चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधान सभा चुनाव :

चुनाव जनसमूह को धोखा देने और गुमराह करने के हथकंडे हैं

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 6 अप्रैल, 2021

असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी की विधानसभाओं के चुनावों के नतीजे 2 मई को घोषित किये जायेंगे।

ये चुनाव ऐसे समय पर हो रहे हैं जब पूरा देश सब-तरफा संकट में फंसा हुआ है। इस संकट का आधार आर्थिक संकट है। कृषि से आमदनी, औद्योगिक रोज़गार और निर्यात, ये सभी कोरोना महामारी के फैलने से पहले ही घटते जा रहे थे। हाल के दिनों में मज़दूरों और किसानों की यूनियनें भारी संख्या में बाहर निकलकर विरोध कर रही हैं। लॉकडाउन की पाबंदियों के बावजूद, इन विरोध प्रदर्शनों में महिलाएं और नौजवान बड़ी तादाद में शामिल हो रहे हैं।

न सिर्फ शोषकों और शोषितों के बीच बल्कि शोषकों के बीच भी अंतर्विरोध और तेज़ होते जा रहे हैं। देश पर शासन कैसे किया जाये, उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम को कैसे लागू किया जाये, इन मुद्दों पर तीखे झगड़े चल रहे हैं। तीखे होते इन सारे अंतर्विरोधों के बीच ये विधानसभा चुनाव हो रहे हैं।

वर्तमान व्यवस्था के अन्दर, चुनाव पूंजीपति वर्ग को लोगों के बीच जाकर खूब सारा झूठा प्रचार करने का एक मौका देता है। चुनावों के ज़रिये यह बहुत बड़ा ख़्वाब फैलाया जाता है कि लोग अपनी पसंद की सरकार को चुनते हैं। पर सच्चाई तो यह है कि इजारेदार पूंजीपति चुनावों का इस्तेमाल करके यह तय कर लेते हैं कि उनकी कौन-सी पार्टी उनके कार्यक्रम को सबसे बेहतर तरीके से लागू कर सकती है और साथ-साथ लोगों को भी सबसे बेहतर तरीके से बुद्धू बना सकती है।

इजारेदार पूंजीपति वर्ग – जिसकी अगुवाई टाटा, अंबानी, बिरला, अडानी और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घराने कर रहे हैं – चुनाव अभियानों का अजेंडा तय करता है। इजारेदार पूंजीपतियों के इस अजेंडे को फैलाने में टी.वी. मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका है। जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं, कॉर्पोरेट मीडिया ने वहां के चुनावों को खुदगर्ज पार्टियों और नेताओं के दो प्रतिस्पर्धी दलों के बीच आपसी झगड़े के रूप में पेश किया है। कहीं-कहीं तीन गठबंधन भी हैं। बाकी सारे उम्मीदवारों को पूरी तरह नज़रंदाज़ किया जाता है।

पश्चिम बंगाल के चुनावों को मोदी और ममता के बीच की स्पर्धा बताई जा रही है। तमिलनाडु में द्रमुक (डी.एम.के.) और अन्ना-द्रमुक (ए.आई.डी.एम.के.) के बीच स्पर्धा बताई जा रही है। असम में भाजपा-नीत गठबंधन और कांग्रेस पार्टी नीत गठबंधन के बीच में स्पर्धा बताई जा रही है। केरल में यह कांग्रेस पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के बीच में स्पर्धा बताई जा रही है, जिसमें भाजपा तीसरा पक्ष है।

हुक्मरान वर्ग यह प्रचार करता है कि हर मामले में, प्रतिस्पर्धी दलों के बीच की दौड़ में काफी हद तक बराबरी है। लोगों पर यह दबाव होता है कि वे इस या उस जीतने वाले घोड़े के बीच में चुनें। अंत में जीत किसकी होगी, यह हुक्मरान वर्ग तय करता है। हुक्मरान वर्ग के पास आवश्यक वोट संख्या तैयार करने व मनचाहा नतीजा हासिल करने के तमाम तरीके हैं।

हाल के दशकों में, इस संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था का कुत्सित चेहरा पहले से कहीं ज्यादा साफ-साफ सामने आने लगा है। संचार के आधुनिक तौर-तरीकों और इसके साथ-साथ करोड़ों-करोड़ों लोगों के व्हाट्स एप्प और ई-मेल जैसे निर्णायक डाटा पर इजारेदार पूंजीपतियों के नियंत्रण के चलते, चुनाव के नतीजों को तय करने में इजारेदार पूंजीवादी घरानों के हथकंडे बहुत बढ़ गए हैं।

