बाबरी मस्जिद के विध्वंस के 31 साल बाद :
हुक्मरान वर्ग की सांप्रदायिक राजनीति के ख़िलाफ़ एकजुट हों!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 2 दिसंबर, 2023

6 दिसंबर, 1992 को 16वीं सदी के एक ऐतिहासिक स्मारक, बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था। बाबरी मस्जिद का विध्वंस, उसकी जगह पर राम मंदिर बनाने के लिए चलाये गए अभियान का हिस्सा था, जो इस धार्मिक आस्था पर आधारित था कि वह श्री राम का जन्म स्थान था। उसके पहले और बाद में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई थी, जिसमें हजारों लोग मारे गए थे।

31 साल पहले एक ऐतिहासिक स्मारक को लोगों की नज़रों के सामने दिन-दहाड़े नष्ट कर दिया गया था। उस अपराध के किसी भी प्रमुख आयोजक को आज तक सज़ा नहीं दी गयी है। सरकार द्वारा गठित कई जांच आयोगों ने उस अपराध के असली चरित्र और इरादों पर पर्दा डालने का काम किया है।

आज तक सरकारी विवरणों में बाबरी मस्जिद के विध्वंस को कुछ कार सेवकों के समूह द्वारा एक स्वतः स्फूर्त हरकत बताया जाता है। सच तो यह है कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस तथा उससे पहले व बाद में हुयी सांप्रदायिक हिंसा, ये हुक्मरान वर्ग के उच्चतम स्तरों पर रची गई साज़िश का हिस्सा थीं।

जबकि कांग्रेस पार्टी भाजपा पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाती है और भाजपा कांग्रेस पर फरेबी धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगाती है, तो इस हक़ीक़त से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ये दोनों पार्टियां बाबरी मस्जिद के विनाश और उसके पहले व बाद में हुई सांप्रदायिक हिंसा के लिए ज़िम्मेदार थीं।

राजीव गांधी की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया था और 1989 में राम मंदिर के शिलान्यास समारोह की देखरेख की थी। उसके अगले वर्ष, भाजपा ने सोमनाथ मंदिर से अयोध्या तक रथ यात्रा शुरू की थी। भड़काऊ भाषणों और खास समुदाय को निशाना बनाकर फैलाई गयी सांप्रदायिक हिंसा के ज़रिये, पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का माहौल फैला दिया गया था।

अधिकतम हिन्दोस्तानी लोग किसी भी इबादत स्थल के नष्ट किये जाने के पक्ष में नहीं हैं, चाहे सैकड़ों साल पहले कुछ भी हुआ हो। लोगों की इस भावना को देखते हुए, संसद ने 1991 में एक क़ानून बनाया था जिसे इबादत स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम का नाम दिया गया था। इस क़ानून में यह निर्धारित किया गया कि हरेक इबादत स्थल की स्थिति वैसी ही बरकरार रखी जानी चाहिए जैसी 15 अगस्त, 1947 को हिन्दोस्तान को आज़ादी मिलने के समय थी। लेकिन, इस क़ानून ने बाबरी मस्जिद को एक अपवाद बना दिया, जिससे बाबरी मस्जिद का विध्वंस करने और उसी स्थान पर एक मंदिर बनाने के लिए सांप्रदायिक अभियान को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ़ हो गया।

दिसंबर 1992 में कांग्रेस पार्टी केंद्र सरकार का नेतृत्व कर रही थी, जबकि भाजपा उत्तर प्रदेश सरकार का नेतृत्व कर रही थी। उनके आदेश पर सुरक्षा बलों ने बाबरी मस्जिद के विनाश को रोकने के लिए कुछ नहीं किया। जब उसे ध्वस्त किया गया तो सुरक्षा बल मूकदर्शक बन कर खड़े रहे। श्रीकृष्ण आयोग ने कांग्रेस पार्टी, भाजपा और शिवसेना, सभी को दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 के दौरान हुयी सांप्रदायिक हिंसा को आयोजित करने के लिए दोषी ठहराया था।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस में कांग्रेस पार्टी और भाजपा की मिलीभगत से पता चलता है कि वह हुक्मरान वर्ग की सेवा में था। उसका मक़सद राजनीतिक था, धार्मिक नहीं। उसने लोगों को बांटने और अपने सांझे दुश्मन, हुक्मरान पूंजीपति वर्ग से लोगों का ध्यान हटाने का काम किया। उसने जनता का ध्यान भटकाने का काम किया, जबकि हुक्मरान वर्ग ने उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये वैश्वीकरण के जन-विरोधी कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।

