श्रम कानूनों में प्रस्तावित बदलाव पूंजीपति-परस्त व मज़दूर-विरोधी है

पूंजीपति वर्ग और उसके प्रवक्ताओं ने “इज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” (व्यापार को सुगम बनाने) के मकसद से श्रम की हालतों से संबंधित कानूनों और नीतियों में बदलाव करने का कार्यक्रम लागू करने का फैसला लिया है। जो भी सरकार केंद्र या राज्य स्तर पर सत्ता में आती है उसके काम का इस आधार पर मूल्यांकन किया जा रहा है कि वह किस हद तक हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी कंपनियों के लिए अधिकतम मुनाफे़ बनाने के लिए माहौल तैयार करती है। श्रम कानूनों में पूंजीपति-परस्त और मज़दूर-विरोधी प्रत्येक बदलाव के साथ विश्व बैंक द्वारा बनाये गए “इज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” सूचकांक में बढ़ोतरी होती है।

पूंजीपति वर्ग और उसके प्रवक्ताओं ने “इज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” (व्यापार को सुगम बनाने) के मकसद से श्रम की हालतों से संबंधित कानूनों और नीतियों में बदलाव करने का कार्यक्रम लागू करने का फैसला लिया है। जो भी सरकार केंद्र या राज्य स्तर पर सत्ता में आती है उसके काम का इस आधार पर मूल्यांकन किया जा रहा है कि वह किस हद तक हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी कंपनियों के लिए अधिकतम मुनाफे़ बनाने के लिए माहौल तैयार करती है। श्रम कानूनों में पूंजीपति-परस्त और मज़दूर-विरोधी प्रत्येक बदलाव के साथ विश्व बैंक द्वारा बनाये गए “इज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” सूचकांक में बढ़ोतरी होती है।

मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद, पहले ही साल में ऐलान किया था कि औद्योगिक संबंध और मज़दूरों के अधिकारों से संबंधित मौजूदा 44 कानूनों को केवल 4 कानूनों में एकत्रित किया जायेगा, जिन्हें श्रम “संहिता” कहा गया। प्रस्तावित चार संहितायें निम्नलिखित चार विषयों से संबंधित है – 1) औद्योगिक संबंध; 2) वेतन; 3) सामाजिक सुरक्षा; और 4) सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम के हालात। ऐसा ऐलान किया गया कि इन कदमों का मकसद श्रम कानूनों को सरल बनाना है और तथाकथित तौर पर इससे पूंजीपतियों और मज़दूरों दोनों को ही फायदा होगा।

इन प्रस्तावित केंद्रीय श्रम संहिताओं के अलावा सरकार ने कई और बदलाव लागू किये हैं। नवंबर 2017 में सरकार ने अप्रेंटिस कानून में बदलाव किया। जिससे नौजवानों और मज़दूरों को नियमित रोज़गार दिए बिना ही उनके अति-शोषण की परंपरा को कानूनी जामा पहना दिया गया। इसके अलावा सरकार ने मज़दूर-विरोधी बदलाव लाने के लिए कई और तरीके अपनाये हैं जिनमें अधिसूचना, अध्यादेश और नीतिगत फैसले शामिल हैं। स्टार्ट अप कंपनियों में काम कर रहे मज़दूरों को किसी भी तरह की कानूनी पहचान और अधिकारों की सुरक्षा से वंचित किया गया है। मज़दूरों को रोज़गार की सुरक्षा से पूरी तरह वंचित करने के लिए “निर्धारित अवधि” के लिये काम की व्यवस्था को कायम किया गया।

इज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस सूचकांक में बेहतरी लाने के लिए देश और विदेश के सबसे बड़े पूंजीपतियों ने मोदी सरकार की तारीफ़ की है। इसके अलावा पूंजीपति वर्ग इस बात से चिंतित है कि प्रस्तावित केंद्रीय श्रम संहिता को लागू करने की दिशा में सरकार कुछ खास हासिल नहीं कर पायी है।

