प्रेपरेटरी कमेटी फॉर पीपल्स एम्पावरमेंट की स्थापना की 29 वीं सालगिरह के अवसर पर:
हिन्दोस्तानी समाज की समस्याओं के समाधान के लिए लोगों के हाथ में सत्ता आवश्यक शर्त है

आज से 29 वर्ष पहले, 11 अप्रैल, 1993 को कम्युनिस्ट और अन्य राजनीतिक कार्यकर्ता, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, महिला आंदोलन के कार्यकर्ता, मानव अधिकार कार्यकर्ता, जज, वकील, शिक्षक, लेखक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता, प्रेपरेटरी कमेटी फॉर पीपल्स एम्पावरमेंट (सी.पी.ई.) की स्थापना करने के लिए, नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित एक सभा में एकत्रित हुए थे।

1992 में हुक्मरान वर्ग की दो मुख्य पार्टियों, कांग्रेस पार्टी और भाजपा, ने मिलकर बाबरी मस्जिद का विध्वंस किया था और उसके बाद देश भर में सांप्रदायिक हिंसा फैलाई थी। तब यह स्पष्ट हो गया था कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के अंदर, हमारे देश के लोगों के हाथ में कोई ताक़त नहीं है।

वह ऐसा समय था जब सोवियत संघ ख़त्म हो गया था और दुनिया का दो-ध्रुवीय बटवारा समाप्त हो गया था। इसके साथ-साथ एक नई अवधि की शुरुआत हो गई थी। दुनिया के साम्राज्यवादी सरमायदारों ने 20 वीं सदी में मज़दूर वर्ग और लोगों द्वारा हासिल की गई सभी उपलब्धियों के ख़िलाफ़ एक चौतरफा हमला शुरू कर दिया था।

वह ऐसा समय था जब हमारे देश के हुक्मरान सरमायदारों ने फैसला किया कि पुराने नेहरुवी “समाजवादी नमूने के समाज” को त्याग दिया जाएगा, जो बीती अवधि में उनके काम आया था। हुक्मरान सरमायदार उदारीकरण और निजीकरण के जरिए भूमंडलीकरण का रास्ता अपनाने लगे। मज़दूर व किसान, महिला और नौजवान, इस जन- विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम के ख़िलाफ़, सड़कों पर उतर रहे थे। उन हालातों में, हुक्मरान वर्ग ने अपना एजेंडा लागू करने के लिए और लोगों के संघर्षों को खून में बहा देने के लिए, अराजकता और हिंसा फ़ैलाने का रास्ता अपनाया था।

22 फरवरी, 1993 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान पर एक ऐतिहासिक रैली आयोजित की गई थी। उस समय केंद्र सरकार ने रैलियों पर रोक लगा रखी थी। केंद्र सरकार के उन प्रतिबंधों को चुनौती देते हुए, उस रैली को आयोजित किया गया था। उस रैली को मज़दूर एकता कमेटी और विभिन्न महिला संगठनों तथा मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ने मिलकर आयोजित किया था। उस रैली में सभी ज़मीर वाले पुरुषों और महिलाओं को संबोधित करते हुए, एक दूरदर्शी अपील जारी की गई थी। उसमें सभी से यह मांग की गई थी कि राजनीति के अपराधीकरण को खत्म करने और राजनीतिक सत्ता से लोगों को दरकिनार करने वाली वर्तमान स्थिति को ख़त्म करने के लिए, हम सब को एकजुट हो जाना चाहिए। देश के कोने कोने में ज़मीर वाले पुरुषों और महिलाओं ने उस अपील पर हस्ताक्षर करके, उसके साथ अपनी सहमति जताई थी।

