बिजली-आपूर्ति का संकट और उसका असली कारण

हिन्दोस्तान में बिजली को लेकर वर्ग संघर्ष पर लेखों की श्रृंखला में यह दूसरा लेख है

देश के बहुत से स्थानों में बिजली की कमी की गंभीर समस्या है क्योंकि थर्मल पॉवर प्लांटों (ताप बिजलीघरों) के पास आवश्यक बिजली-उत्पादन के लिए पर्याप्त कोयला नहीं है। इजारेदार-नियंत्रित मीडिया इस बात को लेकर भ्रम पैदा कर रही है कि बिजली की कमी के लिए कौन और क्या ज़िम्मेदार है। सार्वजनिक क्षेत्र की कोल इंडिया लिमिटेड (सी.आई.एल.), को पर्याप्त कोयले का उत्पादन न करने के लिए दोषी ठहराया जा रहा है और भारतीय रेल को कोयले को थर्मल पावर प्लांटों तक तुरंत न पंहुचाने के लिए, दोषी ठहराया जा रहा है। बिजली मंत्री ने संकट के लिए यूक्रेन में चल रहे युद्ध को ज़िम्मेदार ठहराया है, लेकिन संकट तो युद्ध के पहले, अक्तूबर 2021 से ही मौजूद था।

बिजली उत्पादन और कोयला उत्पादन का निजीकरण ही इस संकट की जड़ है।

बिजली उत्पादन का निजीकरण

बिजली उत्पादन के निजीकरण के कार्यक्रम को लागू करने का नतीजा है कि मार्च 2022 तक हिन्दोस्तान में बिजली की स्थापित उत्पादन क्षमता का 49 प्रतिशत अब निजी क्षेत्र में है।

निजी इजारेदारों के स्वामित्व वाले कई थर्मल पॉवर प्लांट आयात किये गए कोयले से चलते हैं। पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कोयले की क़ीमतों में तेज़ी आई है।

अधिक से अधिक मुनाफ़ा बनाने की लालच के कारण, ऐसे थर्मल पॉवर प्लांटों के मालिक इजारेदार पूंजीपतियों ने कोयला आयात करके बिजली पैदा करने और सरकार के स्वामित्व वाली बिजली-वितरण कंपनियों के साथ पहले से किये गए करार के अनुसार तय की गयी दरों पर बिजली आपूर्ति करने से इनकार कर दिया। इस तरह उन्होंने जानबूझकर बिजली की कमी की हालतें पैदा की। बिजली उत्पादन में भारी कमी पैदा करने की अपनी इस भूमिका को सही ठहराने के लिए, इन इजारेदार पूंजीपतियों ने मीडिया के माध्यम से लगातार यह प्रचार अभियान चलाया है कि वे घाटे में चल रहे हैं और राज्य बिजली बोर्डों द्वारा उन्हें भुगतान की जाने वाली क़ीमतों में सरकार को वृद्धि करनी चाहिए।

6 मई को सरकार ने बिजली अधिनियम की धारा 11 को लागू किया, जिसके तहत उसने आयातित कोयले से चलने वाले सभी थर्मल पॉवर प्लांटों को बिजली पैदा करने के लिए कहा। साथ ही, सरकारी आदेश ने इन इजारेदार पूंजीपतियों की उस मांग को भी मंजूरी दी कि राज्य उन्हें बिजली पैदा करने के लिए गारंटी किया गया मुनाफ़ा सुनिश्चित करेगा। इसीलिये सरकार ने घोषणा की कि आयात किये जाने वाले कोयले पर चलने वाले थर्मल पॉवर प्लांटों द्वारा उत्पादित बिजली के लिए नयी दरें एक समिति द्वारा तय की जाएंगी जिसमें बिजली मंत्रालय, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण और केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग शामिल होंगे।

हिन्दोस्तान में आयात किये जाने वाले कोयले पर चलने वाले थर्मल पॉवर प्लांटों की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 17,600 मेगावाट है। हालांकि इस समय केवल 10,000 मेगावाट बिजली का ही उत्पादन किया जा रहा है। पूंजीपति मालिकों का दावा है कि आयात किये जाने वाले कोयले की क़ीमत इतनी बढ़ गई है कि अगर उन्हें वितरण कंपनियों को पहले से तय की गयी दरों पर बिजली की आपूर्ति करनी पड़ी तो वे मुनाफ़ा नहीं कमा पायेंगे। सरकार द्वारा दरों में वृद्धि की उनकी मांगों को पूरा करने के बाद, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में एस्सार पावर, कोस्टल एनर्जी, सी.एल.पी. इंडिया और आई.एल. एंड एफ.एस. के थर्मल पॉवर प्लांटों में बिजली उत्पादन में वृद्धि की उम्मीद की जा रही है।

