लेनिन की 151वीं जयंती के अवसर पर :
आईये हम मज़दूर वर्ग को किसानों के साथ गठबंधन में शासक वर्ग बनने के लिए संगठित करने का संकल्प लें!

इस साल 22 अप्रैल को, हम व्लादिमीर इल्यिच लेनिन की 151वीं जयंती मना रहे हैं। लेनिन, 20वीं सदी की सबसे बड़ी क्रांतिकारी हस्तियों में से एक थे।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति ने इस अवसर पर, लेनिन और लेनिनवाद पर निबंधों की एक श्रृंखला प्रकाशित करने का फ़ैसला लिया है। इस श्रृंखला का पहला लेख प्रस्तुत है :

लेनिन और अक्तूबर क्रांति

लेनिन का जन्म रूस के सिमबस्र्क में एक सुशिक्षित परिवार में हुआ था। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे। बहुत कम उम्र से ही लेनिन में सीखने के लिए, एक अनोखी चाह दिखती थी। उन्होंने कानून के छात्र के रूप में कज़ान विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। उन्होंने जल्द ही, मार्क्सवादी अध्ययन समूहों में भाग लेना शुरू कर दिया और उस समय के क्रांतिकारी छात्र आंदोलन में शामिल हो गए।

मार्क्स और एंगेल्स ने पूंजीवादी समाज के विकास के नियमों की खोज की थी। उन्होंने वैज्ञानिक रूप से साबित कर दिया था कि पूंजीवादी समाज का विकास और उसके भीतर चल रहे वर्ग संघर्ष का अवश्यम्भावी परिणाम है, पूंजीपति वर्ग की हार और श्रमजीवी वर्ग की जीत। इस वर्ग संघर्ष का अवश्यम्भावी परिणाम है श्रमजीवी वर्ग की हुक्मशाही, जो वर्ग सत्ता का अंतिम रूप होगा जिसका लक्ष्य एक वर्गहीन कम्युनिस्ट समाज स्थापित करना होगा और जिसका शुरुआती चरण समाजवाद से होगी। अपने ऐतिहासिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए, श्रमजीवी वर्ग को एक हिरावल पार्टी की आवश्यकता होती है जो संघर्ष को नेतृत्व देगी।

उस समय क्रांतिकारी युवाओं के बीच में, नारोदनिक नामक एक समूह प्रभावशाली था। जिन्होंने इस विचार को फैलाया था कि क्रांति को सफल बनाने में मुख्य भूमिका किसानों की होगी न कि श्रमजीवी वर्ग की। वे अमीर किसानों के हितों का प्रतिनिधित्व करते थे, जिन्हें कुलक कहा जाता था। नारोदनिकों में से कुछ ने इस विचार को बढ़ावा दिया कि समाज के विकास में कुछ व्यक्तिगत ‘नायकों’, उनके विचारों और साहसी कार्यों की अहम भूमिका होती है। उनके अनुसार, क्रांति में आम लोगों की भूमिका न के बराबर होती है। उन्होंने सत्तारूढ़ शासक वर्ग के व्यक्तिगत सदस्यों की हत्या करने के षड्यंत्रों का भी आयोजन किया था – जिनमें उस समय का रूसी सम्राट, जिसको ज़ार के नाम से जाना जाता था, वह भी शामिल था।

लेनिन ने मार्क्सवाद के मूल निष्कर्ष की हिफ़ाज़त की और उसका विस्तार किया कि, यह वर्गों के बीच संघर्ष है, जो समाज में गुणात्मक परिवर्तन लाता है न कि कुछ व्यक्तिगत नायकों की कार्रवाईयां। श्रमजीवी वर्ग जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं हैं और उसे अपनी श्रम शक्ति को बेचकर ही गुजारा करना पड़ता है, यही वह वर्ग है जो इस काल में समाज में एक क्रांतिकारी परिवर्तन को अंजाम दे सकता है। यही वह वर्ग है जो दिन पर दिन बढ़ रहा है और जिसके सामने एक उज्ज्वल भविष्य है। जबकि पूंजीवादी व्यवस्था में, किसान बिखरने के लिए बाध्य हैं। किसानों में से कुछेक पूंजीपति वर्ग में शामिल हो जायेंगे और बहुसंख्यक श्रमजीवी वर्ग का हिस्सा बन जायेंगे।

लेनिन ने व्यक्तिगत आतंकवाद के रास्ते और इस धारणा का विरोध किया कि कुछेक नायक, समाज के विकास में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वर्ग-विभाजित समाज में यदि कोई व्यक्ति वह चाहे कितना भी बड़ा और प्रतिष्ठित हो, यदि उसके विचार और उसकी इच्छा, उस समय के क्रांतिकारी वर्ग, जो कि क्रांति को नेतृत्व प्रदान कर रहा है, उसकी ज़रूरतों और समाज में आने वाले क्रांतिकारी परिवर्तन की ज़रूरतों के ख़िलाफ़ होते हैं तो उसका दर-किनार होना निश्चित है। इसका विपरीत भी सही है कि वे सभी व्यक्ति, जो अपने विचारों और इच्छाओं द्वारा उस समय के समाज में आने वाले बदलाव और उस समय के अगुआ वर्ग की आवश्यकताओं को सही ढंग से व्यक्त करते हैं, तो वे समाज में अग्रणी भूमिका अदा कर सकते हैं।

लेनिन ने यह भली-भांति समझा कि क्रांतिकारी मंजिल को अंजाम देने के लिए श्रमजीवी वर्ग का नेतृत्व करने में सक्षम एक हिरावल पार्टी के निर्माण के कार्य में, हर एक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार, योगदान देने की भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने इस भूमिका को एक अनुकरणीय तरीके से निभाया।

