सरकार की निजीकरण या निगमीकरण की नीतियों पर विराम लगाने में सफल संघर्ष

कामगार एकता कमेटी द्वारा आयोजित “निजीकरण के ख़िलाफ़ एकजुट हों!” श्रृंखला की 10वीं सभा

निजीकरण के ख़िलाफ़ संघर्ष का एक लम्बा इतिहास है। तब के प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ने जब से निजीकरण तथा उदारीकरण द्वारा वैश्विकरण का कार्यक्रम लागू करना शुरू किया था, तब से ही अपने देश का मज़दूर वर्ग इसका विरोध करने में आगुवाई में रहा है। निजीकरण के विरोध में मज़दूरों के संघर्ष को चूर-चूर करने के लिए सत्ताधारी पूंजीपति वर्ग ने अनेक दांवपेंच अपनाये हैं। उसका कपटी ध्येय है निजीकरण का विरोध करने वाले मज़दूरों में फूट डालना।

1996-98 के बीच संयुक्त मोर्चा की सरकार ने विनिवेश मंत्रालय स्थापित करके निजीकरण के कार्यक्रम की नींव डाली। उसने सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का वर्गीकरण किया और यह घोषणा की कि सिर्फ घाटे में चलने वाली इकाइयों का तथा जिनका रणनैतिक महत्व नहीं है उन्हीं का निजीकरण किया जाएगा। जनवरी 2000 में वाजपेयी की राजग सरकार ने “ब्रेड बनाना सरकार का काम नहीं है”, यह कहकर मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज (एम.एफ.आई.एल.) को बहुराष्ट्रीय कम्पनी हिन्दोस्तान लिवर लिमिटेड (एच.एल.एल) के हाथों बेच दिया। उसने भारत एल्यूमिनियम कंपनी (बी.ए.सी.एल.) को भी एक निजी इजारेदारी इजारेदारी कम्पनी को बेच दिया। मज़दूरों ने एम.एफ.आई.एल. तथा बी.ए.सी.एल. के निजीकरण के ख़िलाफ़ एक बहादुर संघर्ष किया और निजीकरण को रोकने के लिए राजग सरकार को मजबूर किया। मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार को घोषित करना पड़ा कि नवरत्नों का तथा रणनैतिक तौर पर महत्वपूर्ण क्षेत्रों का निजीकरण भी कभी नहीं किया जाएगा। लेकिन, निगमीकरण, विनिवेश, इत्यादि जैसे ही और रास्तों से उसने निजीकरण को जारी रखा। अब तो मोदी सरकार ने खुल्लम-खुल्ला घोषित कर दिया है कि वह सबका निजीकरण करेगी।

निजीकरण के ख़िलाफ़ कामगार एकता कमेटी (के.ई.सी.) ने मीटिंगों की एक श्रृंखला आयोजित की है, जिसके बारे में मज़दूर एकता लहर में हम लगातार रिपोर्ट प्रकाशित करते आये हैं। 4 अप्रैल, 2021 को रविवार के दिन कामगार एकता कमेटी ने इस महत्वपूर्ण विषय पर इंटरनेट पर “सरकार की निजीकरण या निगमीकरण की नीतियों पर विराम लगाने में सफल संघर्ष” विषय पर एक मीटिंग का आयोजन किया। सितम्बर 2020 में कामगार एकता कमेटी द्वारा “निजीकरण के ख़िलाफ़ एक हों!” विषय पर शुरू की गई श्रृंखला की यह 10वीं मीटिंग थी।

का. मैथ्यू ने सहभागियों का स्वागत करते हुए बताया कि के.ई.सी. निजीकरण के ख़िलाफ़ विभिन्न यूनियनों को तथा फेडरेशनों को एक संघर्ष में इकट्ठा करने का प्रयास कर रही है। देशभर के सार्वजनिक क्षेत्र की विभिन्न फेडरेशनों तथा यूनियनों के राष्ट्रीय नेताओं से, कार्यकर्ताओं से, सदस्यों से तथा अनेक जन संगठनों के कार्यकर्ताओं से और आम जनता से भी हमें बहुत अच्छा प्रतिक्रिया मिली है। सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक प्रतिष्ठानों का निजीकरण या निगमीकरण रोकने में जो संघर्ष सफल हुए हैं, उनसे बहुत मूल्यवान सीखें हासिल करने के लिए आज हम सब इकट्ठा हुए हैं, ऐसा उन्होंने कहा।

