11 सितम्बर के आतंकवादी हमलों के बीस साल बाद :
राजकीय आतंकवाद, कब्ज़ाकारी जंग और राष्ट्रीय संप्रभुता के हनन को जायज़ ठहराने के लिए, आतकंवाद साम्राज्यवाद का एक हथकंडा है

11 सितम्बर, 2001 को न्यू यॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की दो इमारतों पर दो विमान टकराए थे। एक और विमान वाशिंगटन के पेंटागन से टकराया था। उन आतंकवादी हमलों में लगभाग 3000 लोग मारे गए थे।

तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ऐलान किया था कि वह अल क़ायदा नामक इस्लामी आतंकवादी गिरोह की साज़िश थी, जिसे अफ़ग़ानिस्तान की सरकार का समर्थन प्राप्त था। अमरीकी प्रचार मशीन ने बिना कोई सबूत पेश किये, उस मनगढ़ंत कहानी को फैलाया। उसी झूठे प्रचार के आधार पर अमरीकी और नाटो की सेनाओं द्वारा अफ़ग़ानिस्तान पर सशस्त्र हमले को जायज़ ठहराया गया, जिसके बाद अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया गया।

अमरीका ने इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को पकड़ कर उनका क़त्ल किया, जो किसी भी अंदाज़े से एक आतंकवादी हरकत थी। अमरीका ने लीबिया पर हमला किया और उसके नेता मुअम्मर गद्दाफी की हत्या की। बीते दस सालों से अमरीका और उसके मित्र सीरिया में बशर अस्साद की सरकार को गिराने के इरादे से, अनेक बाग़ी गिरोहों को हथियार और प्रश्रय देकर, वहां गृहयुद्ध की लपटों को हवा दे रहे हैं। अमरीका ने पाकिस्तान, सीरिया, यमन जैसे कई देशों व अफ्रीका के अनेक देशों पर सैकड़ों ड्रोन हमले किये हैं, जिनमें हजारों-हजारों निर्दोष पुरुष, स्त्री व बच्चे मारे गए हैं।

अमरीकी राज्य ने 11 सितम्बर, 2001 के आतंकवादी हमलों का इस्तेमाल करके, एशिया और अफ्रीका के अनेक इस्लामी मुल्कों पर कब्ज़ाकारी जंग छेड़ने के पक्ष में, अमरीका के अन्दर जनमत पैदा किया। उसने उन हमलों का इस्तेमाल करके, अमरीका के अन्दर तथा सारी दुनिया में मुसलमानों के प्रति नफ़रत फैलाई। अमरीका ने “इस्लामी आतंकवाद पर जंग” को अगुवाई देने का दावा किया। अरब और मुसलमान लोगों को पिछड़े, महिला-विरोधी, असभ्य हठधर्मी और आतंकवादी बताकर, उन्हें बदनाम करने का सुनियोजित प्रचार अभियान चलाया गया है। अपने इस झूठे प्रचार को बल देने के लिए अमरीकी खुफिया एजेंसियों ने समय-समय पर आतंकवादी हमले आयोजित किये और जिनके लिए मुसलमानों को दोषी ठहराया। दुनियाभर में मुसलमानों को आतंक और उत्पीड़न का शिकार बनाया गया।

अमरीकी राज्य ने 11 सितम्बर, 2001 के आतंकवादी हमलों का इस्तेमाल करके, “होमलैंड सिक्यूरिटी” (स्वदेश सुरक्षा) के नाम से, खुद को अप्रत्याशित पुलिसिया ताक़तों के साथ लैस किया। “आतंकवाद पर जंग” के ऊपर सवाल करने वाले सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर नज़र रखी जाने लगी, उन्हें मनमानी से गिरफ़्तार और प्रताड़ित किया जाने लगा।

“आतंकवाद पर जंग” को छेड़ने के पीछे अमरीकी साम्राज्यवादियों का इरादा था पहले एशिया पर और फिर पूरी दुनिया पर कब्ज़ा करना। अरब और मुसलमान लोगों को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उनका अपना प्राचीन इतिहास और संस्कृति है, अपनी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाएं हैं, और वे यूरोपीय व अमरीकी राजनीतिक नमूनों को मानने से इंकार करते हैं। इसके अलावा, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका में प्रचूर तेल और गैस के संसाधन हैं। इस पूरे इलाके पर अपना वर्चस्व जमाना अमरीका का इरादा था।