विध्वंस के दस दिन बाद लिब्रहान आयोग का गठन किया गया था, जिसका काम था गुनहगारों की पहचान करना और तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपना। 48 बार आयोग के कार्यकाल का विस्तार करने के बाद, अंततः 17 साल बाद, 30 जून, 2009 को उसने अपनी रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में 68 लोगों को विध्वंस की योजना बनाने और उसे अंजाम देने का दोषी ठहराया गया, जिनमें भाजपा के कई नेता भी शामिल थे। लेकिन, 30 सितंबर, 2020 को एक विशेष सीबीआई अदालत ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए, उन सभी को बरी कर दिया था।

जबकि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के किसी भी दोषी को सज़ा नहीं दी गई, तो सुप्रीम कोर्ट ने जिस ज़मीन पर बाबरी मस्जिद खड़ी थी, उस ज़मीन की मालिकी के विवाद से जुड़े एक मामले की सुनवाई की। नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने उस ज़मीन को राम मंदिर बनाने के लिए सौंपने का फैसला सुनाया। अदालत ने यह स्वीकार किया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मस्जिद बनाने के लिए किसी मंदिर को ध्वस्त किया गया था, लेकिन इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने लोगों की आस्था का आदर करने के नाम पर अपने फै़सले को सही ठहराने की कोशिश की।

गौरतलब है कि हाल के वर्षों में न्यायपालिका के समर्थन से इबादत स्थलों से संबंधित कई पुराने और नए विवाद भड़काए गए हैं। इस दावे पर अदालतों में सुनवाई हो रही है कि वाराणसी में प्राचीन ज्ञानवापी मस्जिद एक मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। अदालतें उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही हैं जिनमें दावा किया गया है कि मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद उसी स्थान पर बनी है जहां कृष्ण का जन्म हुआ था। मध्य प्रदेश, कर्नाटक और देश के कुछ अन्य राज्यों में मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाने के दावे अदालतों में सुने जा रहे हैं। ऐसे दावों के पक्ष में सबूत इकट्ठा करने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया) को लगाया गया है।

किसी मंदिर का तथाकथित विनाश करके बनाई गई किसी मस्जिद के विध्वंस के आह्वान का समर्थन करके, हिन्दोस्तान के लोगों को कुछ नहीं मिलने वाला है, बल्कि खोने के लिए बहुत कुछ है। बदले की भावना के साथ की गयी ऐसी हरकतें सिर्फ अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं के लोगों के बीच नफ़रत और दुश्मनी फैलाने का काम करती हैं। वे पूंजीपति वर्ग के शोषणकारी और दमनकारी शासन के ख़िलाफ़ मज़दूरों और किसानों की एकता को तोड़ने का काम करती हैं।

हमारे देश में मुख्य संघर्ष, एक तरफ इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग और दूसरी तरफ शोषित और उत्पीड़ित जनसमुदाय के बीच है। धर्म के आधार पर लोगों को बांटना और उस बंटवारे को बढ़ाना पूंजीपति वर्ग की हुकूमत के तरीके़ का हिस्सा है।

सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा को ख़त्म करने के लिए पूंजीपति वर्ग को सत्ता से बेदखल करना ज़रूरी है। सभी प्रगतिशील ताक़तों के सामने तात्कालिक कार्य सत्तारूढ़ पूंजीपति वर्ग, उसकी भरोसेमंद पार्टियों और उनकी बंटवारे की राजनीति के ख़िलाफ़ लोगों की राजनीतिक एकता को बनाना और मजबूत करना है।

सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के ख़िलाफ़ संघर्ष को मौजूदा पूंजीवादी हुकूमत की जगह पर मज़दूरों और किसानों की हुकूमत वाला एक नया राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से आगे बढ़ाना होगा। हमें एक ऐसे राज्य की ज़रूरत है जो बिना किसी अपवाद के सभी लोगों के जीवन और अधिकारों की रक्षा करेगा और किसी भी मानव अधिकार का उल्लंघन करने वालों को कड़ी सज़ा देगा।

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