पूंजीवादी लोकतंत्र का पर्दाफाश : ब्रिटेन में पूंजीवादी संकट से बचने का रास्ता – पूंजीपतियों को सहायता और छात्रों के साथ विश्वासघात

ब्रिटेन में पिछले हफ्ते जनता के सामने पूंजीवादी लोकतंत्र के पाखंड का पर्दाफाश हुआ। ब्रिटेन की सरकार ने देश के छात्रों और शिक्षकों के विरोध को कुचलकर एक कानून पास कर दियाब्रिटेन में पिछले हफ्ते जनता के सामने पूंजीवादी लोकतंत्र के पाखंड का पर्दाफाश हुआ। ब्रिटेन की सरकार ने देश के छात्रों और शिक्षकों के विरोध को कुचलकर एक कानून पास कर दिया, जिसके अनुसार विश्वविद्यालय की फीस अप्रत्याशित हद तक बढ़ा दी जायेगी।

जब संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन करने वाले दसों-हजारों छात्रों और शिक्षकों पर पुलिस लाठी बरसा रही थी, तो उसी समय संसद सदन में बैठे जन प्रतिनिधियोंने एक ऐसा कानून पास कर दिया जिसके तहत टयूशन फीस को प्रति वर्ष 3,290 पाउंड से बढ़ाकर 9,000 पाउंड करने की इज़ाज़त दी जायेगी।

ब्रिटेन में उच्च शिक्षा के अधिकतम छात्र पहले से ही कर्जा लेने को मजबूर हैं और फीस की इस बढ़ोतरी के कारण परिवारों को उच्च शिक्षा के लिये और ज्यादा कर्जे के जाल में फंसना पड़ेगा। किसी भी छात्र या शिक्षक समूह ने फीस की इस बढ़ोतरी का समर्थन नहीं किया है और अधिकतम विश्वविद्यालयों ने भी इस कदम का विरोध किया है।

यह कदम लिबरल डेमोक्रेट, जो शासक गठबंधन का हिस्सा है, द्वारा खुलेआम विश्वासघात है, क्योंकि बीते मई महीने में हुये आम चुनावों के दौरान उन्होंने फीस बढ़ाने के प्रस्ताव के खिलाफ़ अभियान चलाया था। कई आंदोलनकारी छात्रों ने कहा है कि लिबरल डेमोक्रेट पार्टी के फीस बढ़ोतरी के विरोध के रवैये के कारण उन्हें वोट दिया था।

परन्तु पूंजीवादी राज्यों में लोकतंत्र का जो नाटक रचा जाता है, उसमें यह स्वाभाविक है कि पूंजीपतियों की व्यवस्था को संकट से बचाने के लिये जनता की मांग की बेरहमी से उपेक्षा की जाती है। मिसाल के तौर पर, 2003 में इराक पर हमला होने से पूर्व, ब्रिटेन, अमरीका, स्पेन, और कई अन्य देशों में चुनावों के दौरान यह देखा गया था कि प्रत्येक देश में 80 प्रतिशत से अधिक लोगों ने इराक पर जंग का विरोध किया था। परन्तु इन सभी देशों की सरकारों ने इराक पर हमले और जंग में भाग लिया था।

विश्वविद्यालयों की फीस में यह बढ़ोतरी इसलिये की जा रही है क्योंकि केम्ब्रिज और ऑक्सफॉर्ड समेत रस्सेल समूह के 20 प्रसिध्द विश्वविद्यालयों ने बाज़ार के अनुसार फीस तय करने की इजाज़त के लिये लम्बे समय से अभियान चलाया था।

इस दबाव के चलते, भूतपूर्व लेबर सरकार और वर्तमान गठबंधन सरकार, दोनों को आर्थिक मंदी का बहाना देकर, उच्च शिक्षा से राज्य की जिम्मेदारी को हटाने का अच्छा मौका मिल गया।

जबकि बड़े-बड़े उद्योगपतियों को मंदी से बचाने के लिये गॉर्डन ब्राउन की लेबर सरकार ने वित्ता सहायता पैकेज दिये थे, उसी सरकार ने 2009 में मैडिंगले के लॉर्ड ब्राउन की अध्यक्षता में उच्च शिक्षा फंडिंग और छात्र वित्ता की स्वतंत्र समीक्षाके लिये समिति बिठाई थी।

इस समिति ने वही प्रस्ताव किया जो सरकार और शक्तिशाली रस्सेल समूह चाहते थे – कि उच्च शिक्षा पर सरकारी खर्च में कटौती की जाये और विश्वविद्यालयों को बाजार के अनुसार अपनी फीस तय करने की छूट दी जाये।

इस समिति की तत्कालीन सिफारिशों के आधार पर लेबर सरकार और उसके बाद सत्ता में आने वाली गठबंधन सरकार ने उच्च शिक्षा पर सरकारी बजट में भारी कटौती करने का फैसला किया है। इस योजना के अनुसार ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों के वित्ता में सरकारी योगदान को अगले पांच वर्षों में 60 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक घटाया जायेगा। इससे शिक्षण और शोधकार्य, खास तौर पर सामाजिक विज्ञान और कलाओं में, बुरी तरह प्रभावित होगा।

इन कदमों से दूसरे विश्वविद्यालयों को भी अपनी फीस बढ़ाने का औचित्य मिलेगा। जनता के दबाव के कारण सरकार फीस को पूरी तरह बाजार के अनुसार नहीं बढ़ा पायी, बल्कि उसे तीन गुना, यानि 9000 पाउंड तक सीमित रखना पड़ा।

परन्तु यह सवाल उठता है कि जो व्यवस्था जनता की आवाज़ की उपेक्षा करती है, उसे वैत्तिाक संकट से बचाने के लिये छात्रों और शिक्षकों की जेबें क्यों काटी जायें? जैसे-जैसे ब्रिटेन की सरकार द्वारा जनता के साथ इस भयानक विश्वासघात का असर महसूस हो रहा है, वैसे-वैसे उस देश के अधिक से अधिक नागरिक यह सवाल उठा रहे हैं। और इस सवाल का जवाब इस वर्तमान व्यवस्था के अन्दर नहीं मिलने वाला है क्योंकि यह व्यवस्था ही तो इस समस्या की जड़ है।

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