अफ़ग़ानिस्तान और इराक पर हथियारबंद कब्जे़ के ज़रिये, अमरीका ने ईरान को पूर्व और पश्चिम से घेरने का अपना इरादा भी हासिल किया। एशिया के तेल-संपन्न क्षेत्रों पर अमरीका के वर्चस्व का विस्तार हुआ। इराक में सद्दाम हुसैन की सरकार जब यूरोपीय संघ के साथ यूरो में व्यापार करने और इस तरह कच्चा तेल व पेट्रोलियम पदार्थों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापर में अमरीकी डॉलर के वर्चस्व को तोड़ने की कोशिश कर रही थी, तब अमरीका उन कोशिशों को नाक़ामयाब करने में सफल हुआ। अफ़ग़ानिस्तान और इराक पर जंग के सहारे, अमरीकी सैनिक-औद्योगिक ढांचे और अंतर्राष्ट्रीय युद्ध मशीन को जारी रखा गया।

इस “आतंकवाद पर जंग” की वजह से दसों-हजारों पुरुष, महिलाएं और बच्चे मारे गए हैं। अपाहिज या बेघर बनाये गए लोगों की संख्या तो इससे कहीं ज्यादा है। लाखों-लाखों लोग अपने घर-बार छोड़कर, शरणार्थी बनने को मजबूर हुए हैं। अनेक देशों की अनमोल संपत्तियां और ढांचागत रचनायें लूटी गयी हैं या नष्ट कर दी गयी हैं।

बीते 20 सालों के अनुभव से सबसे अहम सबक यह है कि अमरीकी साम्राज्यवाद की अगुवाई में चलाया जा रहा “आतंकवाद पर जंग” एक समाज-विरोधी और मानव-विरोधी हमला है। यह मुसलमानों पर जंग है, राष्ट्रों के आत्म-निर्धारण के अधिकार पर हमला है। यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्थापित किये गए असूलों को बदलकर, एक नए ढांचे को स्थापित करने का प्रयास है, जिसके अनुसार अमरीकी साम्राज्यवादियों और उनके मित्रों को किसी भी मनगढ़ंत बहाने के आधार पर, जब चाहे किसी भी देश पर हमला करने का निरंकुश अधिकार है।

इसमें कोई शक नहीं है कि “इस्लामी आतंकवाद पर जंग” को छेड़ने का बहाना बनाये जाने वाले 11 सितम्बर, 2001 के आतंकवादी हमलों से सबसे ज्यादा फ़ायदा अमरीकी साम्राज्यवाद को हुआ। अगर सभी प्राप्त तथ्यों का विश्लेषण किया जाये, तो हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि 11 सितम्बर, 2001 के हमलों का सरगना, उस साज़िश को रचने वाला, अमरीकी राज्य के अलावा कोई और नहीं था।

अमरीकी साम्राज्यवाद के प्रभावशाली विचारक दलों, जिनमें “नयी अमरीकी सदी की परियोजना” जैसे दल शामिल हैं, ने सन 2000 में यह प्रस्ताव किया था कि अमरीका को संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अंतर्राष्ट्रीय ढांचों से बाहर निकल जाना चाहिए और अपनी सैनिक ताक़त के ज़रिये दुनिया के दूसरे देशों पर अपना वर्चस्व जमाना चाहिए। उन्होंने कहा था कि इसे जल्दी-जल्दी हासिल करने के लिए एक “नए पर्ल हारबर जैसे क्षण” की ज़रूरत है। 1942 में पर्ल हारबर पर जापान के बम गिराने से अमरीकी राज्य को दूसरे विश्व युद्ध में जुड़ने के पक्ष में अमरीकी लोगों के बीच जनमत पैदा करने में सहारा मिला था। इसी तरह, अमरीकी राज्य ने पूरी दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने की अपनी रणनीति को क़ायम करने के लिए 11 सितम्बर, 2001 के आतंकवादी हमलों को आयोजित किया था।

