हिरोशिमा और नागासाकी पर बमबारी की 76वीं वर्षगांठ :
साम्राज्यवाद का मानवता के ख़िलाफ़ कभी भी माफ़ न करने के योग्य अपराध

6 अगस्त और 9 अगस्त 1945 को अमरीकी वायु सेना के विमानों ने जापान के शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर क्रमशः दो परमाणु बम गिराए।

इतिहास में यह पहला और एकमात्र मौका था जब इतनी बड़ी संख्या में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को जानबूझकर मारने और नष्ट करने के लिए इतनी घातक क्षमता वाले हथियारों का इस्तेमाल किया गया था।

प्रारंभिक विस्फोटों में 1,40,000 से अधिक लोग मारे गए थे, जबकि बाद के दिनों में लोगों पर हुए भयानक घावों और घातक विकिरण (रेडिएशन) के प्रभाव के कारण, कुल मिलाकर 3 लाख से अधिक लोग मारे गए थे। फलते-फूलते दो शहर, एक ही झटके में बर्बाद हो गए और इमारतों के खाली अवशेष बाकी रह गए। हिरोशिमा और नागासाकी के लोग कई दशकों तक इस बमबारी के भयानक प्रभावों को झेलते रहे। इन परमाणु हथियारों से हुई दर्दनाक तबाही की बर्बरता और भयावहता को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

जबकि जापान और पूरी दुनिया में लोग विश्व शांति के लिए खुद को समर्पित करके 6 अगस्त और 9 अगस्त को मनाते हैं। यह याद रखना ज़रूरी है कि मानवता के ख़िलाफ़ इस जघन्य अपराध का अपराधी अमरीकी साम्राज्यवाद था।

अमरीकी साम्राज्यवादियों ने बम गिराए जाने को यह कहकर उचित ठहराया था कि द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में जापान को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करना आवश्यक था और इस तरह और अधिक लोगों को मौत से बचाने के लिए यह ज़रूरी था। लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि अगस्त 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध का अंत बहुत ही क़रीब था। यह सबको दिख रहा था कि जापान की हार निश्चित थी। जापान के मुख्य सहयोगी, नाज़ी जर्मनी और इटली पहले ही हार चुके थे। चीन, वियतनाम, कोरिया, बर्मा, मलाया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, लाओस और कंबोडिया के लोगों द्वारा छेड़े गए अथक संघर्षों ने, कब्ज़ा करने वाले जापानी साम्राज्यवादियों के इरादों को चकनाचूर कर दिया था। सोवियत लाल सेना (रेड आर्मी) के 10 लाख से अधिक सैनिक मंचूरिया में लोगों को जापानी कब्जे़ से मुक्त कराने में मदद करने के लिए, तब तक वहां पहुंच चुके थे। जापान को पहले ही अपने अधिकांश शहरों पर लगातार बमबारी से काफी नुकसान उठाना पड़ा था। परमाणु बम गिराने से युद्ध की दिशा नहीं बदली।

जापान पर परमाणु बम गिराने के मुख्य कारणों में से एक यह है कि अमरीकी साम्राज्यवाद जापान को तुरंत आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना चाहता था, क्योंकि उसे यह सुनिश्चित करना था कि जापान समाजवादी सोवियत संघ के सामने आत्मसमर्पण न करे, जो कि बिल्कुल मुमकिन था क्योंकि सोवियत लाल सेना उस समय पहले से ही जापान के सागर-पार मंचूरिया में थी। यह सब तब हुआ जब सोवियत संघ अभी भी युद्ध में अमरीका का सहयोगी था। उस समय के हालातों से यह स्पष्ट हो गया था कि अमरीका द्वारा पूरी कोशिश इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए की जा रही थी कि युद्ध के अंत में अमरीका दुनिया की एक बड़ी प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरे और समाजवादी सोवियत संघ की शक्ति और प्रतिष्ठा को कम किया जाए। उस समय परमाणु क्षमता वाली एकमात्र शक्ति के रूप में अमरीका ने समाजवादी सोवियत संघ और दुनिया के सभी लोगों को, जो साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ एक बहादुर संघर्ष कर रहे थे, उन्हें धमकी देने के लिए जापान पर गिराने के लिये परमाणु बमों का इस्तेमाल किया। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि एक साम्राज्यवादी शक्ति के स्वार्थी हितों को पूरा करने के लिए एक ही झटके में लाखों निर्दोष लोगों की जान ले ली गई।

इस प्रकार, हिरोशिमा और नागासाकी पर बमबारी का महत्व यह नहीं था कि इसने द्वितीय विश्व युद्ध का अंत किया, बल्कि इसमें हक़ीक़त यह है कि इसने अमरीकी साम्राज्यवाद जैसी एक नई महाशक्ति के विश्व मंच पर आगमन की घोषणा की, जो विश्व प्रभुत्व के अपने खुदगर्ज लक्ष्य को हासिल करने के लिए, लोगों के ख़िलाफ़ सबसे घातक हथियारों का जो उस समय मानव जाति के सबसे भयंकर हथियार थे, उनका उपयोग करने के लिए तैयार था। उसके बाद के वर्षों में अमरीका ने अपने परमाणु-शस्त्रागार का निर्माण किया, जिसमें हजारों परमाणु-हथियार और उससे भी अधिक शक्तिशाली हाइड्रोजन बम शामिल थे और जिनके निशाने पर सोवियत संघ, चीन, कोरिया, वियतनाम और यूरोप के पीपुल्स डेमोक्रेसी के देशों के सैकड़ों शहर और कस्बे थे।

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद के दशकों में अमरीकी साम्राज्यवाद ने बार-बार यह साबित किया है कि वह वैश्विक-प्रभुत्व के अपने लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए सामूहिक विनाश और देशों को बर्बाद करने में सक्षम हथियारों का उपयोग करने में कोई संकोच नहीं करेगा। युद्ध के अंत के तुरंत बाद, यूनान के लोगों के क्रांतिकारी संघर्ष को कुचलने के लिए अमरीका ने यूनान में हस्तक्षेप किया। इसने सोवियत संघ और यूरोप में हाल ही में मुक्त हुए देशों, क्रांतिकारी चीन के साथ-साथ लोगों के मुक्ति-संघर्षों को दबाने के लिए, नाटो, सीटो और सेंटो जैसे आक्रामक सैन्य गठबंधन बनाए। इसने 1950 में कोरियाई-युद्ध शुरू किया, जिसमें हजारों लोगों की जानें गईं और अन्त में, कोरिया का स्थायी विभाजन हो गया। कम्युनिस्टों के नेतृत्व में जब वियतनामी सेनानियों ने अपने देश को फ्रांसीसी उपनिवेशवाद से मुक्त कराने में सफलता पायी, अमरीकी साम्राज्यवाद ने तुरंत वियतनाम के दक्षिणी भाग में अपने चमचों (कठपुतली) के शासन का समर्थन करने के लिए वहां अपनी सेना भेजी। लंबे समय तक चलने वाले इस युद्ध को कंबोडिया और लाओस के पड़ोसी देशों में भी विस्तारित किया गया था, अमरीका ने कुख्यात एजेंट ऑरेंज जैसे रासायनिक हथियारों सहित और भी अधिक और नए घातक हथियारों का परीक्षण किया। अमरीकी साम्राज्यवादियो ने, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे अन्य देशों में ऐसे दमनकारी-शासकों का समर्थन किया जिन्होंने हजारों लोकतांत्रिक और प्रगतिशील लोगों का क़त्ल किया।

जब सोवियत संघ एक समाजवादी देश से एक सामाजिक साम्राज्यवादी देश में तब्दील हो गया, तब विश्व प्रभुत्व के लिए अमरीका के साथ मिलीभगत और संघर्ष करते हुए, इन दो महाशक्तियों ने अपने परमाणु शस्त्रागार का उपयोग, अन्य देशों को धमकाने और ब्लैकमेल करने के लिए किया। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भी, इन घातक हथियारों का भंडार सुरक्षित है और उनको कभी भी तुरंत इस्तेमाल के लिए तैयार रखा गया है जिससे पूरी मानव जाति के लिए एक भयंकर ख़तरा पैदा हो गया है। परमाणु हथियारों के अलावा, अमरीकी साम्राज्यवाद ने कई अन्य भयानक हथियारों को विकसित करने का बीड़ा उठाया है ऐसे रासायनिक और जैविक हथियार जिनके द्वारा जब चाहे, लोगों और पर्यावरण को और भी अधिक नुकसान पहुंचाया जा सकता है।

नई सहस्राब्दी में अमरीकी साम्राज्यवाद ने पूरी दुनिया पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के अपने खूनी रिकॉर्ड को जारी रखा है। किसी भी देश को जो उनके अपने मंसूबों को हासिल करने में रोड़ा नज़र आता है, अमरीकी साम्राज्यवाद उसे ‘आतंकवादी’ या ‘दुष्ट राज्य’ घोषित कर देता है और फिर उस पर निर्मम हमला करता है। पिछले दो दशकों में अमरीका ने इसी तरह अफ़गानिस्तान, ईराक, लीबिया और सीरिया जैसे देशों को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है, हजारों निर्दोष लोगों की हत्या की है और इस प्रकार दुनिया के समृद्ध देशों की प्रगति की संभावनाओं को कई दशकों तक के लिए रोक दिया है।

हमें इस हक़ीक़त पर गौर करने की ज़रूरत है कि जिस महाशक्ति ने सामूहिक विनाश के हथियारों के उपयोग का बीड़ा उठाया और उन्हें विकसित करना व उनका इस्तेमाल करना जारी रखा है। उसने पहले यह झूठ गढ़ा कि ईराक के नेता सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के हथियार हैं और फिर उसने इस झूठ का इस्तेमाल करके उस देश पर आक्रमण किया और उसे पूरी तरह से बर्बाद कर दिया!

इसलिए आज जब हम, 76 साल पहले हिरोशिमा और नागासाकी के लोगों के क़त्लेआम, उनके ख़िलाफ़ किये गए जघन्य अपराध और उनके दर्द को याद करते हैं, तो हम यह कभी नहीं भूल सकते कि इसके लिए कौन ज़िम्मेदार था।

हमें स्पष्ट रूप से यह समझना चाहिए कि आधुनिक युग में, दुनिया में लोगों के ख़िलाफ़ युद्धों और लोगों और देशों के सामूहिक विनाश का मूल कारण अमरीकी साम्राज्यवाद के नेतृत्व में, साम्राज्यवाद ही है जिसने लाखों लोगों के जीवन को बर्बाद कर दिया है और जो लोगों की शांति और सुरक्षा के लिए लगातार एक ख़तरा बना हुआ है।

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