यूरोपीय मज़दूर-वर्ग की पार्टियां जो द्वितीय इंटरनेशनल का हिस्सा थीं, संसदीय संघर्ष के लिए संगठित की गयी थीं। ये पार्टियां मज़दूर वर्ग को उन संघर्षों के लिए नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम नहीं थीं, जिनका मक़सद मज़दूर वर्ग द्वारा राजनीतिक सत्ता को बलपूर्वक छीनना था। लेनिन ने पेशेवर क्रांतिकारियों की एक ऐसी पार्टी के निर्माण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया जिसके सदस्य सबसे लड़ाकू और वर्ग-सचेत मज़दूर हों। ऐसी पार्टी की सभी गतिविधियां अपने समय के सबसे उन्नत सिद्धांत पर आधारित होंगी। ऐसी पार्टी जो मज़दूर वर्ग को अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के संघर्ष को नेतृत्व प्रदान करने के लक्ष्य से कभी विचलित नहीं होगी।

लेनिन ने रूस की धरती पर इस तरह की पार्टी की स्थापना और निर्माण के लिए एक दृढ़ और अनवरत संघर्ष किया। प्रारंभ में पार्टी रूसी सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी के नाम से जानी जाती थी। इसे अक्तूबर क्रांति के बाद में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ सोवियत यूनियन (बोल्शेविक) या संक्षेप में बोल्शेविक पार्टी के नाम से पहचाना जाने लगा।

बोल्शेविक पार्टी

19वीं शताब्दी के अंत में मज़दूर वर्ग के स्थानीय संगठन, स्थानीय समितियां, समाजवादी समूह और मार्क्सवादी अध्ययन मंडल वैचारिक भ्रांतियों और संगठनात्मक फूट की स्थिति में थे। इन सभी संगठनों के भीतर कुछ लोगों का एक प्रभावशाली समूह था, जिनके पास अपनी प्रेस भी थी और वे सैद्धांतिक आधार पर संगठनात्मक सामंजस्य की कमी और वैचारिक भ्रम को सही ठहराने की कोशिश कर रहे थे। वे मज़दूर वर्ग की एकजुट और केंद्रीकृत राजनीतिक पार्टी के निर्माण को अनावश्यक और कृत्रिम मानते थे। वे ‘अर्थवाद’ का प्रचार करते थे – अर्थात, यह विचार कि मज़दूर वर्ग को केवल अपनी आर्थिक मांगों पर ध्यान देना चाहिए। वे तर्क दिया करते थे कि जहां तक राजनीतिक मामलों का प्रश्न है, मज़दूरों को इसे पूंजीपति वर्ग और उदार लोकतंत्र की पार्टी के लिए छोड़ देना चाहिए। श्रमजीवी वर्ग की मजबूत एकता और एक केंद्रीकृत पार्टी की स्थापना के लिए अर्थवाद की इस प्रवृत्ति को पराजित करने की सख़्त ज़रूरत थी।

लेनिन ने अपनी एक पुस्तक, जो 1902 में प्रकाशित हुई थी “क्या करें?” – में विस्तार से समझाया कि किस तरह से अर्थवाद की प्रवृत्ति पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा करती है। वैज्ञानिक समाजवाद और क्रांतिकारी राजनीतिक चेतना को बाहर रखकर, यह अर्थवाद की प्रवृत्ति मज़दूर वर्ग के आंदोलन में पूंजीवादी विचारधारा को फैलाने में सहायक होती है।

श्रमजीवी वर्ग को राजनीतिक सत्ता हासिल करने के संघर्ष का नेतृत्व करने के लिए लेनिन ने एक नयी तरह की पार्टी, जो इस ज़िम्मेदारी को निभाने के क़ाबिल हो, इस विचार को विस्तार से समझाने की कोशिश की। ऐसी पार्टी जो श्रमजीवी वर्ग का हिरावल दस्ता हो, उसे श्रमजीवी वर्ग का एक वर्ग-सचेत और संगठित दस्ता होना चाहिए, जो पूरे वर्ग का नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम हो। इसे मज़दूर वर्ग के अलग-अलग प्रकार के संगठनों में सबसे अधिक उन्नत होना चाहिए। उन्होंने इस तरह की पार्टी के निर्माण की दिशा में पहले, और आवश्यक क़दम के रूप में एक अखिल-रूसी राजनीतिक अख़बार स्थापित करने की योजना को आगे बढ़ाया।

रूसी सोशल-डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी की पहली कांग्रेस 1898 में बुलाई गई थी, लेकिन इस कांग्रेस से एक एकजुट श्रमजीवी पार्टी का निर्माण नहीं हुआ। इस कांग्रेस में एक सामान्य कार्यक्रम या संगठनात्मक नियमों को नहीं अपनाया गया था। 1903 में आयोजित दूसरी कांग्रेस एक क्रांतिकारी कार्यक्रम को अपनाने में सफल रही, जिसको लेनिन और उनके साथियों द्वारा परिभाषित किया गया था। कार्यक्रम का मूल उद्देश्य जारशाही को उखाड़ फेंकना था, बुर्जुआ-लोकतांत्रिक क्रांति को पूरा करना और समाजवादी क्रांति को आगे बढ़ाना था। तात्कालिक मांगों में एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना, 8 घंटे का कार्य दिवस और भूमि सम्पदा पर कब्ज़ा किये हुए बड़े मालिकों के हाथों से ज़मीन को जब्त करना शामिल था।

एक महत्वपूर्ण मुद्दा जिस पर द्वितीय कांग्रेस में तीव्र संघर्ष हुआ, वह पार्टी की सदस्यता के नियमों का प्रश्न था।

लेनिन और उनके समर्थकों ने ज़ोर देकर कहा कि एक सदस्य के लिए पार्टी के कार्यक्रम का समर्थन करना और नियमित सदस्यता राशि देना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक सदस्य को पार्टी के किसी न किसी संगठन में अनुशासन के तहत काम करना भी आवश्यक है। तभी सभी पार्टी सदस्य एक समान अनुशासन में आएंगे और एक एकीकृत ताक़त के रूप में काम करेंगे।

