों को बंद करने और छंटनी की धमकी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

आई.टी. मज़दूरों की समस्याएं और भी बढ़ गयी हैं क्योंकि, कंपनियां घर से काम करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा, जैसे हाई स्पीड इंटरनेट, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर और काम करने की जगह भी उपलब्ध नहीं करा रही हैं। नई स्थिति का सामना करने के लिए न तो राज्य और न ही कंपनियां, मज़दूरों को किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य देखभाल या मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान कर रही हैं।

लोगों के कार्य और जीवन के संतुलन में जबरदस्त असर पडा है। मज़दूरों से अपेक्षा की जाती है कि वे हर समय अपने काम के फोन कॉल और ईमेल की जांच करें और उनका जवाब दें। घर से काम करने के दबाव ने, मज़दूरों के बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल सहित आवश्यक घरेलू कामों और ज़िम्मेदारियों से निपटने के लिए, उन्हें पर्याप्त समय या ताक़त जुटाने के लिए भी मुश्किलें पैदा कर दी हंै। क्रेश, डे-केयर सेंटर और स्कूल बंद होने के साथ-साथ, बच्चों के बीच सभी प्रकार के सामाजिक संपर्क की समाप्ति के साथ, कामकाजी माताओं और पिताओं को, ऑनलाइन शिक्षा और सामाजिक-अलगाव की चुनौतियों का और छोटे बच्चों की सहायता करने की अतिरिक्त ज़िम्मेदारियों का भी सामना करना पड़ रहा है। वे पूरी तरह से थक चुके हैं।

इन सभी कारणों से, तनाव, थकान, नींद की कमी और चिंता से संबंधित बीमारियां बढ़ रही हैं। वे पारिवारिक और सामाजिक संबंधों में तनाव को बढ़ा रहे हैं।

मजदूर संगठित होकर इस घोर शोषण को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं

आई.टी. और आई.टी.ई.एस. कंपनियों और अन्य सेवाओं से जुड़े हुए मज़दूर, संगठित हो रहे हैं और मज़दूरों पर लगाए गए अतिरिक्त कार्यभार और लंबे समय तक काम करने के बारे में, अपनी चिंताओं को उठा रहे हैं। विशेष रूप से, यूनाईट – आई.टी. और आई.टी.ई.एस. मज़दूरों की एक यूनियन – ने मांग की है कि उत्पादकता के सामान्य स्तरों को पूरा करने की अपेक्षा किये बिना, लॉकडाउन अवधि के दौरान काम के घंटों को घटाकर 6 घंटे कर दिया जाए। उन्होंने यह भी मांग की है कि लॉकडाउन के दौरान मज़दूरों को इंटरनेट और बिजली का जो अतिरिक्त खर्चा वहन करना पड़ रहा है, उसको कंपनियों को वहन करना होगा। मज़दूरों ने मांग की है कि सरकार द्वारा एक कानून लागू किया जाए, जिससे मज़दूरों को, रोज काम के घंटों के पूरे होने के बाद, डिस्कनेक्ट करने का, यानी, काम से छुट्टी का अधिकार मिले।

पूंजीपति यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव तरीके अपना रहे हैं कि कोविड-19 लॉकडाउन के कारण उनका मुनाफ़ा कम से कम प्रभावित हो, भले ही इसके परिणामस्वरूप, मज़दूरों के लिए कितनी भी भयानक शारीरिक और मानसिक समस्याएं और भारी सामाजिक तनाव पैदा हो रहा हो। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान, पूंजीपतियों द्वारा अपनाए गए “घर से काम” करने का तरीका, एक बार फिर साबित कर रहा है कि पूंजीवाद एक अमानवीय व्यवस्था है जो केवल पूंजीपति वर्ग के मुनाफे की परवाह करती है। उसे इंसानों, मज़दूरों की कोई परवाह नहीं है, जिसका शोषण ही, पूंजीपतियों के मुनाफ़े का स्रोत है।

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