इस बीच आयातित कोयले से थर्मल पॉवर प्लांटों को चलाने वाली दो बड़ी कंपनियों – टाटा पावर और अदानी पावर से भी अपेक्षा की जा रही है कि वे बिजली उत्पादन शुरू कर देंगी। गौरतलब, इन कंपनियों ने दो साल पहले अपने प्लांट इसीलिये बंद कर दिये थे, क्योंकि वे पहले से तय की गयी शर्तों पर राज्य-वितरण कंपनियों को बिजली की आपूर्ति करने के लिए राज़ी नहीं थीं।

ये सभी प्लांट, सरकार द्वारा तय की गई नई दरों पर ही बिजली-ख़रीद समझौता करने वालों को बिजली की सप्लाई करेंगे।

इस तरह, बिजली क्षेत्र में इजारेदार पूंजीपति उपभोक्ताओं का भारी नुक्सान करके अपने लिए मोटा मुनाफ़ा सुनिश्चित कर रहे हैं।

कोयला खनन का निजीकरण

अप्रैल 2022 में, राज्य के स्वामित्व वाली कोल इंडिया लिमिटेड ने कोयले के अपने उत्पादन लक्ष्य को 100 प्रतिशत पूरा किया। जबकि इजारेदार पूंजीवादी समूहों – अदानी, जिंदल और बिड़ला के स्वामित्व वाली निजी कंपनियों ने अपने लक्ष्य का 50 प्रतिशत से भी कम उत्पादन किया।

कोयला ख़नन क्षेत्र में इन इजारेदार पूंजीपतियों ने अपनी खदानों को आधी से भी कम क्षमता पर चलाया और थर्मल बिजली उत्पादन क्षेत्र में इजारेदार पूंजीपतियों ने अत्यधिक ऊंची क़ीमतों का हवाला देते हुए कोयले के आयात को बंद कर दिया। इस तरह से, थर्मल पावर प्लांटों को चलाने के लिए कोयले की सख़्त कमी की हालतें बनाई गई।

इन इजारेदार पूंजीपतियों ने जानबूझकर बिजली की सख़्त कमी की हालतें इसीलिये पैदा कीं क्योंकि वे अपने थर्मल पॉवर प्लांटों में पैदा की जाने वाली बिजली की ख़रीद के लिए, टैरिफ बढ़ाना चाहते थे और यह भी चाहते थे कि विदेशों में उनकी अपनी निजी खदानों से कोयले के आयात को प्राथमिकता दी जाये।

पिछले एक दशक और उससे भी अधिक समय से, सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपतियों में से कुछ ने, जिनके पास बिजली पैदा करने वाली कंपनियां हैं, उन्होंने विदेशों में कोयला खदानें ख़रीदी हैं। टाटा स्टील ने मोज़ाम्बीक में कोयला खदानों में निवेश किया है और टाटा पावर ने इंडोनेशिया में कोयला खदानों में निवेश किया है। अदानी का ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में कोयला खदानों में बड़ा निवेश है। जिंदल स्टील एंड पावर और एस्सार एनर्जी दोनों ने मोज़ाम्बीक में कोयला खदानों में निवेश किया है। जी.वी.के. ग्रुप का ऑस्ट्रेलिया में कोयले में निवेश है। ये सभी इजारेदार पूंजीपति, इन खदानों से हिन्दोस्तान को कोयला बेचकर भारी मुनाफ़ा कमा रहे हैं।

इससे पहले अप्रैल में, केंद्र सरकार ने यह घोषणा की थी कि सरकारी स्वामित्व वाले संयंत्रों सहित, हिन्दोस्तान के सभी थर्मल पावर प्लांटों को कोल इंडिया द्वारा उत्पादित कोयले के साथ मिश्रित करने के लिए आयात किये जाने वाले कोयले का कम से कम 10 प्रतिशत उपयोग करना चाहिए। इसके बाद राज्य सरकारों ने कोयला आयात करने की योजना की घोषणा की। महाराष्ट्र ने घोषणा की है कि वह 1 करोड़ टन कोयले का आयात करेगा। गुजरात ने दस लाख टन का ऑर्डर दे दिया है। तमिलनाडु ने घोषणा की कि वह 15 लाख टन आयात करेगा और अपने थर्मल प्लांटों में 20 प्रतिशत हिस्सा, आयात किये जाने वाले कोयले का उपयोग करेगा। कुल मिलाकर, इन तीनों राज्यों में देशभर में बिजली की कुल मांग का एक तिहाई हिस्सा है। केंद्र सरकार ने कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारों से भी कुल एक करोड़ टन कोयले का आयात करने को कहा है। पंजाब 6.25 लाख टन आयात करने पर राज़ी हो गया है।

