मजदूरी संहिता विधेयक 2017

10 अगस्त, 2017 को मोदी सरकार ने लोक सभा में मजदूरी संहिता विधेयक 2017 पेश किया था। यह नया विधेयक वेतन भुगतान अधिनियम 1936, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1949, बोनस अधिनियम 1965, तथा समान वेतन अधिनियम 1976 की जगह लेगा। मजदूरी संहिता विधेयक तथाकथित श्रम कानून सुधारों का एक हिस्सा है, जिसे सरकार ने 38 श्रम अधिनियमों में “तर्कसंगतता” लाने के नाम पर बनाया है। यह विधेयक सभी कानूनों को चार व्यापक श्रमिक संहिताओं में विभाजित करने की ओर एक कदम है। इन्हें मजदूरी संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थितियों पर संहिता के रूप में तैयार किया जा रहा है।

10 अगस्त, 2017 को मोदी सरकार ने लोक सभा में मजदूरी संहिता विधेयक 2017 पेश किया था। यह नया विधेयक वेतन भुगतान अधिनियम 1936, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1949, बोनस अधिनियम 1965, तथा समान वेतन अधिनियम 1976 की जगह लेगा। मजदूरी संहिता विधेयक तथाकथित श्रम कानून सुधारों का एक हिस्सा है, जिसे सरकार ने 38 श्रम अधिनियमों में “तर्कसंगतता” लाने के नाम पर बनाया है। यह विधेयक सभी कानूनों को चार व्यापक श्रमिक संहिताओं में विभाजित करने की ओर एक कदम है। इन्हें मजदूरी संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थितियों पर संहिता के रूप में तैयार किया जा रहा है।

सरकार का दावा है कि मजदूरी संहिता विधेयक का मुख्य उद्देश्य देश में सभी वेतनभोगी-मजदूरों के लिए एक वैधानिक राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करना है। इसके मुताबिक, किसी भी राज्य सरकार को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी से कम न्यूनतम मजदूरी तय करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। विधेयक में प्रस्ताव है कि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी पूरे देश में संगठित और असंगठित, दोनों क्षेत्रों के सभी मजदूरों पर लागू होगी। अप्रैल 2017 तक, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु सहित कम-से-कम 11 राज्यों ने केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय स्तर के वेतन से भी नीचे न्यूनतम मजदूरी तय की थी। दरअसल प्रतिदिन 160 रूपये अर्थात् 4200 रूपये प्रति माह, के स्तर पर राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी पहले ही बहुत कम है।

संहिता का गहराई से अध्ययन करने से यह नजर आता है कि सरकार का दावा न केवल भ्रामक और दिशाभूल करने वाला है, बल्कि यह संहिता मजदूर-विरोधी उपायों से भरी हुई है। विधेयक की धारा 9(1) में कहा गया है कि ‘विभिन्न राज्यों या विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लिए अलग-अलग राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी तय की जा सकती है’। इस प्रकार, ‘राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी’ इन शब्दों का बार बार-बार इस्तेमाल करते हुए, दरअसल उसका असली अर्थ ‘राज्यस्तर न्यूनतम वेतन’ बना दिया गया है। इसके अलावा, केंद्र सरकार ने “राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी” की राशि क्या होगी, इस बारें में संहिता में कुछ भी नहीं कहा गया है। न्यूनतम मजदूरी कितनी होगी, यह तय करने का अधिकार पूरी तरह से केंद्र सरकार के हाथों में सौंप दिया गया है। सातवें वेतन आयोग में न्यूनतम मासिक वेतन 18,000 रुपये रखने की सिफारिश की गयी थी। सरकार ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए इसे स्वीकार कर लिया था, लेकिन संहिता में इसका प्रावधान नहीं किया गया है। वास्तव में, सरकार ने इस बात से तुरंत इंकार किया कि 18,000 न्यूनतम मासिक वेतन निर्धारित करने का उसका कोई इरादा है।

कई वर्षों से देश भर की तमाम ट्रेड यूनियन सभी मजदूरों के लिए 18,000 रुपये प्रति माह न्यूनतम वेतन की मांग करती आई है। इसके अलावा, न्यूनतम मजदूरी के संशोधन के लिए, सरकार ने 5 साल की मानक अवधि का समय निर्धारित किया है, जबकि वर्तमान कानूनों में मजदूरी के संशोधन के लिए 5 साल अधिकतम अवधि हैं। इसका मतलब होगा कि वास्तविक न्यूनतम मजदूरी साल दर साल गिरती रहेगी, और यदि मुद्रास्फीति के लिए कभी इसको समायोजित किया जायेगा तो वह केवल पांच साल बाद ही होगा।

यह स्वाभाविक है कि देशभर में ट्रेड यूनियन इस विधेयक का जोरदार विरोध कर रहे हैं। इससे यह भी साफ होता है कि मौजूदा चार विधेयकों में मजदूरों के हित में जो कुछ तत्त्व थे, जिनकी जगह यह विधेयक लेगा, उनको भी इस विधेयक में खत्म किया जा रहा है। ट्रेड यूनियन इस बात से चिंतित है कि इस संहिता से रोजगार की अनुसूची को हटा दिया गया है, जिसमें श्रम कानूनों के तहत् आने वाले और उनसे संचालित उद्योगों के नाम दिए गए है। एक मजदूर यूनियन ने बताया कि “अब उद्योग-विशिष्ट मजदूरी तय करने की जगह किसी भी काम के लिए समय और पीस-वर्क के आधार पर मानकीकृत न्यूनतम मजदूरी तय की जाएगी। इसका नतीजा यह होगा कि सबसे कम वेतन वाले मजदूरों को दी जा रही मजदूरी के हिसाब से न्यूनतम मजदूरी की सीमा तय होगी”। एक अन्य मजदूर यूनियन ने पूछा, “क्या इसका मतलब है कि राज्य या केंद्र सरकार द्वारा तय की गयी न्यूनतम मजदूरी, सभी उद्योगों के लिए एक समान होगी?” इसका कोई जवाब नहीं दिया गया है। इसकी बजाए, इस विधेयक से कंपनी मालिकों के लिए उन अधिसूचित उद्योगों में मजदूरी को कम करने की पूरी छूट मिल जाएगी, जहां मजदूरी का स्तर दूसरों की तुलना में अधिक है। यह सारा बदलाव बड़े ही फरेबी तरीके से “व्यवसाय को आसान बनाने” के नाम पर किया जा रहा है।

गौरतलब है कि यह संहिता ट्रेड यूनियनों को पूरी तरह से कमजोर बनाने की एक कोशिश है। यह संहिता ट्रेड यूनियनों द्वारा कानूनी तौर पर प्रतिष्ठानों के खातों के लेखा-जोखा तक पहुंच के अधिकार को पूरी तरह से ख़त्म करती है। संहिता की धारा 31(2) में कहा गया है कि ‘सामान्य रूप से कंपनियों की लेखा परीक्षित लेखा पर सवाल नहीं उठाये जा सकते है’। मौजूदा बोनस अधिनियम 1965 के मुताबिक, मजदूरों और उनकी यूनियनों को यह अधिकार है कि वे कंपनी की बैलेंस शीट की सटीकता पर सवाल पूछ सकते हैं या सफाई की मांग कर सकते हैं, ताकि वे एक न्यूनतम स्तर से ऊपर बोनस की मांग के लिए चर्चा के दौरान उपलब्ध ‘बकाया अधिशेष’ की मात्रा को खुद जांच सके। प्रस्तावित विधेयक में इस प्रावधान को हटा दिया गया है।

प्रस्तावित संहिता में काम के अधिकतम घंटों को तय नहीं किया गया है। इस संहिता के अनुसार, केंद्र या राज्य सरकारें एक दिन में काम के घंटे कितने होंगे इसका फैसला करेगी।

यह संहिता मजदूरों द्वारा हड़ताल पर जाने के अधिकारों पर भी हमला करती है, और मानती है कि जो मजदूर हड़ताल में शामिल होंगे, उनको काम से अनुपस्थित माना जायेगा।

इस संहिता में ‘नकद-हीन अर्थव्यवस्था’ को बढ़ावा दिया गया है, और सभी भुगतानों के लिए चेक या डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मजदूरी के भुगतान का प्रावधान दिया गया है। नोटबंदी के बाद से मोदी सरकार का ‘नकद-हीन अर्थव्यवस्था’ का एजेंडा रहा है।

इस संहिता में समान वेतन अधिनियम के प्रावधानों को काफी कमजोर किया गया है। समान वेतन अधिनियम उन चार अधिनियमों में से एक है, जिनकी जगह यह नयी संहिता लायी जा रही है। मौजूदा समान वेतन अधिनियम में न केवल मजदूरी के भुगतान के संबंध में लिंग भेदभाव को प्रतिबंधित किया गया था, बल्कि भर्ती, पदोन्नति, व्यावसायिक प्रशिक्षण, स्थानांतरण आदि जैसी सेवा की शर्तों पर भी लागू होता था। प्रस्तावित संहिता में यह प्रतिबंध अब केवल समान वेतन के संदर्भ में ही लागू होगा और भर्ती, पदोन्नति, व्यावसायिक प्रशिक्षण, स्थानांतरण आदि जैसी सेवा की शर्तें पर लागू नहीं होगा।

इस संहिता में मजदूरी से संबंधित सभी विवादों को अदालतों के दायरे से बाहर रखने का प्रयास किया गया है। संहिता की धारा 52 में यह कहा गया है कि “कोई भी न्यायालय इस संहिता के तहत, किसी भी दंडनीय अपराध का संज्ञान नहीं लेगा, और केवल सरकार या उसके द्वारा अधिकृत किसी अधिकारी या किसी कर्मचारी या यूनियन अधिनियम 1926 के तहत, पंजीकृत ट्रेड यूनियन, या कोई सहजकर्ता द्वारा दायर शिकायत का ही संज्ञान ले सकता है।”

इस संहिता को मोदी सरकार “श्रम सुधारों” की दिशा में एक कदम के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जिसकी मांग पूंजीपति लगातार करते आये हैं। हालांकि, पूंजीपति प्रस्तावित संहिता से निराश हैं क्योंकि इस संहिता में अभी भी न्यूनतम मजदूरी को सरकार द्वारा निर्धारित करने का प्रावधान है।

वे चाहते हैं कि सरकार के किसी भी हस्तक्षेप के बिना, मजदूरी को ‘मजदूरों की मांग और आपूर्ति के अर्थशास्त्र’ से तय किया जाना चाहिए। किसी भी हालत में, वे नहीं चाहते हैं कि न्यूनतम मजदूरी 18,000 रुपये प्रति माह के स्तर तक बढ़ाई जाए। परिधान निर्यात संवर्धन परिषद (ए.ई.पी.सी.) के अध्यक्ष ने घोषणा की है कि यदि उनके क्षेत्र के लिए न्यूनतम मजदूरी 18,000 रुपये प्रति माह तक बढ़ा दी गयी तो इस क्षेत्र पर बहुत बुरा असर होगा। इस क्षेत्र में मजदूरी प्रति माह केवल 9,000 ही दी जाती है।

पूंजीपतियों ने धमकी दी है कि यदि इस संहिता को विधेयक के रूप में पारित किया गया है, तो विशेष रूप से प्रवेश स्तर पर नई नौकरियों के निर्माण में बाधा आएगी, और न्यूनतम वेतन के कारण कंपनियों की बढ़ती लागत के कारण कम वेतन वाले अनौपचारिक रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। उनके अनुसार, “भारत को अधिक औपचारिक नौकरियों की जरूरत है, रोजगार सुरक्षा की नहीं।“ इसलिए, पूंजीपति ऐसा कानून चाहते हैं, जहां मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई भी प्रावधान न हो।

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