महान ग़दर की 164वीं वर्षगांठ के अवसर पर:

हिन्दोस्तान का मालिक बनने के लिए आम लोगों का संघर्ष जारी है

10 मई, 1857 को मेरठ छावनी में ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिकों ने विद्रोह किया और दिल्ली पर कब्ज़ा करने के लिए मार्च किया। यह पूरे उपमहाद्वीप में अंग्रेजों के शासन के ख़िलाफ़ विद्रोह का संकेत था।

दिल्ली पर कब्ज़ा करने वाले सैनिकों ने, बहादुरशाह ज़फर को एक नई राजनीतिक शक्ति के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया। दिल्ली में एक प्रशासन के लिए अदालत (ग़दर कमेटी) का गठन किया गया, जिसमें नागरिक और सेना के सैनिक दोनों शामिल थे, जिनके फ़ैसले राजा के लिए अनिवार्य थे। लखनऊ, कानपुर, झांसी और अन्य जगहों पर भी इसी तरह की अदालतें बनीं।

बहादुर शाह ने स्पष्ट रूप से यह घोषणा की कि उन्हें लोगों द्वारा सिंहासन पर बिठाया गया था और वे उनकी इच्छानुसार ही, अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए वचनबद्ध थे। यह तर्क़ देते हुए कि ब्रिटिश शासन की कोई वैधता नहीं थी और इसे समाप्त किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘हिन्दोस्तान का भविष्य यहां के लोग तय करेंगे’।

1857 का ग़दर को यदि उसके भौगोलिक दायरे और इसमें शामिल लोगों की संख्या के लिहाज से देखा जाये तो, वह 19वीं सदी का सबसे बड़ा युद्ध था। यह देश के विभिन्न हिस्सों के सैनिकों, किसानों, कारीगरों और देशभक्त राजाओं और रानियों का क्रांतिकारी विद्रोह था। सबसे ज्यादा घृणित, जिससे सभी हिन्दोस्तानी घोर-नफ़रत करते थे, ऐसे कंपनी राज के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए, सभी धर्म और जाति के लोग एकजुट हुए।

ब्रिटिश शासक, इस हक़ीक़त से भयभीत थे कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ाने के अपने सभी प्रयासों के बावजूद, हिन्दोस्तानी लोग एकजुट हो गए थे। विद्रोह को कुचलने और क्रांतिकारियों के क्रूर दमन के बाद, ब्रिटिश राज ने यह झूठ फैलाया कि यह “मुसलमानों का विद्रोह” था। उन्होंने ग़दर को एक “सिपाही विद्रोह” कहा ताकि इस विद्रोह में हिन्दोस्तान के सभी क्षेत्रों के लोगों की व्यापक भागीदारी को छुपाया जा सके।

1947 में ब्रिटिश शासकों की जगह लेने वाले हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग ने भी 1857 के ग़दर के बारे में, उसी गलत जानकारी फैलाना जारी रखा है। शासक वर्ग यह नहीं चाहता कि लोग अपनी क्रांतिकारी परंपराओं से प्रेरणा लें और अपनी क़िस्मत का मालिक खुद बनने के लिए अपने संघर्ष को आगे बढ़ाएं। ब्रिटिश इतिहासकारों की लाइन का अनुसरण करते हुए, हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग ने यह धारणा फैला दी है कि 1857 का ग़दर, एक “सामंती प्रतिक्रिया“ थी, जिसका मतलब यह निकलता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा शुरू की गई आधुनिक व्यवस्था के ख़िलाफ़, यह पुराने शासकों सामंतवादी ताकतों का प्रतिरोध था। यह सरासर झूठा प्रचार, हिन्दोस्तानी लोगों की क्रांतिकारी परम्पराओं का घोर अपमान है।

यह राजा बहादुरशाह नहीं थे, जो विद्रोही लोगों को निर्देशित कर रहा थे। इसके विपरीत जन-विद्रोह ने राजा को, अपनी प्रजा के साथ खड़े होने के लिए विवश कर दिया था। एक ऐसी जन-परिषद की स्थापना, जिसका निर्णय राजा के लिए भी पूरी तरह से अनिवार्य था, एक पूरी तरह से नयी सोच थी। यह सोच और यह क़दम, एक अत्यंत लोकतांत्रिक और पूरी तरह से क्रांतिकारी क़दम था। दूसरी ओर, “गोरे आदमी के बोझ” के सिद्धांत पर आधारित ब्रिटिश-हिन्दोस्तानी राज्य पूरी तरह से प्रतिक्रियावादी था। यह प्रतिक्रियावादी राज्य, लोगों को बांटने और गुलाम बनाए रखने के लिए, जाति-वर्गीकरण और हमारे अतीत से ली हुई हर पिछड़ी बुराई को पुर्नस्थापित या संरक्षित करने के लिए बनाया गया था।

1857 के ग़दर ने एक ऐसे राजनीतिक लक्ष्य को परिभाषित किया जो विभिन्न राष्ट्रीयताओं, जनजातियों, जातियों और धार्मिक विश्वास रखने वाले लोगों को मिलकर संगठित होने के लिए, एक प्रेरणा का स्रोत बन गया। विद्रोहियों ने घोषणा की थी कि हम हैं इसके मलिक! हिन्दोस्तान हमारा!