चुनावी बांड और अन्य तरीकों से भाजपा को हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार कंपनियों से अपने प्रचार अभियान को चलाने के लिए बहुत सारा धन मिला है, इसलिए इस समय वह इस मामले में अपने प्रतिस्पर्धियों से आगे है। केंद्र सरकार भी भाजपा के हाथ में है इसलिए उसे यह फ़ायदा है कि राज्य सरकारों की तिजोरियों पर भी उसी का नियंत्रण है। भाजपा का यह नारा कि “केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार हो”, यह राज्य के लोगों को खुश करने के लिए एक रिश्वत है, एक वादा है कि अगर वहां भाजपा की सरकार बनती है तो उसे केंद्र से ज्यादा धन मिलेगा।

इस महायुद्ध में दोनों ही पक्ष लोगों का ध्यान सच्चाई से हटाते हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा कहती है कि तृणमूल कांग्रेस हिन्दू-विरोधी है जबकि तृणमूल कांग्रेस कहती है कि भाजपा बंगाली-विरोधी है। दोनों पक्ष लोगों का ध्यान इस सच्चाई से हटाने की कोशिश कर रहे हैं कि आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था और सरकारी नीतियां पूंजीपति-परस्त और जन-विरोधी हैं। जिसके चलते, मज़दूरों और किसानों का बेरहम शोषण और दमन होता है, वे चाहे हिन्दू हों या मुसलमान, बंगाली हों या बिहारी या वे किसी और पहचान के हों।

चुनाव प्रचार अभियान के दौरान सभी प्रतिस्पर्धी पार्टियां या गठबंधन मज़दूरों और किसानों की मांगों को पूरा करने का वादा करती हैं। परन्तु सरकार में आ ने के बाद सभी पार्टियां पूरी अडिगता के साथ टाटा, अंबानी, बिरला, अडानी और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घरानों की मांगों को ही पूरा करती हैं।

हमारा समाज वर्गों में बंटा हुआ है, इसलिए अलग-अलग वर्गों के लोग अपने-अपने वर्ग के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियां बनाते हैं।

वर्तमान काल में पूंजीपति वर्ग प्रतिस्पर्धी व्यक्तिगत और गुटवादी हितों के आधार पर बंटा हुआ है। इसलिए, कई प्रतिस्पर्धी पार्टियों का होना उसके वर्ग के हितों के लिए अच्छा है। एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था, जिसमें पूंजीपतियों की सेवा करने में माहिर प्रतिस्पर्धी पार्टियां राज्य की मशीनरी पर नियंत्रण करने के इरादे से आपस में लड़ती हैं, तो वे पूंजीपतियों की हुकूमत को ही बरकरार रखती है। जिसमें लोगों को पूंजीपतियों की प्रतिस्पर्धी पार्टियों की पूंछ बनाकर रखा जाता है।

श्रमजीवी वर्ग, यानी मज़दूर वर्ग के पास अपनी श्रम शक्ति के अलावा बेचने के लिये कुछ और नहीं है, वह वस्तुगत तौर पर समाजवाद की ओर आकर्षित होता है। अगर श्रमजीवी वर्ग को मानव श्रम के हर प्रकार के शोषण को मिटाने के अपने लक्ष्य को पूरा करना है, तो उसे खुद को एक एकजुट राजनीतिक ताक़त के रूप में संगठित करना होगा। श्रमजीवी वर्ग के अगुवा हिस्से को हिरावल कम्युनिस्ट पार्टी में संगठित होना होगा। श्रमजीवी वर्ग के बाकी व्यापक भाग को एक संयुक्त मोर्चे में संगठित होना होगा, जिसे सभी मेहनतकशों और उत्पीड़ि़त लोगों के साथ अटूट एकता बनानी होगी।

जिन किसानों के पास अपनी ज़मीन होती है और दूसरी छोटी-मोटी सामग्रियों के उत्पादक भी अपनी राजनीतिक पार्टियां बनाते हैं। लेकिन इन मंझोले तबकों के अपने कोई ऐसे खास हित नहीं होते, जिन्हें वे या तो समाजवाद की तरफ या फिर पूंजीवाद की तरफ गए बिना, अलग से पूरा कर सकते हैं। समाज के वर्तमान पड़ाव पर, आगे बढ़ने के सिर्फ दो ही रास्ते मुमकिन हैं – पूंजीपतियों का पूंजीवादी-साम्राज्यवादी रास्ता या श्रमजीवी वर्ग का समाजवादी रास्ता। इन मंझोले तबकों से उभरने वाली पार्टियां पूंजीपति वर्ग और श्रमजीवी वर्ग के बीच में, इधर से उधर डोलती रहती हैं और अंत में वे एक या दूसरे पक्ष के साथ मिल जाती हैं।

