“निजीकरण के खिलाफ एकता” श्रृंखला की दूसरी मीटिंग का सफल आयोजन!!

विषय: “भारतीय रेलवे के निजीकरण का विरोध करें”

कामगार एकता कमेटी द्वारा सोमवार 21 सितंबर, 2020 को आयोजित बैठक

कामगर एकता कमेटी (केईसी) द्वारा “निजीकरण के खिलाफ एकता” श्रृंखला की दूसरी बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक के आयोजन का प्रचार व्यापक रूप से भारतीय रेलवे के मज़दूर नेताओं और सक्रिय कार्यकर्ताओं के साथ-साथ अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में भी किया गया था। देश भर के 320 से अधिक सक्रिय कार्यकर्ताओं ने शानदार सौहार्द-पूर्ण  माहौल में इसमें भाग लिया।

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सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?

“सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?” – इस विषय पर 27 सितम्बर 2020 को मज़दूर एकता कमेटी द्वारा आयोजित वेब मीटिंग में कामरेड संतोष कुमार की प्रस्तुति

जब से हमारे देश को बस्तीवादियों से राजनीतिक आज़ादी हासिल हुई उस समय से हमें वादा किया जाता रहा है कि हमारे बच्चों को एक समान और अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा मुफ्त दी जाएगी।

जैसा कि संविधान की धारा 45, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत में बताया गया है कि:

“राज्य का यह प्रयत्न रहेगा कि, संविधान के लागू होने के 10 वर्ष के भीतर 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जाएगी।”

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“सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?” विषय पर वेब मीटिंग

मज़दूर एकता कमेटी ने “सबको शिक्षा क्यों नहीं एक समान?” इस विषय पर एक विचारोत्तेजक वेब मीटिंग का आयोजन किया। इस वेब सभा की अध्यक्षता बिरजू नायक ने की और संतोष कुमार ने इस विषय पर एक प्रस्तुति पेश की। देशभर के अलग-अलग हिस्सों से लोगों ने इस सभा में हिस्सा लिया।

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साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ वियतनामी लोगों की जीत आज भी लोगों को प्रेरणा देती है

इस वर्ष वियतनामी लोगों के देशभक्त आंदोलन की अमरीकी साम्राज्यवाद की हमलावर सेना के ख़िलाफ़ जीत की 45वीं सालगिरह है। अमरीकी साम्राज्यवाद ने इस देश पर 15 वर्षों के लिए कब्ज़ा जमाये रखा था और बर्बरता का ऐसा खेल खेला जिसकी मिसाल दुनियाभर में कहीं नहीं मिलेगी। वियतनाम के कम्युनिस्टों और उनके नेता हो ची मिंह ने इस देशभक्त आंदोलन को अगुवाई दी थी। अमरीकी साम्राज्यवाद पर वियतनामी लोगों की यह दूसरी सबसे बड़ी जीत थी। इससे पहले द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर 2 सितम्बर, 1945 को उन्होंने अपनी राष्ट्रीय आज़ादी का ऐलान किया था।

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निजीकरण के ख़िलाफ़ एकजुट हों!

5 सितंबर, 2020 को कामगार एकता कमिटी द्वारा आयोजित बैठक

हर रोज हमें, लाखों-करोड़ों रुपये के महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के निजीकरण के माध्यम से, बड़े पूंजीपतियों द्वारा हमारे देश के लोगों की सुनियोजित लूट की खबर मिलती है। इन प्रतिष्ठानों में मज़दूर और उनके साथ-साथ अन्य लोग भी यह जानते हैं कि निजीकरण को रोकने के लिए हमें अपने उद्योग, पार्टी और यूनियन के संबंधों से ऊपर उठकर एकजुट होना जरूरी है।

