सरकार के प्रस्ताव और किसान मोर्चे का जवाब

लाखों किसान राजधानी की सीमाओं पर डेरा डाल कर बैठे हैं क्योंकि पुलिस ने उन्हें दिल्ली के अंदर आने से रोक रखा है। 15 दिनों तक डटकर खड़े रहने के बाद, अब अन्त में उन्हें सरकार से एक लिखित जवाब मिला है। किसान मोर्चा ने सरकार के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया जिसमें पहले से पारित पूंजीपति-परस्त कानूनों में कुछ संशोधन करने की बात कही गयी थी। मोर्चे के सभी घटक संगठनों ने एकमत से यह फैसला लिया कि जब तक इन कानूनों को रद्द नहीं किया जाता उस समय तक वे अपना संघर्ष और अधिक तेज करते रहेंगे।

यहां हम सरकार द्वारा दी गयी तथाकथित रियायतों और उन्हें किसानों ने क्यों ठुकरा दिया उन कारणों को पेश कर रहे हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.)

केंद्र सरकार ने लिखित रूप में यह आश्वासन देने का प्रस्ताव रखा है कि वह न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) की मौजूदा व्यवस्था के साथ छेड़खानी नहीं करेगी। लेकिन किसान मौजूदा व्यवस्था को जारी नहीं रखना चाहते हैं। वे मांग कर रहे हैं कि सार्वजनिक ख़रीदी व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाया जाये, उसका विस्तार किया जाये, और इसमें देश के सभी क्षेत्रों को और सभी फ़सलों को शामिल किया जाये।

एम.एस.पी. की मौजूदा व्यवस्था के तहत देश के केवल कुछ ही किसानों को कुछ हद तक समर्थन मूल्य मिल पाता है। यह व्यवस्था सभी फ़सलों को पैदा करने वाले किसानों को लाभकारी मूल्य की गारंटी नहीं देती है। घोषित की गयी एम.एस.पी. पर सरकारी एजेंसियों द्वारा केवल गेहूं और धान की ही ख़रीदी की जाती है। कृषि उत्पादों का अधिकांश हिस्सा एम.एस.पी. से बेहद कम दाम पर निजी व्यापारियों द्वारा ख़रीदा जाता है।

सरसों, मूंगफल्ली और मूंग दाल के मामले में 10 प्रतिशत से भी कम फ़सल की सार्वजनिक ख़रीदी सरकार द्वारा की जाती है। मक्का, रागी, सोयाबीन और अन्य कई कृषि उत्पादों की कोई भी सार्वजनिक ख़रीदी नहीं की जाती है। यहां तक कि भारतीय खाद्य निगम (एफ.सी.आई.) देश के कुछ ही इलाकों में गेहूं और धान की ख़रीदी करता है।

सार्वजनिक ख़रीदी को सीमित पैमाने पर किये जाने का यह नतीजा यह हुआ है कि अधिकांश किसानों को अपनी फ़सल को बेहद कम दाम पर बेचने को मजबूर होना पड़ता है। कई किसान अपने उत्पादन लागत की भरपाई भी नहीं कर पाते हैं। 2018 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किये गए एक सर्व-हिन्द सर्वे में यह पाया गया कि 70 प्रतिशत प्याज उत्पादक, 60 प्रतिशत टमाटर उत्पादक, 45 प्रतिशत बैगन और सोयाबीन उत्पादक और 30 प्रतिशत मूंग और धान उत्पादकों को अपनी फ़सल की लगात से भी कम दाम मिला था।

किसान मोर्चा इस बात से संतुष्ट नहीं है कि सरकार मौजूदा एम.एस.पी. को जारी रखने का लिखित आश्वासन दे रही है, क्योंकि इससे सभी कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी की उनकी मांग पूरी नहीं होती है।

निजी मंडियों में शुल्क लगाया जायेगा

केंद्र सरकार ने किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम में संशोधन करने और राज्य सरकारों को निजी मंडियों के नियमन और उनपर मंडी शुल्क लगाये जाने की इजाजत देने का प्रस्ताव पेश किया है। सरकार का दावा है कि ऐसा करने से निजी मंडियों और सार्वजनिक ए.पी.एम.सी. मंडियों के बीच होड़ के लिए “समतल जमीन” सुनिश्चित की जा सकेगी। सरकार का यह दावा इस हकीकत को छुपाता है कि इस कानून का असली मकसद ए.पी.एम.सी. मंडियों के बाहर निजी कंपनियों और निजी ख़रीदी की संभावना का विस्तार करना है।

