भारतीय रेल का निजीकरण भाग-1 : भारतीय रेल के निजीकरण के ख़िलाफ़ बढ़ता विरोध

भारतीय रेल हमारे देश की जीवन रेखा है जिसमें हर वर्ष लगभग 800 करोड़ लोग यात्रा करते हैं। चाहे कार्यस्थल हो या फिर गृह नगर या गांव के बीच, करोड़ों मज़दूरों के लिए वह लंबी दूरी की यात्रा का एकमात्र विश्वसनीय और किफ़ायती साधन है। इसके अलावा, इन लाइनों पर हर साल 110 करोड़ टन से अधिक माल का परिवहन भी होता है, जिसमें भोजन से लेकर कोयला तक, सभी कुछ ढोया जाता है। इसका लगभग 68,000 किलोमीटर का रेल मार्ग हमारे विशाल देश के विभिन्न हिस्सों को जोड़ता है। अस्थायी अनुबंधों वाले लगभग 4 लाख श्रमिकों सहित लगभग 16-5 लाख कर्मचारियों के साथ, यह देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का नियोक्ता है। भारतीय रेल का वार्षिक राजस्व 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। 165 वर्षों के दौरान, उसके स्वामित्व वाली विशाल भू-संपदा के अलावा, लगभग 6 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति का निर्माण सार्वजनिक धन से किया गया है। वास्तव में यह देश की जीवन रेखा होने के साथ-साथ देश के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारतीय अर्थव्यवस्था और इसके लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद, देश के लोगों की इस मूल्यवान संपत्ति का निजीकरण देशी और विदेशी इजारेदारों के लाभ के लिए किया जा रहा है। ये इजारेदार भारतीय रेल के लाभदायक परिचालन पर गिद्ध की तरह नज़रें गड़ाए हुए हैं।

हिन्दोस्तान और अन्य देशों में इसी तरह के निजीकरण  का जीवन-अनुभव यह दर्शाता है कि भारतीय रेल का निजीकरण इसके लाखों कर्मचारियों और करोड़ों रेल यात्रियों के हित में नहीं है।

हिन्दोस्तानी मज़दूर वर्ग का सबसे बड़ा संगठित हिस्सा होने के नाते भारतीय रेल के मज़दूरों को न केवल भारतीय रेल के निजीकरण का विरोध करना है, बल्कि अन्य सभी सार्वजनिक क्षेत्रों के उद्यमों के मज़दूर-विरोधी, जन-विरोधी निजीकरण के विरोध को भी नेतृत्व प्रदान करना है।

29 अक्तूबर, 2020 को रेल मज़दूरों ने भारतीय रेल के निजीकरण के विरोध हेतु तथा अपनी एकता को मजबूत करने के लिए एक निर्णायक क़दम उठाया, जब उन्होंने राष्ट्रीय रेलवे संघर्ष समन्वय समिति (एन.सी.सी.आर.एस.) को पुनर्गठित करने का निर्णय लिया। भारतीय रेल के निजीकरण की सरकार की योजना का विरोध करने हेतु, देशभर से प्रमुख फेडरेशनों, यूनियनों और श्रेणी-अनुसार एसोसिएशनों – ऑल इंडिया रेलवेमेन फेडरेशन, नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन रेलवेमेन, भारतीय रेल मज़दूर संघ, आल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन, ऑल इंडिया गाड्र्स काउंसिल, ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन, ऑल इंडिया ट्रेन कंट्रोलर्स एसोसिएशन, इंडियन रेलवे टिकट चेकिंग स्टाफ ऑर्गनाइजेशन, इंडियन रेलवे सिग्नल एंड टेलीकॉम मेंटेनर्स यूनियन, ऑल इंडिया ट्रैक मेंटेनर्स यूनियन, ऑल इंडिया रेलवेमेन कॉन्फेडरेशन, इंडियन रेलवे लोको रनिंग मेंस ऑर्गनाइजेशन, रेलवे कर्मचारी ट्रैक मेंटेनर्स एसोसिएशन, दक्षिण रेलवे इंलाॅईज यूनियन, इंडियन रेलवे टेक्निकल सुपरवाइज़र्स एसोसिएशन, ऑल इंडिया एस.सी. और एस.टी. रेलवे इंलाईज़ एसोसिएशन के राष्ट्रीय नेताओं साथ-साथ कामगार एकता कमेटी (के.ई.सी.) उस दिन एकजुट हो गये। हमें यह याद रखना होगा कि इसी एन.सी.सी.आर.एस. ने 1974 की ऐतिहासिक रेलवे हड़ताल का नेतृत्व किया था।

