अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर वर्ग दिवस, मई दिवस ज़िंदाबाद!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का आह्वान, 1 मई, 2021

मज़दूर साथियों,

आज मई दिवस, अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर वर्ग दिवस है। बीते 131 वर्षों से, सारी दुनिया में मज़दूर अपने वर्ग के इस दिवस पर जश्न मनाते आ रहे हैं। हम अपनी जीतों पर खुशियां मनाते हैं और अपनी हारों से सबक लेते हैं, ताकि अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकें। हम अपनी फौरी आर्थिक और राजनीतिक मांगों के लिए संघर्ष करते हैं और साथ-साथ, एक शोषण-दमन से मुक्त, नए समाजवादी समाज का निर्माण करने के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए भी संघर्ष करते हैं।

अपने देश में यह लगातार दूसरा वर्ष है जब हम मज़दूरों को मई दिवस पर अपनी रैलियां करने से रोका जा रहा है। कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के नाम पर, केंद्र सरकार ने बीते 14 महीनों से मज़दूरों की सभी रैलियों और विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगा रखी है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी अपने और दूसरे देशों के मज़दूरों को लाल सलाम करती है, जो इन कठिन हालातों में पूंजीपतियों और उनकी सरकारों के हमलों के ख़िलाफ़ जुझारू संघर्ष करते आ रहे हैं।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी रेलवे, सड़क परिवहन, कोयला, पेट्रोलियम उद्योग, रक्षा उद्योग, बिजली उत्पादन और वितरण, बैंकिंग और बीमा, आदि के मज़दूरों को सलाम करती है, जो निजीकरण के ख़िलाफ़ बड़ी बहादुरी से संघर्ष कर रहे हैं।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी उन लाखों-लाखों किसान बहनों-भाइयों को सलाम करती है, जो बीते 6 महीनों से दिल्ली की सीमाओं पर अपना ऐतिहासिक संघर्ष कर रहे हैं, यह मांग करते हुए कि तीनों किसान-विरोधी कानूनों को रद्द किया जाये और किसानों की रोज़ी-रोटी की सुरक्षा सुनिश्चित की जाये।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की व्यवस्था के पूरी तरह फेल हो जाने के लिए, केंद्र सरकार की कड़ी निंदा करती है। हर रोज़ हजारों-हजारों लोग मर रहे हैं। एक साल पहले, सरकार ने बड़ी बेरहमी के साथ हमारे ऊपर लॉकडाउन थोप दिया था, इस वादे के साथ कि उस दरमियान सरकार महामारी से निपटने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में आवश्यक सुधार लायेगी। पर सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की समस्याओं को हल करने के लिए कुछ भी नहीं किया। सरकार ने धार्मिक मेलों में लोगों की भीड़ को इकट्ठा होने की पूरी इज़ाज़त दी, बड़ी-बड़ी चुनाव रैलियों की इज़ाज़त दी, जिन सबकी वजह से वायरस का और ज्यादा प्रसार हुआ। इसका परिणाम आज हमारे सामने एक भयानक मानवीय त्रासदी के रूप में खुलकर आ रहा है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी इस महामारी के शिकार बने सभी मृतकों के परिजनों को अपनी हार्दिक संवेदना प्रकट करती है। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी उन सभी नर्सों, डाक्टरों, सफाई कर्मचारियों, एम्बुलेंस ड्राइवरों, आंगनवाडी कर्मियों और उन सभी कार्यकर्ताओं को सलाम करती है, जो मानव सेवा के लिए खुद की जान को जोखिम में डाल कर दिन-रात काम कर रहे हैं।

