ईरान के परमाणु संसाधनों पर इस्राइल का हमला युद्ध के एक ऐलान से कम नहीं है

11 अप्रैल को एक विनाशकारी साइबर-हमले ने ईरान के सबसे बड़े परमाणु संसाधनों में से एक को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया। ईरानी सरकार ने इसे “आतंकवादी हमला” कहा है और हमले के लिए इस्राइल को दोषी ठहराया है। हमले के कुछ ही घंटे बाद, नटंज़ रिएक्टर के वैज्ञानिकों ने उन्नत यूरेनियम के उत्पादन में तेज़ी लाने के उद्देश्य से रिएक्टर के यूरेनियम संवर्धन संयत्रों को फिर से शुरू कर लिया।

इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतेन्याहू ने हमले के कुछ घंटे बाद अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को एक बयान दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि “ईरान और उसके निकट सहयोगियों के खि़लाफ़ और ईरानी आयुध प्रयासों के खि़लाफ़ संघर्ष, एक बहुत बड़ा मिशन है”। हमले को व्यापक रूप से इसाइली मीडिया द्वारा कवर किया गया और आधिकारिक रेडियो में यह दावा किया गया कि इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने एक सुनियोजित तरीके से इसको अंजाम दिया था।

इससे पहले भी नटंज़ रिएक्टर इस्राइल के हमलों का निशाना बना रहा है। जुलाई 2020 में इस्राइल द्वारा निशाना बनाकर हमला किए गये विस्फोट से एक यूरेनियम संवर्धन संयंत्र क्षतिग्रस्त हो गया था।

2010 में सी.आई.ए. और मोसाद द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक साइबर-अटैक ने, जिसमें स्टक्सनेट नामक एक कंप्यूटर वायरस का उपयोग किया गया था, ईरान के यूरेनियम संवर्धन संयंत्र को बहुत बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया और इस तरह से, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को कई साल पीछे धकेलने की साज़िश में सफलता पायी। कई ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों को, अमरीका और इस्राइल की खुफिया एजेंसियों ने निशाना बनाया है और उनकी हत्या की है। नवंबर 2020 में प्रमुख ईरानी परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फाकीरजादे की हत्या इस्राइल द्वारा आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) तकनीक का उपयोग करके की गई थी।

ईरान के परमाणु संसाधनों पर सबसे हाल का एक और हमला ऐसे समय पर हुआ है जब अमरीका, ईरान, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, चीन, रूस, फ्रांस और जर्मनी द्वारा 2015 में हस्ताक्षरित परमाणु समझौते को लेकर हाल के दिनों में ईरान और अमरीका के बीच वार्ता फिर से शुरू हुई है। अमरीका ने 2018 में नाजायज़ तरीक़े से इस अन्तर्राष्ट्रीय समझौते को नकार कर, ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए थे, जिसकी वजह से ईरान के लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा है। अमरीकी राष्ट्रपति जो-बाइडेन के अपने मुख्य चुनावी वादों में से एक के रूप में, ईरान के साथ इस समझौते को फिर से लागू करने का वायदा भी था। इस्राइल, ईरान और अमरीका व विश्व अन्य शक्तियों के बीच ऐसे समझौतों और इन वार्ताओं की बहाली के खि़लाफ़ है। इससे पहले अप्रैल में हुई एक बैठक में, इस्राइल के प्रधानमंत्री नेतेन्याहू ने बेशर्मी से कहा था कि “… इस तरह का एक समझौता हमें मान्य नहीं होगा।”

ईरान के परमाणु संसाधनों पर हमले के तुरंत बाद, अमरीकी रक्षा सचिव, लॉयड ऑस्टिन, इस्राइली सरकार के साथ बातचीत के लिए इस्राइल की राजधानी तेल-अवीव भी गए। परन्तु अमरीकी रक्षा सचिव ने ईरान पर इस्राइली हमले की निंदा नहीं की।

नटंज़ रिएक्टर पर हमले से 5 दिन पहले इस्राइल ने लाल सागर में ईरान के लिए सामान ले जाने वाले एक जहाज पर हमला किया था। यह ईरानी जहाजों पर इस्राइल द्वारा ऐसे हमलों की श्रृंखला में एक और हमला था। इसके बाद सीरिया पर भी इस्राइली हवाई हमले हुए जिसने दमिश्क के पास एक सैन्य अड्डे को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस्राइल ने पिछले साल खुलेआम स्वीकार किया था कि पिछले 8 वर्षों में, उसने सीरिया पर लगभग 1,000 हवाई हमले किए हैं।

