लोक पाल बिल पर संसदीय वाद-विवाद का नाटक

लोक पाल और लोकायुक्त बिल, 2011 को लोकसभा में चर्चा के लिये 23 दिसंबर, 2011 को पारित किया गया। इस बिल के मसौदे को एक संविधान संशोधन बिल के साथ-साथ पारित किया गया। इनका मकसद था एक संविधानीय दर्जे वाला भ्रष्टाचार विरोधी जांचकारी आयुक्त बनाना, जिसकी जिम्मेदारी होगी कार्यकारिणी, यानि सभी सरकारी कर्मचारियों तथा प्रधानमंत्री समेत सभी मंत्रियों के खिलाफ़ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच करना (बेशक इसमे

लोक पाल और लोकायुक्त बिल, 2011 को लोकसभा में चर्चा के लिये 23 दिसंबर, 2011 को पारित किया गया। इस बिल के मसौदे को एक संविधान संशोधन बिल के साथ-साथ पारित किया गया। इनका मकसद था एक संविधानीय दर्जे वाला भ्रष्टाचार विरोधी जांचकारी आयुक्त बनाना, जिसकी जिम्मेदारी होगी कार्यकारिणी, यानि सभी सरकारी कर्मचारियों तथा प्रधानमंत्री समेत सभी मंत्रियों के खिलाफ़ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच करना (बेशक इसमें कई शर्तें शामिल हैं)। सरकार ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को हल करने के तथाकथित इरादे से लोक सभा में न्यायिक मानक और जवाबदेही बिल को भी पारित किया। भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वालों की रक्षा करने के लिये एक और विधेयक भी पारित किया गया।

23 दिसंबर और 27-29 दिसंबर को संसद के दोनों सदनों में वाद-विवाद के बाद, इन बिलों पर मतदान हुआ। जबकि लोक पाल बिल को लोक सभा में पास कर दिया गया, उसे संविधानीय दर्जा देने के प्रस्ताव को हरा दिया गया, क्योंकि संविधानीय संशोधन के लिये आवश्यक बहुमत नहीं मिल पाया। इसके साथ-साथ पारित किये गये दो अन्य बिलों-न्यायपालिका की जवाबदेही पर बिल और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वालों की रक्षा पर बिल इन पर चर्चा को आगे के लिये स्थगित कर दिया गया।

वाद-विवाद के दौरान सरकार और विपक्ष दोनों ने लंबे-लंबे भाषण दिये। सरकार की ओर से यह कहा गया कि यह बिल भ्रष्टाचार के खिलाफ़ संघर्ष में एक ज़रूरी कदम है, जो सरकार ने उठाया है। प्रधानमंत्री के अनुसार, ''इस बिल पर चर्चा राष्ट्र के जीवन में विशेष क्षणों में से एक था। पूरा राष्ट्र बड़ी उत्सुकता के साथ यह जानने का इंतज़ार कर रहा है कि बिल पर वाद-विवाद के अंत में जब मतदान होगा तो उसमें इस सदन की सामूहिक बुध्दिमत्ता किस तरह प्रकट होगी।''

दोनों सदनों में प्रमुख विपक्षी पार्टी, भाजपा ने बिल को ''मजबूत'' बनाने के लिये उसमें कई संशोधनों को लाने का प्रयास किया। भाजपा ने बिल के खिलाफ़ तथा उसे संविधानीय दर्जा देने के प्रस्ताव के खिलाफ़ वोट दिया, यह बहाना देकर कि (लोक पाल की तरह) राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना को बाध्यकारी बनाना संविधान के खिलाफ़ है। सरकार और विपक्ष के नेताओं ने ''जवाबदेही'', ''स्वतंत्र जांच करने की लोक पाल और लोकायुक्त की क्षमता'', ''स्वतंत्र न्यायपालिका'', ''स्वतंत्र सी.बी.आई.'', आदि जैसे शब्दों का खूब प्रयोग किया।

इस पूरी प्रक्रिया से पूंजीपतियों को फिर से यह भ्रम फैलाने का मौका मिला कि कार्यकारिणी और विधिपालिका जैसे राज्य के संस्थान लोगों के लिये काम करते हैं। इस प्रकार की गतिविधियों से पूंजीपतियों को यह भ्रम फैलाने का मौका मिलता है कि हमारा ''लोकतंत्र बहुत सजीव है'', जिसमें संविधान, संसद की भूमिका, विभिन्न संस्थानों की जवाबदेही और कार्यकारिणी से उनकी स्वतंत्रता, जैसे विषयों पर, पूरे राष्ट्र के सामने खुले वाद-विवाद और चर्चा हो सकती है!