देशभर के मज़दूरों की यूनियनों के संयुक्त विरोध की वजह से केंद्रीय श्रम संहिता को लागू करने में रुकावट आई है। यहां तक कि सत्ताधारी पार्टी भाजपा से संबंधित केंद्रीय ट्रेड यूनियन ने भी प्रस्तावित संहिता का विरोध किया है और उसे पूंजीपति-परस्त और मज़दूर-विरोधी बताया है।

इस संदर्भ में ऐसी ख़बर आई है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने श्रम मंत्रालय को आदेश दिया है कि वह उन प्रस्तावित श्रम संहिताओं को टाल दे जिन्हें पूंजीपति-परस्त माना जा रहा है और 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले “मज़दूर-परस्त” श्रम संहिताओं को पारित करने पर जोर दे।

पूंजीपतियों की मीडिया ने यह प्रचार करना शुरू कर दिया है कि हो सकता है कि यह सरकार औद्योगिक संबंधों से संबंधित संहिता को कुछ समय के लिए टाल दे और उसकी जगह पर कुछ अन्य संहिताओं पर अमल करे, क्योंकि वे तथाकथित तौर से “मज़दूर-परस्त” हैं।

पूंजीपतियों की मीडिया में चलाया जा रहा यह प्रचार सरासर झूठा है। प्रस्तावित की गयी कोई भी संहिता मज़दूरों के हित में नहीं है। सारी संहिताएं केवल पूंजीपति वर्ग को फायदा पहुंचाने के लिए ही बनायी गयी हैं।

औद्योगिक संबंध संहिता

पूंजीपति वर्ग के प्रवक्ता भी यह मानते हैं कि औद्योगिक संबंध पर संहिता पूरी तरह से मज़दूर-विरोधी है और 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इसे लागू किये जाने की कोई उम्मीद नहीं है।

2015 में औद्योगिक संबंध संहिता पर एक विधेयक पेश किया गया था। इस विधेयक में तीन प्रमुख कानूनों को एकत्रित करने का प्रयास किया गया है – 1926 का ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1946 का औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम और 1947 का औद्योगिक विवाद अधिनियम। ऐसा करते हुए सरकार ने इस संहिता के ज़रिये मज़दूरों द्वारा खुद की पसंद की यूनियन बनाने के अधिकार सहित “बाहरी” व्यक्ति के यूनियन में शामिल होने के मसले पर कई पाबंदियां लगाई हैं। इस संहिता के मुताबिक अधिकांश उद्योगों में अब सरकार की मंजूरी के बिना ही मज़दूरों की छंटनी की इजाज़त होगी और इसके लिये कंपनी को बिना अनुमति बंद करने के लिये आवश्यक मज़दूरों की संख्या को बढ़ाकर 100 से 300 कर दिया गया है।

अपने राज्यों में श्रम कानूनों को केंद्र द्वारा प्रस्तावित संहिता के अनुरूप बनाने के मकसद से राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और हरियाणा की राज्य सरकारों ने अपने राज्य के औद्योगिक कानूनों में बदलाव कर दिया है।

वेतन संहिता

वेतन संहिता पर विधेयक लोकसभा में अगस्त 2017 में पेश किया गया। इस एक संहिता में 1936 का वेतन भुगतान अधिनियम, 1948 का न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1965 का बोनस भुगतान अधिनियम और 1976 का सामान वेतन अधिनियम को एकत्रित किया गया है।

मज़दूर यूनियनें यह मांग कर रही हैं कि न्यूनतम वेतन को 2012 में हुए 44वें भारतीय श्रम सम्मेलन (आई.एल.सी.) द्वारा की गई सिफारिश की गणना-सूत्र के आधार पर भुगतान किया जाए, जिसे 2015 में आयोजित 46वें भारतीय श्रम सम्मेलन ने दोहराया था।

