पेरिस कम्यून की 150वीं वर्षगांठ : मानव समाज की मुक्ति के संघर्ष में पेरिस कम्यून ने एक नए युग की शुरुआत की

150 वर्ष पहले फ्रांस की राजधानी पेरिस में मज़दूर, राष्ट्रीय संकट की घड़ी में उठ खड़े हुए। उन्होंने एक नई राज्य सत्ता का ऐलान किया – मज़दूर मेहनतकशों का राज। उन्होंने सरमायदारों की राज्य व्यवस्था को नष्ट कर दिया। उन्होंने एक संपूर्ण नई राज्य व्यवस्था का निर्माण किया। एक स्थायी सेना की जगह पर, सभी लोग हथियारबंद होकर अपनी राज्य सत्ता की हिफ़ाज़त में तैनात हो गए। दुनिया के इतिहास में श्रमजीवी वर्ग की यह पहली राज्य सत्ता थी और मज़दूर वर्ग ने दिखा दिया कि जब उसके हाथों में राज्य सत्ता होती है, तो वह क्या हासिल कर सकता है! कई अन्य उपलब्धियों के अलावा मज़दूरों और महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा, कला और संस्कृति – जो कि पहले केवल अमीरों के लिए हासिल थे, सभी को मुहैया कराने के लिए, दुनिया में पहली बार कानून पारित किये गए और ठोस क़दम उठाये गए।

यह पेरिस कम्यून ही था, जिसने 20वीं सदी में दुनियाभर को श्रमजीवी क्रांति की राह दिखाई। जब यह सब चल ही रहा था, उस समय कार्ल मार्क्स ने “स्वर्ग के दरवाज़ों को तोड़ने” और मज़दूर वर्ग अपनी मुक्ति जिस राजनीतिक व्यवस्था में हासिल कर सकता है, उसकी खोज करने के लिए, पेरिस के मज़दूरों की जय-जयकार की। जैसे कि फ्रेडरिक एंगेल्स ने बताया कि पेरिस कम्यून ने जिस राजनीतिक व्यवस्था को पहली बार स्थापित किया है, वह कुछ और नहीं बल्कि श्रमजीवी वर्ग की हुक्मशाही है। कार्ल मार्क्स की प्रसिद्ध रचना, फ्रांस में गृहयुद्ध की प्रस्तावना में उन्होंने लिखा कि “क्या आप देखना चाहते हैं, कि यह हुक्मशाही कैसी नज़र आती है?”… “तो फिर पेरिस कम्यून को देखो। यह श्रमजीवी वर्ग की हुक्मशाही थी।”

चारों ओर से दुश्मनों की घेराबंदी और सरमायदारों की पूरी ताक़त का सामना करते हुए, पेरिस कम्यून 26 मार्च से 30 मई तक, केवल 2 महीने के लिए ही टिक पाया। लेकिन अपने पीछे वह एक ऐसी विरासत छोड़ गया जिसे कभी भी ख़त्म नहीं जा सकेगा। उसकी विजय और उसकी पराजय, दोनों से मज़दूर वर्ग आंदोलन को कई महत्वपूर्ण सबक सीखने को मिले। पेरिस कम्यून का अनुभव लेनिन और उनकी बोल्शेविक पार्टी के लिए बहुमूल्य साबित हुए, जब रूस के मज़दूर वर्ग ने 1917 में अक्तूबर क्रांति की और दुश्मनों से क्रांति की हिफ़ाज़त करने के लिए कठिन संघर्ष चलाया।

पेरिस कम्यून की 150वीं सालगिरह पर हिन्दोस्तान का मज़दूर वर्ग मौत को चुनौती देने वाले कम्युनार्डों के जज़्बे को सलाम करता है और प्रण लेता है कि वह उनके अनुभवों से सबक सीखेगा और अपने देश में मज़दूरों और मेहनतकशों का राज क़ायम करेगा।