लॉकडाउन की वजह से, करोड़ों फैक्ट्री मज़दूरों, ऑफिस मज़दूरों और निर्माण मज़दूरों को शहरों को छोड़कर गांव वापस जाना पड़ा है। उनके पास अपने और अपने परिवारों के पेट को भरने के कोई साधन नहीं हैं, कमरे का किराया देने का कोई साधन नहीं है। सरकार उनके साथ दूसरी श्रेणी के नागरिक जैसा बर्ताव करती है और उन्हें कोई हक़ नहीं देती है। केंद्र सरकार ने कभी वादा किया था कि सभी मज़दूरों को सामजिक सुरक्षा सुनिश्चित करेगी, परतु अब वे सब वादे झूठे साबित हो चुके हैं।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी हमारे करोड़ों-करोड़ों “आप्रवासी” कहलाने वाले मज़दूर भाइयों और बहनों के साथ इस अमानवीय बर्ताव के लिए केंद्र सरकार की कड़ी से कड़ी निंदा करती है।

मज़दूर साथियों,

ऐसा कहा जाता है कि जब हिन्दोस्तान आज़ाद हुआ था, तब हम, इस देश के लोग, देश के मालिक बन गए थे। पर यह सच नहीं है। सच तो यह है कि इस देश में मुट्ठीभर अति-धनवानों की हुकूमत चलती है। फैक्ट्रियों, खदानों, बैंकों, रेलवे –  यानी उत्पादन और विनिमय के सभी साधनों के जो मालिक हैं और जो उन पर नियंत्रण करते हैं, आज वे ही हिन्दोस्तान के मालिक हैं। यह हुक्मरान पूंजीपति वर्ग है, जिसकी अगुवाई करने वाले हैं टाटा, अंबानी, बिरला, अडानी और अन्य इजारेदार पूंजीवादी घराने। वे अपने ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने के लिए बेरहमी से हमारा शोषण करते हैं और हमारा खून-पसीना चूसकर बाद में, हमें निचोड़े हुए नींबू की तरह फेंक देते हैं।

हम मज़दूर उत्पादन के साधनों के न तो मालिक हैं और न ही उन पर नियंत्रण करते हैं। हमें जीने के लिए पूंजीपति वर्ग को अपनी श्रम शक्ति बेचनी पड़ती है। हम में से अनेकों को रोज़ी-रोटी के लिए प्रतिदिन 10-12 घंटे और हफ्ते में  6-7 दिन लगातार काम करना पड़ता है। सिर्फ कुछेक गिने-चुने मज़दूरों को ही श्रम कानूनों की सुरक्षा मिलती है, और वह भी अक्सर मात्र काग़ज़ी तौर पर। वास्तव में ये श्रम कानून कभी लागू नहीं होते क्योंकि राज्य की पूरी मशीनरी पूंजीपतियों के हितों की रक्षा करती है, मज़दूरों के हितों की नहीं।

गांवों में रहने वाले हमारे भाइयों-बहनों की हालत इससे कुछ बेहतर नहीं है। उनमें से ज्यादातर भूमिहीन हैं या ज़मीन के छोटे-छोटे पट्टों पर फ़सल पैदा करके गुजारा करते हैं। उन्हें अपने परिवारों का पेट भरने के लिए दूसरों की ज़मीन पर या फिर मनरेगा जैसी योजनाओं में काम करना पड़ता है। हर साल, ज्यादा से ज्यादा किसान परिवार तबाह हो जाते हैं। हर साल लाखों-लाखों किसान भाई-बहन शहरों में आकर निर्माण स्थानों पर या कहीं और काम की तलाश करने को मजबूर होते हैं।

मुंबई के धारावी में 10 लाख मज़दूर और उनके परिवार मात्र 2 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र के अन्दर जीने को मजबूर हैं। सैकड़ों-सैकड़ों मज़दूरों को “पोंगल” निवासों में बारी-बारी से बिस्तर पर सोने को मिलता है। दिल्ली के संगम विहार में लगभग 15 लाख लोग रहते हैं, जहां 75 प्रतिशत घरों में पीने के पानी की सप्लाई नहीं है। वहां लोग पानी के टैंकरों के माफिया की रहनुमाई पर जीते हैं। बस्तियों की पतली गलियों और सड़कों पर सीवर का पानी बहता रहता है क्योंकि सीवर के पानी के निकलने का और कोई साधन नहीं है।

