बंदरगाहों के राष्ट्र-विरोधी, मज़दूर-विरोधी निजीकरण का विरोध करें!

कामगार एकता कमेटी की प्रस्तुति

बंदरगाहों के निजीकरण की दिशा में फरवरी 2021 में दो बड़े क़दम उठाये गये थे। 1 फरवरी, 2021 को अपने बजट के भाषण में वित्त मंत्री ने घोषित किया कि “अपनी परिचालन सेवाओं का प्रबंधन खुद करने की बजाय “प्रमुख” बंदरगाह अब एक ऐसा मॉडल अपनायेंगे जहां एक निजी सांझेदार उनके लिए प्रबंधन करेगा। इसके लिए वित्त वर्ष 2021-22 में 2,000 करोड़ रुपयों से ज्यादा मूल्य की सात परियोजनायें प्रमुख बंदरगाहों द्वारा पी.पी.पी. (सार्वजनिक निजी सांझेदारी) मॉडल पर पेश की जायेंगी”। इसके तुरंत बाद 10 फरवरी, 2021 को राज्य सभा ने “प्रमुख बंदरगाह प्राधिकारण विधेयक” पारित किया। (हिन्दोस्तान के बंदरगाहों के क्षेत्र के बारे में बॉक्स-1 देखें)

बॉक्स-1 :

हिन्दोस्तान का बंदरगाह क्षेत्र

विदेश में व्यापार के लिए बंदरगाहों का रणनैतिक महत्व होता है। हिन्दोस्तान के विदेश व्यापार का घनफल के हिसाब से 95 प्रतिशत तथा वजन के हिसाब से 70 प्रतिशत माल बंदरगाहों से ही आता जाता है। विदेश व्यापार देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग है। सकल घरेलू उत्पाद में निर्यात का हिस्सा तकरीबन 20 प्रतिशत है।

अपने देश के 7,500 किलोमीटर की लम्बाई वाली समुद्री सीमा पर 12 “प्रमुख” तथा तकरीबन 200 “छोटे” बंदरगाह हैं। 2019-20 में उन सबके द्वारा कुल 132 करोड़ टन के माल का अवागमन हुआ था।

सच तो यह है कि बंदरगाहों के लिए “प्रमुख” तथा “छोटे” विशेषणों का जो प्रयोग किया जाता है वह काफी भ्रामक है, क्योंकि यह माल की मात्रा या मालिकी पर आधारित नहीं है। सभी 12 “प्रमुख” बंदरगाह केंद्र सरकार की मालिकी के हैं जिनमें 11 पोर्ट ट्रस्ट कानून-1963 के तहत आते हैं और एक का कंपनी बतौर निर्माण किया गया था। 200 “छोटे” बंदरगाहों में सिर्फ 62 पर माल आता-जाता है और अधिकांश निजी मालिकी के हैं। चकित करने वाली बात यह है कि “छोटे” बंदरगाहों में सबसे बड़ा बंदरगाह जो मुंदरा है, वह माल के हिसाब से कई सारे “प्रमुख” बंदरगाहों से काफी बड़ा है!

Indias surging port traffic

ऊपर का चार्ट दिखाता है कि कैसे 1995 से 2016 के दरम्यान हिन्दोस्तानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले माल की मात्रा कितनी तेज़ी से बढ़ी है। यह भी स्पष्ट है कि “छोटे” बंदरगाहों की वृद्धि दर सरकारी मालिकी के “प्रमुख” बंदरगाहों के मुकाबले बहुत ज्यादा है। 1980 में “छोटे” बंदरगाहों पर सिर्फ 10 प्रतिशत माल आता जाता था, जबकि 2019-20 में वह तकरीबन आधा, यानी कि 47 प्रतिशत है।