पेरिस कम्यून की घटनाएं

पेरिस कम्यून का गठन गहरे संकट के हालात में हुआ था, जब प्रशिया (कालांतर में यह जर्मनी का हिस्सा बना) की हमलावर फ़ौजों ने पेरिस शहर को घेर लिए था और दो महीने तक इसकी घेराबंदी क़ायम रखी थी। इसके एक वर्ष पहले फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय ने प्रशिया के ख़िलाफ़ विस्तारवादी जंग छेड़ दी थी, लेकिन इस जंग में उसकी पराजय हुई और सितम्बर 1870 में उन्हें प्रशिया की सेना ने बंदी बना लिया। इन हालातों में फ्रांस की राष्ट्रीय सभा (फ्रेंच नेशनल असेंबली) के सरमायदारी सदस्यों ने नेपोलियन तृतीय का तख़्ता पलट कर दिया और फ्रांसिसी गणराज्य और एक राष्ट्रीय सुरक्षा की नयी सरकार का ऐलान कर दिया। लेकिन अडोल्फ थिएर्स के नेतृत्व में बनी इस सरकार का सामना जब तेज़ी से आगे बढ़ती दुश्मन सेना के साथ हुआ, तो वह पेरिस के बाहर वर्सेल्स को भाग खड़ी हुई और बाद में फ्रांस के लोगों के पीठ-पीछे हथियार डालने के लिए प्रशिया के साथ समझौता करने की कोशिश की, जबकि फ्रांस के लोग अपने देश की हिफ़ाज़त करने के लिए लामबंध हो गए थे। प्रशिया के लोगों ने इस समझौते के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और पेरिस की घेराबंदी कर डाली, ताकि पेरिस के लोगों को भुखमरी और बमबारी के आगे झुकने को मजबूर कर दिया जाये।

जब मज़दूर वर्ग को सरमायदारों की गद्दारी के बारे में पता चला, तो पेरिस के मज़दूर वर्ग इलाकों में तैनात राष्ट्रीय गार्ड की टुकड़ियों ने बग़ावत कर दी और सत्ता अपने हाथों में ले ली। उन्होंने शहर में लोगों के नए प्रतिनिधि चुनने के लिए चुनाव आयोजित किये और 26 मार्च को कम्यून की स्थापना हुई। पेरिस के लोगों ने अपनी राज्य सत्ता की स्थापना का बेहद खुशी और उम्मीद के साथ स्वागत किया। बगैर कोई विलम्ब किये, इतिहास में पहली बार शोषक वर्गों की राज्य व्यवस्था को नष्ट करने, मेहनतकशों के सुख और कल्याण सुनिश्चित करने और शहर की सुरक्षा सुनिश्चितक करने के लिए कम्यून ने ठोस क़दम उठाये।

वर्सेल्स में बैठी सरमायदारों की सरकार का यह मानना था कि अपने ही देश के लोगों द्वारा स्थापित मज़दूर वर्ग की यह नयी राज्य सत्ता, उनके लिए दुश्मन देश की हमलावर सेना से अधिक ख़तरनाक है। उन्होंने जल्दी ही प्रशिया (अब जर्मनी) की सरकार के साथ समझौता कर लिया और दुश्मन सेना द्वारा बंदी बनाये गए अपने सैनिकों को रिहा करा लिया। प्रशिया ने फ्रांसिसी सरमायदारी सरकार की सेना को इस शर्त पर पुनर्गठित होने की इजाज़त दी कि वह अपनी ताक़त पेरिस कम्यून के ख़िलाफ़ झोंक देगी और इस शर्मनाक शांति समझौते के तहत फ्रांस को अपने कई इलाकों के साथ-साथ भारी हर्ज़ाना जर्मनी को देना पड़ा।

इसके बाद पेरिस पर फिर से कब्ज़ा जमाने के लिए फ्रांस और जर्मनी की सेना ने बर्बर सैनिक अभियान चलाया। पेरिस का मज़दूर वर्ग, महिला और पुरुष, सभी बड़ी बहादुरी से लड़े। एक सप्ताह की भयंकर लड़ाई के बाद, जिसे “खूनी सप्ताह” के नाम से जाना जाता है, 30 मई, 1871 को कम्यून की पराजय हो गई। इस दौरान फ्रांस के सरमायदारों की सेना ने पुरुषों, महिलाओं और बच्चो सहित, लगभग 25,000 मौत के घाट उतार दिया और कई हजार को गिरफ़्तार करके जेलों में बंद कर दिया या देश निकाला दे दिया।

कम्यून द्वारा उठाये गए क्रांतिकारी क़दम

चूंकि कम्यून मज़दूर वर्ग द्वारा स्थापित पहली राज्य सत्ता थी, इसलिए उसके सामने कोई उदाहरण नहीं था जिसका वह अनुसरण कर सकती थी। लेकिन, इतने कम समय में उन्होंने जो क़दम उठाये वे दिखाते हैं कि वर्ग संघर्ष में विजयी मज़दूर वर्ग को किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

