यह लोकतंत्र पूंजीतंत्र है!

संपादक महोदय,
मजदूर एकता लहर के दिसम्बर 16-31, 2010 के अंक 24 के पृष्ट 5 पर प्रकाशित शीर्षक संपादक महोदय,
मजदूर एकता लहर के दिसम्बर 16-31, 2010 के अंक 24 के पृष्ट 5 पर प्रकाशित शीर्षक ‘पूंजीपति वर्ग ने बिहार में नीतीश कुमार का पुन: चुनाव सुनिश्चित किया‘, पूरे बिहार चुनाव और उसके परिणाम को स्पष्ट कर देता है। इससे मैं पूरी तरह सहमत हूं।
मेरा मानना है कि दे की सरमायदारी पार्टियों के साथ-साथ दे की कुछ कम्युनिस्ट पार्टियों ने वर्तमान चुनाव प्रणाली और लोकतंत्र की व्यवस्था के बारे में मेहनतक अवाम के बीच बहुत भ्रम फैला रखा है। ऐसे में, इस लेख के शीर्षक को पचाना आम मेहनतक के लिए कठिन जान पड़ता है। लेखक की कोशिश यह होनी चाहिए कि जब वे ऐसे शीर्षक दें, तो उदाहरणों और उसके पक्ष में तर्क अवश्य दें ताकि पाठक अच्छी तरह से समझ सके। यह सच है कि देश की बागडोर बड़े पूंजीपतियों के हाथ में है। दे की शासन सत्ता पर कौन-सी पार्टी या गठबंधन आयेगी या मंत्रीमंडल में कौन होंगे, पूंजीपति ही निर्णय करते हैं।
पूंजीवादी राज्य की परिभाषा के मुताबिक, वर्तमान राज्य सत्ता को चलाने के लिए पूंजीपतियों को काबिल और साफ-सुथरे छवि वाली राजनीतिक पार्टी की जरूरत है। ऐसी पार्टी या पार्टियों का संयुक्त गठबंधन, जो देश की मेहनतकश अवाम में इस व्यवस्था के प्रति विश्वसनीयता को बनाये रखकर, पूंजीपतियों के हितों (लूट-खसौट) को बड़ी कुषलता तथा ईमानदारी के साथ पूरा करें। पश्चिम बंगाल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का 33 सालों के राज का राज़ सिर्फ यही है कि देश में इंकलाबी तूफानों को रोकने के लिए पूंजीपतियों के पास इससे बेहतर विकल्प और कोई न था।
बिहार, जैसे अति पिछड़े राज्य में नीतीश सरकार का आना या उससे पहले 2009 के विधानसभा चुनाव में उड़ीसा में बिजू जनता दल का उभरकर आना यह कोई आकस्मिक बात नहीं है। प्राकृतिक और मानव संसाधनों से भरपूर, इन दोनों राज्यों में, पूंजीवादी विकास और लूट-खसौट के नये आयाम खोलने का श्रेय पूंजीपति वर्ग ने इन दोनों राजनीतिक पार्टियों को दिया है।
अत: कम्युनिस्टों का काम है कि अपने संघर्षों से, वह चाहे आर्थिक हो या चुनावी, इस पूरी व्यवस्था का पर्दाफाश करें।
अभिनव दास गुप्ता,
भुवनेश्वर, उड़ीसा

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