पुनर्गठित एन.सी.सी.आर.एस. के सभी घटकों द्वारा संगठन और एकता की आवश्यकता को उस बैठक में स्वीकारा गया। अपने सारे मतभेदों के बावजूद वे निजीकरण और निगमीकरण का विरोध करने के लिए एक साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध थे।

अपने पहले क़दम के रूप में, एन.सी.सी.आर.एस. ने संघर्ष को तीव्र और सभी रेल मज़दूरों व उनके परिवारों को एकजुट करने के लिए, “भारतीय रेल के निजीकरण और निगमीकरण के कार्यक्रम को हराने के लिए एकजुट हों” नामक एक पुस्तिका के प्रकाशन का फ़ैसला किया।

सितंबर 2020 से, के.ई.सी. “निजीकरण केख़िलाफ़ एकजुट हों” विषय की श्रृंखला के अंतर्गत मीटिंगों को आयोजित कर रहा है! (पिछली बैठकों की रिपोर्ट के लिए www.hindi.cgpi.org को देखिए)। सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों और सेवाओं के साथ-साथ लोगों के संगठनों, कार्यकर्ताओं और इच्छुक नागरिकों की बड़ी संख्या के साथ-साथ राष्ट्रीय नेताओं ने इन मीटिंगों में बहुत गंभीरता से भाग लिया है। अब तक आयोजित इन दस मीटिंगों में एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष जो बार-बार उभर कर आया, वह है कि यूनियन और राजनीतिक संबद्धताओं से परे होकर, हमें एक साथ आकर निजीकरण का विरोध करने की ज़रूरत है। बड़े पैमाने पर लोगों को निजीकरण के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में शिक्षित करने की भी आवश्यकता है। मज़दूरों, महिलाओं, युवाओं, सेवानिवृत्त लोगों और सभी उपभोक्ताओं और उपयोगकर्ताओं के सभी समूहों को संगठित करके, निजीकरण केख़िलाफ़ एक मजबूत आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए! कई संगठन जागरुकता फैलाने के लिए पहले से ही सोशल मीडिया के साथ-साथ समाचार पत्रों का उपयोग करके इस संदेश को प्रचारित करने के लिए काम कर रहे हैं।

रेलवे के निजीकरण की सरकार की 100-दिन की योजना केख़िलाफ़ मीटिंग-फाइल फोटो

2019 में मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के सत्ता में आते ही, उसने भारतीय रेल की विभिन्न इकाइयों को अलग-अलग करके उनके पुनर्गठन लिए 100-दिन की कार्य योजना की घोषणा की। यह कुछ और नहीं बल्कि भारतीय रेल के निजीकरण की योजना थी। पूरे देश में रेल कर्मचारियों ने इस योजना का कड़ा विरोध किया। रेलवे के निजीकरण केख़िलाफ़ संघर्ष में रेल कर्मचारियों की एकता को एक महत्वपूर्ण सफलता तब मिली जब सात यूनियनों और एसोसिएशनों – ऑल इंडिया गाड्र्स काउंसिल (ए.आई.जी.सी.), ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (ए.आई.एल.आर.एस.ए.), ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन (आई.एस.एम.ए.), ऑल इंडिया रेलवे ट्रैक-मेंटेनर्स यूनियन (ए.आई.आर.टी.एम.यू.), ऑल इंडिया ट्रेन कंट्रोलर्स एसोसिएशन (ए.आई.टी.सी.ए.), इंडियन रेलवे टिकट चेकिंग स्टाफ ऑर्गनाइजेशन (आई.आर.टी.सी.एस.ओ.), रेल मज़दूर यूनियन (आर.एम.यू.) के साथ-साथ कामगार एकता कमेटी (के.ई.सी.) और लोक राज संगठन (एल.आर.एस.) के एक संयुक्त मंच ने इस योजना का विरोध करने के लिए 2 अगस्त, 2019 को मुंबई में एक बैठक आयोजित की।

निजीकरण के ख़िलाफ़ प्रदर्शन-फाइल फोटो

भारतीय रेल की सात उत्पादन इकाइयों का निगमीकरण करना सरकार की इस कार्ययोजना का एक हिस्सा था। मज़दूर अपने अनुभव से जानते हैं कि निगमीकरण निजीकरण  की दिशा में पहला क़दम है। रेल मज़दूरों ने सभी उत्पादन इकाइयों में संयुक्त कार्यवाहियों के माध्यम से सफलतापूर्वक संघर्ष किया और सरकार को निगमीकरण की अपनी योजना को स्थगित करने के लिए मजबूर किया।