यही है हमारे देश के अधिकतम मज़दूरों की हालत। मज़दूर बेहद गंदगी और भीड़-भाड वाली हालतों में रहने को मजबूर होते हैं। मज़दूरों के रिहायशी इलाकों को तरह-तरह के नाम दिए जाते हैं – स्लम, अनाधिकृत कॉलोनी, झुग्गी-झोंपड़ी कॉलोनी – ताकि मज़दूरों को खुद को ही अपनी दुखद हालतों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाये। हमें बताया जाता है कि हम “अवैध” हैं, इसलिए हमें छोटी से छोटी चीज़ के लिए सरकार का आभारी होना चाहिए। हमें पीने, खाना बनाने या शौचालय जाने के लिए पानी नहीं मिलता है। हमारे बच्चे बाल्टी लेकर, घंटों तक लाइन में लगकर, पानी के टैंकर का इंतजार करते हैं। इन हालतों में जब राज्य के अधिकारी लोगों को यह नसीहत देते हैं कि दो गज़ की दूरी बनाये रखो और बार-बार साबुन से हाथ धोते रहो, तो यह घाव पर नमक छिड़काने वाली बात है। जब आपको पानी के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ता है, तो आप दो गज़ की दूरी कैसे बनाये रखेंगे? अपने छोटे से कमरे में सभी परिवार वालों के साथ रहते हुए, आप दो गज़ की दूरी कैसे बनाये रखेंगे?

हर दिन जीने का संघर्ष है। ज्यादातार मज़दूरों को सुबह यह नहीं मालूम होता है कि रात को उसके बच्चों को दो रोटी नसीब होगी या नहीं। उन्हें काम की तलाश में, फैक्ट्रियों के दरवाज़े खटखटाने पड़ते हैं या लेबर मार्किट में जाकर लेबर चैक पर खड़ा होना पड़ता है।

सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, पर मज़दूरों और किसानों को इंसान नहीं माना जाता है। सरकारें सिर्फ पूंजीपति वर्ग के हितों की हिफ़ाज़त करने का काम करती हैं। हमारे बच्चे चाहे कुपोषण के शिकार हों या किसी और बीमारी के, चाहे वे ज़िंदा रहें या मर जायें, शिक्षा पाएं या न पाएं, नौकरी पाएं या न पाएं, सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं है।

मज़दूर साथियों,

हमारे हुक्मरान हमारे दुःख-दर्द के लिए हमें खुद को ही ज़िम्मेदार बताते हैं। बचपन से हमें यही बताया जाता है कि हम आज इसलिए दुखी हैं क्योंकि हमने पिछले जन्म में कोई पाप किया होगा। दूसरी तरफ, हमें यह बताया जाता है कि टाटा, बिरला, अंबानी और दूसरे पूंजीपति मेहनती लोग हैं जिन्होंने अपने खून-पसीने से अरबों रुपये कमाए हैं। परन्तु सच्चाई इसका ठीख उल्टा है।

पूंजीपतियों ने हमारे श्रम का शोषण करके, हमारे किसान भाइयों को लूट कर और हमारे देश के कुदरती संसाधनों को लूट कर, अपनी-अपनी तिजौरियों में ढेर सारी दौलत इकट्ठा कर रखी है। सौ साल पहले, ब्रिटिश राज के दौरान, उन्होंने अपने मिल, फैक्ट्री और खदान स्थापित कर रखे थे। उन्होंने किसानों को जागीरदारों और अंग्रेजों को भारी टैक्स देने को मजबूर करके, बर्बाद कर दिया था। किसानों को नील और अफीम जैसी फ़सलें उगाने को मजबूर किया गया। बस्तीवादी शासन के दौरान हिन्दोस्तान में बार-बार अकाल पड़ते थे। इन हालातों से तबाह होकर, किसानों को शहरों में जाकर हिन्दोस्तानी और अंग्रेज पूंजीपतियों के मिलों और फैक्ट्रियों में काम करना पड़ा। उन्हें बहुत ही कठिन हालतों में दिन-रात काम करना पड़ता था और उनके कोई अधिकार नहीं होते थे। हिन्दोस्तानी और अंग्रेज पूंजीपतियों ने बड़े-बड़े ज़मींदारों के साथ गठबंधन बना लिये और उन्होंने मज़दूरों-किसानों का बेरहम शोषण करके खूब धन कमाए।

