प्रथम विश्व युद्ध में हिन्दोस्तानी सैनिक : बेरहम और नाजायज़ साम्राज्यवादी युद्धों में हिन्दोस्तानी लोगों की जानें फिर कभी कुर्बान नहीं होंगी!

प्रथम विश्व युद्ध में 8 करोड़ पौंड स्टर्लिंग के मूल्य के कपड़े, गोली-बारूद और अन्य सामग्रियां हिन्दोस्तान से लूटकर ब्रिटेन के युद्ध अभ्यासों में खर्च की गयी थीं। इसके अलावा, लगभग 15 लाख हिन्दोस्तानी लोगों, सैनिकों और श्रमिकों, को यूरोप, पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के रण क्षेत्रों को भेजा गया था। लगभग 75,000 हिन्दोस्तानी सैनिक मारे गए, जबकि इससे कहीं ज्यादा तादाद में हिन्दोस्तानी लोग घायल हुए, लापता हुए या बीमारियों व ग़रीबी से मर गए।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद, कई दशकों तक उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच उस युद्ध में हिन्दोस्तानी लोगों और संसाधनों के उस बेरहम शोषण को ब्रिटेन और आज़ाद हिन्दोस्तान की सरकारों ने नज़रंदाज़ कर दिया। परन्तु हाल में जब प्रथम विश्व युद्ध के अंत की शताब्दी को मनाने की तैयारियां चल रही थीं, तो उस युद्ध में हिन्दोस्तान के और खासकर हिन्दोस्तानी सैनिकों के “महान योगदान” की बहुत चर्चा होने लगी। यूरोप के कुछ शहरों और विश्व युद्ध के कुछ स्थानों पर हिन्दोस्तानियों की “कुर्बानी” के स्मारक खड़े किये गए हैं और उनकी याद में आयोजित कई समारोहों में पश्चिमी व हिन्दोस्तानी गणमान्य अतिथियों ने बड़े-बड़े भाषण दिए हैं। दिल्ली में इस अवसर पर सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने भी प्रथम विश्व युद्ध में हिन्दोस्तानी सैनिकों के ‘शांति’ बहाल करने में योगदान की सराहना की।

दुनिया के कोने-कोने से, उपनिवेशों से लाखों-लाखों सैनिकों और मेहनतकशों को उस खून-खराबे में खींच कर लाया गया था और उन्हें “फ़र्ज़” व “सम्मान” के झूठे पाठ पढ़ाये गए थे, ताकि एक ऐसे युद्ध में उनकी कुरबानी को जायज़ ठहराया जा सके, जो उनके हितों के ख़िलाफ़ था। हिन्दोस्तानी सैनिकों द्वारा उस समय लिखे गए हजारों-हजारों ऐसे पत्र पाए गए हैं, जिनमें वर्णन किया गया है कि साम्राज्यवादी मालिकों के हाथों उन्हें किस तरह की क्रूरता और भेद-भाव का सामना करना पड़ता था।

आज संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में, हजारों-हजारों हिन्दोस्तानी सैनिकों को दुनिया के अनेक युद्ध-पीड़ित देशों में “शांति बहाल करने” के लिए भेजा जा रहा है। दुनिया के ऐसे दूर-दूर के देशों में, जिनके साथ हिन्दोस्तान की कोई दुश्मनी नहीं है, वहां हिन्दोस्तानी सैनिकों का तैनात किया जाना – इसे दुनिया में हिन्दोस्तान का बहुत महान योगदान बताया जा रहा है।

आज हिन्दोस्तान के शासक सरमायदार अपने व्यापक भू-राजनैतिक मंसूबों को पूरा करने के लिए, अपनी सैनिक क्षमता को तेज़ी से बढ़ा रहे हैं। “देश की सरहदों की रक्षा करने” और पड़ोसी इलाकों में अपनी ताक़त को स्थापित करने के अलावा, हिन्दोस्तान के सरमायदार दुनिया के दूसरे भागों में अपने हितों की रक्षा करने के लिए भी अपनी सैनिक क्षमता को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। सत्ता के गलियारों में ऊंची आवाज़ें सुनाई दे रही हैं कि हिन्दोस्तान को दुनिया की दूसरी बड़ी-बड़ी ताक़तों के साथ सहयोग या स्पर्धा करने योग्य, एक महान सैनिक शक्ति बन जाना चाहिए। हिन्दोस्तानी सेना के विदेशों में लड़ने के अनुभव पर, यहां तक कि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के हितों के लिए लड़ने के अनुभव पर भी गर्व पैदा करने का यह प्रचार हिन्दोस्तानी शासक वर्ग की साम्राज्यवादी और जंगफरोश नीति का हिस्सा है।

हिन्दोस्तान के मज़दूर और किसान, जिन्होंने अपने बेटों और बेटियों को सेना में लड़ने के लिया भेजा है और भेजते रहते हैं, यह नहीं भूल सकते कि देशी और विदेशी शासकों के हितों के लिए किस तरह हिन्दोस्तानी सैनिकों की जानों की बार-बार कुर्बानी दी गयी है। प्रथम विश्व युद्ध के समय और उसके बाद भी, देशभक्त हिन्दोस्तानियों के संगठनों, जैसे कि हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी, ने हिन्दोस्तानी सैनिकों से यह आह्वान किया था कि अपनी बंदूकों का निशाना दूसरे देशों के लोगों को नहीं, बल्कि उपनिवेशवादी शोषकों को बनाएं। हजारों हिन्दोस्तानी सैनिकों ने इन देशभक्तों के आह्वान को स्वीकार किया था, जो हिन्दोस्तानी सैनिकों के लिए बहुत गर्व की बात है। हिन्दोस्तानी सैनिकों की इस गौरवपूर्ण परंपरा पर हमें नाज़ है।

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