साम्राज्यवाद, फासीवाद और जंग के खिलाफ़, दुनियाभर की मेहनतकश जनता की बढ़ती विरोधता का एक साल

हाल के वर्षों में, विश्व स्थिति की सबसे स्पष्ट विशेषता यह रही है कि पूंजीवादी देशों में शोषित जनसमुदाय और इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में शोषकों के बीच अन्तर्विरोध तेज़ हो रहे हैं।

हाल के वर्षों में, विश्व स्थिति की सबसे स्पष्ट विशेषता यह रही है कि पूंजीवादी देशों में शोषित जनसमुदाय और इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में शोषकों के बीच अन्तर्विरोध तेज़ हो रहे हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उपभोग की चीजों का उत्पादन उन देशों में करना चालू कर दिया, जहां कुशल श्रम अधिक संख्या में उपलब्ध है और कुछ सस्ता है। खुदरा इजारेदार कंपनियों को सस्ते से सस्ते दामों पर सामग्रियों और सेवाओं की आपूर्ति करने के लिये, सारी दुनिया में अधिक से अधिक मजदूरों का अतिशोषण हो रहा है। बेरोज़गारी बहुत बढ़ गयी है, खास तौर पर विकसित पूंजीवादी देशों में जहां बढ़ती संख्या में मज़दूरों को नौकरियों से निकाला गया है।

इससे अतिउत्पादन का पूंजीवादी आर्थिक संकट गहराया और विस्तृत हुआ है। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में जबरदस्त संकट है क्योंकि मेहनतकश लोगों की क्रय शक्ति पर, इजारेदारों के द्वारा अपने मुनाफों को अधिकतम बनाने की कोशिशों से, भारी चोट पहुंची है। क्रय शक्ति में कमी से बिना बिकी वस्तुओं के भंडार भरे हुये हैं और उत्पादन में कटौती की जा रही है, जिसकी वजह से मज़दूरों को काम से निकाला जा रहा है और बेरोज़गारी बढ़ रही है। इससे क्रय शक्ति और भी घटती जा रही 

है। इस विषम चक्र से, लोगों के जीवन में भारी अस्तव्यस्तता आयी है जो कि अर्थव्यवस्था की पूंजीवादी दिशा की वजह से है।

दुनिया भर में मेहनतकश जनता और भी साफ तरीके से समझ रही है कि अर्थव्यवस्था की पूंजीवादी दिशा और उनका कल्याण एक-दूसरे से मेल नहीं खाते हैं। पूंजीवादी सरकारों ने ऐसे ''सुधार'' लाने की कोशिश की है जिससे संकट का बोझ मेहनतकश जनता  पर लादा जा सके। सरकारें बड़े-बड़े बैंकों को बचाने के लिये राहत पैकेज देती आयी हैं परन्तु मेहनतकश लोगों के परिवारों को अपनी हिफ़ाजत खुद करने को कहती हैं। इसका विरोध-प्रदर्शन करने के लिये लोग सड़कों पर उतर रहे हैं।

फ्रांस, यूनान, जरमनी, ब्रिटेन और अमरीका के एक सिरे से दूसरे सिरे तक बड़ी संख्या में, लोग यह घोषणा करने को सड़कों पर उतर आये हैं कि राज्य को सामाजिक सुरक्षा व स्वास्थ्य सेवा की अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। ब्रिटेन व फ्रांस में, उनके लिये शिक्षा दुर्लभ और महंगी होने का, विद्यार्थी बड़ी संख्या में विरोध कर रहे हैं। पूरे यूरोप में सरकारी कर्मचारी, अध्यापक, रेल चालक, गोदी मज़दूर और भी बहुत से अन्य लोग बड़ी संख्या में ऐसे ''सुधारों'' के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं जो सिर्फ इजारेदारों के हित में हैं। ''वॉल स्ट्रीट पर कब्ज़ा करो'' आंदोलन में शामिल होकर, बहुत बड़ी संख्या में, लोगों ने बार-बार वित्तीय खिलाड़ियों के इलाके में ही कब्ज़ा जमाया है और उन्हें याद दिलाया है कि वे आबादी के 99 प्रतिशत हैं।

हाल के वर्षों में अपनी संप्रभुता के लिये संघर्ष कर रहे देशों, राष्ट्रों व लोगों तथा प्रमुख साम्राज्यवादी ताकतों, जो अपना नमूना और नज़रिया सभी देशों पर थोपना चाहती है, इनके बीच अन्तर्विरोध ज्यादा से ज्यादा नज़र आ रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवाद ने दिखाया है कि वह अपने तथा अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रधान रुतबे की हिफ़ाज़त करने के लिये जंग छेड़ने को तैयार है। पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका में वे मौत और विनाश का तांडव शुरू कर ही चुके हैं।

अफगानिस्तान और इराक के लोग अमरीका नीत विदेशी कब्ज़ाकारी फौजों से अपनी मातृभूमि को मुक्त कराने के लिये बहादुरी से लड़ रहे हैं। झूठे बहानों के आधार पर खुलेआम हमला करने, भीषण विनाश करने तथा उपनिवेशवादी कब्ज़ा करने का साम्राज्यवादी ताकतों का भयानक अपराध आज सबके सामने स्पष्ट है। अमरीका नीत ऐसे कब्ज़े का विरोध करने के लिये न केवल युध्द के इलाकों में बल्कि साम्राज्यवादी देशों के भीतर भी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

फिलिस्तीनी और उस इलाके के अन्य लोगों के साथ इस्राइली जाउनवादियों की अपराधपूर्ण हरकतों के खिलाफ़ जन प्रतिरोध बढ़ रहा है। साम्राज्यवादी ताकतों का अलोकतांत्रिक और फासीवादी रुख साफ दिखायी दिया जब पिछले साल संयुक्त राष्ट्र की महासभा में फिलिस्तीन के प्रतिनिधी ने सदस्यता के लिये अपना मामला प्रस्तुत किया।

पाकिस्तान में बढ़ती अमरीकी साम्राज्यवादी दादागिरी और दखलंदाज़ी के खिलाफ़ लोगों का गुस्सा और विरोध बहुत फैल गया है। वहां अधिकतम लोग अमरीकी साम्राज्यवाद को पाकिस्तान का एक नंबर का दुश्मन और खतरा मानते हैं। पिछले वर्ष ओसामा बिन लादेन की तथाकथित हत्या की दु:स्साहसी कार्यवाई और बार-बार सैन्य कार्यवाइयों के विरोध में अलग-अलग देशों में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुये हैं।

बार-बार आर्थिक संकटों, फासीवाद और जंग के ख़तरों से मुक्ति तभी मिल सकती है जब इस आदमखोर पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिये और अपना राज स्थापित करने के लिये मेहनतकश लोग एकता बनायेंगे और संगठित होंगे।

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