प्रत्येक सदस्य को एक पार्टी संगठन के अनुशासन के तहत काम करना चाहिए, इसका मर्तोव और उनके समर्थकों, जिनमें ट्रॉट्स्की शामिल थे, उन्होंने पार्टी सदयस्ता की इस आवश्यकता का विरोध किया। उनका तर्क़ था कि ऐसा करने से कई बुर्जुआ बुद्धिजीवी पार्टी में शामिल नहीं होंगे। लेनिन और उनके समर्थकों ने तर्क़ दिया कि यह बेहतर होगा कि पार्टी के अनुशासन का विरोध करने वाले पार्टी के सदस्य न बनें।

पार्टी की सदस्यता के नियमों पर संघर्ष ने द्वितीय कांग्रेस में शामिल प्रतिनिधियों को दो समूहों में विभाजित कर दिया। लेनिन के नेतृत्व वाले समूह को बोल्शेविक कहा जाता था, जबकि विरोधी समूह को मेंशेविक कहा जाता था। बोल्शेविकों ने जिन संगठनात्मक सिद्धांतों के लिए संघर्ष किया उनका लेनिन की पुस्तक “एक क़दम आगे और दो क़दम पीछे” जो मई 1904 में प्रकाशित हुई थी उसमें विस्तार से उल्लेख किया गया।

बोल्शेविकों और मेंशेविकों के बीच संघर्ष न केवल संगठनात्मक सिद्धांतों पर था, बल्कि पार्टी की राजनीतिक लाइन पर भी था। वास्तव में ज़ार के रूस में जहां पर अभी तक कोई लोकतांत्रिक क्रांति नहीं हुई थी, वहां पर क्रांति की रणनीति और दांवपेंच के बारे में मेंशेविकों और बोल्शेविकों के विपरीत विचार और प्रस्ताव थे। रूस की अधिकांश आबादी किसानों की थी जिनका शोषण, दमन और लूट, रूसी ज़ार के राज्य से समर्थन प्राप्त बड़े ज़मींदार बड़े पैमाने पर करते थे। पूंजीवादी उद्योग का बड़े पैमाने पर, तेज़ी से विकास हो रहा था और परिणामस्वरूप, श्रमजीवी वर्ग की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी। रूसी ज़ार के राज्य ने मज़दूरों और किसानों के अधिकारों को कोई मान्यता नहीं दी थी।

मेंशेविकों ने तर्क़ दिया कि लोकतांत्रिक क्रांति का नेतृत्व पूंजीपति वर्ग को करना होगा और बुर्जुआ लोकतांत्रिक गणराज्य स्थापित होने के बाद ही श्रमजीवी शासन और समाजवाद की ओर आगे बढ़ना संभव होगा। उन्होंने श्रमजीवी वर्ग को क्रांतिकारी तरीक़े से काम न करने के लिए आगाह किया क्योंकि यह उदार-पूंजीपतियों को डरा देगा।

लेनिन और बोल्शेविकों ने तर्क़ दिया कि लोकतांत्रिक क्रांति का नेतृत्व श्रमजीवी वर्ग को करना होगा। श्रमजीवी वर्ग को किसानों के साथ घनिष्ठ गठबंधन बनाना होगा और पूंजीपति वर्ग से अलग करना होगा। पूंजीपति वर्ग मज़दूरों और किसानों की राजनीतिक सत्ता में बनने के सख़्त ख़िलाफ़ था – मज़दूरों-किसानों के सत्ता में आने के बजाय, पूंजीपति वर्ग को रूसी ज़ार के राज्य को समर्थन करना मंजूर था। श्रमजीवी वर्ग को सामंती जमींदारों द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न के ख़िलाफ़ और ज़ार के रूस में शासन के तहत चल रहे राष्ट्रीय उत्पीड़न के ख़िलाफ़, लोकतांत्रिक संघर्ष में सक्रिय और अग्रणी भूमिका निभाते हुए, श्रमजीवी वर्ग को अपने पक्ष में देश के अधिकांश लोगों का बहुमत हासिल करना चाहिए। लेनिन की प्रसिद्ध पुस्तक, “जनवादी क्रांति में सामाजिक-जनवाद की दो कार्यनीतियां” (जुलाई 1905 में प्रकाशित) में, क्रांतिकारी सिद्धांत पर आधारित एक क्रान्तिकारी रणनीति का विस्तार से वर्णन किया गया है।

1905 से 1907 की अवधि रूस के इतिहास में एक क्रांतिकारी अवधि के रूप में जानी जाती है। 1900-03 के आर्थिक संकट ने मेहनतकश जनता के कष्ट को बहुत बढ़ा दिया था। जापान के ख़िलाफ़ युद्ध 1904 में शुरू हुआ, इस युद्ध ने लोगों की कठिनाइयों को और भी तेज़ कर दिया। इस युद्ध में ज़ार की सेना के 1,20,000 से अधिक सैनिक दुश्मन द्वारा या तो मार दिये गए या घायल हो गये या दुश्मन द्वारा कैदी बनाये लिये गये, जिनमें सब किसानों और मज़दूरों के बेटे थे। इससे आम जनता के असंतोष में बहुत बड़ा इज़ाफ़ा हुआ।

9 जनवरी, 1905 को हज़ारों मज़दूरों ने विंटर पैलेस तक जुलूस निकाला और ज़ार निकोलस को संबोधित करते हुये एक याचिका प्रस्तुत की। जुलूस में शमिल मज़दूरों में से कई ने चर्च के बैनर और ज़ार के चित्र के साथ हिस्सा लिया। ज़ार ने अपने सैनिकों को निहत्थे मज़दूरों के जुलूस पर गोली चलाने का आदेश दिया। उस दिन एक हज़ार से ज्यादा मज़दूर मारे गए थे और दो हज़ार से ज्यादा घायल हो गये थे। सेंट पीटर्सबर्ग की सड़कें मज़दूरों के खून से लथ-पथ हो गई थीं। उस खूनी रविवार को दिन-दहाड़े हुए क़त्लेआम ने पूरे रूस के मज़दूरों और किसानों को जगा दिया। इस क़त्लेआम ने पूरे देश में एक क्रांतिकारी विद्रोह को जन्म दिया। मज़दूरों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक हड़तालों के बाद किसानों ने भी ज़ार के खि़लाफ़ जन-विरोध प्रदर्शन किये। एक नौसैनिक युद्धपोत के सैनिकों ने रूसी ज़ार के शासन के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया और क्रांतिकारी मज़दूरों के साथ हाथ मिलाया।