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कोरियाई युद्ध से सबक

इस वर्ष कोरियाई युद्ध के शुरुआत की 70वीं सालगिरह है। इस खूनी और बर्बर युद्ध में करीब 40 लाख लोग मारे गए थे और पूरे कोरियाई प्रायद्वीप में कई शहर, नगर और गांव बर्बाद हो गए थे। इस युद्ध के अंत में स्वाभिमानी और एकजुट कोरिया का बंटवारा हो गया था, जो आज तक चलता आ रहा है। वैसे तो युद्ध 1953 में समाप्त हो गया था, लेकिन आज तक इस प्रायद्वीप को बीच से बांटने वाली सरहद के दोनों ओर सैकड़ों हजारों सैनिक एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं, जिसे फोर्टीफायड बफर ज़ोन (डी.एम.जेड.) कहा जाता है। इस तरह से कोरिया दुनिया में सबसे अधिक सैनिकीकृत क्षेत्र बन गया है। इस सरहद के दोनों तरफ हजारों कोरियाई परिवार बांट दिए गए हैं और उन्हें सरहद पार अपने परिजनों से मिलने की कोई उम्मीद नहीं बची है।

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बाबरी मस्जिद के विध्वंस का मुक़दमा :

जब तक सत्ता की कमान पर बैठे लोगों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाता, कोई इंसाफ नहीं हो सकता

सुप्रीम कोर्ट ने सी.बी.आई. की विशेष अदालत को बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर चल रहे मुक़दमे में 30 सितंबर तक अंतिम फैसला देने का आदेश दिया है। इस मुक़दमे में, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार और साध्वी ऋतंभरा जैसे भाजपा, आर.एस.एस., बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी के कई वरिष्ठ नेता आरोपी बनाये गए हैं। उन सभी पर आरोप है कि उन्होंने 6 दिसंबर, 1992 को 15वीं शताब्दी की एक प्राचीन मस्जिद को ध्वस्त करने की साजिश की थी और विध्वंस से पहले मुस्लिम लोगों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाले भाषण दिये थे।

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तीन श्रम संहितायें संसद में पारित:

मज़दूरों के अधिकारों पर खुलेआम हमलों की निंदा करें

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 25 सितंबर, 2020

औद्योगिक विवाद, व्यावसायिक सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर तीन श्रम संहिताओं को लोकसभा में 22 सितंबर को और राज्यसभा में मानसून सत्र के अंतिम दिन, 23 सितंबर को पारित कर दिया गया। इन प्रस्तावित कानूनों के खि़लाफ़ देशभर में प्रदर्शन कर रहे करोड़ों मज़दूरों की आवाज़ को पूरी तरह से नज़रंदाज़ करते हुए और संसद में बिना किसी चर्चा के पारित किया गया। वेतन पर संहिता को 2019 में ही पारित किया जा चुका है।

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किसान-विरोधी विधेयकों की निंदा करें जिन्हें संसद ने पारित घोषित कर दिया

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 25 सितंबर, 2020

कृषि क्षेत्र की व्यापार और वस्तुओं के भंडारण संबंधी तीन विधेयकों को संसद में पारित किये जाने की निंदा करते हुए देशभर के किसान सड़कों पर उतर आये हैं और उनका जबरदस्त विरोध कर रहे हैं। ये तीन विधेयक इस प्रकार हैं – किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक, 2020; मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर किसानों के साथ समझौते (सशक्तिकरण और संरक्षण) विधेयक, 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश। किसान इलेक्ट्रिसिटी (संशोधन) विधेयक 2020, का भी विरोध कर रहे हैं क्योंकि इस बिल से किसानों का बिजली पर खर्चा और भी बढ़ जायेगा।

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मज़दूर-विरोधी और किसान-विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

23 सितम्बर, 2020 को केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर पूरे देश के मज़दूरों ने सरकार की मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी नीतियों के खि़लाफ़ जगह-जगह प्रदर्शन आयोजित किए। ये प्रदर्शन मज़दूर-विरोधी तीन लेबर कोड बिलों और कृषि क्षेत्र से संबंधित किसान-विरोधी विधेयकों के ख़िलाफ़ थे, जिन्हें केन्द्र सरकार ने हाल ही में, संसद में भारी असहमति के बावजूद पास किया

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