पुलिस की शक्ति बढ़ाने वाले विधेयक का ब्रिटेन में हज़ारों लोग विरोध कर रहे हैं

ब्रिटेन की सरकार ने संसद में एक विधेयक पेश किया है, जिससे लोगों के अधिकारों और न्याय के संघर्षों को कुचलने के लिए पुलिस को अधिक शक्तियां हासिल हो जाएंगी। इस विधेयक को पुलिस, जुर्म, सज़ा और न्यायालय विधेयक कहा गया है।

लंदन में पुलिस की शक्ति बढ़ाने वाले विधेयक का विरोध

ब्रिटिश सरकार ने इस विधेयक को संसद में 15 मार्च को ऐसे समय पर पेश किया, जब अधिकारों और इंसाफ की मांग कर रहे लोगों पर पुलिस की हिंसा बढ़ती ही जा रही है और इससे मज़दूरों और मेहनतकश लोगों के बीच बेहद गुस्सा है। हाल ही में मार्च के महीने में, जब लोग एक पुलिस अधिकारी द्वारा एक नौजवान महिला का अपहरण करने और उसका क़त्ल किये जाने के ख़िलाफ़ और उसकी याद में प्रदर्शन आयोजित कर रहे थे, तो पुलिस ने उन पर बर्बर हमला किया।

जब से यह विधेयक संसद में पेश किया गया है उस समय से देशभर में कई विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए हैं। पुलिस ने इनमें से कई प्रदर्शनों पर बर्बर हमला किया है।

ब्रिस्टल में पुलिस की शक्ति बढ़ाने वाले विधेयक का विरोध

3 अप्रैल, 2021 को “किल द बिल” के बैनर तले पूरे इंग्लैंड में हज़ारों लोग लंदन, ब्रिस्टल, मेनचेस्टर और कई अन्य शहरों में सड़कों पर उतर आये हैं। ब्रिस्टल में हज़ारों प्रदर्शनकारी शहर में एक जगह इकट्ठा हो गए। एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने प्रमुख रास्ते को घेर लिया और पूरे यातायात को ठप्प कर दिया।

लंदन में हज़ारों लोगों ने हाईड पार्क से संसद चैराहे तक जुलूस निकाला, जहां उन्होंने एक सभा आयोजित की और अपने भाषणों में इस विधेयक की कड़ी निंदा की। इस सभा को तोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिस तैनात की गई थी और 100 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। जिन प्रदर्शकारियों ने वहां से उठने से इंकार किया उनको हिरासत में ले लिया गया और पुलिस ने उन पर रायट शील्ड और कुत्तों के साथ हमला कर दिया।

इस विधेयक से इंग्लैंड और वेल्स में लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को शोरगुल वाला या लोगों के लिए परेशानी पैदा करने वाला करार देते हुए उन पर हिंसक हमला करने की शक्ति पुलिस को दी गयी है। जो लोग गिरफ़्तार हो गए उन पर भारी जुर्माना लगाये जाने या जेल की सज़ा थोपने का प्रावधान है। समय और शोर की सीमा का हवाला देते हुए इन प्रदर्शनों को तोड़ने की शक्तियां इस विधेयक के ज़रिये पुलिस को दी गयी हैं। अभी तक पुलिस, पब्लिक ऑर्डर कानून (पब्लिक आर्डर अधिनियम 1986) का इस्तेमाल कर सकती है जिसे विरोध प्रदर्शनों का “प्रबंधन” करने के नाम पर पारित किया गया था। ब्रिटिश सरकार के अनुसार “जिस तरह के विरोध प्रदर्शन हम आज देख रहे हैं, उनसे निपटने के लिए मौजूदा कानून काफी नहीं है। इसलिए इस कानून को अपडेट किया जा रहा है जिससे पुलिस को ऐसे प्रदर्शनों का ‘सुरक्षित और प्रभावी तरीके से प्रबंधन’ करने में मदद मिलेगी”।

असलियत यह है कि इंग्लैंड और दुनियाभर के कई देशों में नस्ली हमलों, सामाजिक खर्चों में कटौती, महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और राज्य के अन्य जन-विरोधी क़दमों के ख़िलाफ़ लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। जो विधेयक प्रस्तावित किया गया है, यह विधेयक पुलिस को शक्ति देता है, जिससे वह लोगों के विरोध प्रदर्शनों और सभाओं को गुनहगारी कार्यवाही घोषित कर सकते हैं।

यह विधेयक ठीक वैसे ही है जैसे कि हमारे देश में उत्तर प्रदेश और हरियाणा में पारित किये गए हैं। दुनिया के हर कोने में हुक्मरान वर्ग अपनी जन-विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ लोगों द्वारा आवाज़ उठाने के अधिकार को दबाने का काम कर रहा है और इसके ख़िलाफ़ उठती हर एक आवाज़ को कुचलने का काम कर रहा है। यहां तक कि 3 अप्रैल को हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने कानूनी पर्यवेक्षकों को भी “स्वास्थ्य सुरक्षा नियामकों” को लागू करने के बहाने से गिरफ़्तार कर लिया है। इन कानूनी पर्यवेक्षकों का काम है कि वे प्रदर्शनों के दौरान मौजूद रहें और टकराव की स्थिति में वे प्रदर्शकारियों को कानूनी सलाह दे सकें।

ब्रिटेन के लोगों ने इस विधेयक के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है और उसे पारित होने से रोकने का प्रण लिया है। वे समझते हैं कि हुक्मरान किसी न किसी बहाने लोगों के संघर्षों को कुचलने की कोशिश कर रहा है, ताकि लोगों के जायज़ संघर्षों को कुचला जा सके।

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