असम के चाय बाग़ानों के मज़दूरों के लिए झूठे चुनावी वादों का एक और दौर

हिन्दोस्तान में चुनाव का मौसम एक ऐसा समय होता है, जब चुनाव में उतरी राजनीतिक पार्टियां लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए हर एक तरह के फरेब का इस्तेमाल करती हैं। असम में हो रहे विधानसभा के चुनावों में यह साफ नज़र आ रहा है, जहां चाय बाग़ान के मज़दूरों को मिलने वाला वेतन चुनावी मुद्दा बन गया है और हर एक पार्टी इसे बढ़ाने का एक से बढ़कर एक वादा किये जा रही है।

भाजपा ने 2016 के चुनावों के समय वादा किया था कि यदि वह चुनाव जीतती है, तो न्यूनतम वेतन को 351 रुपये प्रतिदिन तक बढ़ा देगी। लेकिन चुनाव जीतने और सत्ता में आने के बाद वह अपने वादे से मुकर गयी। 19 मार्च, 2021 को राहुल गांधी ने वादा किया कि यदि उनकी पार्टी चुनकर सत्ता में आती है तो वह राज्य में चाय बाग़ान मज़दूरों के न्यूनतम वेतन को 365 रुपये प्रतिदिन कर देगी। आगे उन्होंने वादा किया कि चाय बाग़ान के मज़दूरों की समस्याओं को हल करने के लिए वह एक विशेष मंत्रालय का गठन करेगी।

लेकिन राज्य के चाय बाग़ान के 8 लाख से अधिक मज़दूरों के अनुभव ने उनको सिखाया है कि चुनावों में वादे केवल तोड़ने के लिए किये जाते हैं। ये वादे केवल लोगों को फफ़सलाने के लिए किये जाते हैं और उन्हें पूरा करने का कोई इरादा नहीं होता है। चाय बाग़ान के मज़दूर बेहद कम वेतन पर अमानवीय हालातों में जीने के लिए मजबूर हैं। रोजमर्रा की चीजों पर खर्चा करने के बाद अपने बच्चों की शिक्षा या किसी अन्य ज़रूरी खर्चे के लिए उनके पास कुछ भी नहीं बचाता। असम के चाय बाग़ान के मज़दूरों को 167 रुपये प्रतिदिन के लिये बेहद कम मज़दूरी दी जाती है, और राज्य के दक्षिण इलाकों में तो इससे भी कम, 145 रुपये प्रतिदिन की मज़दूरी दी जाती है। मज़दूर का वेतन मज़दूर यूनियन और चाय उद्योगों के मालिकों के बीच समझौते के तहत तय किया जाता है। लेकिन प्लान्टर एसोसिएशन, जो कि चाय बग़ान के प्रबंधन का प्रतिनिधित्व करती है, वह चाय बाग़ान के मज़दूरों के वेतन को राज्य में लागू न्यूनतम वेतन से भी नीचे धकेलती रही है।

एक लंबे अरसे से असम में चाय बाग़ान के मज़दूरों का वेतन कम रहा है। पिछले दो दशकों से मज़दूर यूनियनें पूरे राज्य में एक बराबर न्यूनतम वेतन की मांग करती आई हैं, क्योंकि प्लान्टर एसोसिएशन के साथ चर्चा में तय किया गया वेतन बहुत कम होता है। मज़दूर अपने न्यूनतम वेतन को कम-से-कम 350 रुपये के स्तर पर निर्धारित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन चाय बाग़ान के पूंजीपति मालिकों ने न्यूनतम वेतन देने का हमेशा विरोध किया है। वे दावा करते हैं कि वे मज़दूरों को कई अन्य सुविधाएं मुहैया कराते हंै और ये सुविधायें न्यूनतम वेतन की एवज में दी जाती हैं।

दिसंबर 2018 को जॉइंट एक्शन कमेटी फॉर टी वर्कर्स वेजेस (जे.ए.सी.टी.डब्ल्यू.डब्ल्यू.), जो कि आठ संगठनों का प्रतिनिधित्व करती है, उसने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान किया। चाय बाग़ान में मज़दूरों के वेतन को हर तीन साल में निर्धारित किया जाता है। पिछली बार इसे 2017 में निर्धारित किया गया था। उसके बाद फरवरी 2021 तक वेतन में कोई भी बढ़ोतरी नहीं की गयी है।

चुनावों को ध्यान में रखते हुए असम सरकार ने 20 फरवरी, 2021 को मज़दूरों के वेतन में 50 रुपये प्रतिदिन की बढ़ोतरी का ऐलान किया है। एक सरकारी आदेश के ज़रिये चाय बाग़ान के मज़दूरों के वेतन को 50 रुपये प्रतिदिन, यानी 167 रुपये से बढ़ाकर 217 रुपये प्रतिदिन करने की घोषणा की गई है। लेकिन इंडिया टी एसोसिएशन ने सरकार के इस आदेश को चुनौती देते हुए गुवाहाटी हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की और हाई कोर्ट ने इस सरकारी आदेश पर रोक लगा दी। इसका मतबल है कि 17 चाय कंपनियां, जो असम के 90 प्रतिशत चाय बाग़ानों की मालिक हैं, उनके ख़िलाफ़ मज़दूरों को बढ़ोतरी के साथ अधिक वेतन न देने के जुर्म में, कोई भी कार्यवाही नहीं की जा सकती। इसके बाद लोगों के विरोध को रोकने के लिए चाय बाग़ान के पूंजीपति मालिकों ने बड़ी चालाकी से वेतन में 26 रुपये प्रतिदिन की बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया।

कानून के अनुसार, चाय बाग़ानों को अपने मज़दूरों के लिए आवास और शौचालय का इंतजाम करना अनिवार्य है। लेकिन असलियत में मज़दूरों के घर बेहद खस्ता हालत में हैं, और अक्सर उनके घरों में गंदी नालियों का पानी बहता रहता है। इन सबके बावजूद चाय बाग़ान के मालिक दावा करते हैं कि वे मज़दूरों को इसलिए कम वेतन देते हैं, क्योंकि वे इन सभी सुविधाओं का इंतजाम करते हैं। रहने के लिए गंदी और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हालत और बेहद कम वेतन के चलते चाय बाग़ान के मज़दूर कुपोषित और बीमार रहते हैं। ऐसे हालातों में रहने की वजह से वे दस्त, टी.बी., दिमागी बुखार और चमड़ी के रोग, जैसी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।

हर 5 साल में चुनाव होते रहते हैं। लेकिन चाय बाग़ान के मज़दूरों की हालत जस की तस रहती है। केवल एकजुट और लगातार संघर्ष से ही मज़दूरों के हालात बेहतर हो सकते हैं।

Share and Enjoy !

0Shares
0

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *