बैंकिंग का संकेंद्रण और बढ़ती परजीविता

देश के सार्वजनिक बैंकों के विलयन और निजीकरण के जरिये बैंकिंग पूंजी का तेजी से संकेंद्रण होता जा रहा है। इसका मकसद है देश में कुछ चंद मुट्ठीभर बड़े इजारेदार बैंक तैयार करना, जो अधिकतम मुनाफों के लिए एक-दूसरे से होड़ करेंगे और समझौते करेंगे। बैंक के मज़दूरों और आम तौर पर समाज पर इसका बहुत बुरा परिणाम होने वाला

आगे पढ़ें