वर्तमान व्यवस्था के अन्दर किसकी सरकार बनती है, वह कौन सा कार्यक्रम लागू करती है और कौन से कानून पास करती है, इन सारी बातों पर फ़ैसला करने में अधिकतम लोगों की कोई भूमिका नहीं होती। फ़ैसले लेने की ताक़त उसी पार्टी के हाथों में संकेंद्रित होती है, जिसके पास संसद या विधानसभा में बहुमत है। सरकार चलाने वाली पार्टी सत्तारूढ़ पूंजीपति वर्ग के प्रबंधक दल का काम करती है।

सभी तथ्यों और गतिविधियों से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान व्यवस्था में चुनावों का जनमत से कोई संबंध नहीं है। चुनावों के ज़रिये इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग का मत ही पूरे समाज पर थोप दिया जाता है।

भाजपा या किसी दूसरी पार्टी की चुनावी जीत जनमत को नहीं दर्शाती है। चुनावों के नतीजे लोग नहीं निर्धारित करते हैं। इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग ही चुनावों के नतीजों को निर्धारित करता है। चुनावों के नतीजों को निर्धारित करने के लिए पूंजीपति वर्ग के पास बहुत सारे हथकंडे हैं – बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी, भटकाववादी हरकतें, लोगों को बांटना, मतदान में हेराफेरी, ई.वी.एम. की चोरी और ई.वी.एम. के साथ हेराफेरी, इत्यादि।

अगर मज़दूरों और किसानों को फ़ैसले लेने की ताक़त को अपने हाथों में लेनी है, तो वर्तमान संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था को ख़त्म करना होगा, क्योंकि इस व्यवस्था का समय पूरा हो गया है, यह जन-विरोधी है और पूरी तरह बदनाम हो चुकी है। इसकी जगह पर एक आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करनी होगी, जिसमें फ़ैसले लेने की ताक़त लोगों के हाथों में होगी।

मज़दूरों और किसानों, यानी देश की अधिकतम आबादी के हाथों में यह ताक़त होनी चाहिए कि वे अपने भरोसेमंद नुमाइंदों का चयन कर सकें और उन्हें चुनकर उच्चतम फ़ैसले लेने वाले निकायों में बैठा सकें। समाज का एजेंडा तय करने में मज़दूरों और किसानों की भागीदारी होनी चाहिए। मज़दूरों और किसानों के हाथों में निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने और उन्हें किसी भी समय पर वापस बुलाने की ताक़त होनी चाहिए। लोगों के हाथों में कानून बनाने या बदलने, कानूनों या नीतिगत फ़ैसलों को जनमत संग्रह के ज़रिये अपनाने या ख़ारिज़ करने का अधिकार होना चाहिए।

जब हम मज़दूरों और किसानों के हाथों में फ़ैसले लेने की ताक़त होगी, तो हम अर्थव्यवस्था को पुनर्गठित करके एक नई दिशा में चला सकेंगे, ताकि सब की सुख और सुरक्षा सुनिश्चित हो न कि पूंजीपतियों के अधिक से अधिक मुनाफ़े सुनिश्चित हों।

वर्तमान हालतों में यह ज़रूरी है कि जो भी पार्टी या व्यक्ति हिन्दोस्तानी समाज को इस संकट से बाहर निकालना चाहता है, उसे पूंजीपतियों के सभी प्रतिस्पर्धी पार्टियों व दलों को ठुकराना होगा। हमें क्रांतिकारी मज़दूर-किसान मोर्चे को बनाने और मजबूत करने पर अपनी पूरी ताक़त लगानी होगी।

हम अपने श्रम से देश की सारी दौलत को पैदा करते हैं। हम मज़दूरों और किसानों को देश का मालिक बनना होगा। हमें मिलकर देश के भविष्य के बारे में फ़ैसले लेने होंगे। हमें सबको सुख और सुरक्षा की गारंटी देने वाली आर्थिक व्यवस्था और राज्य स्थापित करनी होगी। इस लक्ष्य और नज़रिए के साथ हमें अपनी फौरी मांगों के संघर्ष आगे बढ़ाने होंगे।

इजारेदार पूंजीपतियों के हमलों के खि़लाफ़ संघर्ष के दौरान हमें उस क्रांतिकारी संयुक्त मोर्चे को बनाना व मजबूत करना होगा, जो उस मूलभूत तबदीली, उस सत्ता परिवर्तन को लाने में क़ामयाब होगा जिसकी मांग आज हिन्दोस्तानी समाज कर रहा है।

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