क्रांति के डर से पूंजीपतियों ने एक डूमा (संसद) की स्थापना सहित विभिन्न रियायतें देने के लिए रूसी ज़ार को राजी किया। एक बार जब जापान के ख़िलाफ़ युद्ध समाप्त हो गया और रूसी राज्य ने अपनी ताक़त वापस पा ली तो ज़ार ने क्रांतिकारियों से बदला लेना शुरू कर दिया। 1908 से मज़दूरों और किसानों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले सैकड़ों क्रांतिकारियों को गिरफ़्तार किया गया, उन्हें यातनाएं दी गईं और मौत के घाट उतार दिया गया। लेनिन को देश छोड़कर विदेश में रहना पड़ा।

1905 की क्रांति की हार के कारणों का विश्लेषण करते हुए, बोल्शेविकों ने एक मज़दूर-किसान गठबंधन की अनुपस्थिति को एक प्रमुख कारण के रूप में पहचाना। एक अन्य प्रमुख कारण यह भी था कि मज़दूर वर्ग जो क्रांति का प्रमुख और अग्रणी ताक़त था, लेकिन उसमें एकीकृत नेतृत्व का अभाव था। ऐसी हिरावल पार्टी जो बोल्शेविकों और मेंशेविकों के बीच बंटी थी, इसके कारण श्रमजीवी वर्ग क्रांति को नेतृत्व नहीं दे सका। बाहरी कारणों में से एक यह भी था कि पश्चिम-यूरोप के साम्राज्यवादियों ने ज़ार के राज्य द्वारा क्रांति को कुचलने में सहायता की। विदेशी इजारेदार पूंजीपति रूस में अपने निवेश को और अपने भारी मुनाफ़े को बचाने के लिए ज्यादा उत्सुक थे। उन्हें यह भी डर था कि रूस में क्रांति अन्य देशों में भी क्रांति को जन्म दे सकती है।

1905-08 के घटनाक्रम से यह साफ़-साफ़ दिखाई पड़ा कि बोल्शेविकों को पता था कि वास्तविक स्थिति के अनुसार कैसे आगे बढ़ें। उन्होंने वास्तविक स्थिति के अनुसार, आगे बढ़ना और हमले के दौरान सभी लोगों का नेतृत्व करना सीखा। उन्होंने यह भी सीखा कि यदि ऐसे हालात बनते हैं कि पीछे हटने की नौबत आ जाये तो पीछे कैसे हटना है।

प्रतिक्रिया और दमन की अवधि के दौरान, कठिन परिस्थितियों में बोल्शेविकों को जनता के साथ अपने संबंधों को बनाए रखने के लिए जो भी मौके मिले, उन सभी कानूनी अवसरों का भी उपयोग उन्होंने किया – जिसमें ट्रेड यूनियनों, बीमार-लाभ-समितियों और डूमा (संसद) के मंच भी शामिल थे। उन्होंने सीखा कि उन हालातों में जब प्रतिकूल स्थिति पैदा हो गयी हो, तो घबराहट या हंगामा किये बिना कैसे एक सुनियोजित तरीके से पीछे हटना है ताकि अपने साथियों को सुरक्षित किया जा सके, उनको पुनर्गठित किया जा सके और इसके साथ-साथ दुश्मन के ख़िलाफ़ एक नए आक्रमण के लिए फिर से तैयारी शुरू की जा सके।

मेंशेविकों ने उस समय दहशत फैला दी कि हालातें क्रांति के खि़लाफ़ हो गयी हैं। उन्होंने सभी अवैध पार्टी संगठनों के मिटा देने का आह्वान किया। कई लोग जिन्हें मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों के रूप में जाना जाता था, वे मार्क्सवाद के कुछ मूलभूत सिद्धांतों को नकार कर मार्क्सवाद को ‘सुधारना’ चाहते थे। इस प्रवृत्ति का उद्देश्य पार्टी के सदस्यों में निराशा फैलाना था। मार्क्सवाद से दूर होने वाले कुछ बुद्धिजीवी तो एक नए धर्म की स्थापना की भी वकालत करने लगे। मार्क्सवादी सिद्धांत से धोखा करने वाले ऐसे पाखण्डी लोगों को एक सही जवाब देने के लिए और उनके चेहरों से मुखौटा हटाकर उनका पर्दाफ़ाश करने के लिए तथा इस तरह मार्क्सवादी पार्टी की सैद्धांतिक नींव को सुरक्षित रखने के लिए सही क़दम उठाना एक ज़रूरी आवश्यकता बन गई। इस आवश्यकता को लेनिन द्वारा 1908 में प्रकाशित “भौतिकवाद और अनुभवसिद्ध आलोचना” नामक पुस्तक द्वारा संबोधित किया गया था।

वर्ष 1911 के अंत तक बोल्शेविकों को यह लगने लगा था कि क्रांतिकारी लहर में एक और ज्वार आने की संभावनाएं बढ़ रही थीं। लेनिन के नेतृत्व में एक एकजुट हिरावल पार्टी की स्थापना के लिए किए गए संघर्ष ने बोल्शेविक कार्यक्रम और योजना के समर्थन में लगभग सभी क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को जीतने में सफलता हासिल की। हालांकि पार्टी के भीतर मेंशेविकों की तरह अन्य अवसरवादियों की निरंतरता एक नए प्रकार की पार्टी – एक ऐसी पार्टी जो अवसरवादी तत्वों से मुक्त हो और सत्ता के संघर्ष में श्रमजीवी वर्ग का नेतृत्व करने में सक्षम हो – के निर्माण को रोक रही थी।

जनवरी 1912 में प्राग में आयोजित छठे अखिल-रूसी पार्टी सम्मेलन ने मेंशेविकों को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इस प्रकार लोकतांत्रिक-केंद्रीयवाद के आधार पर अपनी पार्टी की फ़ौलादी एकता बनाने के साथ-साथ, लेनिनवादी प्रकार की एक नयी पार्टी को बनाने और मजबूत करने का मार्ग खुल गया।

