धर्म के नाम पर हुक्मरानों की भटकाऊ और भड़काऊ हरकतें

संपादक महोदय,

मज़दूर एकता लहर के माध्यम से मैं राजनीतिक क्षेत्र में चल रहे रुझानों पर रोशनी डालना चाहती हूं।

सरकारी ओहदेदार, मंत्री, उनके काम से जुड़ी एजेंसियां व संगठन अत्यंत घटिया स्तर के दांवपेंच अपना रहे हैं। लोगों में फूट डालने, नफ़रत व डर फैलाने के तरीक़ों का सहारा ले रहे हैं ताकि नौजवान तबका व व्यापक समाज, मंहगाई, बेरोज़गारी पर सरकार से सवाल न करे। उनके लिये एकजुट संघर्ष न करे। सरकार की शिक्षा के क्षेत्र में उदासीनता व असमानता को चुनौती न दें। सार्वजनिक संपत्ति व लोक कल्याण क्षेत्र में सरकार की मनमानी को ललकारने की हिम्मत न कर सकें।

किसी एक खास धर्म के विरोध में भटकाऊ विचार खड़े करके उन पर हंगामा करवाना। हिजाब की मिसाल, नवरात्री के दिनों में पूरे प्रांत में मांसाहारी भोजन पर पाबंदी लगाना ताजा तरीन उदाहरण हैं। इन बातों से सिर्फ फूट ही नहीं पड़ती बल्कि लोगों के मौलिक अधिकारों पर भी वार किया जाता है। धर्म के नाम पर रोज़ी-रोटी के अधिकार को नकारा जाता है जो कि एक संवैधानिक अधिकार है, हर सदस्य का।

धार्मिक उत्सवों के समय के अलावा भी खास धर्म के लोगों की जीविका पर क्रूर हमले किये जा रहे हैं। नौकरी को तरसते लाखों नौजवानों को ऐसे ही मसलों में उलझाए रखने की कोशिश की जाती है।

ये सब पुलिस व प्रशासन की मदद से ही होता है। वरना एक धार्मिक गुरू सार्वजनिक तौर पर एक विशेष समुदाय की महिलाओं का अपहरण करने व बलात्कार करने वाला भाषण नहीं दे सकता है, वह भी पुलिस की पूरी मौजूदगी में।

लोग व उनके प्रतिनिधि सरकार से महंगाई जैसे गंभीर मुद्दे पर सवाल करते हैं तो मनमानी से सभा ही भंग कर दी जाती है। जैसा कि अभी संसद में हुआ।

भटकाव, भड़काव, हिंसा व साम्प्रदायिक ज़हर फैलाकर लोगों को कमजोर करना, उनके संघर्ष करने की इच्छा शक्ति को कुचलना, महंगाई के जरिये लोगों को गुलाम बनाना, संवैधानिक अधिकारों की धज्जियां उड़ाना, इन सबसे जीवन की बुनियादी समस्याओं का हल नहीं निकलता। हमें इन सबसे सावधान रहकर एक नये शोषण मुक्त समाज की रचना के संघर्ष के ही काम पर ध्यान देना चाहिये।

धन्यवाद,
निर्मल (दिल्ली)

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