आई.एल.सी की गणना-सूत्र में न्यूनतम वेतन को एक औसत मज़दूर परिवार के लिए खाद्यान, कपड़ा, घर किराया, यातायात खर्च, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवनयापन के लिए ज़रूरी अन्य खर्चों को 2015 के मूल्य के आधार पर तय किया जाता है। इस सूत्र के आधार पर सातवें वेतन आयोग ने केंद्र सरकार के मज़दूरों के लिए 18,000 रुपये न्यूनतम वेतन की सिफारिश की है। ट्रेड यूनियनें राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन को इसी स्तर पर निर्धारित करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। लेकिन सरकार ऐसा करने से इंकार कर रही है।

वेतन संहिता पर लाये गए विधेयक में हर एक राज्य सरकार को अपनी मर्जी से न्यूनतन वेतन तय करने की आज़ादी दी गयी है, जिससे अब हर एक राज्य में  ज्यादा से ज्यादा पूंजी निवेश आकर्षित करने के लिए न्यूनतम वेतन को कम से कम रखने की ज़मीन तैयार की गयी है।

इस संहिता में एक काला प्रावधान यह भी है जिसके मुताबिक किसी भी मज़दूर के एक दिन काम पर न जाने पर सज़ा के रूप में उसका 8 दिन का वेतन काट लिया जायेगा।

सामाजिक सुरक्षा संहिता

तमाम मज़दूर संगठन यह मांग करते आये हैं कि हर एक मज़दूर के लिए अधिकार बतौर सामाजिक सुरक्षा की गारंटी मिलनी चाहिए। 2017 में सामाजिक सुरक्षा और कल्याण पर श्रम संहिता में लाये गए विधेयक में ऐसा दिखावा किया गया है कि इससे सभी मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा मिलेगी। लेकिन दरअसल इस विधेयक से मज़दूरों की असुरक्षा बढ़ेगी, क्योंकि जिन 15 कानूनों की जगह पर यह कानून लाया जा रहा है, उसके तहत मिलने वाली सहूलियतें इस नयी संहिता में बरकरार रखी जाएंगी या नहीं इसका कहीं भी कोई जिक्र नहीं किया गया है।

असलियत में अधिकांश मज़दूर इस संहिता से बाहर रखे जायेंगे। केवल वही मज़दूर इसके तहत योग्य माने जायेंगे जिनके पास स्थायी नौकरी है और सामाजिक सुरक्षा निधि में नियमित तौर से योगदान देते हैं। इसके तहत जिन महिलाओं के 2 या इससे अधिक बच्चे हैं उन्हें भी मातृत्व अवकाश सुविधा से वंचित कर दिया जायेगा।

कर्मचारी राज्य बीमा (स्वास्थ्य सेवा के लिए) और कर्मचारी भविष्य निधि (सेवा निवृत्ति के बाद लागू) ये दोनों मौजूदा योजनाएं केवल उन मज़दूरों के लिये लागू होती हैं जो किसी कारखाने या संस्था में काम करते हैं जहां न्यूनतम निर्धारित संख्या में मज़दूर काम करते हों। इसके अलावा यह योजना इन कारखानों और संस्थाओं के उन्हीं मज़दूरों के लिये लागू होती है, जिनके वेतन का स्तर सबसे कम होता है, ये योजनायें सभी मज़दूरों के लिये लागू नहीं होती है।

इस प्रस्तावित संहिता में कुछ ऐसे प्रावधान भी शामिल किये गए हैं जिनके मुताबिक मज़दूरों द्वारा लंबी अवधि तक काम करके जमा की गई उनकी खून-पसीने की कमाई को “बाज़ार-आधारित जोखिम” का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि मज़दूरों की जमा पूंजी को सार्वजनिक-निजी-साझेदारी (पी.पी.पी) के तहत निजी कंपनियों को मुनाफे़ बनाने के लिए दिया जायेगा।