इसके बाद उन्होंने आमंत्रित वक्ताओं का स्वागत किया। ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन (ए.आई.पी.ई.एफ.) के अध्यक्ष श्री. शैलेन्द्र दुबे, ऑल इंडिया डिफेन्स एम्प्लाइज फेडरेशन (ए.आई.डी.एफ.) के अध्यक्ष श्री. एस.एन. पाठक तथा हिन्द खदान मज़दूर फेडरेशन (एच.के.एम.पी.) के अध्यक्ष श्री. नाथुलाल पाण्डे ये सर्व हिन्द स्तर की फेडरेशनों के नेता हैं। वक्ताओं में शामिल थे भारतीय रेल की पांच उत्पादन इकाइयों के नेता। मॉडर्न कोच फैक्टरी (एम.सी.एफ.) मेन्स यूनियन (ए.आई.आर.एफ.) के महासचिव और संयुक्त कृति समिति (एम.सी.एफ.) के निमंत्रक, श्री. एल.एल. पाठक उत्तर प्रदेश के राय बरेली से हैं। रेल कोच फैक्टरी मेन्स कांग्रेस (एन.एफ.आई.आर.) के चेयरमैन तथा संयुक्त कृति समिति (एम.सी.एफ.) के चेयरमैन, श्री नाइब सिंह भी उत्तर प्रदेश के राय बरेली से हैं। चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स (सी.एल.डब्ल्यू.) लेबर यूनियन (सीटू) के पूर्व महासचिव चित्तरंजन, पश्चिम बंगाल से हैं। डिज़ल लोकोमोटिव वर्क्स (डी.एल.डब्ल्यू.) मेन्स यूनियन (ए.आई.आर.एफ.) के महासचिव तथा संयुक्त कृति समिति (एम.सी.एफ.) के निमंत्रक, डॉ. प्रदीप शर्मा वाराणसी, उत्तर प्रदेश से हैं। इंडियन रेलवे टेक्निकल सुपरवाइज़़र्स यूनियन (आई.आर.टी.एस.यू.) के सीनियर संयुक्त महासचिक श्री के.वी. रमेश भी मौजूद थे। का. मैथ्यू ने लोक राज संगठन की राष्ट्रीय उपाध्यक्षा, सुश्री संजीवनी जैन का भी स्वागत किया। लोक राज संगठन एक ऐसा जन संगठन है जो अपनी शु्रुआत से ही कामगार एकता कमेटी जैसे और संगठनों के साथ मिलकर निजीकरण के विरोध में लड़ रहा है।

(तीनों फेडरेशनों के नेताओं के संबोधन पढ़ें, जो अलग-अलग बाक्स में दिये गये हैं।)

माडर्न कोच फैक्टरी मेन्स यूनियन के महासचिव तथा संयुक्त कृति समिति के निमंत्रक, श्री एल.एन. पाठक ने कहा कि सरकार की नीति के मुताबिक वे डिज़़ल इंजनों को बंद करने वाले हैं। वे पूरे रेल नेटवर्क को बिजली से जोड़ना चाहते हैं। यह खर्चा बचाने के लिए किया जाएगा क्योंकि हम दूसरे देशों से ईंधन का आयात करते हैं। इसके बावजूद, अमरीका की जनरल इलेक्ट्रिक कम्पनी को डीज़ल के इंजनों का उत्पादन करने के लिए निजी जगह तथा इज़ाज़त क्यों दी गयी है? सरकार ने 22 करोड़ रुपये में ए.बीबी. के इंजन खरीदे हैं जबकि हिन्दोस्तान में हम केवल 9 करोड़ रुपये में चित्तरंजन में ऐसे इंजन बनाते हैं। राय बरेली में मात्र 2 करोड़ रुपये में रेल के डिब्बों का उत्पादन किया जाता है जबकि सरकार 6.5 करोड़ रुपये में उन्हें विदेश से खरीदती है! सरकार ने रेल मंत्रालय द्वारा जो 100 दिनों की योजना दी थी, उसमें लिखा है कि सिर्फ एम.सी.एफ. राय बरेली को एक कम्पनी बनाया जाएगा और बाद में बाकी उत्पादन इकाइयों को उसके साथ जोड़ा जाएगा। सब मान्यताप्राप्त यूनियनों ने तथा जिनको मान्यता प्राप्त नहीं हुई है ऐसी यूनियनों ने भी एक साथ आकर अपने परिवारों के साथ हड़ताल की। हालांकि सरकार ने अनेक बार हमें आश्वासन दिये हैं कि रेल मज़दूरों से सलाह किये बिना कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा, लेकिन उसने हमारे सामने कोई भी प्रस्ताव नहीं रखे हैं।

