किसानों की आय बढ़ाने के नाम पर इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा लूट को बढ़ावा

15 मई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए सहायता के नाम पर “एक लाख पचास हजार करोड़ रुपये” के पैकेज के साथ तमाम कई नीतियों में बदलाव का ऐलान किया। प्रधानमंत्री ने दावा किया कि इससे किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी। लेकिन इन घोषणाओं का नजदीकी से मूल्यांकन करने से यह नज़र आता है कि इससे किसानों को तुरंत राहत देने की ज़रूरत बिलकुल भी पूरी नहीं होती है। इसके ठीक विपरीत, वित्तीय पैकेज और नीतिगत बदलाव पूंजीवादी कंपनियों द्वारा किसानों की लूट के दायरे को और अधिक विस्तृत करने के मक़सद से किये जा रहे है।

खेतों में काम करने के लिए मज़दूरों की कमी, लॉक डाउन की वजह से यातायात के साधनों की कमी और कृषि उत्पादों के लिए बेहद कम दाम के चलते रबी की फ़सल से होने वाली किसानों की आमदनी में भारी गिरावट हुयी है। अपने कृषि उत्पादों को बाज़ार तक पहुंचाने में पैसा खर्चा करने के बजाय कई किसानों ने अपनी फ़सलों को फेंककर बर्बाद कर दिया है। उन्हें तुरंत नगदी राहत की ज़रूरत है जिसके बगैर वे आने वाली खरीफ की फ़सल की लागत का सामान नहीं खरीद सकते हैं और न ही अपने बकाया कर्जे़ का भुगतान कर सकते हैं।

इस पूरे वित्तीय पैकेज में नगदी देने का केवल एक ही हिस्सा है जिसके तहत देशभर में 8 करोड़ किसानों के बैंक खातों में प्रधानमंत्री किसान योजना के तहत 2000 रुपये डालने का ऐलान मार्च महीने के अंत में किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार 10 अप्रैल तक करीब 7.5 करोड़ किसानों के खातों में यह रकम जमा की जा चुकी है। किसानों को हुए नुकसान की तुलना में यह रकम बहुत ही कम है।

14 मई को किये गए ऐलान में 2,50,000 करोड़ की वह रकम शामिल है जो बिना किसी चीज को गिरवी रखे, किसान क्रेडिट कार्ड के द्वारा 1.6 लाख तक की रकम के कर्ज़ के रूप में, 2.5 करोड़ किसानों को दी जा सकती है। लेकिन बहुत बड़ी संख्या में किसान पहले लिए गए कर्ज़ नहीं चुका पाए हैं, इसलिए इसमें बहुत शक है कि वे नए कर्जे़ लेने की स्थिति में होंगे। 2016-17, 2017-18, और 2018-19 के दौरान किसानों द्वारा लिए गए कर्ज़े न चुकाए जाने के कारण, बैंकों को करीब 60,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त घाटा हुआ। इसकी वजह यह है कि कई किसानों को अपने कृषि उत्पादों को लागत से भी कम क़ीमत पर बेचना पड़ा था।

बैंकों द्वारा किसानों के बकाया कर्ज़े माफ़ किये जाएं, यह देशभर के किसानों की एक फौरी मांग रही है। पिछले कुछ वर्षों में इसके लिए जबरदस्त संघर्ष चल रहा है। लेकिन केंद्र सरकार ने किसानों की इस मांग को पूरा करने से इंकार किया है। इसके ठीक विपरीत, सरकार ने पूंजीपतियों द्वारा बैंकों से लिए गए 550,000 करोड़ रुपये का बकाया कर्ज़ को माफ़ कर दिया है, जिसमें 68,000 करोड़ रुपये का बकाया कर्ज़ 50 सबसे बड़े “अपनी मर्ज़ी से कर्ज़े न चुकाने वालों” का था।

15 मई को घोषित किये गए वित्तीय पैकेज का प्रमुख भाग कृषि उत्पादों की खरीदी और मार्केटिंग में निवेश करने की इच्छा रखने वाली निजी कंपनियों को दिए जाने वाले कर्ज़े हैं। इसमें से 1,00,000 करोड़ रुपये का सबसे बड़ा हिस्सा नाबार्ड को दिया जायेगा। इस रकम में से नाबार्ड वातानुकूलित भण्डारण, खाद्य प्रसंस्करण और अन्य आवश्यक किसानी ढांचा खड़ा करने में निवेश करने वाली कंपनियों को कर्ज़ दे सकता है। इसके अलावा खाद्य पदार्थों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग के लिए 10,000 करोड़ रुपये का एक विशेष फण्ड बनाया जा रहा है।

15 मई को जिन नीतिगत सुधारों का ऐलान किया गया, उन्हें पूंजीवादी कंपनियों द्वारा कृषि उत्पादों की किसानों से सीधी खरीदी को बढ़ावा देने के मक़सद से किया जा रहा है। सभी राज्य स्तरीय कानूनों को दरकिनार करते हुए, एक नए केंद्रीय कानून का प्रस्ताव रखा गया है, जिसके तहत निजी कंपनियों को राज्य स्तरीय कृषि उत्पाद मार्केटिंग कमेटी (ए.पी.एम.सी.) के नियंत्रण से मुक्त, कृषि उत्पादों की खुली खरीदी, भंडारण और यातायात की इज़ाज़त दी जाएगी। आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करके धान, गेहूं, दालें, तिलहन, प्याज, और आलू को उसके दायरे से बाहर किया जायेगा। इसका मतलब है कि अब निजी कंपनियां अधिकतम मुनाफ़े की नज़र से किसी भी मात्रा में इन उत्पादों की जमाखोरी कर सकेंगी।

