सरकारी आंकड़े किसानों की दयनीय स्थिति का खुलासा करते हैं

लंबे समय से हिन्दोस्तानी समाज की रीढ़ की हड्डी माना जाने वाला कृषि क्षेत्र, अब इसमें कार्यरत लोगों के लिए पर्याप्त आय नहीं दे रहा है

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा 10 सितंबर, 2021 को प्रकाशित स्थिति आंकलन सर्वेक्षण (एस.ए.एस.) देश में किसानों की आर्थिक स्थिति पर सबसे व्यापक आधिकारिक सर्वेक्षण है। यह 2019 में किया गया था और इसमें 12 महीने की अवधि, जुलाई 2018 से जून 2019 तक का डेटा एकत्र किया गया था। यह कृषि संकट की गंभीरता और किसान परिवारों की दयनीय स्थिति की पुष्टि करता है।

स्थिति आंकलन सर्वेक्षण (एस.ए.एस.) का अनुमान है कि 2018-19 में ग्रामीण हिन्दोस्तान में 17.2 करोड़ परिवार थे, जिनमें से 9.3 करोड़ कृषि परिवार या किसानों के परिवार थे। शेष 7.9 करोड़ परिवारों में से 4.3 करोड़ परिवार सामयिक मज़दूरी पर निर्भर थे। लगभग 2.2 करोड़ परिवारों में कम से कम एक सदस्य वेतन पर नौकरी करने वाला था।

एक कृषक परिवार को एक ऐसे परिवार के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें, कम से कम एक सदस्य वर्ष के दौरान 4,000 रुपये से अधिक मूल्य की फ़सलों की खेती, पशुधन पालन या अन्य विशिष्ट कृषि उत्पादों का उत्पादन करने में स्व-नियोजित था।

जुलाई 2018 से जून 2019 के दौरान कृषक परिवारों द्वारा कमाई गई औसत मासिक आय 10,200 रुपये थी, जिसमें से 3,800 रुपये खेती से और 4,060 रुपये वेतन आया था। यह देखते हुए कि यह औसत आय है, इसका मतलब है कि कम से कम आधे किसान परिवार 10,000 रुपये प्रति माह से कम कमाते हैं।

2018-19 के स्थिति आंकलन सर्वेक्षण (एस.ए.एस.) की तुलना पिछले 2012-13 की स्थिति आंकलन सर्वेक्षण (एस.ए.एस.) के साथ करने से पता चलता है कि किसान परिवार मज़दूरी की आय पर अधिक से अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। 2012-13 में, कृषक परिवारों की औसत आय का 48 प्रतिशत अपनी खुद की खेती करने या ज़मीन को भाड़े पर देने से आता था, जबकि 32 प्रतिशत की आय मज़दूरी से आती थी। 2018-19 में, खेती की आय का हिस्सा गिरकर 37 प्रतिशत हो गया था जबकि मज़दूरी की आय का हिस्सा बढ़कर 40 प्रतिशत हो गया था।

हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप में लंबे समय से समाज की रीढ़ मानी जाने वाली कृषि अब इसमें लगे लोगों के लिए पर्याप्त आय नहीं दे रही है।

अधिकांश किसान जिनके पास 10 एकड़ या उससे कम ज़मीन है, उनके लिए खेती से होने वाली आय परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं है। परिवार के एक या अधिक सदस्यों को वेतन वाली नौकरी या कम से कम दैनिक मज़दूरी पर काम ढूंढना पड़ता है। बड़े भूमिधारक अल्पसंख्यकों के लिए, अधिकांश आय खेती से आती है लेकिन हाल के वर्षों में, उनके लिए भी खेती से होने वाली आय में गिरावट रही है।

एक तरफ जहां नई दिल्ली में केन्द्र और राज्यों में सरकारें लगातार पूंजीवादी कंपनियों के लिए “व्यापार करने में आसानी” के नाम पर सुधार के लिए विभिन्न उपायों को लागू कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ किसानों की आर्थिक गतिविधि बेहद जोखिम भरी हो गई है। असहनीय परिस्थितियों को बदलने के लिए संघर्ष में एकजुट होने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है।

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