आज़ादी के संघर्ष में पूंजीपति वर्ग और मज़दूर वर्ग के अलग-अलग उद्देश्य थे। पूंजीपति वर्ग अंग्रेजों की जगह को खुद लेकर, उसी शोषण और लूट की व्यवस्था को बरकरार रखना चाहते थे। मज़दूर वर्ग ने मज़दूर-किसान का राज और शोषण-दमन से मुक्त समाज की स्थापना करने के उद्देश्य के साथ संघर्ष किया था।

जब हिन्दोस्तान आज़ाद हुआ तो राज्य सत्ता देश के पूंजीपतियों और जागीरदारों के हाथों में आ गयी। कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व के प्रतिनिधित्व में, पूंजीपति वर्ग ने आज़ाद हिन्दोस्तान पर अपनी हुकूमत को वैधता देने वाले संविधान और संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था स्थापित की। उन्होंने उसी न्याय व्यवस्था को बरकरार रखा, जिसके अनुसार मज़दूरों और किसानों को हमेशा ही पूंजीपति वर्ग की गुलामी करते रहना पड़ेगा और अगर वे प्रतिरोध करते हैं तो उन्हें अपराधी माना जायेगा।

मज़दूर साथियों,

जब से अंग्रेजों का राज ख़त्म हुआ तब से यही पूंजीपति वर्ग देश का एजेंडा तय करता आ रहा है। पूंजीपतियों ने अपने खुदगर्ज़ हितों के अनुसार, सरकार से नीतियां बनवाई हैं, जबकि वे मज़दूरों और किसानों को बुद्धू बनाने के लिए तरह-तरह के शानदार नारे देते रहते हैं।

1947 के बाद के दशकों में इजारेदार पूंजीवादी घरानों ने पूंजीवाद को विकसित करने की अपनी योजना को तथाकथित “समाजवादी नमूने के समाज” के रूप में पेश करने के लिए नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी पर निर्भर किया था। टाटा, बिरला और दूसरे बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों के हित के लिए, उद्योग और ढांचागत व्यवस्था में एक सार्वजनिक क्षेत्र की स्थापना की गयी थी। जिन-जिन क्षेत्रों में हिन्दोस्तानी औद्योगिक घराने अपना वर्चस्व जमाना चाहते थे, उनमें विदेशी पूंजीनिवेश पर पाबंदियां लगाई गयीं। यह भ्रम फैलाया गया कि शोषक पूंजीवादी व्यवस्था के अन्दर ही मज़दूरों और किसानों के हितों की रक्षा की जा सकती है।

1980 के दशक तक, राज्य पर निर्भर होकर और जनता के धन को लूटकर, हिन्दोस्तान में पूंजीवाद के तेज़ गति से विस्तार करने की क्षमता ख़त्म हो गयी थी। 1991 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ, तब हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपतियों ने फै़सला किया कि इस नए दौर में, अपने विश्वव्यापी साम्राज्यवादी लक्ष्यों को अंजाम देने के लिए, उन्हें अपने तौर-तरीके बदलने चाहियें। उन्होंने उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के तथाकथित “सुधार” कार्यक्रम को अपनाने का फैसला किया।