इन नीतिगत सुधारों का समर्थन करने वाले दावा कर रहे हैं कि अगर किसानों को अपने उत्पादों को किसी भी निजी व्यापारी या पूंजीवादी कंपनी को बेचने की छूट दी जाये तो उनकी आमदनी में बहुत बढ़ोतरी होगी। लेकिन हक़ीक़त में इन नीतिगत सुधारों का असली फ़ायदा पूंजीवादी व्यापारी कंपनियों को होगा।

मौजूदा व्यवस्था में अधिकांश छोटे और मंझोले किसान निजी व्यापारियों और बिचैलियों के रहमो-करम पर रहते हैं, भ्रष्ट ए.पी.एम.सी. अधिकारियों  और सरकारी अफ़सरों के साथ साठ-गांठ में, राज्य द्वारा नियंत्रित बाज़ारों पर हावी हैं। जिस नयी व्यवस्था का प्रस्ताव किया गया है उसके तहत बड़ी-बड़ी पूंजीवादी व्यापारी कंपनियां देश के किसी भी इलाके से सबसे बेहतर दाम देकर कृषि उत्पादों को खरीद पायेंगी। इसके चलते, किसानों को मौजूदा व्यापारियों द्वारा लूटे जाने के बजाय, अब उनसे भी बहुत बड़ी इजारेदार पूंजीवादी व्यापार कंपनियों के रहमो-करम पर जीना पड़ेगा।

देशभर के किसान इस खास मांग को लेकर लगातार संघर्ष करते आये हैं कि सरकार लागत से डेढ़ गुना क़ीमत पर किसानों के उत्पादों की खरीदी सुनिश्चित करे। बड़े पूंजीपतिवादी की कंपनियों को किसानों से सीधे उनके उत्पाद खरीदने की इजाज़त देने से किसानों की यह मांग पूरी नहीं होगी। इसके ठीक विपरीत, इससे किसानों की लाभकारी क़ीमत न पाने की समस्या और विकट हो जायेगी।

इजारेदार पूंजीवादी कंपनियां अधिकतम मुनाफ़े बनाने के मक़सद से काम करती हैं। उनकी तरफ से किसानों को उनके उत्पादों के लिए लाभकारी क़ीमत दिलाने की कोई प्रतिबद्धता नहीं होती है। किसानों को बीज, खाद, कीटनाशक और अन्य लागत की वस्तुओं को ऊंचे से ऊंचे दाम पर बेचकर और किसानों के उत्पादों को कम से कम क़ीमत पर खरीदकर ही ये कंपनियां अधिकतम मुनाफे़ बनाती हैं।

टाटा, आदित्य बिरला, रिलायंस, बिग बाज़ार, आई.टी.सी., ए.डी.एम. एग्रो, और महिंद्रा – इन इजारेदार पूंजीवादी घरानों ने पिछले कुछ वर्षों में कृषि उत्पादों की खरीदी के क्षेत्र में प्रवेश किया है। इन पूंजीवादी घरानों की व्यापार कंपनियां शुरुआत में किसानों को अच्छी क़ीमत देकर आकर्षित करती हैं। जब ये कम्पनियां बाज़ार के नियंत्रणकारी हिस्से पर कब्ज़ा कर लेती हैं, तो उसके बाद वे अपनी ताक़त का इस्तेमाल करके, खरीदी की क़ीमत को नीचे से नीचे रखने की कोशिश करती हैं।

नीतिगत सुधारों में पूरे देश में “संविदा कृषि” के लिए एक कानूनी ढांचा बनाने का प्रस्ताव भी किया गया है। गुजरात में अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको के साथ अनुभव साफ दिखाता है कि किस तरह से संविदा कृषि किसानों के लिए नुकसानदेह और बड़ी पूंजीवादी कंपनियों के लिए फायदे का सौदा है। (देखिये गुजरात अनुभव पर बाक्स)। किसानों की आमदनी बढ़ाना तो दूर, संविदा कृषि से किसान और अधिक ग़रीब होता जायेगा तथा और अधिक कर्ज़ में डूबता चला जायेगा।

गुजरात में संविदा कृषि का अनुभव

वर्ष 2019 में अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने गुजरात के साबरकांथा जिले के चार किसानों के खि़लाफ़ अहमदाबाद न्यायालय में एक मुक़दमा दर्ज़ किया। कंपनी ने यह आरोप लगाया कि किसानों ने कंपनी के आलू की “रजिस्टर्ड प्रजाति”, जिसका उपयोग कंपनी द्वारा “लेस” चिप्स का उत्पादन करने के लिए किया जाता है, उसमें “गैरकानूनी व्यापार” किया है। कंपनी ने प्रत्येक किसान से 1.05 करोड़ रुपये के हर्जाने के मांग की! पेप्सिको कंपनी ने दावा किया कि इन किसानों ने खास प्रजाति के आलू का उत्पादन करते हुए “प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटी एंड फार्मर्स राइट्स एक्ट 2001” के तहत कंपनी के “अधिकारों का उल्लंघन” किया है।

किसानों के खि़लाफ़ सबूत इकट्ठा करने के लिए कंपनी ने एक जासूसी एजेंसी को लगाया जो किसानों के पास एक खरीदार के रूप में गयी और किसानों को अच्छी क़ीमत देते हुए आलू खरीद लिए और उसके सैंपल को कंपनी की प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा।

यह उदाहरण दिखाता कि संविदा कृषि के तहत ये बड़ी कंपनियां किस हद तक कृषि पर अपना नियंत्रण जमा सकती हैं।

 

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