हमारे पाठकों से : लॉक डाउन के अनुभव की कहानी मज़दूरों की जुबानी

संपादक महोदय,

देश के अन्य महानगरों की तरह गुजरात स्थित अहमदाबाद में भी लाखों की तादाद में प्रवासी मज़दूर आते हैं। यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश और बिहार से आये काम करने वाले मज़दूरों की आप-बीती है। वैश्विक महामारी कोरोना के चलते 22 मार्च से तालाबंदी हुई और सारे उद्योग-धंधे बंद कर दिए गए। इन्हीं बंद कंपनियों की श्रेणी में बावला स्थित एक स्टील कंपनी शामिल है जिसमें तकरीबन 750 मज़दूर कार्यरत हैं। लॉक डाउन के चलते जब फैक्ट्री बंद कर दी गयी तब इन मज़दूरों ने घर बैठने की बजाय जीविका चलाने के लिए चिवड़ा कंपनी में अस्थायी तौर पर कार्य करना ज़रूरी समझा। 15 अप्रैल से जब कुछ कंपनियां शुरू हुईं तो स्टील कंपनी भी शुरू की गयी और सारे मज़दूर दोबारा कार्य पर लौटे। दुखद यह है कि इन मज़दूरों को मार्च महीने का जो वेतन दिया गया वह मात्र आठ घंटे के हिसाब से ही दिया गया है हालांकि मज़दूरों ने अतिरिक्त घंटे कार्य किया है। मज़दूरों द्वारा बकाया वेतन की मांग करने पर ठेकेदार साफ शब्दों में मना कर देता है यह कह कर कि उसके पास पैसे नहीं हैं ।

कंपनी द्वारा मज़दूरों को दिए गए कमरे मात्र 100 वर्ग फुट के हैं जिसमें औसतन पांच से सात मज़दूर रहते हैं। इस महामारी में इन तंग कमरों में रहकर वे भी भयभीत हैं और सोचने पर विवश हैं कि कहीं यह वायरस उन्हें भी काल का ग्रास न बना ले, कहीं उन्हें भी कोरोना न हो जाय। इन्हीं सब मानसिक परिस्थितियों और विवशताओं से तंग आकर मज़दूर हजारों किलोमीटर दूर अपने घर जाकर अपने परिवार वालों के बीच रह कर इस बुरे समय को बिताना चाहते हैं। मज़दूरों ने अपने घर, अपने गांव जाने के लिए अहमदाबाद के बावला स्थित नगरपालिका में अपनी अर्जियां दीं। 30 अप्रैल और 2 मई को अधिकारी पुलिस जांच का फॉर्म लेकर फैक्ट्री में जांच पड़ताल के लिए आए। फैक्ट्री के मालिक ने अधिकारियों को कह दिया कि उनका कोई भी मज़दूर गांव नहीं जाना चाहता। यह कहकर, मालिक ने अधिकारियों से वह पुलिस जांच का फॉर्म लेकर उन्हें वापस भेज दिया। ठेकेदार स्वयं गुंडा प्रवृत्ति का है, मज़दूरों को कैद कर इस माहौल में उनसे जबरन कार्य करवाया जा रहा है।

सरकार की घोषणा के अनुसार, फंसे मज़दूर अपने घर जा सकते हैं परन्तु वास्तविकता तो यह है कि इन मज़दूरों के लिए घर जाना भी उन्हें सपनों जैसा लग रहा है। सरकार द्वारा घोषित यह योजना और मज़दूरों के बीच बहुत बड़े फासले हैं। एक तरफ लॉक डाउन को चालीस दिन से भी ज्यादा बीत चुके हैं परन्तु घर जाने का कोई मार्ग नहीं दिख रहा है और दूसरी ओर उनके परिजन अभी भी उनके घर आने का इंतजार कर रहे हैं।

सुरेश

अहमदाबाद

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