डॉ. बिनायक सेन को दोषी ठहराने के खिलाफ़ सैकड़ों ने प्रदर्शन किया

राजद्रोह के आरोप पर 24 दिसम्बर, 2010 को रायपुर सत्र न्यायालय द्वारा डा.

राजद्रोह के आरोप पर 24 दिसम्बर, 2010 को रायपुर सत्र न्यायालय द्वारा डा. बिनायक सेन को अन्यायपूर्ण तरीके से अपराधी ठहराये जाने और उन्हें आजीवन कारावास की सजा दिये जाने की अनेक राजनीतिक पार्टियों, विभिन्न मेहनतकश लोगों के लोकतांत्रिक संगठनों, मानव अधिकार संगठनों, प्रगतिशील बुध्दिजीवियों, तथा ज़मीर वाले सभी महिलाओं और पुरुषों ने निंदा की है। देशभर में और सभी राज्यों में सैकड़ों लोगों ने जन प्रदर्शनों में भाग लिया है। लोगों ने इस फैसले का विरोध किया है, जमीर के अधिकार
की हिफ़ाज़त में आवाज़ उठाई है, न्याय की मांग की है तथा यू.ए.पी.ए. और छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा कानून जैसे फासीवादी कानूनों को रद्द करने की मांग की है।
ये प्रदर्शन दिखाते हैं कि अपने शासकों द्वारा ज़मीर के अधिकार और लोगों के प्रतिरोध को कुचलने के लिये फासीवादी कानूनों और राजकीय आतंकवाद के इस्तेमाल के खिलाफ़ विरोध बढ़ रहा है। मज़दूर एकता लहर, देशभर से उठी उन हजारों आवाजों के साथ अपनी आवाज उठाती है, जो इस ज़मीर के अधिकार के खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन के खिलाफ़ उठी हैं, और बुलावा देता है कि हमारे लोगों के मानव अधिकार, न्याय और आत्म-सम्मान सुरक्षित करने के लिये, राजकीय आतंक के उपकरणों तथा शोषण व दमन की व्यवस्था को खत्म करें। नीचे हम प्रदर्शनों की एक झलक पेश कर रहे हैं।
25 दिसम्बर, 2010 के दिन डॉ. बिनायक सेन रिहाई समिति ने मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल के बाहर, प्रदर्शन आयोजित किया।
राजधानी में सैकड़ों शिक्षकों, विद्यार्थियों, नौजवानों, व्यवसायी लोगों, महिलाओं और मज़दूरों तथा कार्यकर्ताओं ने 27 दिसम्बर, 2010 के दिन जन्तर-मन्तर पर, डॉ. बिनायक सेन को दोषी ठहराने का विरोध करने के लिये सभा की। वक्ताओं ने इस फैसले को, साफ-साफ, इजारेदार पूंजीपतियों के हित और उनके अतिमुनाफे को बरकरार रखने के लक्ष्य से, हिन्दोस्तानी राज्य का मज़दूरों, किसानों और प्रगतिशील बुध्दिजीवियों पर निर्दयी हमला बताया। लोक राज संगठन के वक्ता ने ज़मीर के अधिकार पर और नाइंसाफी व शोषण के खिलाफ़ अपनी आवाज़ उठाने के अधिकार पर, इस खुल्लम-खुल्ला हमले की निंदा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह एक और घटना है जो साफ दिखाती है कि हिन्दोस्तानी राज्य हमेशा इजारेदार पूंजी के अधिकतम मुनाफे के हित में काम करता है। उन्होंने सभी उपस्थित लोगों से मांग की कि डॉ. बिनायक सेन को न्याय दिलाने के संघर्ष को आगे ले जाने में लोक राज यानि मेहनतकश लोगों के राज को स्थापित करने का नजरिया अपनायें।
27 दिसम्बर, 2010 को दुनियाभर के बुध्दिजीवियों और शिक्षकों ने एक बयान जारी किया, जिसमें डॉ. बिनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा देने का विरोध किया गया। इसमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, अमरीका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय और एम.आई.टी., टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान तथा भारतीय प्रबंधन संस्थान (कोलकाता) आदि के शिक्षक शामिल थे।