जैसे कि मार्क्स और एंगेल्स ने आने वाले समय में लिखा कि कम्यून को एक बात बिल्कुल स्पष्ट थी कि वह केवल “मौजूदा बने-बनाये राज्य तंत्र को अपने हाथों में लेकर अपने लक्ष्य के लिए उसका इस्तेमाल नहीं कर सकता”। मौजूदा राज्य तंत्र को सरमायदार और उससे पहले का शोषक वर्ग सदियों से लोगों का दमन करने और उनके शोषण को और अधिक आसान करने के तरीकों को और अधिक कुशल करते आये हैं। इसलिए इस राज्य तंत्र को पूरी तरह से नष्ट करना और मज़दूर वर्ग द्वारा अपने हित में सत्ता चलाने के लिए नए तंत्रों और संस्थानों का निर्माण करना ज़रूरी था।

कम्यून ने जो सबसे पहला काम किया वह था, सरमायदारी राज्य की पुरानी स्थाई सेना को बर्ख़ास्त करना। अपने इस ऐलान के दो ही दिन बाद, 30 मार्च को कम्यून ने फरमान जारी किया कि पुरानी सेना की जगह राष्ट्रीय गार्ड का गठन किया जायेगा, जहां इसमें शारीरिक रूप से सबल सभी व्यक्तियों को शामिल किया जायेगा। इस तरह से शोषक वर्गों की सत्ता के सबसे बड़े स्तंभ, स्थाई सेना को एक ही झटके में ख़त्म कर दिया गया।

कम्यून के सभी सदस्यों को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुना गया। इन सदस्यों की मतदाताओं के प्रति जवाबदेही थी और उन्हें किसी भी समय वापस बुलाया जा सकता था। ऐसा करते हुए यह सुनिश्चित किया गया कि लोग हमेशा मालिक बने रहेंगे। कम्यून की एक और खासियत यह थी कि इसमें कानून बनाने और उसे लागू करने की, दोनों ही भूमिकाएं एक साथ शामिल थीं, जहां चुने हुए प्रतिनिधि न केवल कानून पारित करते थे, बल्कि उनको लागू करने की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं प्रतिनिधियों की थी। ऐसा करते हुए यह सुनिश्चित किया गया कि कम्यून सरमायदारी विधानसभाओं की तरह केवल एक भाषणबाजी का अड्डा बनकर न रह जाये। न्यायाधीशों को भी लोगों द्वारा चुना जाता था और उन्हें भी किसी भी समय वापस बुलाया जा सकता था।

पुलिस सहित सभी सार्वजनिक अधिकारियों को कम्यून के निर्देशों के अनुसार काम करना होता था। यह फैसला किया गया कि इन सार्वजनिक अधिकारियों को भी एक मज़दूर के बराबर वेतन दिया जाएगा। विशेषाधिकार प्राप्त कुलीन अधिकारियों वाली एक बेहद पेचीदा और परजीवी राज्य मशीनरी को ख़त्म करने से, यह सुनिश्चित हो गया कि राज्य की अर्थव्यवस्था और उसके संसाधनों पर से अब उनका बोझ हट जायेगा। सरल, कम खर्चीली और प्रभावी सरकार, यह सांकेतिक शब्द बन गए।

दुश्मनों द्वारा घेराबंदी और उसके साथ आई तमाम तकलीफ़ों के बावजूद कम्यून ने सभी मेहनतकश महिलाओं और पुरुषों की सुख और सुरक्षा के लिए कई व्यवहारिक क़दम उठाये। जो फैक्ट्रियां बंद हो गयी थीं या फिर जिनके मालिक उन्हें छोड़कर भाग गए थे, उन्हें चलाने के लिए मज़दूरों की सहकारी संस्थाओं (को-ऑपरेटिव) को सौंप दिया गया। फैक्ट्री के मालिकों द्वारा मज़दूरों पर लगाये जाने वाले जुर्माने की व्यवस्था को ख़त्म कर दिया गया। गिरवी पर सामान रखने वाली दुकानों को बंद कर दिया गया और बेकरी मज़दूरों के लिए रात की पाली में काम करने के प्रावधान को ख़त्म कर दिया गया। खाली पड़े और वीरान घरों को बेघर लोगों के आवास में बदल दिया गया। घरों के किराये के भुगतान पर कुछ समय के लिए पाबंदी लगा दी गई।