सर्वसामान्य माल का परिवहन अब ज्यादा से ज्यादा कंटेनरों द्वारा होता है। जहाजों को लंगर डालकर खड़े होने के लिये हिन्दोस्तान में कुल मिलाकर 34 जगहें (बर्थ) हैं, जो कंटेनर से आने वाले माल के लिए हैं। जे.एन.पी.टी. सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह है और उस पर 11 बर्थ हैं। जिसमें से सिर्फ तीन को पार्ट ट्रस्ट चलाता है और बाकी सब निजी संचालकों के हाथों में हैं। जे.एन.पी.टी. में तीन बड़े अंतर्राष्ट्रीय परिचालक, ए.पी.एम. टर्मिनल्स, डी.पी. वर्ल्ड तथा पी.एस.ए. इंटरनेशनल कार्यरत हैं।

बंदरगाहों का निजीकरण 1997 में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में शुरू हुआ था। महाराष्ट्र के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (जे.एन.पी.टी.) में नेहावा शेवा इंटरनैशनल कंटेनर टर्मिनल (एन.एस.आई.सी.टी.) है जो डी.पी. वर्ल्ड का पी.पी.पी. के आधार पर विकसित किया हुआ पहला टर्मिनल है। डी.पी. वर्ल्ड इस क्षेत्र में सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से एक है। उसी समय बंदरगाहों के लिए स्वचलित मार्ग से सौ प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश को भी मंजूर किया गया था। सन 2000 से अब तक 163 लाख डॉलरों का विदेशी निवेश हुआ है। निजी बंदरगाहों, देश के अंदर के जलमार्गों तथा देशांतर्गत बंदरगाहों को विकसित करने के लिए हिन्दोस्तानी तथा विदेशी पूंजीपतियों को 10 सालों के लिए करों से छूट भी दी गई थी।

केंद्र में एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने बंदरगाहों के निजीकरण के लिए दो रणनीतियां अपनायी हैं। पहले तो वे अनेक तरीक़ों से तथाकथित “छोटे” निजी बंदरगाहों को स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन देते हैं। इस प्रकार के स्थानों को वे प्रोत्साहित करते हैं ताकि नजदीक के “प्रमुख” बंदरगाहों के मुक़ाबले में इन छोटे बंदरगाहों को फलने-फूलने का मौका मिले। उदाहरण के तौर पर, निजी मालिकी के मुंदरा, दिघी तथा विझिंजम को क्रमशः सरकारी मालिकी वाले कांडला, जे.एन.पी.टी. तथा कोची बंदरगाहों के मुकाबले प्रोत्साहन दिया गया।

दूसरा तरीका है कि सरकारी बंदरगाहों पर जहाजों के लिये लंगर डालकर खड़े होने की जो लाभदायक जगहें हैं उन्हें निजी संचालकों के हवाले कर दिया जाये। इससे जल्द ही सरकार की मालिकी के बंदरगाहों में जहाजों के लिये लंगर डालकर खड़े होने वाली सिर्फ अलाभदायक जगहें ही रह जायेंगी। इस तथ्य का इस्तेमाल करके सरकार बंदरगाहों को ही बेच देगी। प्रमुख बंदरगाहों पर ऐसी 240 जगहें हैं जहां जहाज लंगर डालकर खड़े होते हैं जिन में से फिलहाल 69, यानी 28 प्रतिशत को पी.पी.पी. मॉडल (सार्वजनिक निजी साझेदारी) तहत चलाया जा रहा है।

इस परिप्रेक्ष्य में हमें याद रखना होगा कि विविध सरकारों ने पी.पी.पी. मॉडल को हमेशा इस तरह चलाया है कि सरकार सब ख़तरे तथा नुकसान को खुद झेलती है जबकि निजी मालिक मुनाफ़े कमाते हैं। हमें यह भी ख्याल में रखना चाहिए कि इसका अप्रत्यक्ष परिणाम आम लोगों पर पड़ता है क्योंकि सरकार को पैसा लोगों से ही करों के माध्यम से मिलता है। अधिकतम कमाई अप्रत्यक्ष करों से होती है जैसे कि जी.एस.टी., चुंगी, आदि। ग़रीब से ग़रीब लोग भी अप्रत्यक्ष कर देते हैं जब भी वे बाज़ार से अपनी आवश्यकता की अस्तुएं खरीदते हैं। अतः, पी.पी.पी. मॉडल मज़दूरों के पैसों को अति अमीर इजारेदारों के हाथों में देने के ज़रिये के अलावा और कुछ नहीं है।