अमरीका और इस्राइल ईरान पर लगातार किये जा रहे अपने हमलों और ईरान के खि़लाफ़ लगाये गए प्रतिबन्धों को सही ठहराने के लिए इस झूठ का प्रचार करते आयें हैं कि ईरान एक “दुष्ट राज्य” है जो आतंकवाद को आयोजित करता है, हालांकि जीवन का अनुभव बताता है कि सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। तथ्य बताते हैं कि ईरान नहीं, बल्कि अमरीका और इस्राइल सहित उसके सहयोगी ही हैं, जिनका दुनिया के अधिकांश आतंकवादी हमलों के पीछे हाथ रहा है।

सशस्त्र आक्रामकता, नरसंहार, जातीय सफाई और अपनी मातृभूमि से लगभग 7,50,000 फिलिस्तीनी लोगों के क्रूर विस्थापन के माध्यम से, 1948 में इस्राइल राज्य की स्थापना की गई थी। यह राज्य फिलिस्तीनी लोगों के खि़लाफ़ बर्बर भेदभाव और उत्पीड़न करता आया है और इस इस्राइल राज्य ने फिलिस्तीनी लोगों को उनके मानव अधिकारों से वंचित किया है। फिलिस्तीनी लोगों के अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिए संघर्ष को “आतंकवाद” कहकर, इस्राइल, अमरीका के पूरे समर्थन के साथ फिलिस्तीनी लोगों के लगातार क़त्लेआम को जायज़ ठहराता है। अमरीका और इस्राइल, नियमित रूप से इस क्षेत्र के उन सभी देशों पर भी सैन्य हमले करते हैं जो अमरीकी साम्राज्यवाद की दादागिरी का विरोध करते हैं और जो अपनी मातृभूमि को हासिल करने के लिए फिलिस्तीनी लोगों के मूलभूत अधिकार की हिफ़ाज़त करना चाहते हैं।

पश्चिम एशिया पर अपनी दादागिरी क़ायम रखने के अपने रणनीतिक उद्देश्य के समर्थन में, अमरीका ने शुरू से ही इस्राइली राज्य को हथियारबंद किया है, ताकि वह इस क्षेत्र में अमरीका के एक रणनीतिक सहयोगी के रूप में काम कर सके। तेल-समृद्ध पश्चिम एशिया क्षेत्र पर अपना पूर्ण वर्चस्व स्थापित करने के लिए, अमरीका की योजनाओं में ईरान एक बहुत बड़ा रोड़ा है। यही कारण है कि अमरीका लगातार ईरान को निशाना बनाता रहा है। बाहरी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप से मुक्त अपने स्वयं के आर्थिक और राजनीतिक कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के ईरान के मूलभूत अधिकार के खि़लाफ़ संघर्ष में, अमरीका की हर संभव कोशिश रही है कि वह ईरान को अपने सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर कर सके। अमरीका, पश्चिम एशिया के राज्यों के बीच एक सैन्य गठबंधन बनाने की भी कोशिश कर रहा है ताकि वह ईरान पर हमला करने सके।

ईरान के परमाणु संसाधनों पर इस्राइल का हमला युद्ध का ऐलान है। इसका उद्देश्य है, ईरान को भड़काना है और ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्त करने के लिए प्रस्तावित वार्ता को विफल करना है। सच तो यह है कि अमरीका ने इस्राइल के हमले की निंदा नहीं की, यह सच दर्शाता है कि यह हमला एक नए परमाणु समझौते पर आगामी वार्ता के दौरान, ईरान पर दबाव बनाने की अमरीकी रणनीति का ही एक हिस्सा है।

पश्चिम एशिया में बड़े पैमाने पर एक बेहद ख़तरनाक स्थिति का निर्माण करने में, इस्राइल के साथ मिलकर अमरीकी साम्राज्यवाद ही ज़िम्मेदार है। कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, नटंज़ में ईरानी परमाणु संसाधनों पर इस्राइल द्वारा किए गए, इस नवीनतम विनाशकारी हमले की निंदा करती है।

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