प्रावदा नामक एक शानदार जन-श्रमिक अख़बार के साथ लैस होकर, बोल्शेविक पार्टी ने क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं की एक नई पीढ़ी को भर्ती किया और प्रशिक्षित किया। 1917 तक बोल्शेविक पार्टी मार्क्स की क्रांतिकारी दिशा से लैस होकर, अपने सदस्यों में फ़ौलादी एकता के साथ, सबसे उन्नत और मज़दूर वर्ग के सबसे संगठित दस्ते के रूप में उभरी।

अक्तूबर क्रांति

बोल्शेविक पार्टी ने मानव इतिहास में सबसे पहली सफ़ल समाजवादी क्रांति का नेतृत्व किया। बोल्शेविक पार्टी ने रूस के मज़दूरों, किसानों और सैनिकों को पूंजीपति वर्ग के राज्य को उखाड़ फेंकने और नवंबर 1917 (रूसी कैलेंडर के अनुसार अक्तूबर) में सोवियत राज्य स्थापित करने के निर्णायक संघर्ष में नेतृत्व दिया।

7 नवंबर, 1917 को क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं, सैनिकों और नाविकों ने विंटर पैलेस पर धावा बोल दिया। उन्होंने अंतरिम सरकार के प्रतिनिधियों को गिरफ़्तार कर लिया। उन्होंने मंत्रालयों, स्टेट बैंक के साथ-साथ, रेलवे स्टेशनों, डाक और टेलीग्राफ कार्यालयों पर भी कब्ज़ा कर लिया। बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में मज़दूर वर्ग ने रूस में राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया।

अगले दिन मज़दूरों और सैनिकों की सोवियतों (प्रतिनिधि समितियों) की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस ने मज़दूरों, सैनिकों और किसानों के लिए एक अपील को मंजूरी दी और यह घोषणा की कि सोवियतों की कांग्रेस ने राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में ले ली है। प्रथम विश्व युद्ध में रूस की भागीदारी को समाप्त करने के लिए, सोवियतों की कांग्रेस ने शांति पर एक हुक्मनामा जारी करने का निर्णय भी लिया। सोवियतों की कांग्रेस ने भूमि पर एक हुक्मनामा जारी करने के प्रस्ताव को अपनाया जिसके ज़रिये, सैकड़ों करोड़ एकड़ उपजाऊ भूमि के मालिक ज़मींदारों को उनकी ज़मीन से वंचित किया जायेगा और ज़मीन को किसान समितियों को दे दिया जायेगा। सोवियत की कांग्रेस ने कॉमरेड लेनिन के नेतृत्व में पहली सोवियत सरकार स्थापित की। कामरेड लेनिन को जन कमिसारों की परिषद के अध्यक्ष के रूप में चुना गया। सोवियत सरकार ने तुरंत ऐसे क़दम उठाये कि खदानों, इस्पात संयंत्रों, मशीन कारख़ानों और बैंकों को पूंजीपतियों की निजी संपत्ति के बजाय लोगों की सामाजिक संपत्ति में बदल दिया जाये।

अक्तूबर क्रांति ने दुनिया को हिला दिया और पूरे पूंजीपति वर्ग को दहशत में डाल दिया। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि एक शोषक अल्पसंख्यक का शासन, सिर्फ एक और शोषणकारी अल्पसंख्यक के शासन की जगह न ले, जैसा कि 18वीं और 19वीं शताब्दी में यूरोप के देशों में पूंजीवादी लोकतांत्रिक क्रांति के द्वारा हुआ था। पूंजीपति वर्ग के शासन का स्थान अक्तूबर क्रांति के द्वारा श्रमजीवी वर्ग के नेतृत्व में, अब तक के शोषित बहुमत के शासन ने ले लिया था। उत्पादन के साधनों को पूंजीपतियों और ज़मींदारों की निजी संपत्ति की बजाय सभी लोगों की सामाजिक संपत्ति या सामूहिक संपत्ति में बदल दिया गया।

अक्तूबर क्रांति ने एक ऐसे राज्य को जन्म दिया जिसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि सभी प्रकार के शोषण और शोषणकारी वर्गों को जड़ से समाप्त कर दिया जाए। सोवियत संघ में समाजवाद के आने से एक तरफ देश के मज़दूरों और किसानों ने अपने जीवन स्तर में लगातार वृद्धि का सुख प्राप्त किया तो दूसरी तरफ अक्तूबर क्रांति ने सभी देशों के श्रमजीवी और उत्पीड़ित लोगों को क्रांति और समाजवाद के रास्ते को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

युग का विश्लेषण

बोल्शेविक पार्टी ने ऐसे समय में अपने संघर्ष को अंजाम दिया जब विश्व स्तर पर अचानक बड़े बदलाव हुए। पूंजीवाद, साम्राज्यवाद में विकसित हो गया था, जिसका मतलब है इजारेदार वित्त पूंजी द्वारा शोषण और लूट की एक वैश्विक प्रणाली में विकसित हो गई थी। अब दुनिया के अधिकांश वस्तु बाज़ारों और वित्त बाज़ारों पर कुछ मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीपति हावी हो गए थे, इसलिए पूंजीवाद के कानूनों का संचालन भी बदल गया। सभी महाद्वीपों के क्षेत्र पर एक या अन्य साम्राज्यवादी शक्ति ने कब्ज़ा कर लिया था और अब आगे ऐसी शक्तियों के बीच केवल पुनः विभाजन ही संभव था।

लेनिन ने मार्क्सवाद के विज्ञान के आधार पर दुनिया में हो रहे इन परिवर्तनों का विश्लेषण करने में बोल्शेविकों का नेतृत्व किया। उन्होंने उस समय के कई तथाकथित दिग्गज मार्क्सवादियों के मार्क्सवाद-विरोधी विचारों के ख़िलाफ़ एक दृढ़-संघर्ष का नेतृत्व किया। जर्मन सोशल-डेमोक्रेटिक पार्टी के एक प्रमुख सदस्य और एक बड़े मार्क्सवादी सिद्धांतकार माने जाने वाले कार्ल काउत्स्की ने दावा किया कि पूंजीवादी प्रतिस्पर्धा का इजारेदार पूंजीवाद में बदलना, पूंजीवादी व्यवस्था से समाजवाद और कम्युनिज़्म में शांतिपूर्ण परिवर्तन की संभावना को इंगित करता है।

