निरंतर चर्चा पर कोई ठोस कदम नहीं

15वीं लोक सभा चुनाव (मई 15वीं लोक सभा चुनाव (मई 2009) के अभियान के दौरान कांग्रेस पार्टी ने यह वादा किया – प्रत्येक गरीब परिवार को 3 रुपये प्रति किलो, प्रति माह 25 किलोग्राम अनाज मिलेगा।

4 जून, 2009 को 15वीं लोक सभा चुनाव के बाद, संयुक्त संसद सत्र में अपने प्रथम भाषण में राष्ट्रपति ने यह घोषणा की कि सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानूननामक एक विधान पास करेगी, जिसके तहत ग्रामीण और शहरी इलाकों में गरीबी रेखा से नीचे (बी.पी.एल.) हर परिवार को 3 रुपये प्रति किलो, प्रति माह 25 किलो ग्राम चावल या गेहूं कानूनन प्राप्त होगा।

19 मार्च, 2010 को वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अगुवाई में, केन्द्रीय मंत्रीमंडल के तहत मंत्रियों के सशक्त समूह ने प्रत्येक बी.पी.एल. परिवार को 25 किलो अनाज का वादा करने वाले खाद्य सुरक्षा बिल के मसौदे को आगे किया। इस मंत्री समूह ने मंत्रीमंडल से यह सिफारिश भी की कि 11.5 करोड़ ए.पी.एल. परिवारों के लिये अनाज का कोटा बढ़ाया जाये।

अक्तूबर, 2010 को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के अपने प्रस्ताव पेश किये। ये प्रस्ताव जो संसद में पारित किये जाने वाले कानून के आधार होंगे, इस प्रकार हैं। देश की पूरी आबादी के 75 प्रतिशत – ग्रामीण आबादी के 90 प्रतिशत और शहरी आबादी के 50 प्रतिशत – को खाद्य सुरक्षा दी जायेगी। इस 75 प्रतिशत को दो वर्गों में बांटा जायेगा। अधिक प्राथमिकता वाले वर्ग में ग्रामीण आबादी का 46 प्रतिशत और शहरी आबादी का 28 प्रतिशत होगा, जिसे 1 रु. प्रति किलो बाजरा, 2 रु. प्रति किलो गेहूं और 3 रु. प्रति किलो चावल की कीमत पर 35 किलो अनाज मिलेगा। बाकी 44 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 22 प्रतिशत शहरी आबादी को अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य के 50 प्रतिशत की कीमत पर, 20 किलो प्रति परिवार अनाज दिया जायेगा। राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने प्रस्ताव किया है कि इस कानून को क्रम-क्रम से लागू किया जाये और वर्तमान प्रशासन की जिम्मेदारी 85 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 40 प्रतिशत शहरी आबादी तक सीमित रहे।

26 अक्तूबर, 2010 को प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सी. रंगराजन की अगुवाई में विशेषज्ञ समूह गठित किया गया, जिसे प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल पर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सिफारिशों का अध्ययन करने का दायित्व दिया गया।

बहरहाल, बी.पी.एल. और ए.पी.एल. की गणना पर वाद-विवाद का अभी तक कोई हल नहीं हुआ है। विभिन्न सरकारी आयोगों ने इसके अलग-अलग अनुमान दिये हैं। सबसे हाल के अनुमान देने वाले हैं – (1) दिसम्बर, 2009 में योजना आयोग को पेश की गई तेंदुलकर समिति रिपोर्ट और (2) सितम्बर, 2009 में ग्रामीण विकास मंत्रालय को दी गई सक्सेना समिति रिपोर्ट।

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