पर हकीकत तो कुछ और है। सच्चाई तो यह है कि यहां पूरी राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया चंद इजारेदार पूंजीपतियों के हित में काम कर रही है। प्रत्येक मुख्य नीति इस शासक वर्ग के हित में बनायी जाती है। पूंजीपति फैसला करते हैं कि कौन सी नीति कब बनायी जायेगी, कार्यकारिणी को जरूरी कानून पास करने का निर्देशन देते हैं और सरकार व विपक्ष में अपनी राजनीतिक पार्टियों का इस्तेमाल करके वाद-विवाद और चर्चा का नाटक आयोजित करते हैं।

संसद असली निर्णयकर्ता नहीं है। तीन दिन तक मीडिया के सामने जो वाद-विवाद चला, उसका मकसद था लोगों को दुविधा में डालना, जब कि पूंजीपतियों ने पहले से ही फैसला कर रखा था कि इस बिल के साथ क्या करना है और उनकी राजनीतिक पार्टियों ने  आपस में साज़िश करके बिल के भविष्य पर फैसला कर लिया था! संसद एक दिखावटी बातें करने की जगह मात्र है, जहां शासक वर्ग की राजनीतिक पार्टियां पूंजीपतियों और साम्राज्यवादियों को यह दर्शाती हैं कि वे इस प्रकार के बिल को पास करने या दफनाने में कितनी उत्सुक या इच्छुक हैं।

कम्युनिस्टों और मजदूर जनसमुदाय को यह समझना होगा कि इस समय हमारे देश में राजनीतिक चर्चा का अजेंडा कौन तय कर रहा है। सच तो यह है कि बड़े से बड़े हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपति ही बार-बार यह प्रचार करते रहते हैं कि हिन्दोस्तानी लोगों का दमन करने वाली सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है।

वर्तमान घोर आर्थिक संकट की हालतों में साम्राज्यवादी यह प्रचार करने में अगुवाई दे रहे हैं कि कुछ देश बहुत ज्यादा भ्रष्ट हैं और वहां से भ्रष्टाचार हटाने पर वहां बेहतर लोकतंत्र होगा! साम्राज्यवादी इस तरह विभिन्न राज्यों पर दबाव डालने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उन देशों की व्यवस्थाओं में साम्राज्यवादियों के हितों के अनुसार परिवर्तन लाये जाये। साथ ही साथ हिन्दोस्तानी पूंजीपति एक सुगम व रुकावट रहित व्यवस्था चाहते हैं ताकि उनकी अर्थव्यवस्था का तेज़ी से विस्तार हो। वे अमरीका और दूसरे अगुवा पूंजीवादी राज्यों की व्यवस्थाओं के अनुसार अपनी व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते हैं और सबके सामने दिखने वाली गंदगी को कुछ हद तक साफ करना चाहते हैं, ताकि व्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के लिये ज्यादा सक्षम और स्वीकार्य हो जाये। इसीलिये यह अजेंडा आज शासक वर्ग के लिये इतना महत्वपूर्ण हो गया है और वे इस मौके का फायदा उठाकर लोगों के गुस्से को ठंडा करने तथा व्यवस्था के असली संकट से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश कर रहे हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों की हुक्मशाही है। यह हुक्मशाही संसदीय लोकतंत्र के वेश में लागू की जाती है। हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों ने उपनिवेशवादी हुक्मरानों से इस राज्य के सभी संस्थानों को विरासत में पाया है। हरेक संस्थान पूंजीपतियों की हुक्मशाही को मजबूत करने में अपनी निर्धारित भूमिका निभाता है। जैसा कि लेनिन ने बताया था, पूंजीवाद का सबसे अच्छा कवच लोकतांत्रिक गणतंत्र है। पर इस व्यवस्था का नियंत्रण पूंजी के हाथ में है और किसी व्यक्ति, संस्थान या पार्टी के बदलने से इसे हिलाया नहीं जा सकता।

इस व्यवस्था को बरकरार रखने के लिये तरह-तरह के संविधानीय या अधिकारी संस्थान बनाये जाते हैं। न्यायपालिका, सी.ए.जी., सी.वी.सी., सी.बी.आई., संसदीय विपक्ष – इन्हें ऐसे संस्थानों के उदाहरण बताये जाते हैं, जो इस व्यवस्था के अंदर ''निगरानी करने व संतुलन बनाये रखने'' के संस्थान हैं। परन्तु वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में किसी भी संस्थान की ''स्वतंत्रता'' का सवाल ही नहीं पैदा हो सकता है। कार्यकारिणी की ताकत सर्वोच्च है और मनमानी के साथ लागू की जाती है, हालांकि यह दिखावा किया जाता है कि सत्ता विभिन्न संस्थानों में बंटा हुआ है और ''निगरानी व संतुलन'' के तंत्र मौजूद हैं। ये सभी पूंजीवादी राज्य के संस्थान हैं, जो पूंजीवादी सम्पत्तिा की हिफ़ाज़त करते हैं, लोगों को दरकिनार करते हैं और जन प्रतिरोध को दबाते हैं। इस व्यवस्था में जनता का यही अनुभव है।

भ्रष्टाचार शोषण और लूट की पूंजीवादी व्यवस्था का अभिन्न भाग है। यह सभी पूंजीवादी राज्यों की विशेषता है, अमरीका व ब्रिटेन जैसे अगुवा पूंजीवादी राज्यों का तथा चीन व हिन्दोस्तान जैसे राज्यों का भी। पूंजीपतियों में भ्रष्टाचार को मिटाने की न तो रुचि है, न ही क्षमता। हिन्दोस्तानी पूंजीपति यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उसके संवर्धन और प्रसार में, उसके विश्वव्यापक इरादों में कोई रुकावट न आये। यह हासिल करने के लिये, वे भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने व वैधता देने के कदम भी उठायेंगे। वे लोगों के गुस्से और आन्दोलन को ठंडा करने के लिये कुछ भी करेंगे, क्योंकि लोग साफ-साफ देख सकते हैं कि यह व्यवस्था अधिकतम जनसमुदाय की उपेक्षा करके सिर्फ मुट्ठीभर लोगों की सेवा करती है। 

पूंजीपति संसदीय लोकतंत्र के संस्थानों को बरकरार रखेगी व मजबूत बनायेगी, क्योंकि संसदीय लोकतंत्र उसके शासन का सबसे अच्छा कवच है। हम कम्युनिस्टों को पूंजीपतियों द्वारा बार-बार फैलाये गये भ्रमों का पर्दाफाश करते रहना होगा और यह स्पष्ट करते रहना होगा कि यह राज्य पूंजीवादी हुक्मशाही का यंत्र है।

हम यह देख सकते हैं कि इस आर्थिक व्यवस्था और इसे बरकरार रखने वाली राजनीतिक व्यवस्था को इस या उस कानून से सजाया-संवारा नहीं जा सकता। लोगों की समस्याओं की जड़ यह पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था है, जो देशी-विदेशी पूंजीपतियों द्वारा हमारे देश की जनता के श्रम और कुदरती संसाधनों की लूट से अधिकतम मुनाफे कमाने पर आधारित है। राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया और सारे संस्थान इसी पूंजीवादी व्यवस्था को वैधता देते हैं तथा पूंजीपतियों के शासन को बरकरार रखते हैं। फैसले लेने की ताकत पूंजीपतियों के हाथ में है। हम लोगों के बीच में यह आन्दोलन चलाते रहेंगे कि फैसले लेने की ताकत लोगों के हाथ में हो, मुट्ठीभर पूंजीपतियों के हाथ में नहीं। संप्रभुता लोगों के हाथ में होनी चाहिये, और इसे सुनिश्चित करने के लिये राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया में मूल परिवर्तन लाने होंगे। जब लोग संप्रभु होंगे,जब मजदूर-किसान फैसले लेने में सक्षम होंगे, तब हम मजदूरों-किसानों और आने  वाली पीढ़ियों के हित में अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिला सकेंगे।

जो भी हमारी जनता की खुशहाली में सचमुच रुचि रखते हैं, उन्हें आगे आकर हिन्दोस्तानी राज्य और समाज के नव-निर्माण का कार्यक्रम उठाना चाहिये।

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