लेनिन ने काउत्स्की के तथाकथित सिद्धांत के दोष और भ्रम का पर्दाफ़ाश किया। उन्होंने मार्क्सवादी निष्कर्ष की रक्षा की और उसे फिर से दोहराया कि पूंजीपति और श्रमजीवी वर्ग के बीच अंतर्विरोध को शांतिपूर्ण तरीक़े से नहीं सुलझाया जा सकता। यह केवल एक क्रांति के माध्यम से ही हल किया जा सकता है। क्रांति के द्वारा पूंजीवादी शासन को बलपूर्वक उखाड़ फेंककर श्रमजीवी राज्य की स्थापना की जाती है। साम्राज्यवाद इस तरह की क्रांति के लिए ज़मीनी हालात पैदा करता है, यानी क्रांतिकारी परिवर्तन की स्थिति बनाता है।

लेनिन के मार्क्सवाद के विज्ञान पर आधारित, साम्राज्यवाद के विश्लेषण से उस विज्ञान का और विकास हुआ। लेनिन ने साम्राज्यवाद को पूंजीवाद के उच्चतम और अंतिम चरण के रूप में परिभाषित किया, जब समाज के सभी अंतर्विरोध तीव्र हो जाते हैं। असमान पूंजीवादी विकास के नियम के अनुसार, प्रतिद्वंद्वी साम्राज्यवादी राज्यों के बीच शक्ति संतुलन में बार-बार बदलाव होते हैं। और इसीलिए साम्राज्यवादी अंतर्विरोध समय-समय पर दुनिया के फिर से विभाजन के लिए सशस्त्र अंतर-साम्राज्यवादी टकराव की ओर ले जाता है। उस तरह की हालातें पैदा करता है। इस तरह साम्राज्यवाद में दरार पड़ने की संभावनाएं, दुनिया में क्रांति के लिये अवसर और संभावनाएं पैदा करती हैं, वैश्विक साम्राज्यवादी श्रृंखला की सबसे कमजोर कड़ी के टूटने की संभावनाएं पैदा होती हैं – क्रांति के हालात बनते हैं।

लेनिन और बोल्शेविक पार्टी ने पूंजीवाद के इस साम्राज्यवादी चरण की परिभाषित विशेषताओं में से एक यह बताया कि विश्व स्तर पर पूंजीपति वर्ग, पूरी तरह से प्रतिक्रियावादी वर्ग है। जब मार्क्स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखा, तो उन्होंने पूंजीवाद के विकास के प्रारंभिक चरण में पूंजीपति द्वारा निभाई गई प्रगतिशील भूमिका को रेखांकित किया था, जब वे सामंती विशेषाधिकारों के ख़िलाफ़ और नागरिक स्वतंत्रता के लिए भी लड़ा था। पूंजीवाद के साम्राज्यवादी चरण में पूंजीपति वर्ग श्रमजीवी क्रांति के मार्ग को रोकने के लिए, सभी प्रकार की पिछड़ी ताक़तों के साथ हाथ मिलाने के लिए तत्पर रहता है। और इसलिए साम्राज्यवादी युग में पूंजीपति वर्ग राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रयास करता है।

ज़ार के निरंकुश शासन के स्थान पर किस तरह की राजनीतिक व्यवस्था और राज्य की स्थापना करनी चाहिए?

बोल्शेविकों और मेंशेविकों ने इस सवाल के जवाब बिलकुल एक दूसरे के विपरीत दिए थे। मेंशेविक चाहते थे कि एक पूंजीवादी जनतंत्र स्थापित हो, जो ब्रिटेन तथा फ्रांस जैसे और उन्नत पूंजीवादी देशों में मौजूदा व्यवस्थाओं की तरह होगा। बोल्शेविकों ने एक नए तरह के राज्य को स्थापित करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया, एक श्रमजीवी लोकतंत्र की राज्य व्यवस्था जो पूंजीवादी शोषकों पर अधिनायकत्व का प्रयोग करेगा।

साम्राज्यवादी युद्ध की प्रतिक्रिया

साम्राज्यवाद का पूंजीवाद के एक ऐसे चरण के रूप में विश्लेषण, जब पूंजीपति वर्ग को दुनिया के पुनर्विभाजन के लिए युद्ध करना पड़ता है, यह 1914 में बिल्कुल सही साबित हुआ जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ।

प्रथम विश्व युद्ध ने बोल्शेविक पार्टी को बहुत ही कठिन स्थिति में पहुंचा दिया चूंकि यूरोप के मज़दूरों की प्रमुख पार्टियों ने अंतर्राष्ट्रीय श्रमजीवी वर्ग के साथ विश्वासघात किया और अपने देश के पूंजीपति वर्ग का साथ दिया। बोल्शेविक पार्टी ने इस विश्वासघात के ख़िलाफ़ और साम्राज्यवाद तथा पूंजीपति वर्ग के ख़िलाफ़ अपने संघर्ष में दुनिया के सभी मज़दूरों की एकता के समर्थन में और इस एकता की रक्षा के लिए एक अडिग संघर्ष किया।

युद्ध के शुरू होने से पहले, 24-25 नवंबर, 1912 को बाज़ल शहर में एक असाधारण अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का आयोजन किया गया था। इसमें भाग लेने वाली पार्टियों में बोल्शेविक पार्टी, ब्रिटेन की लेबर पार्टी और फ्रांस तथा जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टियां शामिल थीं। बाज़ल कांग्रेस ने अंतर-साम्राज्यवादी युद्ध का विरोध करने के लिए सभी देशों के श्रमजीवी वर्ग के सिद्धांतों को स्थापित करने के लिए एक घोषणापत्र प्रकाशित किया था।

