दिल्ली की सरहदों पर किसानों का 6 महीनों से अनवरत आन्दोलन

26 मई, 2021 को, दिल्ली की सरहदों पर किसान संगठनों के संयुक्त मोर्चे की अगुवाई में लगातार चल रहे अन्दोलन के 6 महीने पूरे होंगे। संयुक्त किसान मोर्चा ने उस दिन को ‘काला दिवस’ के रूप में मनाने का आह्वान किया है। उन्होंने लोगों से आह्वान किया है कि किसानों की आवाज सुनने से इंकार करने वाली सरकार का, काली पट्टी बांधकर, विरोध किया जाये। मजदूर संगठनों ने किसानों का समर्थन किया है। यह एक मौका है कि बीते 6 महीनों के अनुभवों का जायजा लिया जाए और उससे सही सबक लिए जायें।

बीते 6 महीनों के अनुभव से यह स्पष्ट हो गया है कि हालांकि मजदूर और किसान देश की आबादी की बहुसंख्या हैं, परन्तु हमसे पूछे बिना ही, हमारी रोजी-रोटी को खतरे में डालने और हमारे अधिकारों का हनन करने वाले कानूनों को पास कर दिया जाता है। फैसले लेने का अधिकार हुक्मरान वर्ग के हाथों में संकेंद्रित है, जो इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने पर वचनबद्ध है। संसद में जो कानून पास किये जाते हैं, वे टाटा, अंबानी, अदानी, बिरला और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घरानों की लालच को पूरा करने और हमारी रोजी-रोटी व अधिकारों को छीनने के मकसद से पास किये जाते हैं। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि वर्तमान संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था वास्तव में पूजीपति वर्ग की हुक्मशाही है, और इस हुक्मरान पूंजीपति वर्ग की अगुवाई करने वाले इजारेदार पूंजीवादी घराने हैं।

जब-जब किसान सरकार से बात-चीत करने गए, तब-तब सरकार के प्रवक्ताओं ने बार-बार नए कानूनों को रद्द करने से इंकार कर दिया, हालांकि 500 से ज्यादा किसान संगठनों ने मिलकर यह मांग रखी है। केंद्र सरकार का इतना अड़ियल रवैया क्यों रहा है? क्योंकि देशी-विदेशी बड़ी-बड़ी इजारेदार पूंजीवादी कम्पनियाँ इस मुद्दे पर पीछे हटने के बिलकुल खिलाफ़ हैं।

वालमार्ट और अमेजन, रिलायंस रिटेल, आदित्य बिरला रिटेल, टाटा का स्टार इंडिया, अदानी विलमार, बिग बाजार और डी मार्ट – ये सारी कम्पनियाँ बीते कुछ सालों से कृषि व्यापार के उदारीकरण के एजेंडा को बड़ी सक्रियता के साथ बढ़ावा दे रही हैं। वे कृषि उपज के विशाल हिन्दोस्तानी बाजार पर कब्जा करना चाहती हैं। वे कृषि उत्पादन और व्यापार से अधिक से अधिक मुनाफों की अपनी लालच को पूरा करना चाहती हैं।

मनमोहन सिंह सरकार ने 10 साल तक राज्य सरकारों को इस एजेंडा को अपनाने को राजी करने की कोशिश की थी, परन्तु उन्हें इसमें थोड़ी सी ही सफलता मिली थी। अब यह बहुमत वाली भाजपा सरकार ने एक केन्द्रीय कानून को सफलतापूर्वक पास कर दिया है, जो सभी राज्यों पर बाध्यकरी होगा। इजारेदार पूंजीपति इसे एक बहुत बड़ी जीत मानते हैं, जिससे वे किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

बीते 6 महीनों से भाजपा यह प्रचार कर रही है कि ये तीनों कानून किसानों के हित में हैं। भाजपा बार-बार कह रही है कि विपक्ष की पार्टियां किसानों को गुमराह कर रही हैं, कि आन्दोलन में आतंकवादी घुस गये हैं। कांग्रेस पार्टी भाजपा पर कॉर्पोरेट घरानों के हितों के लिए काम करने का आरोप लगा रही है, जैसे कि उसे अभी-अभी पता चला हो कि उदारीकरण और निजीकरण किसानों के हितों के खिलाफ है। दोनों पार्टियाँ किसानों को बुद्धू बनाने की कोशिश कर रही हैं।

वर्तमान व्यवस्था के अन्दर, जो भी पार्टी सरकार में आती है, उसे इजारेदार पूंजीवादी घरानों के तय किये हुए एजेंडे को ही लागू करना पड़ता है। उसे लोगों को यह झूठ बोलना पड़ता है कि सब कुछ उनके हित के लिए किया जा रहा है। विपक्ष की पार्टी को सरकार के खिलाफ चीखना-चिल्लाना पड़ता है और उसे जनता के हितों के खिलाफ काम करने का दोषी बताना पड़ता है। परन्तु जब वह खुद सरकार में आती है तो आज सरकार की आलोचना करने वाली पार्टी कल अपना रवैया बदल लेती है और इजारेदार पूंजीपतियों के एजेंडे को लागू करने लग जाती है।

