खाद्य सुरक्षा बिल पर सरकार के दांवपेच : सिर्फ एक आधुनिक सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था ही खाद्य के अधिकार की गारंटी दे सकती है

खाद्य पर एक विशेषज्ञ समूह की प्रथम बैठक 3खाद्य पर एक विशेषज्ञ समूह की प्रथम बैठक 3 दिसम्बर, 2010 को हुई। प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल पर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एन.ए.सी.) की सिफारिशों को जांचने के लिये प्रधानमंत्री ने इस विशेषज्ञ समूह का गठन किया है।

बीते दो वर्षों से खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छूती जा रही हैं, प्रतिवर्ष दो अंकों की गति से बढ़ती जा रही हैं। 2009 के लोक सभा चुनावों के अभियान के दौरान खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों की समस्या पर बड़ी सरगर्मी के साथ चर्चा हुई थी। हरएक पार्टी ने यह वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आयेगी तो अवश्य ही इस समस्या को हल करेगी। मनमोहन सिंह की अगुवाई में दूसरी संप्रग सरकार के सत्ता में आये हुये डेढ़ साल बीत चुके हैं। परन्तु एक और समिति का गठन करने के सिवाय, इस समस्या को हल करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है।

खाद्य के सवाल पर दो आपस में विरोधी वर्ग दृष्टिकोणों के बीच तीखा टकराव चल रहा है। मजदूर वर्ग और मेहनतकश लोग यह मानते हैं कि खाद्य एक आवश्यक मानवीय जरूरत है जिसे पूरा किया जाना चाहिये। कम्युनिस्टों के अनुसार यह एक सर्वव्यापक अधिकार है जिसका हनन नहीं हो सकता है और जिसे पूरा करना समाज तथा राज्य का फ़र्ज है। पूंजीपति वर्ग खाद्य को एक महत्वपूर्ण विक्रय वस्तु समूह मानता है, जिससे अधिकतम मुनाफे बनाये जा सकते हैं।

इन दोनों आपस में विरोधी दृष्टिकोणों के बीच टकराव तब स्पष्ट हुआ जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट को नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप न करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले यह फैसला सुनाया था कि एफ.सी.आई. के गेहूं और चावल के भंडार, जो खुले पड़े-पड़े सड़ रहे थे, उन्हें मुफ्त में बांट दिया जाये। इसके जवाब में प्रधानमंत्री ने यह ऐलान किया कि इस नीतिगत मामले में अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। प्रधानमंत्री की बातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि समाज के सभी सदस्यों को पर्याप्त खाद्य दिलाना उनकी सरकार की नीति की दिशा नहीं है।

केन्द्रीय सरकार सभी क्षेत्रों में निजीकरण और उदारीकरण कार्यक्रम को बढ़ावा देने तथा इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों की मुनाफाखोरी का विस्तार करने पर प्रतिबध्द है।

20 वर्ष पहले जब मनमोहन सिंह वित्तामंत्री थे तब उन्होंने इस कार्यक्रम को बड़ी धूम-धाम से शुरू किया था। उस समय से, सामाजिक उत्पादन के अधिक से अधिक क्षेत्रों में इजारेदार पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफों को सुनिश्चित करना ही अर्थव्यवस्था और सरकारी नीतियों की दिशा रही है। इस दिशा के चलते, हमारे समाज के सभी सदस्यों के लिये उचित दाम पर खाद्य मुहैया कराना नामुमकिन है।

अगर खाद्य को अधिकतम मुनाफों का स्रोत माना जाये, तो ऐसी नीतियां अपनायी जाती हैं जिनसे उत्पादन और वितरण में अधिक से अधिक निजी मुनाफे बनाने के मौके पैदा हो जायें। इसी नज़रिये के साथ हमारे देश में खाद्य और अन्य वस्तुओं के व्यापार में क्रमश: उदारीकरण किया गया है। खाद्य पर सरकारी खर्च में कटौती, ज्यादा कुशल बनाने और सबसे गरीब के पेट भरनेके नाम पर सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को क्रमश: खत्म करना, ”किसानों को बाजार में अच्छी कीमत हासिल करने की इज़ाज़त देना”, यह सब इस सुधार कार्यक्रम के हिस्से थे। सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को घटाते-घटाते अब मानो खत्म ही कर दिया गया है।