31 दिसम्बर, 2010 को डॉ. सेन के समर्थन में पटना की बेऊर केन्द्रीय जेल में एक प्रदर्शन हुआ। कैदियों ने क्रमिक भूख हड़ताल की और धमकी दी कि अगर बिनायक सेन को न्याय नहीं दिया जाता तो वे अनिश्चित काल के लिये भूख हड़ताल करेंगे।
31 दिसम्बर, 2010 को रायपुर, छत्तीसगढ़ में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने डॉ. सेन के समर्थन में एक रैली की और धरना दिया।
पश्चिम बंगाल के बांग्लार मानाबाधिकार सुरक्षा मंच (मासूम) तथा प्रोग्राम अगैन्स्ट कस्टोडियल टोर्चर एण्ड इम्प्यूनिटि ने 31 दिसम्बर, 2010 को छत्तीसगढ़ राज्य टूरिस्ट सूचना केंद्र के सामने धरना दिया।
1 जनवरी, 2011 को भोपाल में 500 से भी अधिक लोगों ने डॉ. बिनायक सेन की रिहाई के लिये एक जनसभा की। इसके तुरंत बाद एक रैली की गयी जिसमें इस विडंबना पर ध्यान दिलाया गया कि हजारों लोगों की मौत के लिये जिम्मेदार भोपाल गैस कांड के अपराधियों को सिर्फ दो साल की सजा दी गयी जबकि लोगों के अधिकारों के मुद्दे पर लड़ने वाले मानव अधिकार कार्यकर्ता को आजीवन कारावास दिया गया है।
4 जनवरी, 2011 को डॉ. सेन को उनके जन्मदिन पर समर्थकों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ने बधाई पत्रों, तारों और कार्डों को भेजकर रायपुर की जेल भर दी। कोलकाता में उनके पैतृक घर पर सैकड़ों समर्थक उनकी गैरहाजिरी में उनके जन्मदिन को मनाने के लिये जमा हुये।
4 जनवरी, 2011 को डॉक्टर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता और मानव अधिकार कार्यकर्ता ”मानव अधिकार के लिये चिकित्सक” संस्था स्थापित करने के लिये साथ आये। हिन्दोस्तान की शाखा के लिए माननीय सभापति की उपाधि, जनजातियों और गरीबों के बीच उनके अथक काम के लिये, डॉ. सेन को दी गयी।
4 जनवरी, 2011 की शाम को डॉ. बिनायक सेन के समर्थकों ने वढ़ोदरा, गुजरात में मोमबत्ती जलाकर धरना दिया। वक्ताओं ने दोष लगाया कि जो गरीबों की सहायता करते हैं और सरकार के गुनाहों का पर्दाफाश करते हैं उन्हें ”देशद्रोही” कहा जाता है पर जो देश की संपदा और प्राकृतिक संसाधनों को चूसते हैं और जो गरीबों का शोषण करके अपार मुनाफा बनाते हैं उन्हें ”राष्ट्रप्रेमी” कहा जाता है।
4 जनवरी, 2011 की रात को डॉ. बिनायक सेन के लिये न्याय की मांग को लेकर दिल्ली में मोमबत्ती जलाकर दो प्रदर्शन हुए। एक, बिनायक सेन मुक्ति अभियान द्वारा जन्तर-मन्तर में आयोजित किया गया था और दूसरा, विभिन्न इसाई संगठनों द्वारा इंडिया गेट पर किया गया था जिसमें करीब 200 लोगों ने भाग लिया।
4 जनवरी, 2011 को मदुरई में डॉ. बिनायक सेन की रिहाई की मांग को लेकर एक विरोध सभा की गयी। कोलकाता में लगभग 200 चिकित्सक, उनकी बिना शर्त रिहाई की मांग को लेकर, मोहर कुंज में जमा हुये।
फॉरेस्ट वर्कर्स के राष्ट्रीय संगठन ने एक व्यक्तव्य जारी किया, जिसमें डॉ. बिनायक सेन को फौरन रिहा करने की मांग की गई। पी.यू.डी.आर. ने सक्रियता से डॉ. बिनायक सेन के लिये समर्थन जुटाने का काम किया है।

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