मणिपुर विधान सभा चुनाव :

मुद्दा है सशस्त्र बल (विशेष-अधिकार) अधिनियम और सैनिक शासन को स्थायी रूप से खत्म करना!

28 जनवरी को केन्द्रीय सशस्त्र बलों के फासीवादी राज की हालतों में, मणिपुर के लोगों को एक बार फिर विधान सभा के सदस्यों को चुनने के लिये कहा जा रहा है।

मुद्दा है सशस्त्र बल (विशेष-अधिकार) अधिनियम और सैनिक शासन को स्थायी रूप से खत्म करना!

28 जनवरी को केन्द्रीय सशस्त्र बलों के फासीवादी राज की हालतों में, मणिपुर के लोगों को एक बार फिर विधान सभा के सदस्यों को चुनने के लिये कहा जा रहा है।

मणिपुर की सड़कों पर केन्द्रीय सशस्त्र बलों के ही आदेश चलते हैं। उपनिवेशवादी और फासीवादी सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम (ए.एफ.एस.पी.ए.) की छत्रछाया में, वर्दी में सैनिकों को मात्र संदेह पर ही किसी व्यक्ति को मार देने का अधिकार है।

जबकि विधान सभा के सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से मांग रखी थी कि ए.एफ.एस.पी.ए. को रद्द किया जाये, तब भी ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि न तो यह केन्द्रीय सेना कमान को मंजूर था और न ही नयी दिल्ली की शासक सत्ता को। यह साफ सिध्द करता है कि मणिपुर पर केन्द्र की हुकूमत है। निर्वाचित राज्य विधान सभा और उसका गैरसैनिक प्रशासन एक कठपुतली मात्र हैं जो केन्द्र की आज्ञा के अनुसार ही चलते हैं।

इस चुनाव में लोगों से किसको वोट देने की अपेक्षा की जा सकती है? क्या उन्हें उपनिवेशवादी और फासीवादी सैन्य शासन के लिये वोट देना चाहिये? क्या उन्हें यह चुनना चाहिये कि कौन सी पार्टी इन असहनीय परिस्थिति को जारी रखने का गंदा काम करेगी?

मणिपुर की राजनीतिक परिस्थिति के बारे में अपने देश का शासक वर्ग हमेशा सच्चाई का उल्टा बताता है। नयी दिल्ली का सरकारी प्रचार यह है कि चूंकि मणिपुर के अधिकांश लोग हिन्दोस्तानी संघ और उसके संविधान को नहीं मानते, इसीलिये यहां सैन्य शासन जरूरी है। सरकार कहती है कि आत्मनिर्धारण के अधिकार की मांगने वाले मणिपुर के लोग, ''हिन्दोस्तान की एकता व अखण्डता'' के लिये ख़तरा हैं।

हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद की जीत के पहले से ही, मणिपुर एक स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता के रूप में मौजूद था। इम्फाल घाटी और आसपास की पहाड़ियों के लोगों का गौरवमय इतिहास है कि उन्होंने उपनिवेशवाद या किसी दूसरे का अपने ऊपर शासन स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपनी राजनीतिक राजसत्ता और संविधान स्थापित कर लिया था, जब नेहरू की सरकार ने मणिपुर के महाराजा को वस्तुत: हिरासत में ले कर, उससे गुवाहटी में विलयन समझौते पर जबरदस्ती हस्ताक्षर कराये थे।

जहां तक मणिपुर के लोगों का सवाल है, उपनिवेशवाद के पश्चात के हिन्दोस्तानी संघ के संविधान से वहां उपनिवेशवादी राज समाप्त नहीं हुआ। वहां हथियारों के बल पर अलोकप्रिय राज जारी रहा है। इसमें क्या आश्चर्य की बात है कि लोग इन उपनिवेशी हालातों से राजी नहीं हैं जब उनके पास इतने राजनीतिक अधिकार भी नहीं हैं जितने एक अधिकतम हिन्दोस्तानियों के पास हैं।

मणिपुर के लोगों की नाराजगी उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित होने की स्थिति से आती है। इसका कारण है उनके आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार होना और अफसरों और गैर-सरकारी सशस्त्र बलों द्वारा पैसे वसूली का शिकार होना।