जब मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार कृषि व्यापार के उदारीकरण का एजेंडा लागू करने की कोशिश कर रही थी, तब भाजपा उसे किसान-विरोधी बताकर उसकी आलोचना करती थी। अब इन दोनों पार्टियों ने अपनी-अपनी जगहें बदल ली हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सर्वोच्च ताकत इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग के हाथों में है। केंद्र सरकार में जो पार्टी होती है, वह हुक्मरान वर्ग का प्रमुख प्रबंधक दल या मैनेजमेंट टीम होता है। चुनावों के जरिये इस मैनेजमेंट टीम को बदल दिया जा सकता है। पार्टियां एक-दूसरे की जगह ले लेती हैं परन्तु पूंजीपतियों की हुक्मशाही निरंतर चलती रहती है।

किसान आन्दोलन के सामने एक निर्णायक सवाल है, यह पहचानना कि असली दुश्मन कौन है, संघर्ष का असली निशाना कौन है। यह पहचानना होगा कि इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग ही मजदूरों, किसानों और सभी दबे-कुचले लोगों का सांझा और मुख्य दुश्मन है। इसलिए, किसानों के लिए आगे का रास्ता है इजारेदार पूंजीवादी घरानों और उनके जन-विरोधी एजेंडा के खिलाफ, मजदूर वर्ग के साथ राजनीतिक गठबंधन बनाना।

इस समय किसानों के संघर्ष के सामने मुख्य खतरा उन पाटिर्यों से है जो भाजपा को मुख्य दुश्मन के रूप में पेश कर रही हैं। भाजपा को मुख्य दुश्मन बताने का मतलब है पूंजीवादी संसदीय विपक्ष की पूंछ बन जाना। इसका मतलब है फिर से उस झूठी उम्मीद, उस धोखे का शिकार बन जाना कि भाजपा की जगह पर कांग्रेस पार्टी या किसी भाजपा-विरोधी गठबंधन को सरकार में लाकर, किसानों के हित पूरे हो सकते हैं।

हुक्मरान वर्ग ने कांग्रेस पार्टी और भाजपा, दोनों को ही ट्रेनिंग दे रखी है कि कैसे लोगों को बाँट कर रखा जाये और अपने असली दुश्मन को न पहचानने दिया जाये। हमें नहीं भूलना चाहिए कि 1980 के दशक में कांग्रेस पार्टी ने ही किसानों के संघर्ष को “सिख अलगाववाद” करार दिया था और पंजाब में राजकीय आतंकवाद को जायज ठहराने के अभियान को अगुवाई दी थी।

हमारे ऐतिहासिक अनुभव से एक अहम सबक यह है कि आर्थिक विकास के पूंजीवादी रास्ते पर चलकर, किसानों की रोजी-रोटी सुनिश्चित नहीं हो सकती है। पूंजीवादी विकास इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में और उन्हीं के वर्चस्व में होता है, और यह अवश्य ही अधिकतम किसानों को और गहरे संकट में धकेल देगा।

इसका एक ही समाधान हो सकता है। केंद्र और राज्य सरकारों को एक सरकारी खरीदी की व्यवस्था स्थापित करने की जिम्मेदारी लेनी होगी, जिसमें सभी खाद्य पदार्थ और अन्य जरूरत की चीजें शामिल होनी चाहिये। यह सुनिश्चित करना होगा कि किसानों को कृषि के लिए सभी जरूरी चीजें मुनासिब दामों पर मुहैया करायी जायें और सभी कृषि उत्पादों की स्थायी तथा लाभकारी दामों पर खरीदी की जाये। इस सरकारी खरीदी की व्यवस्था के साथ जुड़ी हुयी, एक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था स्थापित करनी होगी, जिसमें सभी लोगों को उपभोग की सारी आवश्यक चीजें मुनासिब दामों पर प्राप्त होंगी। मजदूरों और किसानों के संगठनों और जन समितियों को इन सरकारी खरीदी की व्यवस्थाओं और सार्वजनिक वितरण व्यवस्थाओं की देख-रेख करनी होगी। यह सुनिश्चित करना होगा कि निजी मुनाफाखोरों और भ्रष्ट अफसरों द्वारा कोई लूट न हो।

एक ही ऐसी ताकत है जो इन सारे कदमों को लागू कर सकती है, और वह है मजदूरों और किसानों का गठबंधन। इस ताकत को अपने हाथों में राज्य सत्ता लेनी होगी। सिर्फ ऐसा करके ही इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों और सभी निजी मुनाफाखोरों को कृषि व्यापार के क्षेत्र से बाहर निकाला जा सकता है। सिर्फ ऐसा करके ही सभी मेहनतकशों के लिए सुरक्षित रोजी-रोटी और उनके जीवन स्तर में लगातार प्रगति सुनिश्चित की जा सकती है।

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