इतने बड़े पैमाने पर कोयले का आयात करने के निर्णय को एक सख़्त ज़रूरत के रूप में पेश किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि उसके पास और कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि कोल इंडिया द्वारा कोयले की पर्याप्त आपूर्ति नहीं की जा रही है।

लेकिन सच्चाई तो यह है कि एक के बाद एक, सभी सरकारें जानबूझकर कोल इंडिया के निजीकरण और उसे बर्बाद करने की नीति अपनाती रही हैं। यह सब कोयला खनन और ऊर्जा क्षेत्र में पूंजीवादी इजारेदारों के हित में उनके मंसूबों को पूरा करने के लिये किया जा रहा है। लेकिन निजीकरण के ख़िलाफ़, कोयला मज़दूरों के बहादुर संघर्ष ने पूंजीपतियों की योजनाओं पर पानी फेर दिया है।

कोयले के बढ़ते आयात से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कोयले के मूल्य में बड़ी वृद्धि होने की उम्मीद है, क्योंकि हिन्दोस्तान दुनिया में कोयले का दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश है।

हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपति जिनके पास विदेशों में निजी कोयला खदानें हैं, उन्हें इससे भारी मुनाफ़ा होगा। हिन्दोस्तान के लोगों को बिजली के लिए बहुत अधिक टैरिफ का भुगतान करने के लिए मजबूर किया जाएगा। सरकार के स्वामित्व वाले सभी थर्मल पावर प्लांटों को आयात किया जाने वाला कोयला खरीदने के लिए मजबूर कर, सरकार इजारेदार पूंजीपतियों की अधिकतम मुनाफ़ा बनाने की लालच को पूरा कर रही है।

रेल परिवहन

इजारेदार नियंत्रित मीडिया, भारतीय रेल को कथित तौर पर थर्मल पावर प्लांटों को कोयले की समय पर सप्लाई सुनिश्चित करने में विफल रहने के लिए दोषी ठहरा रहा है।

लेकिन सच्चाई तो यह है कि दिन-रात मेहनत कर रहे रेल मज़दूर असलियत में यह सुनिश्चित करते आ रहे हैं कि खदानों से थर्मल पावर प्लांटों तक कोयले को कम से कम समय में पहुंचाया जाए।

कोयले के परिवहन के लिए रेलवे 113,880 वैगनों का उपयोग कर रहा है – खुले वैगनों की कुल संख्या का 86 प्रतिशत। रोज़ाना करीब 28,470 वैगन लोड किए जा रहे हैं। तेज़ी से परिवहन सुनिश्चित करने के लिए, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के कोयला उत्पादक राज्यों में 122 स्थानों से, एक के बाद एक तुरंत तीन से पांच ट्रेनें भेजी जा रही हैं। प्रत्येक कोयला ट्रेन में लगभग 84 वैगन होते हैं। रेलवे ने कोयला ट्रेनों की तेज़ आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए कई पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनों को रद्द कर दिया है।

2021-22 में रेलवे ने 65.3 करोड़ टन कोयले का परिवहन किया, जो 2020-21 की तुलना में लगभग 20.4 प्रतिशत अधिक है। रेलवे द्वारा परिवहन किए गए 65.3 करोड़ टन कोयले में से लगभग 83 प्रतिशत या लगभग 54.04 करोड़ टन, थर्मल पावर प्लांटों के लिए था। निजीकरण के समर्थकों के झूठे प्रचार के बावजूद रेल कर्मचारी, मौजूदा संकट में कोयला खदानों से कोयले की ढुलाई का एक बेहतरीन उदाहरण बनकर काम कर रहे हैं।

निष्कर्ष

मौजूदा बिजली संकट किसी भी क़ीमत पर जनता से ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की इजारेदार पूंजीपतियों की हवस का नतीजा है। ये संकट देश की अर्थव्यवस्था की वर्तमान दिशा का अवश्यंभावी परिणाम है, जिसका मक़सद है लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की बजाय इजारेदार पूंजीपतियों की लालच की हवस को पूरा करना। यह बिजली उत्पादन और कोयला खनन के निजीकरण के कार्यक्रम का नतीजा है, जिसका उद्देश्य सामाजिक उत्पादन की इन ज़रूरी शाखाओं को, हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के लिए, अधिकतम निजी मुनाफ़ों के स्रोतों में परिवर्तित करना है।

पहला लेख पढ़िए : बिजली क्षेत्र के मज़दूरों का संघर्ष बिल्कुल जायज़ है! बिजली का निजीकरण जन-विरोधी है!

तीसरा लेख पढ़िए : हिन्दोस्तान में बिजली आपूर्ति का ऐतिहासिक विकास – 1947 से 1992

Share and Enjoy !

Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published.