शिक्षा मंत्रालय के प्रोजेक्ट के तहत नियुक्त किए गए शिक्षकों को निस्सहाय छोड़ा :
नई दिल्ली के शास्त्री भवन पर विरोध प्रदर्शन

आई.आई.टी. जैसे तकनीकी संस्थानों के स्नातकोत्तर (पोस्ट-ग्रेजुएट) विद्यार्थियों को शिक्षा मंत्रालय के “तकनीकी शिक्षा गुणवत्ता सुधार” कार्यक्रम (टी.ई.क्यू.आई.पी.) के लिए शिक्षक बतौर नियुक्त किया गया था। लेकिन प्रोजेक्ट के खतम हो जाने पर उनकी शिक्षक बतौर नियुक्ति को आगे नहीं ले जाया गया। वे अपने प्रोजेक्ट संस्थानों में अपनी नियुक्ति की मांग को लेकर फिलहाल नई दिल्ली के शास्त्री भवन पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

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शास्त्री भवन, नयी दिल्ली पर धरना

बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, उत्तराखंड और आठ उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने के उद्देश्य से टी.ई.क्यू.आई.पी. की शुरुआत विश्व बैंक के साथ की गई थी। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य था कि, इन राज्यों में मौजूदा इंजीनियरिंग कॉलेजों को संसाधन और उच्च शिक्षित शिक्षक प्रदान किए जाएं।

चुने हुए शिक्षक जनवरी 2018 से संबंधित संस्थानों में सहायक प्रोफेसर के रूप में लगे हुए थे। प्रोजेक्ट के खतम होने पर सभी संस्थानों में इन शिक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए थी। यह प्रोजेक्ट कार्यान्वयन योजना के एक खंड में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि, प्रोजेक्ट के तहत वित्त पोषण ‘‘राज्य सरकारों के साथ एक समझौते पर आधारित होगा कि प्रोजेक्ट निधि का उपयोग कर भर्ती किए गए शिक्षकों को, जिनका प्रदर्शन प्रोजेक्ट के दौरान अच्छा रहेगा, उन्हें प्रोजेक्ट समाप्त होने के बाद नियुक्त किया जाएगा, बाकी सभी अपरिवर्तित रहेंगे’’।

इन सहायक शिक्षकों को संस्थानों में पूर्णकालिक शिक्षक बतौर नियुक्त करने के बजाए, उन्हें अतिथि शिक्षकों के पद दिए जा रहे हैं। अतिथि शिक्षकों को घंटे के हिसाब से वेतन दिया जाता है, जो प्रति महीने ज्यादा से ज्यादा 21,000 रूपए होता है। वर्तमान में, इस प्रोजेक्ट के तहत इन शिक्षकों का वेतन प्रति महीना 70,000 रूपए है।

सभी शिक्षक बेहद नाराज और गुस्से में हैं क्योंकि उन्होंने उद्योग में अन्य अवसरों को, पिछली शिक्षण नौकरियों को छोड़ दिया था इस उम्मीद में की उन्हें स्थाई नौकरियां मिलेंगी। लेकिन अब उन्हें उससे वंचित रखा जा रहा है और उन्हें बेहाल छोड़ दिया गया है। उन्होंने उनसे किये हुए वादे पर भरोसा किया था की प्रोजेक्ट समाप्त हो जाने पर उन्हें प्रोजेक्ट संस्थानों में नौकरियां दी जाएंगी।

शिक्षा मंत्रालय साफ-तौर पर अपने वादे से पीछे हट रहा है। राज्य सरकारों ने प्रोजेक्ट कार्यान्वयन योजना के तहत काम सुनिश्चित करने की बजाए, हर राज्य सरकार को अपने हिसाब से निर्णय लेने के लिए छोड़ दिया गया है। यह साफ तौर पर राज्य और केंद्र सरकार के लापरवाह रवैये को दर्शाता है। जब वे उपलब्ध उच्च शिक्षित शिक्षकों को नियुक्त नहीं कर रहे हैं, तब उनका यह दवा की वे तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाना चाहते हैं साफ झूठ है। इस पूरे कार्यक्रम का सही उद्देश्य है विश्व बैंक से प्रोजेक्ट के दौरान पैसा लेना। पैसे मिल जाने के बाद प्रोजेक्ट को जारी रखने, नौकरियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने या तकनीकी शिक्षकों को पर्याप्त वेतन देना की कोई कोशिश नहीं है।

शिक्षकों की मांगें जायज़ हैं और उनका समर्थन किया जाना चाहिए।

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