महापत्तन प्राधिकरण कानून-2020 में निजीकरण को एक और बढ़ावा दिया गया है। 23 सितम्बर, 2020 को लोकसभा ने तथा 10 फरवरी, 2021 को राज्यसभा ने इस अधिनियम को पारित किया। यह मई 2011 के विश्व बैंक की रिपोर्ट की सिफारिशों पर आधारित है। यह नया बंदरगाह कानून माल ढोनेवाले जहाजों के लंगर डाकलकर खड़े होने की क्रियाशील जगहों के निजीकरण के लिए दरवाज़े पूरी तरह खोल देगा। सरकार की मालिकी में ‘ट्रस्ट’ बतौर चलाये जा रहे 12 में से 11 बंदरगाहों को अब ‘प्राधिकरणों’ में तब्दील किया जाएगा। प्रमुख बंदरगाह प्राधिकारण कानून के तहत प्रस्तावित ‘बंदरगाह प्राधिकरण’ महज एक ज़मीनदार की भूमिका निभाएगा। इस मॉडल में मालिकी सरकार की ही रहेगी जबकि निजी कंपनियां बंदरगाहों का परिचालन करेगी। ज़मीनदार बंदरगाह को निजी कंपनी की कमाई से एक हिस्सा मिलेगा। (महापत्तन प्राधिकरण कानून-2020 के विवरण के लिए बॉक्स-2 को देखें।)

बॉक्स-2 :

महापत्तन प्राधिकरण अधिनियम-2020

महापत्तन प्राधिकरण अधिनियम-2020 के तहत चेन्नई, कोच्ची, जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह, कांडला, कोलकाता, मुम्बई, न्यू मैंगलोर, मड़गांव, पारादीप, वी.ओ. चिदम्बरनार तथा विशाखापट्टनम के प्रमुख बंदरगाह आएंगे। कानून बोर्ड को इजाजत़ देता है कि प्रमुख बंदरगाहों के विकास के लिए वह जैसे योग्य मानता है, वैसे ही अपनी संपत्ति तथा निधि का इस्तेमाल करे। वर्तमान में 1963 के कानून के तहत स्थापित “प्रमुख बंदरगाहों के लिए शुल्क प्राधिकरण” (टैरिफ ऑथोरिटी फॉर मेजर पोर्ट्स) बंदरगाह में उपलब्ध संपत्ति तथा सेवाओं के इस्तेमाल के लिए दरों को निर्धारित करता है। अब नये कानून के तहत बोर्ड या बोर्ड द्वारा नियुक्त कमेटी दर निर्धारित करेगी। इस कानून के तहत बोर्ड पूंजी या काम के खर्च के लिए इनमें से किसी से भी आवश्यक कर्ज़ ले सकता है: (1) हिन्दोस्तान के अंदर की किसी भी निर्धारित बैंक या (2) हिन्दोस्तान के बाहर की किसी भी वित्त संस्था।

अधिनियम में दर्ज़ की गयी परिभाषा के मुताबिक पी.पी.पी. परियोजनायें वे परियोजनायें हैं जो बोर्ड के साथ रियायत अनुबंध द्वारा चलाई जा रही हैं। ऐसी परियोजनाओं के लिए बोर्ड को इजाज़त है कि शुरुआती बोली प्रक्रिया के लिए शुल्क निर्धारित करे। नियुक्त किये हुए रियायतग्राही को बाज़ार की परिस्थिति तथा सूचित की हुई और परिस्थिति के आधार पर प्रत्यक्ष शुल्क निर्धारित करने की आज़ादी होगी।

