हमारे पाठकों से: बेरोज़गार हो गए अख़बार बाँटने वाले

कोरोना महामारी और लॉकडाउन के चलते, विभिन्न क्षेत्रों में तमाम श्रमिकों के रोज़गार के साधन ख़त्म हो गए हैं। सरकार बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों को राहत पैकेज देने की बात कर रही है, परन्तु इन बेरोज़गार श्रमिकों के दुःख-दर्द शायद ही कभी सुर्खियों में आते हैं। मज़दूर एकता लहर के एक पाठक से हमें अख़बार बांटने वाले श्रमिकों की दुर्दशा के बारे में यह पत्र मिला है।

माननीय संपादक महोदय,

मज़दूर एकता लहर

कोरोना के डर, डिजिटल जुड़ाव और लॉकडाउन के बाद अख़बारों की कम होती मांग की वजह से हजारों अख़बार बांटने वाले, बेरोज़गार हो गए हैं।

सुबह की भोर में जब चकाचैंध दिल्ली, सबसे प्यारी नींद की आगोश में सो रही होती है। उसी भोर में कुछ किशोर साइकिल की हैंडल पर टोकरी और थैले लिए निकल जाते हैं अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने। अख़बारों के थोक मूल्य पर मिलने वाले सेंटरों पर पहुंचकर, अलग-अलग कम्पनियों के अख़बार खरीदते हैं। मुख्य पन्नों के बीच सप्लिमेंटरी पन्ने भरते हैं। और मालिक की निगरानी में गिनकर अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी लेकर चल पड़ते हैं।

साइकिल चलाते-चलाते किसी के दरवाज़े तो किसी की बहुमंजिली बालकनियों में रबड़ से लपेटे अख़बार फेंकते हैं। गिनती के अख़बारों की ज़िम्मेदारी ऐसी कि निशाना हमेशा सटीक ही लगता है।

चाहे कड़ाके की ठंड हो या तेज़ बारिश, रविवार हो या कोई राष्ट्रीय अवकाश। दिवाली और होली के बासी दिन के अलावा, इनके लिए कोई छुट्टी नहीं होती।

हर दिन दो से तीन घंटे के काम के बाद, ज़िम्मेदारी और अख़बारों की संख्या के आधार पर 800 रुपये से लेकर 1500 रुपये तनख्वाह मिलती है। जिसके लिए ये मेहनती जोशीले नौजवान काम करते हैं।

ज्यादातर झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले किशोरों के लिए अख़बार बांटना मुख्य पार्ट टाइम काम है जिसे करके वे अपनी ट्यूशन की फीस देते हैं। अपना जेब खर्च चलाते हैं। और परिवार चलाने में आर्थिक मदद करते हैं।

प्रधानमंत्री द्वारा लिए गए शुरुआती 21 दिन के लॉकडाउन के फैसले के मद्देनजर नेहरू प्लेस जैसे कई अख़बार सेंटरों के वेंडर्स असोसिएशन ने यह फैसला लिया की लॉकडाउन में कोई भी अख़बार का काम नहीं करेगा। सरकार के भारत बंद के फैसले का सम्मान किया जाएगा। और ऐसा ही हुआ।

हालांकि सरकारों ने अख़बार के काम को “ज़रूरी सेवा” की श्रेणी में रखा और ई-पास लेकर काम करने की इजाज़त दी। लेकिन हर मोड़, हर चैराहे पर हुई सरकारी नाकाबंदी और रेजिडेंट वेलफेयर असोसिएशन के द्वारा प्रवेश द्वार बंद कर दिए जाने की वजह से अख़बार बांटना मुश्किल हो गया। अनेकों हाउसिंग सोसाइटियों ने बाहरी लोगों का प्रवेश रोक दिया।

दूसरी तरफ अख़बार से कोरोना फैलने के पुख़्ता सबूत न मिलने के डब्ल्यू.एच.ओ. के बयान के बावजूद भी, भारी संख्या में मासिक अनुबंध पर अख़बार लेने वालों ने, लेना बंद कर दिया। वेंडर्स ने अख़बारों की संख्या कम होने की वजह से अख़बार डालने वाले लड़कों को निकलना शुरू कर दिया। आज हालात ये हैं कि इनमें से लगभग 80 प्रतिशत अख़बार डालने वाले बेरोज़गार हो गए हैं।

नेहरू प्लेस के एक वेंडर “चैहान न्यूज सर्विसेज” के अनुसार कोरोना के डर की वजह से लगभग 40 प्रतिशत से ज्यादा रीडर्स ने अख़बार लेना बंद कर दिया है। जिसकी वजह से काम कम हो गया है। इसका असर ये है कि वेंडर्स को अपने यहां सालों से काम कर रहे लड़कों को मजबूरन निकलना पड़ा है।

अख़बार बांटने का काम करने वाले एक युवक ने बताया कि “ये काम परिवार की आर्थिक मदद और अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए करता था। लॉकडाउन की वजह से पिता के पास काम नहीं है और मैं भी बेरोज़गार हो गया हूं।”

अख़बार की डिलीवरी का काम करने वाले लोगों की बेरोज़गारी किसी को नहीं दिखती है। ज़रूरी सेवा की श्रेणी में होने के बावजूद भी न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र की तरफ से किसी तरह की राहत दी गई। बेरोज़गारों का ये तबका किसी भी गिनती में नहीं आता। किसी को इनकी कोई परवाह नहीं।

पूरी दिल्ली में एक सौ से ज्यादा सेंटर्स हैं जहां लगभग सभी अख़बार थोक क़ीमत पर मिलते हैं। हर सेंटर पर लगभग 100 से ज्यादा वेंडर्स आते हैं। हर वेंडर के पास दो से तीन अख़बार बांटने वाले काम करते हैं। और लगभग सभी वेंडर्स ने अपने यहां काम करने वालों को मजबूरन हटाया है। हजारों की संख्या में अख़बार डालने वाले बेरोज़गार हो गए हैं।

आपका पाठक

दिल्ली

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