रेल कोच फैक्टरी मेन्स कांग्रेस (एन.एफ.आई.आर.) के चेयरमैन तथा संयुक्त कृति समिति (एम.सी.एफ.) के चेयरमैन, श्री नाइब सिंह का कहना था कि 19 जून, 2019 को उन्हें मालूम पड़ा कि 6 उत्पादन इकाइयों का एक निगम बनाया जाएगा। इसके तुरंत बाद, 20 जून को ही एक-एक आम सभा का आयोजन किया गया जिसमें अधिकतर मज़दूरों ने भाग लिया। 25 जून, 2019 को रेलवे बोर्ड ने अपने वित्त आयुक्त को एम.सी.एफ. भेजा। मज़दूरों में बहुत हलचल थी। हालांकि 10,00 कोच बनाने के लिए फैक्टरी बनायी गयी थी, लेकिन वास्तव में 1,900 कोचों का उत्पादन हो रहा था! फिर उसका निगमीकरण क्यों किया जा रहा था? जो पहली लड़ाई हुई, रेलवे बोर्ड उससे बहुत चिंतित था क्योंकि परिवारों ने भी सहभाग लिया था और उनकी संख्या मज़दूरों से ज्यादा थी। रेलवे बोर्ड के विभिन्न सदस्यों ने हमारे सामने जो प्रस्ताव रखे उनमें से किसी के साथ भी हम सहमत नहीं थे। लगातार मना करने तथा लड़ाई की वजह से सरकार को अपनी योजना रोकनी पड़ी। यही प्रस्ताव 2006 में भी रखा गया था। उस वक्त भी परिवार, खास करके महिलाएं, उसके ख़िलाफ़ लड़ी थीं। वे 71 दिन तक लड़े और सरकार को कपूरथला की फैक्टरी का निजीकरण करने का अपना प्रस्ताव पीछे लेना पड़ा।

डिज़ल लोकामोटिव वर्क्स (डी.एल.डब्ल्यू.) मेन्स यूनियन (ए.आई.आर.एफ.) के महासचिव तथा संयुक्त कृति समिति (डी.एल.डब्ल्यू.) के निमंत्रक, डॉ. प्रदीप शर्मा ने कहा कि रेल मज़दूरों की संख्या 12.26 लाख है। पुराने कोचों का नवीकरण करके, उन्हें नया जैसा बनाकर डी.एल.डब्ल्यू. रेलवे का बहुत पैसा बचा रहा है। उनके संगठन ने निजीकरण के बुरे प्रभावों के बारे में आम जनता को समझाया। सरकारी मालिकी की शताब्दी तथा निजी मालिकी की तेजस रेलगाड़ियों, दोनों नयी दिल्ली तथा लखनऊ के बीच में चलती हैं। मज़दूरों ने लखनऊ स्टेशन में टिकट खिड़कियों के पास पोस्टर लगाये और समझाया कि कैसे उसी यात्रा के लिए शताब्दी की टिकटों से तेजस के टिकट की कीमत 174 रुपये ज्यादा है।

इंडियन रेलवे टेक्निकल सुपरवाजर्स यूनियन के सीनियर संयुक्त महासचिक श्री के.वी. रमेश का कहना था कि चेयरमैन रेलवे बोर्ड (सी.आर.बी.) द्वारा 18 तथा 19 जून 2019 को भारतीय रेल की उत्पादन इकाइयों के निगमीकरण की योजना घोषित की थी। इसके तुरंत बाद कई स्वतः स्फूर्त आंदोलन तथा विरोध प्रदर्शन हुए थे। सभी यूनियनें तथा एसोसिएशनें, अर्थात एन.एफ.आई.आर. व ए.आई.आर.एफ. के साथ जो संलग्न हैं और तमिलनाडु की दो प्रमुख पार्टियों के साथ जो हैं, यानी कि डी.एम.के. लेबर यूनियन तथा ए.आई.ए.डी.एम.के. अण्णा तोलिर संगम, डी.आर.ई.यू. (सीटू), बी.आर.एम.एस., ओ.बी.सी. तथा एस.सी. एंड एस.टी. एसोसिएशन्स तथा बेशक आई.आर.टी.एस.ए.। सभी एक साथ आये। तब से आज तक हर एक आंदोलन आई.सी.एफ. के संयुक्त कृति समिति के झंडे तले आयोजित किया गया है।

महाप्रबंधक कार्यालय के पर जो प्रदर्शन किया गया था उसमें करीबन 6,000 मज़दूरों ने भाग लिया। तथा आई.सी.एफ. और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के निगमीकरण के ख़िलाफ़ तकरीबन 8,000 मज़दूरों ने हस्ताक्षर किये है और आई.सी.एफ. के महाप्रबंधक के द्वारा उन्हें रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को भेजा गया है। आई.सी.एफ. में महाप्रबंधक के कार्यालय के सामने, कोच फैक्टरी, फर्निशिंग फैक्टरी तथा एल.एच.बी. फैक्टरी के सामने एक के बाद एक भी आंदोलन, सभाएं तथा प्रदर्शन किये गए। उत्पादन इकाइयों के निजीकरण के ख़िलाफ़ ज्ञापन देने के लिए सभी यूनियनों ने सांसदों तथा अन्य राजनीतिक नेताओं से संपर्क किया। यह एकजुट संघर्ष जारी रखना पड़ेगा।

