नए आपराधिक क़ानून :
क़ानून व्यवस्था के दमनकारी और नाइंसाफ़ चरित्र में कोई बदलाव नहीं

20 दिसंबर, 2023 को संसद ने देश में आपराधिक क़ानूनों से संबंधित तीन विधेयक पारित किए। भारतीय न्याय संहिता ने 1860 के भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) का स्थान ले लिया है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने 1898 के आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सी.आर.पी.सी.) का स्थान ले लिया है। भारतीय साक्ष्य संहिता ने 1872 के भारतीय साक्ष्य अधिनियम का स्थान ले लिया है।

केंद्र सरकार के प्रवक्ताओं का दावा है कि नए क़ानून, लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिये और न्याय सुनिश्चित करने के लिए बनाये गए हैं, जबकि पुराने क़ानून लोगों को सज़ा देने के उद्देश्य से बनाये गए थे। उनका दावा है कि तीन नये क़ानूनों ने पुराने क़ानूनों में निहित गुलामी के चिन्हों को मिटा दिया है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पुराने क़ानून, देश पर अन्यायी और अत्याचारी ब्रिटिश शासन की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाए गए थे। ब्रिटिश शासकों ने उन क़ानूनों के ज़रिये उपनिवेशवादी दासता और लूट का विरोध करने वाले हिन्दोस्तानियों को सज़ा देने के उद्देश्य को पूरा किया था। यह भी सच है कि आज़ाद हिन्दोस्तान में, शोषक अल्पसंख्यक ही एजेंडा तय करते हैं और जो उस एजेंडे का विरोध करते हैं उन्हें सुरक्षा बलों की लाठियों और गोलियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अपराधी कहकर जेल में डाल दिया जाता है। आज की तारीख़ में, हिन्दोस्तानी जेलों में लगभग पांच लाख कैदी बंद हैं, जिनमें से 70 प्रतिशत ऐसे लोग हैं, जिन पर अभी मुकद्दमा चलाया जाना बाक़ी है और उन्हें किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराया जाना भी बाक़ी है।

1947 में जब हिन्दोस्तान आज़ाद हुआ था, तब पुराने उपनिवेशवादी क़ानूनों को निरस्त क्यों नहीं किया गया था? इसका कारण हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग के चरित्र में निहित है, जिसने ब्रिटिश पूंजीपति वर्ग के स्थान पर देश की राजनीतिक सत्ता संभाली थी। हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग ने उपनिवेशवादी क़ानूनों को बनाए रखने का रास्ता चुना, क्योंकि उनका उद्देश्य ब्रिटिश पूंजीपति वर्ग द्वारा सौंपी गई शोषण और लूट की व्यवस्था को बनाए रखना और उससे अपना फ़ायदा उठाना था।

पुराने उपनिवेशवादी क़ानूनों की जगह पर तीन नए क़ानून लागू हो जाने से क़ानूनी व्यवस्था की मौलिक प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आया है। ज़्यादातर बदलाव केवल पहले के क़ानूनों में विषयों की पुनः क्रमबद्धता मात्र हैं तथा कुछ विषयों का विलय कर दिया गया है।

भारतीय न्याय संहिता (बी.एन.एस.), जो आई.पी.सी. की जगह लेती है, ऐसा लगता है कि उसमें “राजद्रोह” से संबंधित एक महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। जो कोई भी सरकार का विरोध करेगा उसे पुराने क़ानून के तहत इस अपराध के लिये आरोपी बनाया जा सकता है। जबकि राजद्रोह शब्द को अब हटा दिया गया है, लेकिन बी.एन.एस. की धारा 150 के ज़रिये, बिलकुल वही उद्देश्य पूरा किया जा रहा है, इसमें कहा गया है कि:

“जो कोई, प्रयोजनपूर्वक या जानबूझकर, बोले गए या लिखे गए शब्दों से, या संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपण द्वारा, या इलेक्ट्रॉनिक संचार द्वारा या वित्तीय साधनों के उपयोग से, या अन्यथा, अलगाव या सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसक गतिविधियों को उत्तेजित करता है या उत्तेजित करने का प्रयास करता है, या अलगाववादी गतिविधियों की भावनाओं को प्रोत्साहित करता है या भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को ख़तरे में डालता है; या ऐसी किसी भी गतिविधि में शामिल होता है या करता है तो उसे आजीवन कारावास या कारावास से दंडित किया जाएगा जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।“

इन शब्दों का अर्थ यह है कि सत्ता में बैठे लोगों के पास उन लोगों को गिरफ़्तार करने की बहुत व्यापक गुंजाइश है जो उनकी पसंद के विपरीत विचार व्यक्त करते हैं। यह हमारे ज़मीर के अधिकार का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन है।

बी.एन.एस. की धारा 113 आतंकवादी हरकत की इतनी व्यापक परिभाषा देती है कि सरकार के लिए पूंजीवादी व्यवस्था और उसकी सरकार का विरोध करने का साहस करने वाले किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ केस तैयार करना संभव है। क़ानून लागू करने वाली एजेंसियां यू.ए.पी.ए. जैसे विशेष क़ानूनों का उपयोग किए बिना, इस धारा के तहत किसी के ख़िलाफ़ आतंकवाद का मामला तैयार कर सकती हैं।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बी.एन.एस.एस.), जिसने सी.आर.पी.सी.) की जगह ली है, में 531 धाराएं हैं। इनमें से 350 से अधिक अनुभाग पुराने कोड के समान ही हैं। अन्य धाराओं में जो बदलाव किए गए हैं, उनमें से कई बदलाव पुलिस की शक्तियों को मजबूत करने के लिए हैं, न कि लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए।

कार्यपालिका और न्यायपालिका को लोगों की भीड़ को नियंत्रित करने और तितर-बितर करने और निवारक-हिरासत (प्रेवेंटिव डिटेंशन) के लिए अधिक अधिकार दिए गए हैं। यू.ए.पी.ए. जैसे कठोर क़ानूनों के समान प्रावधान बी.एन.एस.एस. में शामिल किए गए हैं। इस क़ानून के तहत, किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति में भी उस पर मुकदमा चलाने और सज़ा सुनाने का प्रावधान शामिल है। न्यायाधीशों को अब अधिकार है कि वे किसी भी व्यक्ति को, जिसको पहले कभी गिरफ़्तार नहीं किया गया है, लिखित में कारण दर्ज़ करने के बाद उसकी उंगलियों के निशान, आवाज़ का नमूना या लिखावट के नमूने जैसे सेंपल देने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

भारतीय साक्ष्य (एविडेंस) विधेयक (बी.एस.बी.) पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के कुछ प्रावधानों को पुनः क्रमबद्ध करने से ज्यादा कुछ नहीं करता है। एकमात्र महत्वपूर्ण परिवर्तन ईमेल संदेशों जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (एविडेंस) के उपयोग से संबंधित है। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (एविडेंस) को शामिल करने से सत्ता में बैठे लोगों को अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ झूठे आरोप लगाने की अधिक गुंजाइश मिलती है, जैसा कि छेड़छाड़ किए गए ईमेल और डीप फेक वीडियो के कई मामलों में देखा गया है।

भाजपा और केंद्र सरकार के प्रवक्ता इन तीन आपराधिक क़ानूनों के अधिनियमन को ब्रिटिश उपनिवेशवाद की विरासत से नाता तोड़ने और हिन्दोस्तानी राजनीतिक सिद्धांत के पुनर्जागरण के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, हिंदी नामों के अलावा, इन क़ानूनों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो हिन्दोस्तानी विचार को दर्शाता हो। सच तो यह है कि ये क़ानून राज्य को पूरी छूट देते हैं कि सत्ता बैठे लोगों को नामंजूर किसी भी विचार को प्रकट करने वाले सभी लोगों को गिरफ़्तार किया जा सके। इससे स्पष्ट हो जाता है कि ये क़ानून उस हिन्दोस्तानी परंपरा का संपूर्ण हनन हैं, जिसके अनुसार ज़मीर का अधिकार सभी स्त्रियों और पुरुषों का अलंघनीय अधिकार माना जाता है।

उपनिवेशवादी क़ानूनों की तरह, ये नए क़ानून भी इस धारणा पर आधारित हैं कि सिर्फ संपत्तिवान अल्पसंख्यक तबके के ही सब अधिकार हैं, जबकि मेहनतकशों को सिर्फ अपना कर्तव्य पूरा करना होता है। इस पूर्वधारणा में कोई बदलाव नहीं है कि राज्य को किसी भी व्यक्ति को अपराध करने की योजना बनाने के शक मात्र के आधार पर गिरफ़्तार करने का पूरा अधिकार है। उसके बाद अपनी बेगुनाही को साबित करने का बोझ आरोपी पर है।

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