बीते 30 सालों में जो भी सरकार आयी है, चाहे कांग्रेस पार्टी की हो या भाजपा की, उसने कुछ-कुछ क्षेत्रों में मज़दूरों को मिलने वाली सीमित कानूनी सुरक्षाओं को और कम करने का काम किया है। हर सरकार ने इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अमीरी को जल्द से जल्द बढ़ाने के रास्ते से सभी रुकावटों को दूर करने के लिए, बड़ी वफ़ादारी से काम किया है। श्रम कानूनों को “सुधारने” के नाम पर, उन्होंने काम के घंटों को बढ़ा दिया है, सभी फैक्ट्री मालिकों को मनमर्ज़ी से मज़दूरों को काम पर रखने और काम से निकालने और हर प्रकार से मज़दूरों के शोषण को बढ़ाने की छूट दे दी है। मज़दूर वर्ग के संगठित भाग के अधिकारों और काम की शर्तों पर हमला करके, पूंजीपति वर्ग पूरे मज़दूर वर्ग की हालतों को दबाने की कोशिश कर रहा है।

पूंजीपति वर्ग एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था और चुनाव प्रक्रिया के ज़रिये राज करता है, जिसमें मज़दूर वर्ग और मेहनतकशों को गुमराह करके, आपस में बांट दिया जाता है। इस व्यवस्था के ज़रिये, यह भ्रम फ़ैलाया जाता है कि जिस पार्टी की सरकार बनती है, वह हमारे जीवन की हालतों को तय करती है। दिन-रात यह प्रचार किया जाता है कि लोगों को पूंजीपति वर्ग की इस या उस पार्टी में से किसी एक का पक्ष ले लेना चाहिए।

चुनाव पूंजीपति वर्ग का एक हथकंडा मात्र है, जिसके सहारे वह यह फ़ैसला करता है कि अगले कुछ सालों के लिए सरकार को चलाने का दायित्व किस पार्टी को दिया जायेगा। जिस तरह कोई फैक्ट्री मालिक पूंजीपति अपने कारोबार को और बेहतर चलाने के लिए समय-समय पर अपने मैनेजर को बदलता है, ठीक उसी तरह पूंजीपति वर्ग सरकार को चलाने का दायित्व उस पार्टी को सौंपता है जो सबसे बेहतर तरीक़े से लोगों को बुद्धू बनाएगी और साथ ही साथ, सबसे बेहतर तरीक़े से उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के जन-विरोधी कार्यक्रम को लागू करेगी। कांग्रेस पार्टी, भाजपा या कोई और पार्टी, जो भी सरकार को चलाती है, वह सिर्फ पूंजीपतियों की मैनेजमेंट टीम (प्रबंधक दल) है। इसलिए, किसी एक पार्टी को सरकार से हटाकर, किसी दूसरी पार्टी को सरकार में बिठाने से लोगों की हालत नहीं बदलेगी।

शोषण, बेरोज़गारी, असुरक्षा और दुःख-दर्द से भरी इस वर्तमान व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था और पूंजीपति वर्ग की हुकूमत को ख़त्म करना होगा।

हम मज़दूरों को किसानों के साथ मिलकर, इस देश का मालिक बनने के राजनीतिक लक्ष्य के साथ संघर्ष करना होगा। ऐसा करके ही हम एक सच्चे माइने में समाजवादी हिन्दोस्तान का निर्माण कर सकेंगे, जिसमें मेहनतकश लोगों का शोषण-दमन नहीं होगा।

मज़दूर साथियों,

हम अपनी सांझी मांगों को लेकर, हाल के सालों में बार-बार विरोध प्रदर्शन और सर्व हिन्द हड़तालें करते आये हैं। बीते लगभग 6 महीनों से किसान तीनों किसान-विरोधी क़ानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर, दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन कर रहे हैं। हमें खुद से यह सवाल पूछना पड़ेगा, कि क्या इन कार्यक्रमों का वास्तव में कोई असर हुआ है? क्या पूंजीपति वर्ग हमारी इन मांगों में से किसी एक मांग को भी मानने को मजबूर हुआ है? नहीं! हमारे तमाम प्रदर्शनों और हड़तालों से पूंजीपति वर्ग को कोई फ़र्क नहीं पड़ा है।