सी.पी.ई. की स्थापना के साथ, इस हक़ीक़त को स्पष्ट दर्शाया गया कि हिन्दोस्तानी समाज जिस राजनीतिक और आर्थिक संकट में फंसा हुआ है, उसका समाधान तभी हो सकता है जब लोगों को राजनीतिक सत्ता से दरकिनार करने की वर्तमान स्थिति ख़त्म होगी। सी.पी.ई. ने वर्तमान संसदीय व्यवस्था और उसकी राजनीतिक प्रक्रिया की समस्याओं पर व्यापक चर्चा शुरू की। सांप्रदायिक हिंसा के ख़िलाफ़ और मानव अधिकारों तथा लोकतांत्रिक अधिकारों की हिफ़ाज़त में संघर्ष के अनुभव की समीक्षा की गयी। इन चर्चाओं से यह निष्कर्ष निकला कि लोकतंत्र और उसकी राजनीतिक प्रक्रिया की वर्तमान व्यवस्था में कई मूलभूत त्रुटियां हैं।

वर्तमान व्यवस्था का गंभीर विश्लेषण करके, यह समझा गया कि हिन्दोस्तान का संविधान एक छोटे से गिरोह के हाथ में संप्रभुता सौंप देता है। वह गिरोह है – संसद के अंदर मंत्रिमंडल, जिस का उपदेश राष्ट्रपति मानने को बाध्य है। लोगों की सिर्फ एक ही भूमिका होती है, कि कुछ-कुछ साल बाद, हुक्मरान वर्ग की प्रतिस्पर्धी पार्टियों द्वारा चुने गए इस या उस उम्मीदवार को वोट दें। चुनाव के परिणाम सरमायदार निर्धारित करते हैं, धनबल, बाहुबल, मीडिया बल और खुलेआम धांधली के जरिए। मतदान करने के बाद लोगों की और कोई भूमिका नहीं रह जाती है। सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी जिस पार्टी को दी जाती है, वह सरमायदारों द्वारा निर्धारित एजेंडा को ही लागू करती है। इन त्रुटियों को हल करने के लिए कुछ आवश्यक परिवर्तन लाने होंगे, ताकि फैसले लेने की प्रक्रिया में लोगों की केन्द्रीय भूमिका हो। संविधान के जरिये सुनिश्चित हो कि संप्रभुता लोगों के हाथ में होनी चाहिए।

समाज के अलग-अलग तबकों के पुरुषों और महिलाओं ने लोगों के हाथ में सत्ता लाने के इस काम को अपनाया। जनवरी 1999 में लोक राज संगठन की स्थापना के साथ, लोगों के हाथ में सत्ता लाने के आंदोलन को एक जन आंदोलन का रूप दिया गया, जिसमें मज़दूर, किसान, महिला, नौजवान और वे सभी लोग शामिल हुए, जो वर्तमान व्यवस्था के अंदर, सत्ता से दूर और हाशिये पर रखे जाते हैं — यानी समाज का बहुसंख्यक हिस्सा।

बीते 29 वर्षों की गतिविधियों से लोगों के हाथ में सत्ता लाने के संघर्ष को आगे बढ़ाने की फ़ौरी जरूरत की बार-बार पुष्टि हुई है।

हमारे देश के अधिकतम लोग अपने अधिकारों के लिए बहादुरी से संघर्ष कर रहे हैं। मज़दूर रोज़गार की सुरक्षा और सभी के लिए सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं, निजीकरण और उदारीकरण के कार्यक्रम को फ़ौरन बंद करने की मांग कर रहे हैं। किसान सभी कृषि उत्पादों की सर्वव्यापक सरकारी खरीदी की व्यवस्था और लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) की मांग कर रहे हैं। लोग मांग कर रहे हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, जन-परिवहन, आदि इन सब को जनसेवा माना जाये और इन्हें सभी के लिए मुहैया कराना राज्य का फ़र्ज़ हो।

कश्मीरी, असमिय, मणिपूरी, नगा और हिन्दोस्तान में निवासी अनेक अन्य राष्ट्रों के लोग सम्मान का जीवन चाहते हैं, जहां उनकी भाषा, संस्कृति और जीवन शैली का आदर किया जाएगा। वे सेना के पांव तले जीवन जीने को मजबूर नहीं होना चाहते हैं।