फासीवादी राज का जारी रहना और आत्मनिर्धारण के अधिकार का नकारा जाना, ये समस्या की जडें हैं। गैरकानूनी प्राधिकारियों का विरोध लोगों में बहुत ही व्यापक है। केन्द्रीय राज्यसत्ता ऐसे विरोध को ''हिन्दोस्तान की एकता व अखण्डता'' के लिये ख़तरा बताता है और अपने फासीवादी राज को जारी रखने का बहाना बनाता है।

अपने देश के लोगों की सुख और सुरक्षा को किसी राष्ट्र के लोगों से ख़तरा नहीं है। उन्हें ख़तरा है तो दिल्ली की राज सत्ता का नियंत्रण करने वाले बड़े पूंजीपतियों की खूंखार लालच और साम्राज्यवादी मंसूबों से है। हिन्दोस्तान के दबे-कुचले राष्ट्रों और लोगों के प्रति,टाटा, अंबानी और दूसरे इजारेदार गुटों के नेतृत्व में शासक वर्ग का नज़रिया, ब्रिटिश उपनिवेशवादियों से अलग नहीं है। उनकी चिंता सिर्फ अपने निजी मुनाफों को अधिकतम बनाने के लिये लूट-पाट सुनिश्चित करने के लिये इलाकों पर अपना नियंत्रण बनाये रखना है; और वे राष्ट्रों और लोगों के अधिकारों व व्यक्तियों के अधिकारों को कुचलने से कभी नहीं कतराते। उन्होंने अलग-अलग राष्ट्रों और लोगों को आपस में लड़ाने की ''फूट डाल कर राज करने'' की कला को और विकसित किया है। मणिपुर के और पुर्वोत्तार के दूसरे राज्यों के लोग इसी नीति के शिकार बने हैं।

मणिपुर की समस्या के बुनियादी कारण को संबोधित किये बिना, पहले भी कई बार चुनाव किये गये हैं। इनका मकसद सिर्फ यथास्थिति को बरकरार रखना और उसपर वैधता की सजावटी परत चढ़ाना रहा है।

जो मणिपुर को राष्ट्रीय दमन और वहां जिन्दगी की अमानवीय स्थिति से मुक्ति देना चाहते हैं, जो मानव अधिकारों और आत्मसम्मान में विश्वास करते हैं, उन्हें बुनियादी मुद्दे पर ही ध्यान रखना होगा। उन्हें किसी भी बहाने पथभ्रष्ट नहीं होना चाहिये। उन्हें अपनी एकता, सबसे तात्कालिक मांग, यानि कि ए.एफ.एस.पी.ए. और सैन्य शासन का अंत तथा सभी सैनिकों को अपने बैरकों में वापस भेजने, इसके इर्द-गिर्द बनानी चाहिये और उसकी रक्षा करनी चाहिये।

एकताबध्द और सुरक्षित हिन्दोस्तान बनाने के लिये मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ से नाता तोड़ना जरूरी है जो उपनिवेशी नींव पर बनाया गया है। हिन्दोस्तान को एक नये आधार पर, यानि कि स्वेच्छा पर आधारित सभी सहमत राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों का संघ बतौर, बना कर ही, राष्ट्रीय अधिकारों और लोगों की एकता की समस्या का समाधान पाया जा सकता है।

अपने देश में मज़दूर व किसान देश के हर हिस्से में, हर राष्ट्र, राष्ट्रीयता और लोगों में, आबादी के अधिकांश भाग हैं। देश के हर हिस्से में मज़दूरों व किसानों से ही राष्ट्र बनता है, और ऐसे मज़दूरों व किसानों के राष्ट्रों को एक साथ मिलकर एक बलवान हिन्दोस्तानी स्वेच्छिक संघ बनाना चाहिये। ऐसे संघ में राष्ट्र, राष्ट्रीयतायें और लोग स्वेच्छा से सम्मिलित होंगे और उसकी रक्षा करेंगे क्योंकि ऐसा संघ सब के लिये लाभदायक होगा।

आधुनिक मज़दूर वर्ग, जिसकी रचना बहुराष्ट्रीय और बहुभाषीय है, इसका ऐसा नज़रिया है। यही हिन्दोस्तानी राज्य के नवनिर्माण के कार्यक्रम का सार है, जिस कार्यक्रम की हिमायत आज हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी करती है।

चलो, हम हिन्दोस्तान की राज्य व्यवस्था और संघ के रणनैतिक दृष्टिकोण से मणिपुर में तात्कालिक मांग के संघर्ष को मजबूत करें।

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