आगे जाकर उन्होंने भारतीय रेल के बारे में बहुत रोचक तथा महत्वपूर्ण तथ्य बताये। आज़ादी के तुरंत बाद, सारा रोलिंग स्टाक (इंजन तथा कोच) समय पर बिना किसी नियंत्रण के आपूर्ति के लिये बड़ी क़ीमत देकर हिन्दोस्तान को अमरीका, ब्रिटेन तथा आस्ट्रेलिया जैसे देशों से आयात करना पड़ता था। आज ये 7 उत्पादन इकाइयां कुल 10,000 यात्री डिब्बों का तथा 1,000 इंजनों का उत्पादन कर सकती हैं, जिससे भारतीय रेल की ज़रूरतें पूरी होती हैं। भारतीय रेल अब ज्यादातर आत्मनिर्भर बन गया है।

हर इकाई के उत्पादन के लिए अब कम मज़दूरों की ज़रूरत होती है। इस बात से इन उत्पादन इकाइयों ने अपनी कार्यक्षमता सिद्ध की है। सन 2012 से 2018 के दौरान में, सी.एल.डब्ल्यू. में एक इंजन बनाने के लिए लगने वाले आवश्यक मज़दूरों की संख्या 51 से घटकर 30.5, तथा डी.एल.डब्ल्यू. में 22.8 से घटकर 19 पर आ गयी है। एक कोच को बनाने के लिए लगने वाले औसतन मज़दूरों की संख्या आई.सी.एफ. में 8.1 से घटकर 4.5 तथा आर.सी.एफ. में 3.9 से घटकर 3 पर आ चुकी है।

इससे भारतीय रेल के खर्चे पर बड़ी मात्रा में नियंत्रण हुआ है। भारतीय रेल ने जर्मनी से एल.एच.बी. कोच खरीदना 1995 में शुरू किया। एक कोच की औसतन कीमत 5.5 करोड़ रुपये हुआ करती थी। आज हिन्दोस्तान में एक एल.एच.बी. कोच का उत्पादन मात्र 2 करोड़ रुपये में होता है। इसी प्रकार डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर (डी.सी.एफ.) के लिए भारतीय रेल ने 20 करोड़ रुपये की क़ीमत के इंजन को ख़रीदने का प्रस्ताव दिया है जबकि उसी क्षमता के इंजनों का उत्पादन सी.एल.डब्ल्यू. मात्र 12 करोड़ रुपये में कर रहा है!

सात उत्पादन इकाइयों की क्षमता आज प्रति वर्ष 1,000 इंजन तथा 10,000 कोच बनाने की है। भारतीय रेल के पास आज 12,500 इंजन तथा 70,000 कोच हैं। कुल मिलाकर उनका मूल्य 3.1 लाख करोड़ रुपये है। भारतीय रेल की इन इकाइयों को निगम बनाने से इंजनों तथा कोचों की क़ीमत बढ़ेगी।

इसके अलावा इन सात उत्पादन इकाइयों के पास 36 वर्ग किलामीटर भूमि है। आई.सी.एफ. चेन्न्ई महानगर में ऐसी महंगी जगह पर स्थित है जहां भूमि की क़ीमत प्रति 10,000 रुपये वर्ग फुट से भी ज्यादा है। इसका मतलब यह है कि आई.सी.एफ. के पास जो भूमि है उसकी क़ीमत 12,000 करोड़ रुपये से 13,000 करोड़ रुपये तक है। अगर यह कॉर्पोरेट्स के हवाले की जाती है तो उसकी क़ीमत केवल 2,500 करोड़ रुपये से भी कम होगी।

फैक्टरियों के अलावा, इन उत्पादन इकाइयों के पास रिहायशी कोलोनियां, अस्पताल, खेल-कूद के लिए अच्छी सुविधाएं, स्कूल, इत्यादि भी हैं। वे सभी छोटे आत्मनिर्भर शहर हैं!

लोक राज संगठन (एल.आर.एस.) की राष्ट्रीय उपाध्यक्षा सुश्री संजीवनी जैन ने निजीकरण के ख़िलाफ़ अनेक मुहिमों के बारे में बात रखी, जिनमें एल.आर.एस. ने आगुवाई दी थी या जिनमें उसने भाग लिया था। उसके साथ निजीकरण के बारे में लोगों को जानकारी देने के लिए और उसका विरोध करने की आवश्यकता के बारे में उन्हें समझाने के लिए एल.आर.एस. ने अनेक कार्यशालाओं तथा सेमिनारों का आयोजन भी किया है। तीस सालों से हर सरकार ने निजीकरण और उदारीकरण द्वारा वैश्विकरण की नीति लागू की है, जो देशी तथा विदेशी पूंजीपतियों के हित में है। वह पूर्णतः लोगों के हितों के ख़िलाफ़ है। यह ज़रूरी है कि शिक्षित लोग इस व्यवस्था पर सवाल उठाये जो व्यवस्था लोगों के प्रति बिल्कुल जवाबदेही नहीं है। करोड़ों लोगों के विरोध के बावजूद, क्रमशः आनेवाली सभी सरकारें कैसे इतने जन-विरोधी क़दम उठा सकती हैं?