बंदरगाहों के लिए ज़मीनदार मॉडल निजीकरण का एक और ज़रिया है। भूमि अधिग्रहण सहित बंदरगाह निर्माण के लिए सरकार निवेश करेगी। निर्माण होने के बाद मुनाफ़ा कमाने के लिए बंदरगाहों को पूंजीपतियों के हाथों सौंप दिया जाएगा।

बंदरगाह, नौपरिवहन तथा जलमार्ग मंत्री मनसुख मांडविया ने इस साल फरवरी में, इस अधिनियम का समर्थन करते हुए, एक झूठा ऐलान किया जब उन्होंने दावा किया कि महापत्तन प्राधिकरण अधिनियम-2020 का इरादा 12 प्रमुख बंदरगाहों का निजीकरण करना नहीं है बल्कि उसका लक्ष्य “निजी बंदरगाहों के साथ स्पर्धा करने के लिए इन बंदरगाहों को स्वायत्ता प्रदान करना तथा उनके निर्णय लेने की ताक़त को बढ़ाना है”।

कानून बनाने से पहले ही निजीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी थी। राज्यसभा में अधिनियम पारित होने से पहले ही मंत्री ने सभी प्रमुख बंदरगाहों को आदेश दिए थे कि “नये तथा मौजूदा सभी टर्मिनलों के लिये पी.पी.पी. या ज़मीनदार मॉडल की योजना बनायी जाए”।

इस आदेश के अनुसरण में, जे.एन.पी.टी. ने खुद चलाए जाने वाले कंटेनर टर्मिनल का निजीकरण करने का प्रस्ताव पारित कर दिया। न्यू मैंगलोर पोर्ट ट्रस्ट (एन.एम.पी.टी.) ने तेल तथा एल.पी.जी. उतारने वाले तेल बंदरगाह पर जहाजों के लंगर डालकर खड़े होने की जगह (बर्थ) नंबर-9 का परिचालन, रखरखाव तथा क्रय-विक्रय के आधार पर निजीकरण के लिए प्रस्ताव मांगे हैं।

जे.एन.पी.टी. में 1,430 मज़दूर हैं। डर है कि निजीकरण के होते ही ये सभी अपनी नौकरियां खो बैठेंगे। आसपास रहने वाले 4000 से ज्यादा लोग हैं जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए जे.एन.पी.टी. पर निर्भर हैं।

35-40 साल पहले जे.एन.पी.टी. के लिए जिन्होंने अपनी भूमि दी थी, वे ग्रामवासी भी मज़दूरों का समर्थन कर रहे हैं। जे.एन.पी.टी. के पास 8,000 एकड़ ज़मीन है। ग्रामवासियों के नेता दिनेश पाटिल का कहना है कि “सरकार ने आश्वासन दिया था कि हर प्रभावित घर से एक व्यक्ति को नौकरी दी जाएगी और उन्हें अपने दी हुई ज़मीन के बदले दूसरी जगह पर 12.5 प्रतिशत ज़मीन दी जाएगी। 2,000 से भी अधिक ऐसे परिवार हैं जिन्हें यह सब अभी तक नहीं मिला है। निजीकरण से यह परिस्थिति और जटिल बन जाएगी”।

मज़दूर जानते हैं कि बंदरगाहों का निजीकरण उनके हितों के खि़लाफ़ है और वे इसके खि़लाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। नौकरियां खोने का उनका डर जायज़ है, यह इस बात से सिद्ध होता है कि केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित बंदरगाहों पर 2013 में नियमित मज़दूरों की संख्या 51,000 तक गिर गई जबकि एक दशक पहले यह संख्या तकरीबन 100,000 थी। जो 2019 में घट कर 29,000 ही रह गई थी।