वाराणसी में रेलवे बचाओ प्रदर्शन-फाइल फोटो

100-दिन की योजना की कई सिफारिशें मोदी सरकार द्वारा सितंबर 2014 में गठित बिबेक देबरॉय कमेटी की रिपोर्ट पर आधारित थीं। इस कमेटी का प्रमुख उद्देश्य भारतीय रेल को क़दम-दर-क़दम बांटकर निजी संचालकों को सौंपना था, जिसका रेलवे की सभी ट्रेड यूनियनों द्वारा डटकर विरोध किया गया।

निजीकरण केख़िलाफ़ रेल मज़दूरों के बढ़ते संघर्ष का समर्थन करने के लिए, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी (सी.जी.पी.आई.) ने मई 2018 में एक पुस्तिका निकाली, जिसका शीर्षक था “भारतीय रेल के निजीकरण  को एकजुट होकर हराएं”(इस पुस्तिका की हजारों प्रतियां रेल मज़दूरों के बीच वितरित की गईं, ताकि उन्हें यह पता चल सके कि भारतीय रेल का निजीकरण किस तरह से वर्षों से क़दम-दर-क़दम किया जा रहा है और सत्ता में आने वाली हर पार्टी ने उसे आगे बढ़ाया है।

2014 में जब देबरॉय कमेटी ने पूरे भारतीय रेल के निगमीकरण और निजीकरण की सिफारिश की थी, तब रेल मज़दूरों के मजबूत विरोध से बाध्य होकर तत्कालीन रेल मंत्री, श्री सुरेश प्रभु को यह घोषणा करने के लिए मजबूर होना पड़ा था कि देबरॉय कमेटी की सिफ़ारिशों को लागू नहीं किया जाएगा। यही नहीं, प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी को दिसंबर 2014 में डीजल लोको वक्र्स (डी.एल.डब्ल्यू.), वाराणसी के हजारों मज़दूरों के सामने घोषणा करनी पड़ी थी कि भारतीय रेल का निजीकरण कभी नहीं किया जाएगा और मज़दूरों को ऐसी “अफवाहों” पर विश्वास न करने के लिए कहा!!

तब से लगातार पिछले कुछ वर्षों में विशेष रूप से जो कुछ सामने आया है, वह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि प्रधानमंत्री और एक के बाद एक रेल मंत्री किस प्रकार झूठ बोलते रहे हैं। उल्टे, भारतीय रेल के निजीकरण को उसके बाद और भी अधिक तेज़ी से आगे बढ़ाया गया है। रेल मंत्रालय ने चुनिंदा 109 लाभदायक मार्गों पर 150 निजी रेलगाड़ियों को चलाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। 109 मार्गों का विश्लेषण यह बताता है कि राजस्व अर्जित करने वाले सभी मार्गों को चुनकर निजी संचालकों को सौंपा जा रहा है और घाटे में चल रहे मार्ग रेलवे के लिए छोड़ दिए गये हैं। बोलीदाताओं की संक्षिप्त सूची तैयार है और अंतिम बोलियां 30 जून, 2021 तक प्राप्त होने की उम्मीद है।

पुनर्विकास और आधुनिकीकरण के नाम पर रेलवे स्टेशनों का निजीकरण सक्रिय रूप से शुरू किया गया है। स्टेशनों का प्रबंधन और उसके आसपास की ज़मीन व्यवसायिक विकास हेतु 30 से 60 साल की लीज़ पर सौंपी जा रही है। पहले चरण में 123 स्टेशनों को शामिल किया गया है। पहले दो स्टेशनों, हबीबगंज (भोपाल), मध्य प्रदेश और गांधीनगर (गुजरात) पर कार्य पहले से ही चरम स्तर पर है। आठ और स्टेशनों के लिए शुरुआती बोलियां प्राप्त हो चुकी हैं। प्रतिष्ठित नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और सी.एस.एम.टी., मुंबई स्टेशनों के आसपास की बहुत क़ीमती अचल संपत्ति के कारण कई पूंजीपतियों की इन दोनों स्टेशनों के निजीकरण में विशेष रुचि है।

2022 में पश्चिमी और पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के पूरा होते ही उन पर निजी मालगाड़ियों को चलाने की योजना की घोषणा 2021 के केंद्रीय बजट में पहले ही की गई है।