अलग-अलग सहभागियों ने अपने बयानों में इस बात पर ज़ोर दिया कि बहुत ज़रूरी है कि हम जनता को समझाएं कि निजीकरण कैसे उनके ख़िलाफ़ है और उनको मज़दूरों के संघर्ष के साथ जोड़ें। इससे अपनी ताकत कई गुना बढ़ेगी। खास करके बहुत ज़रूरी है कि हम ऐसी अनुरूप हालातें बनायें जिससे महिलाएं इस संघर्ष में भाग ले सकें, क्योंकि वे जनसंख्या का आधा हिस्सा हैं। युवा पीढ़ी को जोड़ना भी बहुत महत्वपूर्ण है। हम इस प्रकार की जानकारी देने वाली सभाएं हमें अपनी काम की जगहों पर तथा रिहाइशी इलाकों में, अपने परिजनों के तथा दोस्तों के साथ भी करनी चाहिएं। पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के दौरान जो एक जन जागृति अभियान चलाया गया था उसे लोगों के तरफ से बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी।

मौजूदा व्यवस्था जिस तरह से काम करती है, उसमें प्रत्यक्ष ताक़त चंद पूंजीवादी घरानों के हाथों में होती है। वे उसी पार्टी को पैसा तथा समर्थन देते हैं जो उनके हित के कार्यक्रम को लागू करने में सबसे ज्यादा क़ामयाब होती है और साथ-साथ इस प्रकार से लागू करेती है कि आम जनता का विरोध कम से कम हो। इसलिए कोई भी पार्टी सत्ता में क्यों न हो, वह इन पूंजीवादी घरानों के हित में ही काम करती हैं। कृषि कानून, भूमि अधिग्रहण कानून या श्रम संहिता, ये सब पूंजीवादी घरानों के कार्यक्रम का ही हिस्सा हैं, वे सत्ता में आयी विभिन्न पार्टियों के ज़रिये अपने कार्यक्रम को लागू करने की वे कोशिशें कर रहे हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के इकाइयों के पास जो भूमि है, वह सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है। बड़े-बड़े पूंजीवादी घराने निजीकरण के द्वारा बहुत कम क़ीमत पर इस अनमोल भूमि को हड़पना चाहते हैं। सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक हिन्दोस्तान में 13 प्रमुख पोर्ट ट्रस्ट हैं; उनके पास 1 लाख हेक्टेयर भूमि है। रक्षा मंत्रालय के पास ढाई लाख हेक्टेयर भूमि है और एयर पार्ट ऑथॉरिटी के पास 20,400 हेक्टेयर  भूमि है। और तो और हवाई अड्डों के पास जो ज़मीनें हैं वे बहुत क़ीमती होती है। भारतीय रेल के पास 43,000 हेक्टेयर ज़मीन है जिसकी कीमत 3 लाख करोड़ रुपये है! इतनी सारी ज़मीन के ऊपर पूंजीवादी घरानों की नज़र है।

एक पर हमला सब पर हमला! की भावना के साथ लड़ने के अलावा हमारे पास और कोई विकल्प नहीं है।

यह जोशिली सभा साढ़े तीन घंटे तक चली। अंत में का. मैथ्यू ने घोषित किया कि इस श्रृंखला की अगली सभा 25 अप्रैल, दिन रविवार को बिजली वितरण के निजीकरण के ख़िलाफ़ होगी।

अखिल भारतीय पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (ए.आई.पी.ई.एफ.) के अध्यक्ष श्री शैलेन्द्र दूबे के संबोधन के प्रमुख मुद्दे

पिछले 30 वर्षों से बिजली वितरण का निजीकरण होता आया है। 13 मई, 2020 को, वित्त मंत्री सीतारमण ने महामारी के दौरान ही अधिनियम में संशोधन किए बिना, केंद्र शासित प्रदेशों के बिजली विभागों के निजीकरण की घोषणा कर दी। जहां तक बिजली का सवाल है, यह एक लंबी लड़ाई रही है।

हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने वाराणसी में पूर्वांचल विद्युत निगम के निजीकरण का निर्णय लिया है। जुलाई 2020 को केंद्रीय ऊर्जा मंत्री की मौजूदगी में लखनऊ में आयोजित एक बैठक में यह निर्णय लिया गया कि पूर्वांचल विद्युत निगम, जो कि उत्तर प्रदेश की एक बहुत बड़ी वितरण कंपनी और प्रदेश के 75 में से 21 जिलों में बिजली वितरण में कार्यरत है, उसका निजीकरण किया जाएगा। इस निर्णय का विरोध हमने सितंबर 2020 से शुरू कर दिया था। यूपी में विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति (वी.के.एस.एस.एस.) हमारा संगठन है जिसमें 18 यूनियनें शामिल हैं; सदस्यों में मुख्य अभियंता और उनके नीचे के सभी पदों के आधिकारी और श्रमिक शामिल हैं। हमारे विरोध के फलस्वरूप, इन 18 यूनियनों और वी.के.एस.एस.एस. के संयोजक तथा पदाधिकारियों को एक पत्र भेज कर यह धमकी दी गई थी कि “इस महामारी के दौरान प्रबंधन आपदा अधिनियम के तहत आपको 2 साल की सज़ा, ईत्यादि। एस.एम.ए. (एस्मा) के तहत 2 साल की सज़ा और महामारी अधिनियम के तहत एक साल की और सज़ा हो सकती है।” लेकिन कोई भी इन धमकियों से डरा नहीं और हम सभी लगातार संपर्क रहे और बैठकें करते रहे।