व्यक्तिगत कानूनों के मामले में, कम्यून ने ऐसे प्रगतिशील क़दम उठाये जो सीधे महिलाओं के हित में थे। कानून के सामने किये गए विवाह और तलाक को मान्यता दी गयी। बच्चों के माथे से अवैधता का कलंक मिटा दिया गया और बच्चे विवाहित माता या अविवाहित माता के हों, सभी के साथ एक समान बर्ताव किया गया।

एक बेहद महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी क़दम था, चर्च को राज्य सत्ता से अलग करना। राज्य की ओर से चर्च को मिलने वाले सहयोग और समर्थन को ख़त्म कर दिया गया और चर्च की संपत्ति को राज्य की संपत्ति में तब्दील कर दिया गया। शिक्षा सहित सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों से चर्च की भूमिका को ख़त्म कर दिया गया। धर्म और आस्था को हर एक व्यक्ति के ज़मीर का निजी मामला मान लिया गया।

अंतर्राष्ट्रीयतावाद के असली जज्बे के साथ कम्यून ने अपनी सेना में लड़ रहे दूसरे देशों के लड़ाकू लोगों का स्वागत किया और उनका सम्मान किया। कम्यून ने फ्रांसिसी सरमायदारी अंध-राष्ट्रवाद के प्रतीक विजय स्तंभ को गिरा दिया, जिसका लोगों ने तालियों के साथ स्वागत किया। कम्यून ने क्रूर अत्याचार के प्रतीक, गिलोटिन (क्रूर तरीके से सिर काटने के यन्त्र) को भी नष्ट कर दिया जिससे लोग नफ़रत करते थे।

ये सारे क्रांतिकारी क़दम केवल दो महीने के छोटे से काल में उठाये गए, जब कम्यून और मज़दूर वर्ग को घेराबंदी के असर का सामना करना था और अधिकांश समय दुश्मन के साथ सीधे लड़ाई में भी शामिल होना था। हुक्मरान वर्ग के रूप में संगठित मज़दूर वर्ग सबसे कठिन हालातों में भी, क्या हासिल कर सकता है, इसे कम्यून के काम ने व्यवहारिक रूप से साबित कर दिया।

पेरिस कम्यून के सबक

पेरिस कम्यून की उपलब्धियां दुनियाभर के श्रमजीवी क्रांतिकारियों के लिए आकाश-दीप की तरह थे। कार्ल मार्क्स ने अपनी रचना “फ्रांस में गृहयुद्ध” में मज़दूर वर्ग के मुक्ति संघर्ष में कम्यून की महान उपलब्धियों के योगदान का विस्तार से विश्लेषण किया है। रूस में 1917 की समाजवादी क्रांति की पूर्व संध्या पर लिखी अपनी चिरस्थाई रचना “राज्य और क्रांति” में वी.आई. लेनिन ने कम्यून द्वारा लिए गए निर्णायक क़दमों के महत्व को उजागर किया है। कम्यून के इस अनुभव ने साबित कर दिया है कि मज़दूर वर्ग को सरमायदारों के पुराने राज्य तंत्र को नष्ट करने और पराजित हुए शोषक वर्ग पर अपनी हुक्मशाही क़ायम करने की ज़रूरत है।

इसके साथ-साथ, पेरिस कम्यून की पराजय और उसकी कमजोरियों से भी अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर वर्ग को कई महत्वपूर्ण सबक सीखने को मिलते हैं।

पेरिस कम्यून एक स्वतः स्फूर्त बग़ावत का नतीजा था और इस वजह से संगठन की कमजोरियों से ग्रसित था। संघर्ष के दौरान कई बार वह खुद की सफलतापूर्ण हिफ़ाज़त करने के लिए निर्णायक क़दम नहीं ले पाया। दुश्मन सरमायदारों की ताक़त और उसके अनुभव को टक्कर देने, उनकी शातिर चालों को समझने और अपने संगठन में फ़ौलादी-एकता बनाये रखने के लिए श्रमजीवी वर्ग को उसका अपना हिरावल दस्ता, पेशेवर क्रांतिकारियों की पार्टी की ज़रूरत है। यह एक महत्वपूर्ण सबक है जिसे लेनिन ने रूस के समाजवादी क्रांतिकारियों को अच्छी तरह से समझाया और बोल्शेविक पार्टी का निर्माण किया, जिसने 1917 में अक्तूबर क्रांति को अगुवाई दी।

कम्यून की पराजय से एक और सबक मिलता है कि मज़दूर वर्ग अपने दुश्मन के प्रति कोई ढिलाई नहीं दिखा सकता है। मार्क्स और ऐंगल्स ने बताया है कि कम्यून ने बैंक ऑफ फ्रांस पर अपना कब्ज़ा जमाने और सरमायदारों को उनके संसाधनों से वंचित करने में हिचकिचाहट दिखाई और यह एक बहुत बड़ी भूल थी। इसके अलावा, क़त्लेआम को टालने की उम्मीद में उन्होंने वर्सेल्स की सरकार के साथ समझौता करने की कोशिश की और इस तरह से वर्सेल्स की सरकार को अपनी सेना को पुनः हथियारबंद करने और पुनर्गठित करने का समय मिल गया और जिसे उसने कम्युनार्डों के ख़िलाफ़ झोंक दिया। जब सरमायदारों की सेना ने पेरिस में प्रवेश किया उस समय उन्होंने काम्युनार्डों या लोगों के प्रति कोई भी ढिलाई नहीं बरती और उनसे रक्तरंजित बदला लिया। यह अनुभव दिखाता है कि विजयी मज़दूर वर्ग को पराजित दुश्मन की सेना के ख़िलाफ़ अपनी हुक्मशाही चलाना बेहद ज़रूरी है।

कम्यून की पराजय का एक और प्रमुख कारक यह है कि सरमायदारी ताक़तें पेरिस के मज़दूर वर्ग को किसानों और देश के अन्य मेहनतकशों से अलग कर पाने में सफल हो गईं। चूंकि कम्युनार्ड अन्य मेहनतकशों तक पहुंच नहीं पाए, इसलिए दुश्मन लोगों के बीच उनके ख़िलाफ़ तमाम तरह के झूठ फैलाने और कम्यून को कुचलने में क़ामयाब हो गया। पेरिस कम्यून के अनुभव से एक और महत्वपूर्ण सबक मिलता है और वह है कि शोषक वर्गों की हुकूमत को ख़त्म करने के लिए मज़दूर वर्ग को किसानों के साथ एक अटूट एकता बनाने की सख़्त ज़रूरत है।

निष्कर्ष

पेरिस कम्यून को अनंतकाल तक मेहनतकशों के मुक्ति संघर्ष में एक नए दौर, श्रमजीवी वर्ग की हुक्मशाही के दौर का आगाज़ करने के लिए याद किया जायेगा। उसने दिखा दिया कि मज़दूर वर्ग के पास आगे बढ़ने का एक ही रास्ता है – राजनीतिक सत्ता को अपने हाथों में लेना, शोषकों के राज्य तंत्र को नष्ट करना और वर्ग आधारित समाज की आर्थिक बुनियाद को जड़ से उखाड़ फेंकना। पेरिस कम्यून ने दिखा दिया कि मज़दूर वर्ग अपनी ऐतिहासिक भूमिका को निभाने के लिए तैयार भी है और क़ाबिल भी। पेरिस कम्यून के समय से मज़दूर वर्ग के बीच यह समझ, अक्तूबर क्रांति और अन्य श्रमजीवी क्रांतियों के अनुभव के आधार पर कई क़दम आगे बढ़ गयी है। बार-बार मज़दूर वर्ग अपनी पराजय और असफलता से सीखता है कि, किस तरह से उसे पुनर्गठित होना है और अपने मुक्ति संघर्ष को बेहतर तरीके से आयोजित करना है।

आज के दौर में मज़दूर वर्ग के भीतर निराशा फैलाने की तमाम कोशिशें की जा रही हैं, यह भ्रम फैलाने की कोशिशें की जा रही हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था और सरमायदारों की हुकूमत के साथ समझौता करने के अलावा मज़दूर वर्ग के सामने कोई और रास्ता नहीं है। पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के साथ समझौते का रास्ता और तीव्र शोषण, संकट और जंग की दिशा में ही लेकर जायेगा। मज़दूर वर्ग को इस रास्ते को ठुकराना होगा। कम्युनार्डों द्वारा दिखाए गए अग्निपथ पर चलते हुए मज़दूर वर्ग को खुद अपने ही मानकों के आधार पर जत्थेबंदी करनी होगी। बोल्शेविकों और वी.आई. लेनिन का अनुसरण करते हुए उसे अपनी पार्टी में एकजुट होना होगा और सरमायदारों पर संपूर्ण विजय के लिए और मेहनतकशों के शोषण और दमन की व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए संगठित तरीके से संघर्ष करना होगा।

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