बाज़ल घोषणापत्र ने कहा कि ‘युद्ध को रोकने के लिए हर प्रयास को जारी रखना’ शामिल देशों में मज़दूर वर्ग और उनके संसदीय प्रतिनिधियों का कर्तव्य है। यह भी कहा गया कि यदि युद्ध किसी भी कारणवश शुरू हो जाता है, तो यह उनका कर्तव्य है कि ‘युद्ध द्वारा उत्पन्न आर्थिक और राजनीतिक संकट का इस्तेमाल लोगों को आंदोलित करने के लिये करें और इस तरह पूंजीवादी वर्ग के शासन के पतन की संभावनों को और तेज़ करें।’

जब 1914 में युद्ध छिड़ गया तो पश्चिमी यूरोप के मज़दूर वर्ग की पार्टियों के नेताओं ने बाज़ल घोषणापत्र के फ़ैसलों को पूरी तरह से नकार दिया। उन्होंने अपने – अपने देशों की साम्राज्यवादी सरकारों के युद्ध प्रयासों का समर्थन किया। उन्होंने श्रमजीवी वर्ग से ‘पितृभूमि की रक्षा’ के नाम पर अपने ही देश के पूंजीपति वर्ग का समर्थन करने का आह्वान किया!

ब्रिटिश और फ्रांसीसी मज़दूर किसान अपने ही वर्ग के जर्मन भाइयों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए लामबंध किये गए थे। जर्मन मज़दूरों को उनकी पार्टी के नेताओं ने बताया कि रूसी उनके दुश्मन हैं।

बोल्शेविक पार्टी ने दूसरे इंटरनेशल के नेताओं द्वारा बाज़ल घोषणापत्र के साथ विश्वासघात के ख़िलाफ़ एक कड़ा संघर्ष किया और बाज़ल घोषणापत्र के फ़ैसलों के साथ समझौता नहीं किया। बोल्शेविक पार्टी ने इन बड़े नेताओं का पर्दाफ़ाश किया और उनकी सामाजिक उग्र-राष्ट्रवादियों के रूप में निंदा की। सामाजिक उग्र-राष्ट्रवाद का अर्थ है – शब्दों में समाजवादी बयानबाजी और हक़ीक़त में सामाजिक – उग्र-राष्ट्रवाद और साम्राज्यवादी युद्ध का समर्थन। बोल्शेविक पार्टी ने बाज़ल घोषणापत्र के फ़ैसलों के मुताबिक, पूंजीवादी राज्य सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए साम्राज्यवादी युद्ध को एक गृहयुद्ध में परिवर्तित करने की हर संभव कोशिश करने के निर्णय को माना और उसे रूस में बखूबी से लागू किया।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, रूसी मज़दूरों किसानों और रूसी ज़ार की सेना में भर्ती उनके बेटों को भयंकर पीड़ा का सामना करना पड़ा। भोजन की भारी कमी और बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी के कारण लोगों में असंतोष बढ़ा। बोल्शेविक पार्टी ने इस असंतोष को दिशा दी – ज़ार के शासन के ख़िलाफ़, पूंजीपति वर्ग के ख़िलाफ़ और साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिये किये गये नाजायज़ युद्ध के ख़िलाफ़।

फरवरी 1917 में एक क्रांतिकारी जन-संघर्ष ने रूसी ज़ार के शासन को उखाड़ फेंका और एक अंतरिम सरकार की स्थापना की। बोल्शेविक पार्टी ने घटनाक्रम का विश्लेषण किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि श्रमजीवी वर्ग और उसके सहयोगियों की अपर्याप्त तैयारी के कारण, क्रांतिकारी विद्रोह ने राजनीतिक सत्ता को पूंजीपतियों के हाथों में सौंप दी थी। सोवियतें ऐसे नेताओं के प्रभाव में थी जिन्होंने उन्हें पूंजीपति वर्ग के एक लोकतांत्रिक भाग के ऊपर अपना विश्वास रखने के लिए कहा। क्रांति के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए राजनीतिक सत्ता को श्रमजीवी वर्ग के हाथों में लाने की सख़्त ज़रूरत थी, श्रमजीवी वर्ग जिसका किसानों और अन्य सभी उत्पीड़ित तबकों के साथ गठबंधन बना था। बोल्शेविक पार्टी ने धैर्य के साथ और लगातार प्रयासों के द्वारा सभी मज़दूरों और किसानों को अपनी सोवियत में संगठित होकर, सारी राजनीतिक सत्ता को अपने हाथों में लेने की आवश्यकता और इसमें सफलता की संभावनाओं पर यक़ीन दिलाया।

राजनीतिक सत्ता को सोवियतों के हाथों में स्थानांतरित करके अक्तूबर क्रांति ने एक पूरी तरह से नए राज्य, सोवियत राज्य की नींव रखी।

राज्य के बारे में मार्क्सवादी सिद्धांत का उपयोग

अक्तूबर क्रांति राज्य और क्रांति के मार्क्सवादी सिद्धांत पर आधारित एक सामाजिक क्रांति का पहला उदाहरण थी। इसने मार्क्सवाद के उस मौलिक निष्कर्ष का एक व्यावहारिक प्रदर्शन और प्रमाण प्रदान किया, जिसके अनुसार वर्ग संघर्ष अनिवार्य रूप से श्रमजीवी वर्ग के अधिनायकत्व को जन्म देगा और इस नयी राज्य सत्ता की ज़िम्मेदारी होगी यह सुनिश्चित करना कि समाज सभी प्रकार के शोषण और वर्गीय संघर्षों से मुक्त हो।

राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा करने के लिए श्रमजीवी वर्ग की पहली कोशिश, 1871 में हुई थी। मज़दूरों ने राज्य सत्ता का एक रूप स्थापित किया जिसे पेरिस कम्यून कहा जाता है। भले ही पेरिस के मज़दूर लंबे समय तक सत्ता में नहीं रह सके, लेकिन उनके बहुत ही महत्वपूर्ण अनुभव ने क्रांतिकारी सिद्धांत को आगे बढ़ाया। मार्क्स और एंगेल्स ने इस अनुभव के आधार पर एक महत्वपूर्ण सैद्धांतिक निष्कर्ष निकाला कि श्रमजीवी वर्ग, बनी-बनाई पूंजीवादी राज्य मशीनरी पर कब्ज़ा करके इसका उपयोग अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए नहीं कर सकता। श्रमजीवी वर्ग को पूंजीवादी राज्य को ध्वस्त करके, एक नई राज्य सत्ता का निर्माण करना होगा जो राज्य मेहनतकश लोगों के शासन करने के लिए एक तंत्र बतौर होगा। लेनिन ने मार्क्सवाद के इस महत्वपूर्ण सिद्धांत की रक्षा करने और उसे हक़ीक़त में अमल में लाने के लिये बोल्शेविक पार्टी का नेतृत्व किया।

बोल्शेविक पार्टी ने उस संस्था का पोषण और विकास किया, जिसको क्रांतिकारी जनता ने 1905 में जन्म दिया था और जिसका नाम है – मज़दूरों के प्रतिनिधियों की सोवियतें। मज़दूरों के प्रतिनिधियों की सोवियतें औद्योगिक मज़दूरों के लोकप्रिय राजनीतिक संगठन का एक रूप थीं। ये मज़दूर वर्ग के आज़माए और परखे हुए लड़ाकू प्रतिनिधियों की एक परिषद थी, जो अपने साथियों के बीच से ही खुद मज़दूरों द्वारा चुनी जाती थी। सोवियत संगठन की यह परिकल्पना, मज़दूरों के दिमाग में बस गयी थी और फरवरी 1917 में रूस के ज़ार की सत्ता को उखाड़ फेंकने वाले क्रांतिकारी विद्रोह के दौरान फिर से अमल में लाई गयी थी।

1917 में फरवरी के विद्रोह के बाद, बोल्शेविकों ने देश के विभिन्न हिस्सों में मज़दूरों, किसानों और सैनिकों की सोवियतों को मजबूत करने के काम में अपना योगदान दिया। उन्होंने आम जनता को समझाने के लिए सोवियतों के मंच का इस्तेमाल किया और उन्हें समझाया कि उनकी कोई भी ज्वलंत समस्या अंतरिम पूंजीवादी सरकार द्वारा हल नहीं की जाएगी जो सरकार ज़ार के शासन की जगह लाई गयी थी। शांति, ज़मीन और रोटी की गारंटी के लिए, मज़दूर-किसान गठबंधन को राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेना बहुत ज़रूरी है। फरवरी और अक्तूबर के बीच किए गए लगातार प्रयासों से बोल्शेविक पार्टी ने “सोवियतों के हाथों में सत्ता!” के आह्वान के लिये व्यापक समर्थन जीता

अक्तूबर क्रांति के बाद, सोवियतें श्रमजीवी वर्ग के अधिनायकत्व के तंत्र बन गईं। उन्होंने मज़दूरों, किसानों और सैनिकों को समाज के सामने अपने एजेंडे को स्थापित करने में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए एक तंत्र प्रदान किया। पूंजीवादी लोकतंत्र से कहीं बेहतर व्यवस्था के रूप में सोवियत लोकतंत्र उभरा – उदाहरण के तौर पर, सार्वजनिक निर्णयों में नागरिकों की भागीदारी, सोवियत लोकतंत्र में पूंजीवादी लोकतंत्र से कई गुना ज्यादा थी। समाजवाद एक बेहतर व्यवस्था के रूप में उभरा, जिसमें उन लोगों के लिए जो काम करते हैं, मेहनत करके जीना चाहते हैं उनके लिए यह संभव था कि बिना किसी शोषण, उत्पीड़न या भेदभाव के वे अपने श्रम के फल का आनंद भी ले संके। इस नई राज्य और आर्थिक व्यवस्था ने दुनियाभर का ध्यान उस समय आकर्षित किया जब पूंजीवाद एक गहरी मंदी में फंस गया था।

लेनिनवाद

1924 में लेनिन के निधन के बाद, लेनिनवाद को बोल्शेविक पार्टी द्वारा एक मूल्यांकन के रूप में पेश किया गया था। यह साम्राज्यवाद, जो पूंजीवाद का उच्चतम और अंतिम चरण है, इसके विश्लेषण, साम्राज्यवाद की स्थितियों में श्रमजीवी वर्ग के संघर्ष का नेतृत्व करने के लिए मार्क्सवाद को लागू करने के अनुभव, तथा अक्तूबर क्रांति सोवियत लोकतंत्र व समाजवाद के निर्माण के अनुभव पर आधारित था। स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी इस मूल्यांकन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची कि मार्क्सवाद का विज्ञान और भी विकसित हुआ है लेनिनवाद में।

लेनिनवाद को साम्राज्यवाद और श्रमजीवी क्रांति के युग के मार्क्सवाद के रूप में परिभाषित किया गया है। यह सामान्य रूप से श्रमजीवी क्रांति का सिद्धांत और रणनीति है तथा विशेष रूप से श्रमजीवी वर्ग के अधिनायकत्व का सिद्धांत और रणनीति।

साम्राज्यवाद का विरोध करने के इच्छुक और श्रमजीवी वर्ग व उत्पीड़ित लोगों के शोषण और दमन से मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाले साथियों के लिए लेनिनवाद का सिद्धांत और अभ्यास अनिवार्य है। अक्तूबर क्रांति का मार्ग श्रमजीवी वर्ग द्वारा संघर्षरत किसानों और अन्य उत्पीड़ित तबके को लामबंध करके पूंजीपति वर्ग के अधिनायकत्व को उखाड़ फेंकने और श्रमजीवी वर्ग की हुक्मशाही के तहत, समाजवादी व्यवस्था का निर्माण, हिन्दोस्तान में और विश्व स्तर पर समाज के सामने मौजूद सभी समस्याओं का एकमात्र सही समाधान है।

भाग-2 : लेनिन और समाजवाद के निर्माण के लिए संघर्ष

भाग-3: लेनिन के पुस्तिका – ‘राज्य और क्रांति’ के बारे में

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