अमरीकी साम्राज्यवाद कोरियाई प्रायद्वीप में खतरनाक जंगी खेल खेल रहा है

23 नवम्बर को अमरीकी और दक्षिणी कोरिया के सशस्त्र बलों ने एक बड़े सैन्य अभ्यास के दौरान उत्तरी कोरिया की दिशा में विवादित समुद्र के पानी में जबरदस्त गोले बरसाये। जवाब में उत्तरी कोरिया ने योंगफियोंग टापू पर गोले बरसाये जिस पर दक्षिणी कोरिया का सैन्य अव है और कुछ असैन्य आबादी भी है।

23 नवम्बर को अमरीकी और दक्षिणी कोरिया के सशस्त्र बलों ने एक बड़े सैन्य अभ्यास के दौरान उत्तरी कोरिया की दिशा में विवादित समुद्र के पानी में जबरदस्त गोले बरसाये। जवाब में उत्तरी कोरिया ने योंगफियोंग टापू पर गोले बरसाये जिस पर दक्षिणी कोरिया का सैन्य अव है और कुछ असैन्य आबादी भी है।

योंगफियोंग द्वीप में चार व्यक्तियों के हताहत होने के पश्चात, साम्राज्यवादी प्रभुत्व वाले प्रसार माध्यमों ने तुरंत इस हादसे को उत्तरी कोरिया के दु:स्साहसी और गैर-जिम्मेदारानाहमले का उदाहरण बताकर दुनिया भर में प्रचार करना शुरू कर दिया। फिर इसी का बहाना लेकर, अमरीका अपने खतरनाक युध्द खेलों को और बड़े पैमाने पर करने लगा, जबकि उसके युध्द-खेल की वजह से ही उत्तरी कोरिया की तरफ से गोलीबारी होना शुरू हुई थी। उसने अपना विमानवाही पोत कोरियाई समुद्र में भेजा और दक्षिणी कोरिया से मिलकर, एक तनावी माहौल में, 28 नवम्बर से 1 दिसम्बर के बीच, फिर एक बार सैन्य अभ्यास के रूप में तांडव नृत्य दिखाया। वह संयुक्त राष्ट्र तथा चीन सहित दूसरे देशों पर दबाव डाल रहा है कि उत्तरी कोरिया की निंदा करने के लिये कदम लें।

उत्तरी कोरिया पर अमरीकी छेड़खानी का लम्बा इतिहास

हाल में हुये हादसे को, कोरियाई प्रायद्वीप में लगातार अमरीकी दखलंदाजी और हमलों के लम्बे इतिहास की पृष्ठभूमि में ही देखना उचित होगा। दूसरे विश्व युध्द के बाद, जब कोरियाई लोगों ने जापानी उपनिवेशवाद के खिलाफ़ लड़ाई की और आजादी पायी, तब अमरीका ने सारी संधियों को तोड़क़र, सिंगमान हृी के नेतृत्व में, स्थानीय सहयोगियों की मदद से, दक्षिणी कोरिया में अतिक्रमण किया और एक विशालकाय सैन्य बल बनाया। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रूमैन ने, 1949 में कोरिया के पड़ोस में चीनी लोगों की क्रांति और दूसरे महायुध्द के बाद सोवियत संघ व समाजवादी गुट की जबरदस्त प्रतिष्ठा की पृष्ठभूमि में, खुल्लम-खुल्ला कम्युनिज्म को खदेड़ने के नाम पर ठीक ऐसा ही किया था।

1950 से 1953 तक, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने उत्तर में प्योंगयेंग में स्थापित कोरिया के लोकतांत्रिक जन गणतंत्र (डी.पी.आर.के.) पर सबसे खूनी और निर्मम जंग छेड़ी। उसने धरती झुलसा देने वाली नीति से पूरे देश को तहस-नहस कर दिया। परन्तु वह डी.पी.आर.के. को परास्त न कर सका और 1953 में अस्थाई युध्दविराम करना पड़ा। साथ ही, उसने पिछले 60 वर्षों में औपचारिक शांति समझौता नहीं किया है और दक्षिण में स्थाई रूप से अमरीकी सेना तैनात रखी है (वर्तमान में वहां 30,000 फौजी हैं)। वह और हजारों फौजियों, युध्दपोतों, टैंकों, लड़ाकू जेटों, आदि को जुटा कर नियमित रूप से उकसाऊ ढंग से उत्तरी कोरिया के खिलाफ़ हवाई, स्थल और नौसैनिक सैन्य अभ्यास करता है। ऐसी उत्तेजनात्मक स्थिति में उत्तरी कोरिया ने हमेशा अपनी सुरक्षा के अधिकार को बरकरार रखा है। उत्तरी कोरिया के इस रवैये को तर्करहितनहीं कहा जा सकता, जबकि वह अभी तक औपचारिक तौर पर अमरीका से युध्द में है और जबकि अमरीकी सरकार अभी भी डी.पी.आर.के. की सरकार से सीधे बात करने से इनकार करती है।

जबकि अमरीका अभी भी शांति समझौता करने को तैयार नहीं है और उसने दक्षिणी कोरिया में अपनी सेना तैनात रखी है, फिर भी 1990 के दशक में तनाव कम करने के समझौतों की दिशा में कुछ कदम उठाये गये थे। परन्तु जॉर्ज बुश के नेतृत्व की अमरीकी सरकार ने एकतरफा और अचानक ही समझौते की प्रक्रिया को खत्म कर दिया और कुछ सहमतियों को उलट भी दिया था। बुश ने उत्तरी कोरिया को शैतान की धुरी का हिस्सा और अमरीकी परमाणु बमों का निशाना बता कर चौंका दिया। जब उत्तरी कोरिया इससे नहीं घबराया, और जब अमरीकी साम्राज्यवाद इराक और अफग़ानिस्तान में अपने आप मुश्किलों में फंसा हुआ था, तब अमरीका समझौते की बातचीत के लिये फिर राजी हुआ। यह छ:पक्षीय बातचीत के रूप में शुरू किया गया (जिसमें उत्तरी और दक्षिणी कोरिया, अमरीका, जापान, रूस तथा चीन शामिल थे)। ऐसी वार्ता इसीलिये करनी पड़ी क्योंकि अमरीका ने डी.पी.आर.के. से द्विपक्षीय चर्चा से इनकार कर दिया था। परन्तु फिर से अमरीकी नखरों की वजह से चर्चा में ज्यादा प्रगति नहीं हो पाई और फिर से एक खतरनाक परिस्थिति बन गई।

इस दौरान कोरिया में शांति और एकीकरण के लिये एक मजबूत आंदोलन बन गया है। यह ज्यादा साफ हो गया है कि कोरियाई लोगों के बीच एक दूसरे के लिये गहरी भावनायें हैं और वे आपसी विवाद को शांतिपूण्र् तरीके से सुलझाना चाहते हैं तथा, एक दिन, एक राष्ट्र बन कर साथ रहना चाहते हैं। यह कोई छुपी बात नहीं है कि लोगों के इस रुझान से अमरीका खुश नहीं है क्योंकि इससे उसके लिये इस रणनैतिक प्रायद्वीप में अपनी फौज कायम रखने का औचित्य ही नहीं बचेगा। दक्षिणी कोरिया में वर्तमान युध्दकारी सरकार के सत्ता में आने से अमरीका खुश हुआ है क्योंकि उसने उत्तर की तरफ हमलावर रुख़ अपनाया है और अमरीका से रणनैतिक गठबंधन बनाने के कदम उठाये हैं। अमरीका में ओबामा सरकार ने, वार्ता जारी रखने के लिये उत्तरी कोरिया द्वारा अपना परमाणु कार्यक्रम रद्द करने की शर्त बना कर, तनाव को कम करने की जगह और भी ज्यादा बढ़ा दिया है।

उत्तरी कोरिया पर हाथ मत लगाओ!

यह महत्वपूर्ण है कि हिन्दोस्तान की सरकार और लोग इस झूठ में विश्वास न करें कि हाल के बढ़े तनाव, जिससे उस इलाके और पूरी दुनिया में शांति व सुरक्षा को खतरा है, इसके लिये उत्तरी कोरिया जिम्मेदार है। यह जरूरी है कि अमरीकी साम्राज्यवाद तथा दक्षिणी कोरिया व उसके दूसरे मित्र देशों द्वारा डाले जा रहे जबरदस्त दबाव का प्रतिरोध करने के पूरे प्रयास किये जायें।

यह भी जरूरी है कि कोरियाई प्रायद्वीप के सभी उलझे मुद्दों को, जिनमें से काफी 60 साल से भी ज्यादा पुराने हैं, इनको शांतिपूर्ण तरीके से और विभाजन के दोनों तरफ के लोगों के सम्मान व प्रतिष्ठा को बरकरार रख कर हल किया जाये। यह भी जरूरी है कि डी.पी.आर.के. और अमरीका के बीच समझौते से, अति विलंबित शांति संधि सम्पन्न हो और आखिरकार कोरियाई प्रायद्वीप से अमरीकी सेना वापस जाये। कोरियाई लोगों को अपने मतभेद अपनी तरह से हल करने के लिये बाहरी दखलंदाजी से आजादी मिलनी चाहिये।

Share and Enjoy !

Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *