छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य के निवासियों का कॉर्पोरेटों द्वारा उनकी भूमि हड़पने का विरोध

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर, सरगुजा और कोरबा जिलों में रहने वाले आदिवासी एक बार फिर कोयला खनन के लिए पूंजीवादी-कोर्पोरेट्स द्वारा अपने जंगलों पर क़ब्ज़ा करने के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं। दिसंबर 2023 की शुरुआत में, भारी पुलिस सुरक्षा के साथ छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में पेड़ों की कटाई फिर से शुरू हुई। यह प्रक्रिया राज्य विधानसभा के जुलाई 2022 में सर्वसम्मति से एक निजी सदस्य के उस प्रस्ताव के पारित होने के केवल 18 महीने बाद, जिसमें केंद्र सरकार से इन्हीं जंगलों में सभी खनन परियोजनाओं को रद्द करने के लिए कहा गया था।

Chhattisgarh_hasdeo_aranya_struggleखनन (माइनिंग) रोकने के लिए, कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश कर रही हैं। तत्कालीन कांग्रेस सरकार के तहत, 2022 में, 41 हेक्टेयर ज़मीन पर लगे और पेड़ काटे गए और विधानसभा चुनाव के बीच, नवंबर 2023 में इसके अलावा, 93 हेक्टेयर अधिक ज़मीन पर लगे पेड़ काटने के लिए मंजूरी दी गई। 13 दिसंबर को ऐसे राज्य, जहां हिन्दोस्तान की 7.5 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति (एस.टी.) आबादी रहती है, उस राज्य के पहले आदिवासी मुख्यमंत्री ने कोयला खनन और पेड़ों की कटाई की अनुमति देने के फ़ैसले के लिए पिछली कांग्रेस पार्टी सरकार को दोषी ठहराया और घोषणा की कि उसी निर्णय के तहत, अभी भी काम जारी है।

इन जंगलों में, कोयला खनन की अनुमति देने में राज्य की अन्य संस्थाओं ने भी अपनी भूमिका निभाई है। 2010 में केंद्र सरकार ने हसदेव अरण्य को खनन के लिए “नो-गो” क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया था और इनमें से किसी भी ब्लॉक में खनन (माइनिंग) की अनुमति देने से इंकार कर दिया था। हालांकि, इस निर्णय के ठीक एक साल बाद, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस क्षेत्र में एक कोयला ब्लॉक के खनन के लिए मंजूरी दे दी। इसी तरह, जुलाई 2022 में जब छत्तीसगढ़ विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें मांग की गई कि केंद्र सरकार इन जंगलों में सभी खनन परियोजनाओं को रद्द कर दे, उसी समय, सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2022 में घोषणा की कि – ‘हम विकास के रास्ते में रोड़ा नहीं बनना चाहते हैं और हमारा मत इस मुद्दे पर बहुत स्पष्ट है।’ सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकार हसदेव अरण्य वन के परसा क्षेत्र में, कोयला खनन पर रोक लगाने के प्रस्ताव को ख़ारिज़ कर दिया और इस फ़ैसले ने खनन-ब्लॉक के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की याचिका को रद्द कर दिया।

राज्य में इन जंगलों में रहने वाले लोग, कोयला खनन के ख़िलाफ़, अपना सख़्त विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, क्योंकि इससे इस क्षेत्र की नदियों, जंगल और किसानों के उपजाऊ चावल के खेतों में, भारी पर्यावरणीय नुक़सान हो रहा है। इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों का कोयला खनन के प्रति तीव्र विरोध ही था जिसने छत्तीसगढ़ विधानसभा को, सभी खनन परियोजनाओं को रद्द करने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से, पारित करने के लिए मजबूर किया था।

संघर्ष एक बार फिर तेज़ होता जा रहा है, इन जंगलों में रहने वाले लोग, पुलिस और राज्य सरकार के ख़िलाफ़ अपना संघर्ष तेज़ कर रहे हैं। बड़े पैमाने पर वनों की कटाई को फिर से शुरू करने में बाधा डालने पर, पुलिस ने यहां के ग्रामीणों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है। अधिकारी इस संघर्ष को कुचलने के लिए, पेड़ काटने का विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति का अपहरण और मनमाने ढंग से गिरफ़्तारी जैसे सभी प्रकार के तरीक़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

पिछले दो दशकों की इन घटनाओं से साफ़ पता चलता है कि वनवासी, किसान और मज़दूर अपने हितों की सुरक्षा के लिए सरकार और अदालतों पर निर्भर नहीं रह सकते। राज्य और उसकी सभी एजेंसियां – केंद्र और राज्यों की सरकारें, पुलिस और अदालतें -पूंजीवादी घरानों के हितों और उनके ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़े बनाने के लालच की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह हक़ीक़त है और इसमें कोई बदलाव नहीं होता, चाहे कोई भी राजनीतिक दल सरकार बनाए।

मज़दूरों, किसानों, आदिवासियों और सभी उत्पीड़ित लोगों को पूंजीपति वर्ग के शासन के स्थान पर अपना शासन स्थापित करने के लिए संगठित होना होगा। ऐसा करके ही वे यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि विकास बहुसंख्यक – मेहनतकश लोगों – के हितों को पूरा करने के लिए किया जाये और साथ ही साथ, प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाए।

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