शासक वर्ग और उनके अर्थशास्त्री यह नहीं मानना चाहते हैं कि सार्वजनिक वितरण व्यवस्था का विनाश ही मुख्य तौर पर वर्तमान हालत के लिये जिम्मेदार है, जिसमें मजदूर और किसान विश्व बाजार के उथल-पुथल और मुनाफे के भूखे व्यापारियों की जकड़ में फंसे हुये हैं।

देश भर में मजदूरों और किसानों के संगठनों ने एक सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की मांग की है, जो सभी को प्राप्त हो और जिसमें सिर्फ गेहूं और चावल ही नहीं बल्कि सभी जरूरी चीजें मिलें। इस जायज़ मांग के जवाब में सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल पर लंबे समय से चर्चा चलाती आ रही है। खाद्य सुरक्षा कानून लाने का वादा करने के डेढ़ साल बाद सरकार अभी भी विशेषज्ञ समितियों में इस पर चर्चा चला रही है (देखिये बोक्स)। मार्च 2010 में पेश किये गये खाद्य सुरक्षा बिल के मसौदे का मजदूरों और किसानों के संगठनों तथा जनाधिकार कार्यकर्ताओं ने डटकर विरोध किया था। उसके बाद सोनिया गांधी की अगुवाई में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने उस मसौदे का संशोधन करने का काम उठाया, परन्तु खाद्य के सर्वव्यापक अधिकार की गारंटी देने के लिये नहीं।

सरकार ने जानबूझकर, मजदूरों और किसानों की इस अति जायज़ मांग को पूरा किये बिना, 18 महीने बिता दिये। इस बीच निजी व्यापारी खाद्य और खाद्य पदार्थों के व्यापार से बेशुमार मुनाफे कमाते आये हैं। हाल में पता चला है कि 2007 में तीन महीनों के अन्दर, कुछ अफ्रीकी देशों को हिन्दोस्तान से चावल का निर्यात किया गया था, जिसमें 4 करोड़ डॉलर (180 करोड़ रुपये) के निजी मुनाफे कमाये गये थे।

मनमोहन सिंह सरकार खाद्य के अधिकार की समस्या को हल करने का सिर्फ नाटक ही कर सकती है। असलियत में इस अधिकार का हनन करना ही उसकी पसंदीदा नीति है, जैसा कि सड़ते खाद्य भंडार पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के जवाब में प्रधानमंत्री की बातों से स्पष्ट होता है।

अगर आधुनिक समाज के हर सदस्य को खाद्य का मूल अधिकार दिलाना है, तो खाद्य को एक आवश्यक सार्वजनिक सामग्री मानना पड़ेगा, पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफों का स्रोत नहीं। इसका यह मतलब है कि खाद्य का उत्पादन और उपभोग करने वाले मजदूरों और किसानों के नियंत्रण में, एक सांझी योजना के अनुसार खाद्य का प्रापण और वितरण आयोजित करना होगा, जिसमें निजी मुनाफाखोरी या किसी बिचौलिये के कमीशन की कोई भूमिका नहीं होगी।

मजदूरों और किसानों को एक आधुनिक सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था, जो सभी को उपलब्ध हो और जिसमें सभी जरूरी उपभोग की चीज़े शामिल हों, इससे कम कुछ मंजूर नहीं है। कम्युनिस्टों को एक सर्वव्यापक
अधिकार बतौर खाद्य की गारंटी की मांग को विचारधारात्मक समर्थन देना होगा। कम्युनिस्टों का काम है मजदूर वर्ग को एक ऐसे कार्यक्रम के इर्द-गिर्द किसानों को लामबंध करने में सक्षम बनाना, जिसके अनुसार अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दी जायेगी और एक ऐसा राज्य स्थापित किया जायेगा जिसमें खाद्य के अधिकार की संवैधानिक गारंटी और उसे प्राप्त करने के तंत्र मौजूद होंगे।

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