हमने 1 सितंबर, 2020 को वाराणसी में अपनी पहली बैठक आयोजित की जिसमें 300 से अधिक कर्मचारी शामिल हुए। उत्तर प्रदेश में धारा 144 लागू होने के बावजूद हमने इस बैठक की योजना बनाई और हम गिरफ़्तारी के लिए भी तैयार थे। 25 सितंबर से 2 अक्तूबर तक हमने सभी सांसदों और विधायकों से संपर्क किया और उन्हें पत्र भी सौंपे।

28 सितंबर को हमने मशाल जुलूस का आयोजन किया जिसमें लगभग 2,000 लोगों ने भाग लिया।

शहीद भगत सिंह की जयंती के अवसर पर, विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्रों में निजीकरण का विरोध करने के लिये और मज़दूरों की एकता प्रकट करने के लिए एक रैली का आयोजन किया गया। लखनऊ में, लगभग 4000 कर्मचारी शरीक हुए जिसको पुलिस ने चारों ओर से घेर लिया। ए.सी.पी. ने मुझ से संपर्क कर सूचित किया कि वे हमें उस रैली का संचालन करने की अनुमति नहीं देंगे, जिस पर मेरी प्रतिक्रिया थी कि भगत सिंह की जयंती मनाने के लिए पूरे देश में हमें कोई नहीं रोक सकता। ए.सी.पी. ने कहा कि आप अंतिम समय में ऐसा नहीं कर सकते हैं तो मैंने उन्हें सूचित किया कि रैली की अनुमति का आवेदन हमने 15 दिन पहले ही दे दिया था, जिसे आपने नहीं नाकारा इसका अर्थ है कि हमें इसे संचालित करने की अनुमति है। मुझे ए.सी.पी. द्वारा गिरफ़्तार कर लिया गया और उसी क्षण 900 कर्मचारियों ने स्वेच्छा से गिरफ़्तारी दी। पुलिस अपनी गाड़ियों में इतनी बड़ी संख्या में कर्मचारियों को भरकर ले जाने में असमर्थ थी। जैसे ही यह खबर राज्य के अन्य हिस्सों में पहुंची, अन्य 10,000 कर्मचारियों ने खुद को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। आखिरकार मजबूर होकर पुलिस ने सभी को बिना किसी आरोप के रिहा कर दिया।

28 सितंबर के बाद उन्होंने मज़दूरों को विभाजित करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाये लेकिन हम एकजुट रहे। 5 अक्तूबर को वी.के.एस.एस.एस. के साथ चर्चा के बाद सरकार को पूर्वांचल विद्युत निगम के निजीकरण के प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा और लिखित में वादा करना पड़ा कि भविष्य में भी सरकार कर्मचारियों को विश्वास में लिए बिना ऐसी किसी भी योजना को प्रस्तावित नहीं करेगी।

2018 में भी निजीकरण की उनकी योजनाओं के विरोध के फलस्वरूप, सरकार को सभी फ्रेंचाइजी निविदाओं को रद्द करना पड़ा था। निजी निगम केवल इन सार्वजनिक क्षेत्रों से लाभ चाहते हैं, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे में निवेश करने का कोई इरादा नहीं रखते हैं।

विद्युत संशोधन विधेयक-2021 में कहा गया है कि निजी कंपनियां सरकारी कंपनियों के मौजूदा बुनियादी ढांचे का उपयोग करके इस सार्वजनिक क्षेत्र में भाग ले सकेंगी और आम जनता को बिजली वितरण की सेवा प्रदान करने हेतु उन्हें किसी भी लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होगी। वे अपने मुनाफ़े के लिए लोगों से कोई भी दर वसूल कर सकती हैं।

चंडीगढ़, जो कि एक केंद्र शासित प्रदेश होने के साथ-साथ पंजाब और हरियाणा की राजधानी भी है, उसका बिजली क्षेत्र पिछले 5 वर्षों से लाभ कमा रहा है और पिछले साल इसने 365 करोड़ रुपये का लाभ कमाया है। वहां बिजली दोनों राज्यों से सस्ती है। ऐसा ही मुंबई तथा दादरा, नगर और हवेली में भी किया गया था। इस प्रकार सरकार स्पष्ट रूप से पी.पी.पी. माडल के तहत सभी लाभ कमाने वाले सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण करने पर आमदा है।