हमारे प्रदर्शनों और हड़तालों का पूंजीपति वर्ग और उनकी सरकार पर कोई असर क्यों नहीं पड़ता? इसका यह कारण है कि जब तक हमारे आंदोलनों और प्रदर्शनों का राजनीतिक मक़सद वर्तमान संसदीय व्यवस्था के अन्दर सीमित रहेगा, तब तक पूंजीपति वर्ग को इनसे कोई ख़तरा नहीं है।

पूंजीपति वर्ग की इस हुकूमत को झकझोरने के लिए, हमें संसदीय पार्टियों द्वारा फैलाये गए भ्रमों को ख़ारिज़ करना होगा। हमारा जो पुराना नारा रहा है, कि “जो सरकार निकम्मी है, वह सरकार बदलनी है!”, उसे छोड़कर अब हमें आगे बढ़ना होगा। मोदी सरकार की जगह पर पूंजीपति वर्ग की किसी और पार्टी की सरकार को लाने से हम मज़दूरों और किसानों की हालत नहीं बदलने वाली है।

हमें उत्पादन के बड़े-बड़े साधनों – फैक्ट्रियों, खदानों, बैंकों, रेलवे, आदि – की मालिकी और नियंत्रण को पूंजीपति वर्ग के हाथों से छीनकर, अपने हाथों में लेने और उन्हें सामाजिक मालिकी व नियंत्रण में लाने के उद्देश्य के साथ, अपने संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा। ऐसा करने के लिए हम मज़दूरों को एकजुट राजनीतिक ताक़त बनना होगा और किसानों के साथ मजबूत गठबंधन बनाना होगा।

हिन्दोस्तान हम मज़दूरों और किसानों का है! हिन्दोस्तान पूंजीपति वर्ग की निजी जागीर नहीं है। परन्तु आज हिन्दोस्तान पूंजीपति वर्ग और उसके साम्राज्यवादी मित्रों के हाथों में है। वे देश को अपनी निजी जागीर की तरह चला रहे हैं। हमें पूंजीवादी व्यवस्था की जगह पर मज़दूरों और किसानों की हुकूमत स्थापित करनी होगी। ऐसा करके ही हम समाज को नयी बुनियादों पर स्थापित कर सकेंगे, ताकि सबकी सुख-सुरक्षा सुनिश्चित हो।

जब हम हिन्दोस्तान के मालिक बनने के उद्देश्य के साथ अपने संघर्ष को आगे बढ़ाएंगे, तब हम अपनी कुछ फौरी मांगों को भी जीत सकेंगे और निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण के समाज-विरोधी हमले के खि़लाफ़ संघर्ष को आगे बढ़ा सकेंगे।

मई दिवस 2021 के अवसर पर, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी मज़दूरों से आह्वान करती है कि निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण के पूंजीवादी कार्यक्रम के खि़लाफ़ और सबके अधिकारों की हिफ़ाज़त में, अपने संघर्ष को तेज़ करें। मज़दूर-किसान एकता मजबूत करें। पूंजीवाद की जगह पर समाजवाद का निर्माण करने के उद्देश्य के साथ अपने संघर्ष को आगे बढायें। एक ऐसी नई व्यवस्था बनाने के लिए संघर्ष करें, जिसमें उत्पादन सामजिक मालिकी और नियंत्रण में होगा और इंसान द्वारा इंसान के शोषण का कोई आधार नहीं रहेगा।

दुनिया के मज़दूरों एक हो!

मज़दूर-किसान एकता ज़िंदाबाद!

इंक़लाब ज़िंदाबाद!

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