बंदरगाहों के निजीकरण के विरोध में कामगार एकता कमेटी ने सभा आयोजित की

बंदरगाहों के निजीकरण के विरोध में कामगार एकता कमेटी ने सोमवार, 1 मार्च, 2021 को सभा आयोजित की।

मुम्बई, कोच्ची, चेन्नई, विशाखापट्टनम जैसे विविध प्रमुख बंदरगाहों के नेताओं ने इस सभा में भाग लिया। अपने उद्घाटन संबोधन में कामगार एकता कमेटी के सचिव, कामरेड मैथ्यू ने कहा कि बैंक, रेलवे, शिक्षा, तेल क्षेत्र, बीमा, कोयला के निजीकरण के खि़लाफ़, निजीकरण से संबंधित 2021-22 के बजट के प्रस्तावों के ख़िलाफ़ तथा किसानों के संघर्ष के समर्थन में कामगार एकता कमेटी ने जिन सभाओं की श्रृंखला आयोजित की है, उसने हर एक क्षेत्र का गहराई से अध्ययन करके और विविध क्षेत्रों के नेताओं को तथा कार्यकर्ताओं को एक समान मंच पर लाकर निजीकरण के ख़िलाफ़ आंदोलन को प्रबल बनाया है।

कामरेड मैथ्यू ने सभा के वक्ताओं का परिचय दिया कि – कोच्ची बंदरगाह से ऑल इंडिया पोर्ट एण्ड डॉक वर्कर्स फेडरेशन के अध्यक्ष का. पी.एम. मोहम्मद हनीफ, चेन्नई बंदरगाह से वॉटर ट्रान्सपोर्ट वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (सीटू) के महासचिव का. नरेंद्र राव,  विशाखापट्टनम बंदरगाह से पोर्ट, डॉक एण्ड वॉटरफ्रन्ट वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एटक) के महासचिव का. बी.च. मासेन तथा मुम्बई बंदरगाह से ऑल इंडिया पोर्ट एण्ड डॉक वर्कर्स फेडरेशन (वर्कर्स) (एच.एम.एस.) के महासचिव का. सुधाकर आर. अपराज शरीक हो रहे हैं।

कामगार एकता कमेटी की तरफ से का. अशोक कुमार ने हिन्दोस्तान के बंदरगाहों की आज की परिस्थिति का विवरण दिया और स्पष्ट किया कि कैसे निजीकरण मज़दूर-विरोधी है और राष्ट्र-विरोधी भी। सभी सहभागियों ने इस प्रस्तुति की बहुत सराहना की। (देखें – बंदरगाहों के राष्ट्र-विरोधी, मज़दूर-विरोधी निजीकरण का विरोध करें! कामगार एकता कमेटी की प्रस्तुति)

प्रस्तुति के बाद कोच्ची बंदरगाह से शरीक हुए ऑल इंडिया पोर्ट एण्ड डॉक वर्कर्स फेडरेशन के अध्यक्ष का. पी.एम. मोहम्मद हनीफ तथा चेन्नई बंदरगाह से वॉटर ट्रान्सपोर्ट वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (सीटू) के महासचिव का. नरेंद्र राव के संबोधन हुए। (इनके संबोधन के प्रमुख मुद्दे क्रमशः बाक्स 1 तथा 2 में हैं।)

विशाखापट्टनम बंदरगाह से पोर्ट, डॉक एण्ड वॉटरफ्रन्ट वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एटक) के महासचिव का. बी.च. मासेन, ने तथा मुम्बई बंदरगाह से ऑल इंडिया पोर्ट एण्ड डॉक वर्कर्स फेडरेशन (वर्कर्स) (एच.एम.एस.) के महासचिव का. सुधाकर आर. अपराज ने भी अपनी बातें रखीं। उनका कहना था कि एक ही मार्ग है कि सरकार की नीतियों के खि़लाफ़ सब क्षेत्रों के मज़दूर एकजुट हों।

इसके बाद मंच को सभी के लिये खोला गया इस दौरान अनेक लोगों ने उत्साह से भाग लिया। पोर्ट एण्ड डॉक पेन्शनर्स एसोसिएशन के नेता का. कस्टोडियो मेन्डोन्सा ने आश्वस्त किया कि सेवानिवृत्त मज़दूर भी सरकार की नीतियों के खि़लाफ़ सड़कों पर आएंगे। ऑल इंडिया पोर्ट एण्ड डॉक वर्कर्स फेडरेशन के का. डी.के. सर्मा का कहना था कि पूंजीपतियों के पक्ष में बनाई जा रही सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिए मज़दूरों की विश्वव्यापी एकता बनानी चाहिए।

सभा के अंत में सभी ने निश्चय किया कि कामगार एकता कमेटी द्वारा आयोजित श्रृंखला को जारी रखना चाहिए और बिजली वितरण, बी.एस.एन.एल., इस्पात तथा अन्य क्षेत्रों के निजीकरण के बारे में भी चर्चा करनी चाहिए।

बॉक्स-1 :

ऑल इंडिया पोर्ट एण्ड डॉक वर्कर्स फेडरेशन के अध्यक्ष का. पी.एम. मोहम्मद हनीफ के संबोधन के प्रमुख मुद्दे

बंदरगाह एक जटिल उद्योग है। हिन्दोस्तान की सरकार आज बंदरगाह संबंधित कार्यों का केवल प्रबंधन कर रही है। सरकारी नियंत्रण के प्रमुख बंदरगाह सालाना औसतन 50,00 करोड़ रुपये का मुनाफ़ा कमा रहे हैं। परंतु कंटेनरों द्वारा देश में आने-जाने वाला माल अब पूरा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है। माल का परिचालन करने की क्षमता बढ़ जाएगी ऐसा कहकर सरकार निजीकरण का समर्थन कर रही है। लेकिन हमारे पास अभी भी कुल मिलाकर सालाना 150 करोड़ टन का परिचालन करने की क्षमता है जबकि केवल 120 करोड़ टन की क्षमता का ही इस्तेमाल हो रहा है।

पहले तो सारे के सारे माल का परिचालन सरकारी बंदरगाह करते थे। लेकिन अब केवल 55 प्रतिशत का परिचालन “प्रमुख” यानी सरकारी बंदरगाह कर रहे हैं, जबकि उनके पास उच्चतर तकनीकी साधन हैं। अंत में सरकार सब कुछ निजी खिलाड़ियों को हवाले कर देगी। निजी बंदरगाह पहले लोगों को आकर्षित करने के लिए कम दर रखते हैं जबकि प्रमुख बंदरगाहों की दर सरकार निर्धारित करती है।

प्रमुख बंदरगाहों के पास 2.7 लाख एकड़ से ज्यादा भूमि है, जिसे इजारेदार पूंजीपति हथियाना चाहते हैं।

सरकारी बंदरगाहों में मज़दूरों की संख्या बहुत गिर गई है। 1993 में 1,13,000 मज़दूर हुआ करते थे, 1997 में 95,000 और अभी मात्र 24,000 हैं। 2001 से 2010 दौरान प्रमुख बंदरगाहों से सरकार को 56,000 करोड़ रुपये से ज्यादा सीमा कर द्वारा मिला था, जबकि निजी बंदरगाहों से केवल 2,000 करोड़ रुपये मिला था। सरकारी बंदरगाह आयकर भी भरते हैं। दुबई स्थित बहुराष्ट्रीय कम्पनी, डी.पी. वर्ल्ड देश में 5 टर्मिनलों का संचालन करती है। 4 टर्मिनलों का मुनाफ़ा वह चेन्नई बंदरगाह के नुकसान के साथ जोड़कर आयकर देती ही नहीं है।