सुरक्षा संहिता

हर रोज़ कारखानों में आग लगने और विस्फोट होने की ख़बरें आती रहती हैं, जिनमें सैकड़ों मज़दूरों को अपनी जानें गंवानी पड़ती हैं। इनमें से कई कारखाने पंजीकृत भी नहीं होते। इन कारखानों में काम करने वाले मज़दूरों को न तो कोई अधिकार दिए जाते हैं और न ही किसी तरह की सुरक्षा इंतजाम होते हैं। मज़दूर यूनियनें यह मांग करती आई हैं कि सभी कारखानों को पंजीकृत किया जाना चाहिए और उनको सुरक्षा इंतजाम करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।

मार्च 2018 को व्यवसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम के हालात पर संहिता से संबंधित विधेयक लाया गया। लेकिन इस प्रस्तावित संहिता के तहत सभी कारखानों का पंजीकरण करने की ओर कोई कदम नहीं लिया गया है, क्योंकि इससे “इज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” पर विपरीत असर होगा।

मोदी सरकार का सबसे पहला कदम, जिसकी पूंजीपति वर्ग ने तारीफ की थी वह श्रम सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों से संबंधित था। इन मानकों का अनिवार्य रूप से पालन किया जा रहा है इसकी जांच करने में सरकार ने पूंजीपतियों को ढील दी थी और इसके लिए “इंस्पेक्टर राज” ख़त्म करने का बहाना दिया गया।

यदि सभी प्रस्तावित केंद्रीय श्रम संहिताओं को एक साथ देखा जाये तो यह साफ हो जाता है कि इनको लागू करने से जिन कारखानों या संस्थानों में 40 से कम मज़दूर काम करते हैं, उन कारखानों या संस्थानों को किसी भी श्रम कानून या मानक को लागू करने से पूरी छूट दी गयी है। जो ठेकेदार 50 से कम मज़दूरों को काम पर रखते हैं उनको भी श्रम कानूनों से पूरी छूट दी गयी है।

निष्कर्ष

मज़दूरों के संगठनों, उनके संघर्षों और मज़दूरों के अधिकारों की जिस तरह से परिभाषा दी गयी है, पूंजीपति वर्ग उसे अधिकतम मुनाफ़े बनाने के रास्ते में एक रुकावट के रूप में देखता है। “इज़ ऑफ डूइंग बिजनेस” को बेहतर बनाने और हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों द्वारा अधिकतम मुनाफे़ बनाने को आसान करने के लिए वह मौजूदा ट्रेड यूनियनों को कमजोर बनाकर उनको नष्ट करना चाहते हैं। नयी कंपनियों के मज़दूरों को यूनियनों में संगठित करने को और ज्यादा मुश्किल बनाना चाहते हैं। कई दशकों से मज़दूरों द्वारा संघर्ष के ज़रिये जीते गए तमाम अधिकारों को वे छीनना चाहते हैं।

“इज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” को बेहतर बनाने के लिए भाजपा और कांग्रेस पार्टी दोनों ही शोषक पूंजीपतियों के इस अजेंडे को लागू करने के प्रति समर्पित हैं।

अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए मज़दूर वर्ग के पास केवल एक ही रास्ता है, हमारे अधिकारों पर पूंजीपति वर्ग के हमलों का मुहतोड़ जवाब देने के लिए हमें अपनी जंगी एकता को और मजबूत करना होगा। उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के कार्यक्रम के ख़िलाफ़ मज़दूरों और किसानों की एकता को मजबूत करना होगा। हमारा लक्ष्य है शोषक अल्पसंख्यक पूंजीपतियों के राज का तख़्तापलट करना, मेहनतकश जनसमुदाय का राज कायम करना और समाज का पूंजीवाद से समाजवाद में परिवर्तन करना, जिसमें अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की बजाय सभी लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में मोड़ा जायेगा।

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