मज़दूरों तथा लोगों के विरोध के बावजूद पिछले दो दशकों से बंदरगाहों का निजीकरण होता रहा है। हिन्दोस्तानी पूंजीपति तथा बंदरगाहों के बहुराष्ट्रीय संचालक, दोनों हिन्दोस्तानी बंदरगाहों को अपने हाथों में ले रहे हैं। इस क्षेत्र में अडानी पोर्ट्स एक बड़ा खिलाड़ी बन चुका है। हिन्दोस्तान के समुद्री किनारों पर रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जगहों पर स्थित 10 बंदरगाहों को वह चलाता है। उसने और दो बंदरगाहों का अधिग्रहण कर लिया है। उसका नवीनतम अधिग्रहण महाराष्ट्र के दिघि बंदरगाह का है जिसे 10,000 करोड़ रुपयों के निवेश से सरकारी मालिकी के जे.एन.पी.टी. के निजी विकल्प बतौर विकसित किया जायेगा। गुजरात के कच्छ में स्थित उसका मुंदरा बंदरगाह हिन्दोस्तान का सबसे बड़ा निजी बंदरगाह है। वह एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज़) भी है। 2019-20 में उससे 13.9 करोड़ टन माल का अवागमन हुआ था। (हिन्दोस्तान के निजी बंदरगाहों के बारे में बॉक्स-3 देखें।)

बॉक्स-3 :

हिन्दोस्तान के निजी बंदरगाह

हिन्दोस्तान के निजी बंदरगाहों का केंद्र गुजरात है। गुजरात के समुद्री किनारे पर जगह-जगह बंदरगाह हैं। इनमें सरकारी मालिकी का कांडला बंदरगाह है तथा निजी मालिकी के मुंदरा, पिपावाव, दाहेज तथा हजीरा का समावेश है। मुंदरा माल का परिचलन करने वाला देश का सबसे बड़ा बंदरगाह है। देश में चलने वाले छोटे बंदरगाहों में से 70 प्रतिशत माल का आवागमन गुजरात से होता है। इसके बाद आता है आंध्र प्रदेश, जिसमें 16 प्रतिशत तथा महाराष्ट्र जिसमें 7 प्रतिशत माल आता-जाता है। 2017-18 में समुद्री मार्ग से आने वाले माल का तकरीबन 93 प्रतिशत हिस्सा इन तीनों राज्यों से था।

सार्वजनिक बंदरगाहों को नुकसान पहुंचाकर निजी बंदरगाह फले-फूले हैं। 1998-99 में सार्वजनिक क्षेत्र के बंदरगाह कांडला से 4.06 करोड़ टन के माल का परिचलन होता था, जबकि गुजरात के सभी छोटे तथा मध्यम बंदरगाहों में कुल मिलाकर सिर्फ 2.51 करोड़ टन माल का परिचलन होता था। वित्त वर्ष 2014 में गुजरात के सभी छोटे तथा मध्यम बंदरगाहों ने कुल मिलाकर कांडला के चैगुना माल का परिचालित किया। आज यातायात के आधार पर  अडानी का मुंदरा बंदरगाह सबसे बड़ा है और सबसे बड़ा कंटेनर टर्मिनल है गेटवे टर्मिनल इंडिया का, जो खुद डेनिश नौपरिवहन समूह ए.पी. मोलर-मर्सेक ग्रुप ए/एस का भाग है। ये दोनों निजी क्षेत्र में हैं।

मुंदरा बंदरगाह अपनी कंटेनर परिचालन क्षमता दुगुना बनाने की प्रक्रिया में है। हिन्दोस्तान के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बंदरगाह, जे.एन.पी.टी. से स्पर्धा करने के लिए वह आक्रामक तरीक़े से जगह बना रहा है। जे.एन.पी.टी. से मुंदरा केवल 300 समुद्री मील की दूरी पर है। सार्वजनिक क्षेत्र के चेन्नई बंदरगाह को कृष्ण्पट्टनम, गंगावरम तथा कट्टूपल्ली जैसे अनेक नये निजी बंदरगाहों के साथ लगातार बढ़ती हुई स्पर्धा करनी पड़ रही है।

अडानी पोर्ट्स एण्ड स्पेशल इकानामिक ज़ोन लिमिटेड (अपसेज़) 1998 में आरंभ हुआ। अब यह निजी कंपनी हिन्दोस्तान का सबसे बड़ा बंदरगाह निर्माणकर्ता तथा परिचालक बन चुकी है।

वह हिन्दोस्तान के सबसे बड़े व्यवसायिक बंदरगाह मुंदरा का परिचालन करता है और वित्त वर्ष 2020 में हिन्दोस्तान के 15 प्रतिशत माल का आवागमन उससे हुआ है। उसने वित्त वर्ष 2020 में 11,873 करोड़ रुपये (1.68 अरब अमरीकी डालर) कमाये हैं। उस वर्ष माल का परिचालन करने की उसकी क्षमता 41 करोड़ मिट्रिक टन थी और उसने वर्ष 2019 में 20.8 करोड़ मिट्रिक टन माल का परिचालन किया था।

यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि देश के हवाई अड्डों का भी सबसे बड़ा संचालक अडानी है। परिणामस्वरूप समुद्री तथा हवाई, दोनों मार्गों में से माल के आने-जाने पर एक निजी पूंजीपति हावी होगा।

दुनिया के बंदरगाहों के पांच सबसे बड़े परिचालकों में से तीन, सिंगापुर का पी.एस.ए., दुबई का डी.पी. वर्ल्ड तथा हौलेंड का ए.पी.एम. टर्मिनल्स आज हिन्दोस्तान में भी कार्यरत हैं। मुंदरा इंटरनेशनल कंटेनर टर्मिनल के 100 प्रतिशत शेयरों का अधिग्रहण पी. एण्ड ओ. पोर्ट्स ने कर लिया है। आज हिन्दोस्तान के सबसे बड़े कंटेनर टर्मिनलों में से मुंदरा का दूसरा नम्बर है। गुजरात पिपावाव पोर्ट लिमिटेड पी.पी.पी. माडल पर है जिसके 43.01 प्रतिशत शेयर ए.पी.एम. टर्मिनल्स के पास हैं। आज इस बंदरगाह की कंटेनर क्षमता 13.5 लाख टी.ई.यू., 50 लाख टन सूखा माल तथा 20 लाख टन तरल माल की क्षमता है। देश में सबसे बड़ा बंदरगाह संचालक डी.पी. वर्ल्ड है जो इस समय मुंदरा, जे.एन.पी.टी., कोच्ची, चेन्नई, विशाखापट्टनम तथा कुल्पी बंदरगाहों पर परिचलन करता है।

इंडियन प्राइवेट पोर्ट्स एंड टर्मिनल्स एसोसिएशन के महासचिव शशांक कुलकर्णी ने स्पष्टता से घोषित किया है कि “भविष्य में प्रमुख बंदरगाहों के टर्मिनल्स को निजी खिलाड़ी ही चलाएंगे”।

बंदरगाहों का निजीकरण हिन्दोस्तानी तथा विदेशी इजारेदारों का कार्यक्रम है। वे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का नियंत्रण करना चाहते हैं। वे उसे मुनाफ़ा कमाने के एक मार्ग के रूप में देखते हैं जहां निवेश मुख्यतः सार्वजनिक धन से किया जाएगा। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता में आाने वाली हर पार्टी ने इस कार्यक्रम को लागू किया है। इसे रोकने के लिए आवश्यक है कि बंदरगाहों के मज़दूर सार्वजनिक क्षेत्र के और मज़दूरों के साथ एकजुट होकर इसका विरोध करें।

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