औद्योगिक और सेवा के क्षेत्र के कई मामलों के अनुभव से यह साफ़ हो गया है कि मौजूदा सार्वजनिक संस्थानों की जानबूझकर अनदेखी करना और उनका विनाश करना निजीकरण और उदारीकरण के सुधार कार्यक्रम का अभिन्न हिस्सा है। एयर इंडिया के निजीकरण को जायज ठहराने के लिए केंद्र सरकार ने जानबूझकर इस कंपनी पर बड़े पैमाने पर कर्ज और घाटे का बोझ डाला। साथ ही सरकारी स्कूलों की अनदेखी की गयी और उन्हें सड़ने दिया गया, ताकि निजी स्कूलों को बढ़ावा मिल सके। इसी तरह से ए.पी.एम.सी. मंडियों को भी बर्बाद कर दिया जायेगा ताकि किसानों को अपने उत्पादों को बेचने के लिए निजी ख़रीदारों के पास जाने के लिए बाध्य किया जा सके।

लेकिन किसान सरकार द्वारा निजी मंडियों पर शुल्क लगाये जाने, और राज्य सरकारों द्वारा निजी मंडियों का नियमन किये जाने के प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं है, क्योंकि इससे ए.पी.एम.सी. मंडियों की जगह निजी मंडियों को स्थापित किये जाने से रोका नहीं जा सकेगा। ऐसा करने से विशाल रिटेल कंपनियों द्वारा कृषि व्यापार पर अपना दबदबा कायम करने के रास्ते को रोका नहीं जा सकेगा।

कॉन्ट्रैक्ट खेती में विवाद का निवारण

कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर किसानों के साथ समझौता अधिनियम के तहत कॉन्ट्रैक्ट खेती को बढ़ावा दिया जायेगा। अंबानी, टाटा, बिरला, और अदानी समूह और वालमार्ट और अमेजन जैसी विशाल कंपनियां किसानों के साथ कानूनी कॉन्ट्रैक्ट करना चाहती हैं। इन कॉन्ट्रैक्टों के तहत यह कंपनियां खास कृषि उत्पादों के लिए किसानों को बीज, और लागत की अन्य वस्तुएं देंगी और किसानों से उनकी फ़सल ख़रीदने का वादा करेंगी, जिससे उन्हें बाद में भारी मुनाफ़ा बनाने की उम्मीद हो।

इन कानूनों में लिखा गया है कि यदि किसानों और कंपनियों के बीच कोई विवाद हो जाता है तो उसे जिला मजिस्ट्रेट के पास अपनी शिकायत लेकर जाना होगा, जिसका फैसला सबके ऊपर लागू होगा। अब सरकार कानून में संशोधन का प्रस्ताव रख रही है, जिससे किसान विवाद के निपटारे के लिए अदालत में जा सकते हैं।

कॉन्ट्रैक्ट खेती के आज तक के अनुभव यह दिखलाते हंै कि जब निजी कंपनियों को पता चलता है कि किसी उत्पाद के व्यापार में मुनाफ़ा नहीं है तो वह कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों का उल्लंघन करने और पैदा की गयी फ़सल को ख़रीदने से बचने के लिए कोई न कोई बहाना खोज निकालती हैं। ऐसे हालात में अक्सर यह देखने में आया है कि कंपनी दावा करती है कि उगाई गयी फसल उनकी गुणवत्ता मानकों के अनुसार नहीं है। ऐसी हालात में किसान क्या कर सकता है? जिला मजिस्ट्रेट के पास जाने से उसे अपनी फ़सल का दाम नहीं मिलेगा। अदालत में जाने की इजाज़त भी किसी काम की नहीं है।
किसान सालों साल अदालत के चक्कर नहीं काट सकता है। वह वकीलों की फीस के लिए लाखों रुपये खर्च नहीं कर सकता। वह अंबानी, टाटा, बिरला, और अदानी जैसे लोगों के खिलाफ़ कोर्ट में जीतने की उम्मीद नहीं कर सकता। यही वजह है कि किसान मोर्चा नहीं मानता कि इन तथाकथित रियायतों से पूंजीपतियों कंपनियों के हाथों किसानों के शोषण और लूट को रोकने की कोई गारंटी होगी।

 

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