ये विद्रोही कौन थे? वे सैनिक, किसान और कारीगर थे।उन्हें देश के पंडितों, मौलवियों और पुजारियों सहित कई कवियों, कलाकारों और विद्वानों का समर्थन प्राप्त था। सैनिक ज़्यादातर किसान परिवारों से थे। 1857 का ग़दर मेहनतकश और देशभक्त लोगों के उस शक्तिशाली दावे का प्रतीक बन गया जिसके अनुसार – हिन्दोस्तान के लोगों ने यह स्पष्ट शब्दों में कहा – कि यह ज़मीन हमारी है और हम इसके मालिक हैं।

आज हिन्दोस्तानी समाज जिन समस्याओं का सामना कर रहा है, उसकी जड़ें इस हक़ीक़त से जुड़ी हुई हैं कि 1947 में मज़दूर, किसान और अन्य देशभक्त लोग, एक आज़ाद हिन्दोस्तान के मालिक नहीं बने थे। 1947 में राजनीतिक सत्ता को, टाटा, बिरला और अन्य इजारेदार पूंजीपति घरानों के नेतृत्व वाले देशद्रोही वर्ग, देश के पूंजीपतियों और जमींदारों ने हड़प लिया था।

क्रांति की संभावनाओं के डर ने हिन्दोस्तानी और ब्रिटिश पूंजीपतियों और उनके राजनेताओं को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया। उन्होंने एक ऐसा समझौता किया जिसके तहत, गोरे लोगों की जगह, हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग के प्रतिनिधियों ने ले ली, जबकि देश की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था हूबहू वैसे ही चलती रही।

1950 के संविधान का अधिकांश हिस्से को ब्रिटिश संसद द्वारा पारित 1935 के हिन्दोस्तानी सरकार के अधिनियम से नकल (कॉपी) किया गया था। नतीजा यह हुआ कि अतीत से ली हुई पिछड़ी हर चीज को क़ायम रखा गया है। निर्णय लेने की शक्ति, बहुत ही गिने-चुने लोगों के हाथों में केंद्रित है। अधिकांश लोगों की भूमिका नहीं है। उनके साथ, एक वोट बैंक के रूप में व्यवहार किया जाता है।

इजारेदार घरानों के नेतृत्व वाला पूंजीपति वर्ग, 1947 से ही हिन्दोस्तानी समाज के लिए एजेंडा तय करता आया है। शासक वर्ग चुनावों का इस्तेमाल, अपने अंतर-पूंजीवादी विरोधों को निपटाने के लिए करता है और यह तय करता है कि उसके एजेंडे को लागू करने और लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए, उसकी कौन-सी विश्वसनीय पार्टी, अगले पांच साल के लिए सबसे उपयुक्त है।

मौजूदा राज्य, संसदीय लोकतंत्र की मौजूदा व्यवस्था और उसकी राजनीतिक प्रक्रिया की रक्षा करके, हम मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और युवाओं को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। हमें ग़दरियों की दूर-दृष्टि, कल्पना और उद्देश्यों से प्रेरित होकर, एक ऐसे नए समाज की नींव रखने के लिए संघर्ष करना होगा, मज़दूरों और किसानों की एक नयी राज्य – व्यवस्था स्थापित करने के लिए लड़ना होगा, जो सभी के लिए समृद्धि और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध होगा। यह नया राज्य एक ऐसे संविधान पर आधारित होना चाहिए जो हिन्दोस्तानी संघ के सभी लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों सहित मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान करता हो और उन अधिकारों की हक़ीक़त में, लोगों को हासिल करने की गारंटी देता हो। हमें मौजूदा अमानवीय पूंजी-केंद्रित अर्थव्यवस्था की जगह पर एक नयी मानव-केंद्रित अर्थ-व्यवस्था की आवश्यकता है। हमारे देश के मज़दूर वर्ग, मेहनतकश किसानों और अन्य सभी मेहनतकश और देशभक्त लोगों के लिए, 1857 का ग़दर और उसका नारा, हम हैं इसके मालिक!, एक तुरंत कार्यवाई करने और संगठित होने के लिए, प्रेरणा का स्त्रोत है। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण के लिए पूरे दिल से काम करने का आह्वान है – एक नए राज्य और राजनीतिक प्रक्रिया के लिए, जो इस सिद्धांत पर आधारित होगी कि संप्रभुता लोगों की है और राज्य की यह अनिवार्य ज़िम्मेदारी है कि वह सभी के लिए समृद्धि और सुरक्षा सुनिश्चित करे।

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