पुराने बंधनों को तोड़कर, महिलाएं यौन उत्पीड़न, भेदभाव और अत्याचार के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठा रही हैं। वे महिला बतौर और इंसान बताओ अपने अधिकारों की मांग कर रही हैं।

लोग धर्म के आधार पर भेदभाव और अत्याचार को ख़त्म करना चाहते हैं। लोग ऐसे राज्य और व्यवस्था के लिए तरस रहे हैं जहां सबको ज़मीर  का अधिकार सुनिश्चित होगा और जहां सांप्रदायिकता व सांप्रदायिक हिंसा फैलाने वालों को सज़ा दी जाएगी। लोग घिनावनी जातिवादी व्यवस्था को ख़त्म करना चाहते हैं, जिसके चलते लोगों को अमानवीय अत्याचार और अपमान का सामना करना पड़ता है।

लेकिन हक़ीक़त यह है कि वर्तमान व्यवस्था के चलते, लोगों के पास यह सुनिश्चित करने के लिए कोई साधन नहीं है, कि उनकी किसी भी समस्या का हल होगा।

हिन्दोस्तानी समाज कि इन तमाम समस्याओं की जड़ सरमायदारों  की हुकूमत में है, जिसमें अधिकतम शोषित बहु संख्या को सत्ता से बाहर रखा गया है। इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में सरमायदार उत्पादन के मुख्य साधनों पर नियंत्रण करते हैं। राज्य – कार्यकारिणी, विधायिकी, न्यायपालिका, सरमायदारों  की संसदीय पार्टियां और सभी दूसरे संस्थान – ये सब मजदूरों और किसानों के ऊपर सरमायदारों की हकूमत को सुनिश्चित करने का काम करते हैं। इस हकूमत को वैधता देने के लिए, समय-समय पर चुनाव आयोजित किये जाते हैं।

हिन्दोस्तान के सरमायदार दूसरे देशों के साम्राज्यवादी सरमायदारों  के साथ, कभी मिलकर तो कभी टकराकर, ज्यादा से ज्यादा तेज़ गति के साथ खुद को अमीर बनाने का रास्ता अपना रहे हैं। इस रास्ते पर चलते हुए, वे मजदूरों के शोषण, किसानों की लूट और लोगों की प्राकृतिक संपदा की लूट को और तेज़ कर रहे हैं। सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा, जातिवादी बटवारा और दमन, राष्ट्रीय अत्याचार, महिलाओं का अत्याचार, ये सब लोगों के सब-तरफा शोषण और दमन को और बढ़ाने के लिए सरमायदारों  के काम आते हैं।

लोगों को बार-बार यह कहा जाता है कि उनकी समस्याओं की वजह सरकार चलाने वाली किसी खास पार्टी की नीतियां हैं, और अगर लोग किसी दूसरी पार्टी को सरकार चलाने के लिए चुनते हैं तो वे परिवर्तन ला सकते हैं। यह बहुत बड़ा धोखा है। यह हुक्मरान वर्ग, सरमायदार वर्ग ही है जो नीतियों को तय करता है। सरकार चलाने वाली पार्टी इन नीतियों को लागू करती है।

मजदूरों और किसानों के लिए, समझने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बहुपार्टीवादी, प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था सरमायदारों का पसंदीदा हथकंडा है, जिसके जरिए वे मज़दूरों और किसानों पर अपनी हकूमत को कायम करते हैं और इस हकूमत को वैधता देते हैं। वर्तमान व्यवस्था के चलते, कार्यकारिणी निर्वाचित विधायिकी के प्रति जवाबदेह नहीं है और संसद के लिए निर्वाचित प्रतिनिधि मतदाताओं के प्रति जवाबदेह नहीं है। क़ानून और नीति बनाने में लोगों की कोई भूमिका नहीं है। चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन पार्टियों द्वारा किया जाता है। कौन उम्मीदवार बन सकता है या नहीं बन सकता है, इस पर लोगों से पूछा नहीं जाता है। निर्वाचित प्रतिनिधि का काम संतोषजनक न होने पर भी, मतदाता के पास उस प्रतिनिधि को वापस बुलाने का कोई अधिकार नहीं है।

सरमायदार धनबल के जरिए और राज्य तंत्र पर अपने नियंत्रण के सहारे धांधली करके चुनावों के परिणाम को निर्धारित करते हैं। सरमायदार यह सुनिश्चित करते हैं कि सिर्फ ऐसी पार्टी को ही सरकार चलाने की जिम्मेदारी दी जाए जो वफ़ादारी से उनका एजेंडा लागू करेगी।

अगर आर्थिक व्यवस्था को जन समुदाय की सेवा में चलाना है तो यह आवश्यक है कि मेहनतकश लोग खुद सारे मुख्य फैसले ले सकें। हमें एक ऐसे राज्य की जरूरत है, जो सरमायदारों को फैसले लेने के विशेष अधिकार से वंचित करेगा, जो आज उनके पास है, और यह सुनिश्चित करेगा कि फैसले लेने का अधिकार संपूर्ण जनता के हाथ में हो।

इसलिए आर्थिक मांगों के लिए संघर्ष करने के साथ-साथ, मज़दूर वर्ग को लोगों के हाथ में संप्रभुता लाने के संघर्ष को अपने कार्यक्रम का मुख्य हिस्सा बनाना होगा। जब लोग संप्रभु होंगे, तब अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के बजाय लोगों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा दी जा सकती है। हम आत्मनिर्भरता के असूल का पालन करके देश की आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की हिफाजत कर सकेंगे।

हिन्दोस्तान के मज़दूरों और किसानों को एक नए संविधान पर आधारित, एक नए राज्य के ढांचे की स्थापना करनी होगी। उसमें कार्यकारिणी को विधायिकी के अधीन होना होगा और विधायकी को जनता के नियंत्रण में होना होगा। लोग अपने कार्य स्थानों और रिहायशी इलाकों में संगठित होकर, फैसले लेने के अधिकार को अपने हाथों में लेंगे। जब लोग अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे, तो वे पूरी ताक़त उन्हें सौंप नहीं देंगे बल्कि ताक़त का कुछ हिस्सा ही सौंपेंगे और वह भी कुछ समय के लिए। लोग अपने हाथों में यह मांग करने का अधिकार रखेंगे, कि चुने गए प्रतिनिधि को समय-समय पर लोगों के सामने अपने काम का हिसाब देना होगा और लोग किसी भी समय उन्हें अपने पद से वापस बुला सकेंगे।

नई राजनीतिक प्रक्रिया के अंदर राजनीतिक पार्टियों को शासन करने के अधिकार से वंचित करना होगा। इसके बजाय, राजनीतिक पार्टियों को लोगों की जागरुकता और संगठन के स्तर को बढ़ाने का काम करना होगा, ताकि लोग खुद अपना शासन करने के लिए पूरी तरह काबिल हो सकें।

हिन्दोस्तानी संघ को रजामन्द राष्ट्रों और लोगों के स्वेच्छा पूर्ण संघ के रूप में पुनर्गठित करना होगा, जिसके अंदर हर एक घटक राष्ट्र और लोगों को आत्म निर्धारण और अलग होने तक का अधिकार होगा।

जो भी पार्टी और संगठन लोगों के अधिकारों की हिफ़ाज़त में तथा उदारीकरण और निजीकरण के ख़िलाफ़, सांप्रदायिकता और राजकीय आतंकवाद के ख़िलाफ़, संघर्ष कर रहे हैं, उन सब को एकजुट होकर लोगों के हाथ में सत्ता लाने के कार्यक्रम को अपनाना होगा। यही हमारे समाज की तमाम समस्याओं के समाधान की कुंजी है।

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