बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक-2021 :  पुलिस की बढ़ती ताक़त

23 मार्च, 2021 को बिहार विधानसभा ने ‘बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक-2021’ पारित किया। यह विधेयक बिना किसी वारंट के छापे मारने और गिरफ़्तारी करने की पुलिस को बेलगाम छूट देता है। इस विधेयक को विधानसभा में पारित करने के दौरान विपक्ष की पार्टियों के नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया है।

एक नए बहु-क्षेत्रीय विशेष सशस्त्र पुलिस बल की स्थापना को जायज़ ठहराते हुए, इस विधेयक की प्रस्तावना में कहा गया है कि “बिहार… राज्य के हित के लिए एक बहु-क्षेत्रीय विशेष सशस्त्र पुलिस बल की आवश्यकता है जो औद्योगिक सुरक्षा, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डों, मेट्रो रेल आदि की ज़रूरतों को पूरा कर सके”। आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि “ऐसे सशस्त्र पुलिस यूनिटों की तैनाती से राज्य को पूंजी निवेश को आकर्षित करने, औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने में, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व और पर्यटन आदि के स्थानों की रक्षा और सुरक्षा करने में मदद होगी”।

यह विधेयक किसी भी विशेष सशस्त्र पुलिस अधिकारी को “अपने कर्तव्य को पूरा करने में बाधा डालने” या “किसी जगह या इंसान को चोट पहुंचाने की कोशिश” का आरोप लगाकर किसी भी व्यक्ति को, मजिस्ट्रेट के आर्डर के बगैर या किसी भी वारंट के बगैर, गिरफ़्तार करने की पूरी ताक़त देता है। विशेष सशस्त्र पुलिस अधिकारी के पास किसी भी व्यक्ति को इस संदेह पर गिरफ़्तार करने का अधिकार है कि, “संभावना” है कि वह व्यक्ति, किसी व्यक्ति या प्रतिष्ठान के ख़िलाफ़ अपराध करेगा/करेगी। विशेष सशस्त्र पुलिस अधिकारी के पास बिना वारंट के किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने, उसकी और उसके आस-पास की जगहों (घर, ऑफिस, आदि) की तलाशी लेने की पूरी ताक़त होगी। विशेष सशस्त्र पुलिस अधिकारी किसी भी प्रकार के न्यायालय या कानूनी कार्यवाही से सुरक्षित होंगे, जब तक कि सरकार द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता है।

यह साफ नज़र आता है कि इस विधेयक का चरित्र पूरी तरह से जन-विरोधी और बेहद क्रूर है। किसी भी राज्य या निजी मालिकी के कारखाने या प्रतिष्ठान में आंदोलन या विरोध प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों को प्रबंधन के ख़िलाफ़ “बल के प्रयोग की धमकी” के नाम पर गिरफ़्तार किया जाएगा। विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाली महिलाओं तथा युवकों को जेल में बंद कर दिया जाएगा, खासकर तब, जब राज्य आंदोलन को तोड़ने और बदनाम करने के लिए अराजकता और हिंसा फैलाएगा, जैसे कि वह हमेशा करता है। पीड़ितों को अदालतों से न्याय के लिए सहारा नहीं दिया जाएगा।

विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने यह डर जाहिर किया है कि सत्ता चला रही पार्टी इस विधेयक का इस्तेमाल उन्हें डराने तथा उन्हें चुप कराने के लिए करेगी।

इस साल फरवरी के पहले सप्ताह में बिहार और उत्तराखंड की सरकारों ने आदेश जारी किए थे, जिसके अनुसार सोशल मीडिया द्वारा विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले या विरोध में अपनी आवाज़ उठाने वाले लोगों को हानिकारक परिणामों का सामना करना पड़ेगा। इस आदेश के चलते ही अभी पुलिस की शक्तियों को बढ़ाने का विधेयक जारी किया गया है।

हिन्दोस्तान का शासक वर्ग अपने शासन के ख़िलाफ़ हो रहे किसी भी प्रकार के विरोध को कुचलने के लिए, बढ़ती मात्रा में पुलिस का सहारा ले रहा है। हमारे प्राकृतिक संसाधनों, ज़मीनों और श्रम के बेलगाम शोषण और लूट को क़ायम रख कर, हिन्दोस्तानी राज्य, टाटा, अंबानी और ऐसे अन्य इजारेदार पूंजीपतियों के हितों की रक्षा करता है और सबसे तेज़ गति से उनका पोषण सुनिश्चित करता है। यह सब करने के लिए, राज्य की दमनकारी ताक़तों को सुनियोजित तरीके से मजबूत किया जा रहा है, ताकि लोगों के बढ़ते विरोध को आपराधिक ठहराया जा सके और क्रूरता से कुचला जा सके।

एक ऐसे राज्य में जहां मज़दूरों, किसानों, युवकों और छात्रों का अपने हक़ों के लिए आंदोलनों में सक्रिय भाग लेने का इतिहास रहा है, वहां बिना किसी वारंट के गिरफ़्तार करने की ताक़त के साथ बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस बल को स्थापित करने का मक़सद साफ है – जायज़ आंदोलन करने से रोकने के लिये लोगों को आतंकित करना।

Share and Enjoy !

0Shares
0

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *