राडिया टेप्स से किस बात का पर्दाफाश हुआ? पूंजीवादी इजारेदार घरानों की हुक्मशाही ही बहु-पार्टीवादी प्रतिनिधित्व वाले लोकतंत्र की हकीक़त है

बीते कुछ महीनों से राडिया टेप्स के नाम से जाने जाने वाले टेपों की प्रतियों का अखबारों और टीवी में बहुत प्रचार हो रहा है। विभिन्न पूंजीपतियों और संसद में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों द्वारा इस बात पर बहु

बीते कुछ महीनों से राडिया टेप्स के नाम से जाने जाने वाले टेपों की प्रतियों का अखबारों और टीवी में बहुत प्रचार हो रहा है। विभिन्न पूंजीपतियों और संसद में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों द्वारा इस बात पर बहुत शोर मचाया जा रहा है कि टेलिकॉम मंत्रालय ने व्यक्तिगत मंत्रियों और इजारेदार पूंजीपितयों के बीच सौदों के आधार पर 2जी स्पेक्ट्रम का आवंटन किया और मुनाफेदार ठेकों का भी आवंटन किया है।

एक तरफ, भाजपा और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) समेत विपक्ष की पार्टियां इस बात पर जोर दे रही हैं कि मनमोहन सिंह की अगुवाई में केंद्र सरकार भ्रष्ट है। दूसरी ओर, शासक पार्टी और सबसे बड़े हिन्दोस्तानी इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों में से एक, टाटा समूह के अध्यक्ष भाजपा पर यह आरोप लगा रहे हैं कि 1999-2004 के दौरान जब भाजपा सत्ता में थी, तब उन्होंने इस टेलिकॉम घोटाले को शुरू किया था। अन्तर साम्राज्यवादी अन्तर्विरोध बहुत तेज हो गये हैं, जिसके कारण कई ऐसी बातें, जो आम तौर पर छिपी रहती हैं, अब खुलकर सामने आ रही हैं।

नीरा राडिया एक पेशेवर लाबीइस्ट, यानि आधुनिक पूंजीवादी दलाल है। एक या अनेक इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों की तरफ से बिचौलिये का काम करना, एक या दूसरे के पक्ष में किसी को प्रभावित करना, यह एक पेशा बन गया है। कई ऐसे पेशेवर दलाल हैं जो टाटा, अम्बानी, मित्ताल, बिरला और अन्य कंपनियों के लिये काम करते हैं, जो चुनिंदा मंत्रियों और वरिष्ठ अफसरों को रिश्वत देते हैं, यह सुनिश्चित करने के लिये कि जिन निजी हितों के लिये वे काम करते हैं, उनके पक्ष में सरकारी फैसले किये जाएं।

राडिया टेप्स में विभिन्न राजकीय संस्थानों द्वारा टैप की गयी वे टेलिफोन वार्ताएं हैं, जो नीरा राडिया और जिन मुख्य कंपनियों के लिये वह काम करती थी तथा विभिन्न मंत्रियों और अलग-अलग पार्टियों के नेताओं के बीच हुईं थीं। ये टेप और उनके लिखित रूप कुछ समय पहले मीडिया के हाथों में आ गये थे। अब इनका कुछ हिस्सा सबके सामने आ गया है।

इसकी प्रतिक्रिया में इज़ारेदार पूंजीवादी कंपनियों और सत्ताधारी पार्टियों के बीच भ्रष्ट समझौतों के बारे में जो हैरानी प्रकट की जा रही है और बड़े-बड़े पूंजीपति जिस तरह अपनी सफाई दे रहे हैं, उनसे ऐसा लगता है कि राडिया टेप्स में जो खुलासा किया गया है, वह एक अपवाद है और आम घटना नहीं है। परन्तु हक़ीक़त तो यह है कि वर्तमान व्यवस्था हमेशा ठीक इसी तरह ही काम करती है। सत्ताधारी नेताओं और इज़ारेदार पूंजीपतियों के बीच रिश्वत और आपसी हित में किये गये कामों की लेन-देन आम घटना है, कोई अपवाद नहीं। पूंजीपति, नेताओं और अधिकारियों के साथ अपने संबंध बनाते हैं। वे अपने हित में किये गये कार्यों के बदले में नेताओं और अधिकारियों को सूटकेस भर-भर के पैसे देते हैं। मंत्री और उच्च अधिकारी अपने पदों का फायदा उठाकर निजी धन और पूंजी इकट्ठा करते हैं और खुद पूंजीपति बन जाते हैं।

राडिया टेप्स से स्पष्ट होने वाली एक अहम सच्चाई यह है कि इजारेदार पूंजीपति केन्द्र और राज्यों में सरकार बनाने वाली पार्टियों के गठबंधन को ही नहीं निर्धारित करते, बल्कि किसी खास क्षेत्र का मंत्री कौन बनेगा, वह फैसला भी इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा किया जाता है। टेपों से जाना जाता है कि टाटा समूह दूसरी संप्रग सरकार में कौन सा द्रमुक नेता टेलिकॉम मंत्री बनेगा, यह फैसला प्रभावित करने के लिये राडिया को पैसे दे रहा था।

हमारे देश में जो बहु-पार्टीवादी प्रतिनिधित्व वाला लोकतंत्र मौजूद है, उसके बारे में यह प्रचार किया जाता है कि यह जनता द्वारा, जनता के लिये, जनता का शासन है। परन्तु राजनीतिक प्रक्रिया में अधिकतम लोगों की बहुत ही कम भूमिका होती है, और वह भी सिर्फ मतदान के दिन। मुट्ठीभर अतिमालदार और शक्तिशाली इजारेदार पूंजीपति यह निर्धारित करते हैं कि कौन सी पार्टी या गठबंधन सरकार बनायेगी। वे सीधे तौर पर यह चयन करते हैं कि खास मंत्रालयों के मंत्री कौन होंगे। पूंजीपति नेताओं को पैसे देते हैं और इसके बदले, नेता सत्ता में आकर पूंजीपतियों के हित में काम करते हैं। इस तरह वर्तमान राजकीय इजारेदार पूंजीवादी व्यवस्था में नियमित तौर पर मंत्री और अधिकारी खास कंपनियों को लाईसेंस और परमिट सौंपते हैं। इजारेदार पूंजीपति विपक्षकी पार्टियों को भी पैसे देते हैं। इसके बदले में, विपक्ष के नेता भी पूंजीपतियों के हित में तरह-तरह के काम करते हैं। चुनाव इन मुट्ठीभर शोषकों की हुकूमत को सिर्फ वैधता देने के लिये करवाये जाते हैं।

राडिया टेप्स से हमें कुछ झलक मिलती है कि सरकार की नीति कैसे बनायी जाती है। जांच संस्थानों को टेपों पर रिकार्ड की गई चर्चाओं का संकलन करते हुये यह मानना पड़ा है कि विभिन्न सरकारी विभागों – टेलिकॉम, पेट्रोलियम और गैस, रक्षा, एयर लाइन इत्यादि – के काम-काज पर इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा, अपने दलालों के जरिये चर्चा होती है और तरह-तरह के दांवपेच किये जाते हैं ताकि एक पूंजीपति अपने प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़कर अपने हितों को बढ़ावा दे सके। कहा जाता है कि सरकारी नीतियां राष्ट्र हितमें बनायी जाती हैं, परन्तु हक़ीकत में यह नीतियां इजारेदार पूंजीपतियों के लालच पूरी करने के लिये बनायी जाती हैं।

टेपों से यह जाना जाता है कि सबसे बड़े पूंजीवादी घराने पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ ठीक उसी तरह काम कर रहे थे, जैसे कि वे कांग्रेस पार्टी, भाजपा और अन्य पार्टियों तथा उनकी सरकारों के साथ करते हैं। टेप की एक वार्ता के अनुसार, पश्चिम बंगाल की राजकीय कंपनी, हलदिया केमिकल्स के मुकेश अंबानी समूह द्वारा टेकओवर का सौदा करने के लिये माकपा महासचिव कराट के साथ एक मीटिंग आयोजित की जा रही थी। इस मिसाल से स्पष्ट होता है कि हमारे देश में असलियत में सरकारी नीति कैसे बनायी जाती है। बड़े पूंजीपतियों और सत्ताधारी नेताओं की लालच ही असलियत में यह निर्धारित करती है कि किसी राजकीय कंपनी का निजीकरण किया जायेगा या नहीं, और उसके बाद नीति और निर्देशों को उस फैसले के अनुसार बदला जाता है।

पूंजीपति वर्ग के प्रचार के अनुसार, बीते दो दशकों के मुक्त बाजारसुधारों के चलते, ”लाइसेंस-परमिट राजके पुराने भ्रष्ट तौर-तरीके खत्म हो गये हैं। यह प्रचार किया जाता है कि 1991 में तत्कालीन वित्तामंत्री मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गई तथाकथित सुधार प्रक्रिया के जरिये व्यवस्था में सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही आ गई है। परन्तु राडिया टेप्स के खुलासों से पता चलता है कि शासकों के ये दावे कितने खोखले हैं।

पूंजीवाद के विकास के वर्तमान पड़ाव की विशेषता ऊपर से नीचे तक इजारेदारी, बड़े पूंजीपतियों का प्रभुत्व, परजीविता तथा भ्रष्टाचार है। इस व्यवस्था के चलते, ”मुक्त स्पर्धाया बराबर के खिलाड़ी हो ही नहीं सकते। बाजार तथा राज्य के संस्थानों पर इजारेदार पूंजीपतियों का पूरा बोलबाला है। तथाकथित बाजार उन्मुख सुधारों के जरिये इजारेदार पूंजीपतियों के लिये नये-नये मौके पैदा हुये हैं, ताकि कुछ इजारेदार पूंजीपति दूसरों को पीछे धकेलकर खुद आगे बढ़ सकें, जिसके कारण पूंजी और सत्ता हमेशा ही ज्यादा से ज्यादा हद तक संकेन्द्रित होती जाती हैं।

नेहरूवीं समाजवादी नमूने के समाजके दौरान और हाल की उदारीकरण और निजीकरण की अवधि, दोनों में ही हमारे देश में जो व्यवस्था विकसित हुई है, वह राजकीय इजारेदार पूंजीवाद ही थी तथा है। इस व्यवस्था में इजारेदार पूंजीपति केन्द्रीय राज्य पर नियंत्रण करते हैं और केन्द्रीय राज्य इजारेदार कंपनियों के हित में हस्तक्षेप करता है। समय के साथ-साथ, इजारेदारी बहुत ज्यादा बढ़ गयी है, जिसके कारण हरेक सौदे में बहुत बड़ी बाज़ियां लगाई जाती हैं। कुछ नये पूंजीवादी समूह आगे आये हैं और विकसित हुये हैं जबकि कुछ पुराने पूंजीवादी समूह पीछे हटने को मजबूर हुये हैं। नेताओं और बड़े पूंजीपतियों के बीच संबंध दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है।

पूंजीपति वर्ग यह प्रचार करता है कि कुछ सुधारों या छोटे-मोटे कदमों से वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को साफ और भ्रष्टाचार रहित बनाया जा सकता है। परन्तु सच्चाई तो यह है कि सिर्फ मजदूर वर्ग की अगुवाई में क्रान्ति ही मुट्ठीभर शोषकों के भ्रष्ट और परजीवी शासन को खत्म कर सकती है, पूंजीवादी लोकतंत्र की जगह पर आधुनिक मजदूर वर्ग की अगुवाई में मेहनतकश जनसमुदाय का शासन, यानि श्रमजीवी लोकतंत्र स्थापित कर सकती है।

श्रमजीवी लोकतंत्र स्थापित करने के इस जंग में मजदूर वर्ग की कामयाबी हासिल करने के लिये कम्युनिस्टों को एक साथ मिलकर अपने वर्ग को अगुवाई देनी होगी। जो पार्टियां और नेता खुद को कम्युनिस्ट कहलाते हैं परन्तु पूंजीवादी लोकतंत्र की व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं, उनके द्वारा बहुत नुकसान किया जा चुका है और आज भी किया जा रहा है।

ऐसा क्यों है कि इजारेदार पूंजीवादी समूहों और तथाकथित निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच के संबंधों का बार-बार पर्दाफाश होने और तरह-तरह के घोटालों के होने के बावजूद हमारे देश की अधिकतम जनता आज भी यह सोचती है कि वह अपनी पसंद की सरकार को चुन सकती है?

इसके लिये वे पार्टियां जिम्मेदार हैं जो खुद को कम्युनिस्ट कहलाती हैं परन्तु मजदूरों और किसानों को पूंजीवादी लोकतंत्र और उसकी राजनीतिक प्रक्रिया पर भरोसा रखने की नसीहत देती रहती हैं। ये पार्टियां पूंजीवादी विपक्ष की पार्टियों के सुर में सुर मिलाकर यह चिल्लाती हैं कि कोई खास सरकार भ्रष्ट है परन्तु पूरी व्यवस्था और उसकी राजनीतिक प्रक्रिया का कभी पर्दाफाश नहीं करती हैं। ये पार्टियां किसी खास पार्टी या गठबंधन को दोषी ठहराती हैं परन्तु शासक वर्ग और उसके संपूर्ण राज्य तंत्र पर कभी निशाना नहीं साधती हैं। यह माक्र्सवादी या कम्युनिस्ट रवैया नहीं है। यह पूंजीवादी व्यवस्था के बारे में भ्रम फैलाने का काम, यह भ्रम कि अगर कोई कम भ्रष्ट पार्टी या गठबंधन सत्ता में आता है तो हालत सुधर सकती है। इससे मजदूरों और किसानों की जागरुकता को बहुत नुकसान पहुंचता है।

पूंजीपति वर्ग और उसके विचारक लोगों में यह भ्रम बनाये रखना चाहते हैं कि जनता को वही सरकार मिलती है जिसे वह चुनती है। खुद को कम्युनिस्ट कहने वाले परन्तु बहु-पार्टीवादी प्रतिनिधित्व के लोकतंत्र की हिफ़ाज़त करने वाले मजदूर वर्ग और क्रान्ति के उद्देश्य के लिये नहीं काम कर रहे हैं। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की मिसाल यह दिखाती है कि जो पार्टी वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया में पूरी तरह घुलमिल जाती है, उसके और दूसरी पूंजीवादी पार्टियों के बीच कोई अन्तर नहीं रह जाता, सिर्फ नाम के सिवाय।

कम्युनिस्टों का फ़र्ज है देश के मजदूरों, किसानों और बुध्दिजीवियों के सामने वर्तमान आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था की सच्चाई का पर्दाफाश करना और यह स्पष्ट करना कि मेहनतकश जनसमुदाय को अपने हाथों में राज्य सत्ता लेने तथा उसे चलाने के लिये क्या करना होगा।

समय के साथ-साथ, पूंजीवादी लोकतंत्र ज्यादा से ज्यादा भ्रष्ट और दमनकारी होता जायेगा। इसका अन्त तभी होगा जब मजदूर वर्ग किसानों के साथ गठबंधन बनाकर, अपने अतीत से नाता तोडेग़ा और आधुनिक लोकतंत्र की अगवानी करेगा। वह आधुनिक लोकतंत्र मजदूर वर्ग की अगुवाई में मेहनतकश जनसमुदाय का शासन होगा, जिसमें कोई भी सरकारी सेवक अपने पद का फायदा उठाकर निजी हितों की सेवा करने की हिम्मत नहीं करेगा।

राडिया टेप्स से स्पष्ट होने वाली सबसे अहम बात यह है कि पूंजीवादी लोकतंत्र और उसके बारे में सारे भ्रमों से नाता तोड़ना आवश्यक है।

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