अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के ख़िलाफ़ अमरीकी साम्राज्यवाद के वहशी अपराध कभी भुलाये नहीं जा सकते!

अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को खुद अपना भविष्य तय करने का पूरा अधिकार है!

15 अगस्त, 2021 को तालिबान की सेना ने काबुल में प्रवेश किया और राष्ट्रपति के महल पर कब्ज़ा कर लिया। राष्ट्रपति अशरफ़ गनी कुछ ही घंटों पहले, अमरीकी मदद के साथ, भाग चुके थे। अमरीकी पैसों पर पली और अमरीका से प्रशिक्षण प्राप्त, तीन लाख सिपाहियों वाली अफगानी सेना बिना लड़े ही अस्त-व्यस्त हो गयी। इन घटनाओं के साथ, काबुल में अमरीका द्वारा समर्थित कठपुतली सरकार का अंत हुआ। इसके साथ-साथ, अफ़ग़ानिस्तान में लगभग 20 साल लम्बा अमरीकी दख़ल भी ख़त्म हुआ।

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द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 75 वीं वर्षगांठ पर

भाग 3 : द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले प्रमुख साम्राज्यवादी शक्तियों तथा सोवियत संघ की रणनीति

दुनियाभर के बाज़ारों और प्रभाव क्षेत्रों के पुनः बंटवारे के लिए नए साम्राज्यवादी युद्ध की शुरुआत 1930 में हो गयी थी। ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी को सोवियत संघ के ख़िलाफ़, जापान को चीन और सोवियत संघ के ख़िलाफ़ भड़काने की सोची-समझी नीति चलायी, ताकि ये सभी देश आपसी टकराव के चलते कमजोर हो जाएं। ऐसा करते हुए ब्रिटेन और फ्रांस जंग में कुछ देर बाद शामिल होने और विजेता बनकर उभरने की योजना बना रहे थे। अमरीका की रणनीति हालातों पर निगाह रखने और बाद में जंग में उतरने की थी ताकि अन्य साम्राज्यवादी ताक़तों के थक जाने के बाद वह स्पष्ट रूप से सबसे शक्तिशाली देश की तरह उभर कर आये।

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आज़ादी के 73 साल बाद :

शोषण और दमन से मुक्त हिन्दोस्तान के लिए संघर्ष जारी है

बर्तानवी बस्तीवादी हुकूमत की समाप्ति के 73 साल बाद भी, हिन्दोस्तान में राजनीतिक सत्ता मुट्ठीभर लोगों के हाथों में केंद्रित है। “सबका विकास” एक खोखला वादा बनकर रह गया है।

हिन्दोस्तान में केवल टाटा, अंबानी, बिरला और अन्य इजारेदार पूंजीपति घरानों की जायदाद और उनके निजी औद्योगिक साम्राज्य बड़ी तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

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प्रथम विश्व युद्ध में हिन्दोस्तानी सैनिक : बेरहम और नाजायज़ साम्राज्यवादी युद्धों में हिन्दोस्तानी लोगों की जानें फिर कभी कुर्बान नहीं होंगी!

प्रथम विश्व युद्ध में 8 करोड़ पौंड स्टर्लिंग के मूल्य के कपड़े, गोली-बारूद और अन्य सामग्रियां हिन्दोस्तान से लूटकर ब्रिटेन के युद्ध अभ्यासों में खर्च की गयी थीं। इसके अलावा, लगभग 15 लाख हिन्दोस्तानी लोगों, सैनिकों और श्रमिकों, को यूरोप, पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के रण क्षेत्रों को भेजा गया था। लगभग 75,000 हिन्दोस्तानी सैनिक मारे गए, जबकि इससे कहीं ज्यादा तादाद में हिन्दोस्तानी लोग घायल हुए, लापता हुए या बीमारियों व ग़रीबी से मर गए।

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