16 मार्च, 2021 को रेलमंत्री ने लोकसभा को सूचित किया कि, “अब तक देशभर में 87 भूमि खंड, 84 रेलवे कॉलोनियों, 4 पहाड़ी क्षेत्र के रेलवे और 3 स्टेडियमों को संपत्ति मुद्रीकरण के लिए चुना गया है।” इसका सरल शब्दों में यह मतलब है कि भारतीय रेल की ये संपत्तियां लाभ कमाने के लिए पूंजीपतियों को लंबे समय के लिये पट्टे पर सौंप दी जाएंगी।

ये सभी तथ्य निर्विवाद रूप से भारतीय रेल के निजीकरण के अथक प्रयासों की तरफ संकेत करते हैं। भारतीय रेल के निजीकरण के कड़े विरोध के कारण, सरकारी प्रवक्ता ने सरकार के इरादों के बारे में झूठ बोलना जारी रखा है। यहां तक कि मार्च 2021 में रेलमंत्री पीयूष गोयल ने लोकसभा में घोषणा की कि, “भारतीय रेल का निजीकरण कभी नहीं किया जाएगा। यह हर भारतीय की संपत्ति है और ऐसी ही रहेगी, और यह हिन्दोस्तान की भारत सरकार के पास ही रहेगी।” जब 100-दिन की कार्य योजना का रेल मज़दूरों द्वारा कड़ा विरोध किया गया था, तब भी उन्होंने जुलाई 2019 में संसद में इसी तरह का बयान दिया था।

वर्षों से, अनेक संगठन भारतीय रेल के नियोजित निजीकरण के लिए एक मजबूत विरोध खड़ा करने के लिए कार्यरत हैं।

ऑल इंडिया गाड्र्स काउंसिल (ए.आई.जी.सी.), ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (ए.आई.एल.आर.एस.ए.), ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन (ए.आई.एस.एम.ए.), ऑल इंडिया रेलवे ट्रैक मेंटेनर्स यूनियन (ए.आई.आर.टी.एम.यू.), मुंबई सबर्बन रेलवे पैसेंजर्स एसोसिएशन, ठाणे रेलवे प्रवासी संगठन, ऑल इंडिया रेल यात्री परिषद, मध्य नगरी रेलवे प्रवासी संघ, तेजस्विनी महिला प्रवासी संगठन, मुंबई रेल प्रवासी संघ, कल्याण-कसारा पैसेंजर वेलफेयर एसोसिएशन, रेलवे पैसेंजर जनहित संघर्ष मंच टिटवाला, इत्यादि जैसे कई तबकों की एसोसिएशनों, यूनियनों, यात्री एसोसिएशनों के साथ-साथ के.ई.सी., लोक राज संगठन और सी.जी.पी.आई. ने रेल मज़दूरों और यात्रियों की सुरक्षा पर निजीकरण के दुष्प्रभावों को उजागर करने के लिए अक्तूबर 2017 में मुंबई में एक सेमिनार का आयोजन किया था।

भारतीय रेल के निजीकरण केख़िलाफ़ रेल मज़दूरों के संघर्ष के प्रति रेल-यात्रियों का समर्थन जुटाने हेतु, के.ई.सी. और एल.आर.एस. द्वारा एक पत्रक 2019 के दौरान मुंबई में हजारों की संख्या में वितरित किया गया था। पत्रक ने दर्शाया कि कैसे निजीकरण यात्रियों के हितों में नहीं है और अपने तथा अन्य देशों के जीवन के अनुभव से उजागर होता है कि निजीकरण के लाभों के बारे में सरकार के दावे झूठे हैं।

रेल मज़दूरों के साथ-साथ रेल यात्री भी समझने लगे हैं कि भारतीय रेल का निजीकरण उनके हित में नहीं है। निजीकरण के बाद रेल सेवाएं अधिक महंगी हो जाएंगी और सुरक्षा से समझौता किया जाएगा। लाभहीन सेवाओं को वापस लेकर, बड़ी संख्या में लोगों को रेल सेवाओं से वंचित कर दिया जाएगा।

रेल यात्रियों का समर्थन रेल मज़दूरों की निजीकरण केख़िलाफ़ बढ़ते विरोध में एक बड़ा योगदान है। रेल मज़दूरों का मानना है कि रेल यात्रियों के समर्थन और उनकी अपनी एकता न केवल भारतीय रेल के मज़दूर-विरोधी और जन-विरोधी निजीकरण  को रोक पाएंगे, अपितु उलट सकेंगे।

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