देश में 5 बंदरगाह हैं जो रक्षा सेवा के माल का परिचालन करते हैं। उनके निजीकरण से देश की सुरक्षा पर बुरा असर होगा।

निजीकरण की पूरी प्रक्रिया बिल्कुल पारदर्शी नहीं है। जो अधिकारी इन निजी खिलाड़ियों के साथ सौदा करते हैं, उन्हें बाद में उन्हीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में नौकरियां मिलती हैं! इसकी एक मिसाल है जी.जे. राव। वे पहले प्रमुख बंदरगाहों के उपाध्यक्ष थे, अभी वे अडानी की बंदरगाह के सीईओ यानी मुख्य कार्यपालक अधिकारी बन गये हैं।

समुद्री विभागों में 20 से अधिक साल जिन जहाजों ने सेवा दी है उनको बेकार घेषित पड़ता है, जबकि अगर ठीक तरीके से उन्हें सूखे बंदरगाह पर लाया जाए तो उनका 5-10 साल और इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन उनकी जगह पर सरकार निजी जहाजों को लाना चाहती है।

1,30,000 सेवानिवृत्त तथा प्रमुख बंदरगाहों में कार्यरत 25,000 मज़दूरों की पेंशन के भुगतान की ज़िम्मेदारी सरकार की है। निजीकरण का इस पर प्रभाव हो सकता है।

प्रमुख बंदरगाहों में 1 लाख पद रिक्त हैं। उनमें अगर भर्ती की जाए तो दसों-हजारों नौजवानों को नौकरियां मिल सकती हैं। लेकिन होने वाले निजीकरण की वजह से उन्हें भरा नहीं जा रहा है।

निजीकरण की क़ीमत हिन्दोस्तानी लोग चुकायेंगे, सिर्फ इजारेदारों को फ़ायदा होगा।

सरकार की निजीकरण की योजनाओं को रोकने के लिए हमें रेलवे तथा परिवहन के अन्य क्षेत्रों के सभी मज़दूरों को लामबंध करना होगा।

 

बॉक्स-2 :

वॉटर ट्रान्सपोर्ट वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (सीटू) के महासचिव का. नरेंद्र राव के संबोधन के प्रमुख मुद्दे

2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने, तब उन्हें फिक्की (बड़े पूंजीपतियों के संगठन) ने आमंत्रित किया था। एक वार्ताकार को जवाब देते हुए उन्होंने कहा था कि अपने देश के सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों ने तो आखिर मरने के लिए ही जन्म लिया है। हम या तो उन्हें बंद कर सकते हैं या उनका निजीकरण कर सकते हैं। यह नीति 1991 से कांग्रेस तथा अन्य सरकारों ने भी लागू की है।

ऑक्स्फेम के एक रिसर्च पेपर ने स्पष्ट किया है कि कैसे हिन्दोस्तान में असमानता इतनी बढ़ी है कि उपनिवेशवाद के काल के बाद इतनी कभी नहीं थी। मार्च 2020 के बाद हिन्दोस्तान के 100 अमीरतम लोगों के पास जो ज्यादा धन आया है, वह सबसे गरीबतम 13.8 करोड़ लोगों में से हर एक व्यक्ति को 94,045 रुपये देने के लिए काफी है! पिछले साल देश के अमीरतम व्यक्तियों को प्रति सेकंड जितना धन मिला, उतना कमाने के लिए हिन्दोस्तान के अकुशल मज़दूर को 3 वर्ष लगेंगे। यह सरकार की निजीकरण की नीतियों का अंजाम है।

अपने बजट भाषण में निर्मला सीतारमण ने कहा कि माल के परिचालन का बोझ हल्का करने के लिए वे सात बंदरगाहों का निजीकरण करेंगे। लेकिन माल का परिचालन करना तो हमारा मुख्य काम है, तो वह बोझ कैसे हो सकता है?

महापत्तन प्राधिकरण अधिनियम को महामारी के दौरान, 23 सितम्बर, 2020 को लोकसभा में तथा 10 फरवरी, 2021 को राज्यसभा में पारित किया गया। अब 1 अप्रैल, 2021 को प्रमुख बंदरगाह ट्रस्ट को प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण में तब्दील किया जाएगा। बंदरगाहों के मज़दूरों की पांच फेडरेशन हैं। उन सबने कानून की कई धाराओं के खि़लाफ़ आवाज़ उठायी है। हमने संसदीय स्थायी समिति के सामने अपनी आपत्तियों को प्रकट किया है और उसने उनको मान्य किया है।

परंतु कानून पारित करते वक्त सरकार ने संसदीय स्थायी समिति द्वारा सूचित की गई हर एक सिफारिश नजरंदाज़ कर दिया।

दुबई पोर्ट्स वर्ल्ड (डी.पी.डब्ल्यू.) अपना नाम बदलकर हिन्दोस्तान पोट्र्स प्राइवेट लिमिटेड करना चाहती थी। यह प्रस्ताव कोच्ची ट्रस्ट बोर्ड के सामने लाया गया। उस वक्त कोच्ची पोर्ट ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री पॉल एन्थनी ने इसका विरोध किया था और हम मज़दूरों के प्रतिनिधियों ने भी इसका विरोध किया। डी.पी.डब्ल्यू. प्रधानमंत्री के पास गया। मोदी दुबई के शासकों के साथ मिले और उसके बाद मंत्रीमंडल ने निर्णय लिया। नौवहन मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी किया जिसके ज़रिये मंत्रालय ने डी.पी.डब्ल्यू. की याचिका को मान्य करने का आदेश पोर्ट को दिया। उसके बाद कोई बोर्ड उसके बारे में कुछ पूछ नहीं सकता है क्योंकि वह नीतिगत बन गया। उसके बाद नाम हिन्दोस्तान पोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बन गया। यह बहुत स्पष्ट है कि बंदरगाहों का निजीकरण करना सरकार का इरादा है।

दो नये कानून बनने जा रहे हैं। व्यापारी नौवहन कानून 1958 को सुधार कर व्यापारी नौवहन अधिनियम 2020 बनाया गया है। उसी प्रकार भारतीय बंदरगाह कानून 1908 अब भारतीय बंदरगाह अधिनियम 2020 बन गया है।

व्यापारी नौवहन कानून के अनुसार जो हिन्दोस्तानी मालिक या कॉर्पोरेट कम्पनी जहाज खरीदती है उसे जहाज भारतीय नौवहन रजिस्टर में दर्ज करना पड़ता है। लेकिन अब व्यापार नौवहन अधिनियम के मुताबिक कोई भी विदेशी खिलाड़ी जहाज खरीद सकता है और हिन्दोस्तान में उसका पंजीकरण करके वह हिन्दोस्तान के समुद्रों में उसे चला सकता है। यह बहुत ख़तरनाक है। अंतर्राष्ट्रीय वित्त कम्पनियां हिन्दोस्तानी कॉर्पोरेटों के साथ हाथों में हाथ मिलाकर काम करती हैं।

भारतीय पोर्ट कानून-1908 के तहत 9 तटवर्ती राज्यों के छोटे बंदरगाह आते हैं। हर तटवर्ती राज्य में छोट बंदरगाह हैं और गुजरात में 87 छोटे बंदरगाह हैं। ये राज्य सरकारों के नियंत्रण में हैं। समुद्री बंदरगाह नियामक प्राधिकरण के नाम पर भारत सरकार उन पर हावी हो जाएगी। भारतीय बंदरगाह बिल-2020 के मुताबिक सब छोटे बंदरगाहों को केंद्र सरकार अपने हाथों में ले लेगी।

सरकार की निजीकरण की मुहिम को रोकने का एक ही उपाय है कि मज़दूरों को संगठित करके अपना संघर्ष तेज़ करें।

 

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