कई अमरीकी इंजीनियरों और अन्य पेशों के विशेषज्ञों ने बताया है कि दोनों टावर जिस तरह धंस कर गिरे थे, वह ऊपर की मंजिलों से विमानों के टकराने से नहीं हो सकता था। उन इमारतों के धंसने के तरीक़े से ऐसा लगता है कि उनमें लगे इस्पात के स्तम्भों के निचले भाग में बम फोड़े गए थे।

उस आतंकवादी हमले के मात्र 26 दिन बाद, अमरीका और ब्रिटेन ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा करने की अपने जंग को शुरू किया। कई अमरीकी पूर्व सेनानियों ने कहा है कि इतने बड़े युद्ध की तैयारी सिर्फ 26 दिनों में नहीं की जा सकती थी। इसका यह मतलब है कि उस युद्ध की तैयारी उससे बहुत पहले से ही की जा रही थी। इससे और ज्यादा शक पैदा होता है कि 11 सितम्बर, 2001 की घटनाओं को अंजाम देने वालों का सरगना अमरीकी साम्राज्यवाद ही था।

अब तो अमरीकी खुफिया एजेंसियां भी यह कबूल करती हैं कि उन्होंने अल क़ायदा जैसे तरह-तरह के आतंकवादी गिरोहों को गठित किया, धन और हथियार दिया था, जिनके अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में अड्डे थे। 1980 के दशक में उन्होंने सोवियत कब्ज़ाकारी सेनाओं के खि़लाफ़ लड़ने के लिए उन गिरोहों तथा तरह-तरह के स्थानीय सरदारों को हथियार और धन दिए थे।

1988-89 में जब सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सेनाओं को वापस कर लिया, तो उसके बाद अमरीका यूरोप और एशिया में अपने भू-राजनीतिक हितों को बढ़ावा देने के लिए उन आतंकवादी गिरोहों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। सशस्त्र आतंकवादियों को, इस्लाम की हिफ़ाज़त करने के नाम पर नियुक्त करके और सैनिक प्रशिक्षण देकर, सी.आई.ए. के विमानों पर अजरबैजान और यूगोस्लाविया भेजा गया। उन्हें रूसी पाइप लाइनों का ध्वंस करने के लिए, गुप्त रूप से चेचन्या और दागेस्तान भेजा गया। ऐसे बहुत सबूत हैं कि आई.एस.आई.एस. नामक आतंकवादी गिरोह को सी.आई.ए. ने ही गठित किया और धन दिया, ताकि वह अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया जैसे अनेक देशों में आतंकवादी हमले कर सके।

अमरीकी साम्राज्यवाद ने 11 सितम्बर, 2001 की घटनाओं का इस्तेमाल करके, “इस्लामी आतंकवाद” का हव्वा खड़ा किया, जिसकी आड़ में उसने अमरीका का विरोध करने वाली सरकारों को गिराने या कमजोर करने का काम किया, अमरीका के अन्दर लोगों के जनवादी अधिकारों को कुचलने का काम किया और दूसरे देशों पर कब्ज़ाकारी जंग छेड़ने का काम किया। अपने ही धन और हथियारों पर पले हुए किसी एक आतंकवादी गिरोह से आतंकवादी हरकतें करवाना और फिर उसके बहाने, दूसरे देशों की राष्ट्रीय संप्रभुता का हनन करना, दूसरे देशों को “दुष्ट राज्य” या “आतंकवादी राज्य” करार देना और उन देशों में शासन परिवर्तन व उनके शासकों की हत्या को भी जायज़ ठहराना – यह सब अमरीकी साम्राज्यवादियों का पसंदीदा तरीक़ा बन गया है।

अमरीकी साम्राज्यवाद आज दुनियाभर में फैले हुए हिंसा और आतंक के माहौल के लिए ज़िम्मेदार है। दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने के अमरीकी साम्राज्यवादियों के हमलावर प्रयास आज जनवादी अधिकारों, मानव अधिकारों और विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। अमरीकी साम्राज्यवाद और दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने के उसके ख़तरनाक प्रयासों के खि़लाफ़ अधिक से अधिक राजनीतिक एकता बनाना आज बेहद ज़रूरी है।

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