लेकिन जब तक आवश्यक होगा, हम इस संघर्ष को जारी रखेंगे।

अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (ए.आई.डी.ई.एफ.) के अध्यक्ष श्री एस.एन. पाठक के संबोधन के प्रमुख मुद्दे

रक्षा कर्मचारी एम.ई.सी., सी.ओ.डी., आयुध डिपो, सेना, नौसेना और वायु सेना के साथ-साथ 42 आयुध कारखानों में फैले हुए हैं। पहले 7.5 लाख रक्षा नागरिक कर्मचारी थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर आधी रह गई है। हम पिछले 20 वर्षों से निजीकरण के ख़िलाफ़ संघर्षरत हैं, जब से राज्याध्यक्ष समिति का गठन किया गया था। तीन रक्षा मंत्रियों के साथ हमने लिखित समझौते भी किए हैं, लेकिन जब से मौजूदा प्रधानमंत्री सत्ता में आए हैं, आयुध कारखानों के निजीकरण का निर्णय कैबिनेट की बैठकों में लिया जा रहा है। 2016 में इस सरकार के साथ हमारी लड़ाई शुरू हुई थी जब 47 दिनों तक जंतर-मंतर पर आयुध कारखानों के एक हजार से अधिक लोगों ने भूख हड़ताल में भाग लिया था। ट्रेड यूनियनों और रेलवे यूनियनों के साथी भी हमारे संघर्ष में शामिल हुए और हमारा समर्थन किया। सरकार ने हमें बताया कि चिंता न करें क्योंकि कारखानों के निजीकरण के लिए अभी तक कुछ भी निर्णय नहीं किया गया है लेकिन उन्होंने लिखित रूप से हमें कोई आश्वासन नहीं दिया।

2019 में सरकार ने रक्षा कारखानों के निजीकरण की अपनी योजनाओं को पुनर्जीवित किया और इसके फलस्वरूप हमने अनिश्चितकालीन हड़ताल का नोटिस सरकार को भेजा। हमारी हड़ताल के 5वें दिन, सरकार के साथ-साथ दिल्ली के मुख्य श्रम आयुक्त ने हमें हड़ताल को समाप्त करने को कहा और साथ ही वादा भी किया कि इस क्षेत्र के कर्मचारियों के परामर्श के बिना इस क्षेत्र में निजीकरण के लिए कोई क़दम नहीं उठाया जाएगा।

इस वादे के बावजूद उन्होंने फिर से 2020 में निजीकरण पर पुनः कार्य शुरू कर दिया और हमें बाध्य होकर सरकार को अनिश्चितकालीन हड़ताल का नोटिस भेजने के लिए मजबूर होना पड़ा। सरकार ने फिर से दिल्ली के मुख्य श्रम आयुक्त से संपर्क किया और कहा कि वे यथास्थिति बनाए रखेंगे और तब तक कोई क़दम नहीं उठाया जाएगा जब तक कि सरकार और मज़दूरों के बीच कुछ समझौता न हो जाए। जब हमें विचार-विमर्श के लिए बुलाया गया तब सरकार ने कहा कि वे निजीकरण के बारे में बात नहीं कर सकते क्योंकि यह नीति निर्धारण निर्णय के अंतर्गत आता है। इसका जवाब देते हुए हमने कहा कि श्री मोदी इस देश के मालिक नहीं हैं और न ही अमित शाह। हमें बताया गया था कि इसे कैबिनेट में पारित किया गया था। हमने सरकार को स्पष्ट कर दिया कि हम इन कारखानों का निजीकरण नहीं होने देंगे।

चर्चाओं के कई दौर चलने के बाद सरकार ने कहा कि उसके पास 30,000 करोड़ रुपए की युद्ध सामग्री का लक्ष्य है और हम इस लक्ष्य को पूरा करने में उनकी मदद नहीं कर सकते हैं और यही कारण है कि रक्षा आयुध कारखानों का निजीकरण करने की आवश्यकता है। हमने मुख्य श्रम आयुक्त के साथ चर्चा की और उनसे कहा कि हम आपके 30,000 करोड़ रुपए के लक्ष्य को पूरा करने में मदद करेंगे। उन्होने हमें प्रस्ताव देने की सलाह दी। हमने उन्हें मौजूदा सरकारी व्यवस्था के भीतर इस लक्ष्य को पूरा करने योजना दी परंतु 4 महीने के बाद उन्होंने कहा कि जब तक आपको खरीद-आदेश प्राप्त नहीं होते, आप इस लक्ष्य को पूरा करने की योजना कैसे बना रहे हैं? खरीद-आदेश हमें सेना से प्राप्त होते हैं लेकिन दुर्भाग्य से निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल लोग चाहते हैं कि इस क्षेत्र का निजीकरण हो जाए। हमें आज तक भी 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की ख़रीद-आदेश नहीं मिले हैं!

सरकार ने दावा किया है कि आयुध कारखानों की संपत्ति करीब 75,000 करोड़ रुपये की है। यह आंकड़ा अंबानी, अडानी, टाटा और बिरला जैसे लोगों के लिए उद्धृत किया गया है अन्यथा उन्हें अपने चुनावों के लिए धन कैसे प्राप्त होगा? वास्तव में रक्षा संपत्ति का मूल्य इसका दस गुना या उससे और भी अधिक है। फील्ड गन बनाने के लिए 60 से 70 करोड़ रुपये की आवश्यकता होती है। नागपुर में, हमारे कारखाने के समीप ही सरकार ने अनिल अंबानी के गोला बारूद बनाने के कारखाने के लिए आयुध-कारखाने की ज़मीन मुफ्त में उपलब्ध कराई है।

इस बैठक में शामिल होने का मेरा उद्देश्य दूसरों को यह दिखाना नहीं है कि हमने किस प्रकार संघर्ष किया बल्कि यह आह्वान करना है कि इस सरकार पर जीत हासिल करने के लिए हम सभी को मिलकर यह लड़ाई लड़नी होगी। अकेले हम संघर्ष में सफल नहीं होंगे और एकता में ही हमारी शक्ति निहित है।

हिंद खदान मज़दूर महासंघ के अध्यक्ष, श्री नाथूलाल पाण्डेय के संबोधन के प्रमुख मुद्दे

कोयला उद्योग का मूल संगठन कोल इंडिया है और इसकी 8 इकाइयां हैं। यह भारत की ऊर्जा आवश्यकता का 72 प्रतिशत हिस्सा पूरा करता है। कोल इंडिया की स्थापना 1975 में हुई थी, जब हम केवल 70 मिलियन टन कोयले का उत्पादन करने में सक्षम थे; आज हम 559 मिलियन टन का आंकड़ा पार कर चुके हैं। पहले कोल इंडिया में 7.5 लाख कर्मचारी थे और आज केवल 2 लाख 67 हजार कर्मचारी ही रह गये हैं। जहां कर्मचारियों की संख्या में लगातार गिरावट आई है लेकिन उत्पादन साल दर साल बढ़ता रहा है।

कोल इंडिया का प्रत्यक्ष रूप से निजीकरण नहीं किया जा रहा है; कोई भी आधिकारिक खदान निजी खिलाड़ियों को नहीं बेची जा रही है, अपितु पहले से ही मौजूदा खदानों के समानांतर खदान की अनुमति उनको दी जा रही है। एच.एम.एस., ए.आई.टी.यू.सी., सी.आई.टी.यू., आई.एन.टी.यू.सी. और बी.एम.एस. से जुड़ी कोयला उद्योग की सभी यूनियनों ने 2 से 4 जुलाई 2020 को इस मुद्दे पर 100 प्रतिशत सफल हड़ताल आयोजित की और कोल इंडिया का लगभग पूरा उत्पादन इन 3 दिनों के लिए ठप्प पड़ गया। हमने 26 नवंबर, 2020 को हुई अखिल भारतीय हड़ताल में भी भाग लिया।

कोल इंडिया में 5 सरकारी मान्यता प्राप्त ट्रेड यूनियनें हैं और हमारे बीच में एकता है। मैं कहना चाहूंगा कि बी.एम.एस. ने भी सरकार की निजीकरण की नीति के विरोध में ईमानदारी से भाग लिया। हम सभी ज़रूरत पड़ने पर सदैव लड़ने के लिए तैयार रहते हैं। हम सभी अलग-अलग क्षेत्रों से हैं और जब भी हम अकेले लड़े हैं तब हम सभी ने अलग-अलग क्षेत्रों में छोटी-छोटी सफलताएं प्राप्त की हैं। बैंक यूनियनों ने 15 और 16 मार्च, 2021 की दो दिन की हड़ताल की। बीमा यूनियनें भी 17 और 18 मार्च, 2021 को हड़ताल पर गईं। मेरा सुझाव है कि हमें 3 से 4 दिनों के लिए सभी क्षेत्रों में देशव्यापी हड़ताल का आयोजन करना चाहिए और इसके लिए एक रास्ता तय कर इस निजीकरण की समस्या के ख़िलाफ़ एकजुट होकर लड़ें। मुझे यकीन है कि अगर हम किसानों की तरह खुद को संगठित करते हैं और देश व्यापी हड़ताल की योजना बनाते हैं तो हम महत्वपूर्ण प्रभाव डाल पाएंगे। यहां तक कि बी.एम.एस. के कई सदस्य सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों से सहमत नहीं हैं।

मैं आप सभी से वादा करता हूं कि अगर हम देश व्यापी हड़ताल की योजना बनाते हैं तो कोल इंडिया के सभी मज़दूर इसके समर्थन में होंगे और हम खदानों से एक ग्राम कोयला भी नहीं निकलने देंगे!

 

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